padmamesh gupt, hansa deep, anusuya sahu
हिन्दी की ज़मीनें... इस अंक के लिए आब-ओ-हवा के नियमित लेखक विवेक रंजन श्रीवास्तव ने एक प्रश्नावली तैयार कर विदेशों में बसे हिन्दी साहित्यकारों की राय जानी। यूनिवर्सिटी ऑफ़ टोरंटो में लेक्चरर हैं हंसादीप, जिनके खाते में चार उपन्यास, आठ कहानी संग्रह और लोक साहित्य पर पुस्तक है। राष्ट्रीय निर्मल वर्मा सम्मान से विभूषित हैं। मूलतः लखनऊ से डॉ. पद्मेश गुप्त चार दशकों से ब्रिटेन में हैं, प्रतिष्ठित शिक्षाविद्, यू.के. हिंदी समिति और 'पुरवाई' के संस्थापक हैं। और... विश्व हिंदी दिवस जैसे आयोजनों के लिए पहचानी जाने वाली अनुसूया साहू VSSS-Singapore की अध्यक्ष, शिक्षक, साहित्यप्रेमी और हिंदी एवं भारतीय संस्कृति के प्रचार-प्रसार में सक्रिय सामाजिक-सांस्कृतिक कार्यकर्ता हैं। प्रस्तुत है विविध-रंगी एक अनूठी वार्ता...

दूर देस में हिन्दी के अपनों का मन-2

1. परदेस में रहते हुए अगर आपसे कोई पूछे कि आप कहाँ के हैं, तो आप क्या जवाब देते हैं? क्या अब उस जवाब में परदेस ही है?

हंसा: दो नावों में सवार होकर। किसी भारतीय से बात करते हुए- मध्यप्रदेश से और कैनेडियन से बात करते हुए- टोरंटो से। जैसा माथा वैसा टीका।

अनुसूया: भारत मेरी जड़ है और सिंगापुर ने मुझे एक नया अनुभव, नयी दृष्टि और जीवन को देखने का एक अलग नज़रिया दिया है। इसलिए अब कोई पूछे मैं कहाँ की हूँ, तो शायद कहूँगी, मैं भारत की हूँ, लेकिन सिंगापुर ने मुझे बहुत कुछ सिखाया है।

पद्ममेश: मूलतः भारत से, पिछले चार दशक से यू.के. में रहता हूँ, ऑक्सफ़ोर्ड में!

padmamesh gupt, hansa deep, anusuya sahu

2. इस देस में आपका पहला दिन और आज यह देस, दोनों के बीच सबसे बड़ा बदलाव क्या महसूस करते हैं?

हंसा: बदलाव अपने भीतर है, टोरंटोनियन होकर अपनी पहचान बना ली है। टोरंटो शहर की तासीर आज भी उतनी ही प्रभावशाली है।

अनुसूया: जब पहली बार सिंगापुर आयी थी, तब यह बिल्कुल नया और अपरिचित स्थान था। आज लगता है बड़ा बदलाव सिंगापुर में नहीं, बल्कि मेरे भीतर आया है। पहले मैं इसे एक बाहरी दुनिया की तरह देखती थी, आज यह मेरे जीवन की कहानी का हिस्सा है।

पद्ममेश: भारतीयों के प्रति यहाँ के लोगों का सम्मान बढ़ा है, भारतीय संस्कृति जैसे भारतीय व्यंजनों और त्योहारों को स्वीकार करना। दूसरा, आज की पीढ़ी के ब्रिटिश भारतीय अपनी भाषा में संवाद करने में शर्म नहीं महसूस करते और सड़क, बाज़ारों में बेहिचक आपस में बात करते हैं।

3. परदेस में रहते हुए अपने देश की कौन-सी छोटी-सी चीज़ सबसे ज़्यादा याद आती है, ऐसी चीज़ जिसे कोई पर्यटक शायद समझ भी न पाये?

हंसा: मालवा की मिट्टी में ककड़ी-भुट्टों की ढेरी।

अनुसूया: मुझे भारत के लोगों का अपनापन सबसे ज्यादा याद आता है। बिना औपचारिकता के किसी के घर चले जाना, पड़ोसी से अचानक बातचीत, चाय के साथ घंटों बातें… ये छोटी बातें लगती हैं, लेकिन परदेस में इनकी कमी बहुत महसूस होती है। पर्यटक भारत की ख़ूबसूरती देखता है, लेकिन प्रवासी भारत की आत्मीयता महसूसता है।

पद्ममेश: अनौपचारिकता। भारत में मित्रों, रिश्तेदारों के संबंधों में औपचारिकताएं न के बराबर हैं।

4. क्या परदेस में कभी किसी सड़क, मौसम, पार्क, नदी या स्टेशन ने अचानक आपको अपने शहर या अपने गाँव की याद दिलायी है?

हंसा: दिमाग़ी दौड़ बहुत तेज़ है, कहीं भी रहे, अपनापन हर कहीं ढूँढ लेती है।

अनुसूया: हाँ, ऐसा कई बार हुआ है। कभी बारिश की ख़ुशबू, कभी किसी पेड़ की छाया या नदी के किनारे का कोई दृश्य अचानक मुझे बचपन और अपने शहर की यादों में ले जाता है। मुझे लगता है स्मृतियों की कोई सीमा नहीं होती। हम सिंगापुर में खड़े होकर भी पल भर में अपने गाँव या शहर पहुँच सकते हैं।

पद्ममेश: बहुत याद आती है इस प्रश्न के साथ- पश्चिमी फ़ैशन, संगीत, वेश-भूषा और भाषा को अपनाने में भारत सबसे आगे रहता है परंतु यहाँ के लोग अपने शहर, पार्क, नदी, प्राकृतिक सौंदर्य को साफ़-सुथरा रखने के प्रति जागरूक हैं, यह गुण हम भारतीय अपनाने में इतना पीछे क्यों रहते हैं!

भाषा और साहित्य

5. हिंदी आख़िर आपके लिए क्या है, भाषा, स्मृति, घर, पहचान या इन सबके बीच कुछ और?

हंसा: हिंदी मेरा पैशन और प्रोफ़ेशन दोनों है।

अनुसूया: मेरे लिए हिंदी इन सबका संगम है। हिंदी केवल मेरी भाषा नहीं, मेरी स्मृतियों और भावनाओं का घर है। कुछ भाव हम अपनी मातृभाषा में ही गहराई से महसूस पाते हैं। इसलिए मेरे लिए हिंदी भाषा से कहीं बढ़कर मेरी पहचान और भावनात्मक संसार है।

पद्ममेश: अस्मिता के साथ स्वयं से संवाद करती भाषा।

6. क्या विदेश में रहते हुए हिंदी से आपका रिश्ता भारत में रहने की अपेक्षा अधिक गहरा हुआ?

हंसा: हिन्दी से गहरा रिश्ता तो पहले भी था, हाँ, सात समंदर पार इसका विस्तार ज़रूर हुआ है।

अनुसूया: हाँ, निश्चित रूप से। विदेश में जब अचानक हिंदी सुनायी देती है, कोई हिंदी की कविता पढ़ता है या कोई अपनेपन से हिंदी में बात करता है, तो एक अलग ही ख़ुशी होती है।

पद्ममेश: अवश्य। मैं ब्रिटेन से पहले फ्रांस गया था एक विद्यार्थी के रूप में। वहाँ के लोगों का अपनी भाषा के प्रति प्रेम देखकर मुझे समझ आया कि अंग्रेज़ी या दूसरी भाषा जानना प्रतिभा है, परंतु अपनी भाषा के प्रति प्रेम और सम्मान न करना शर्म की बात है। इसी विचार से पंक्तियाँ लिखीं जो आज भी नयी पीढ़ी के साथ साझा करता हूँ:
“प्रगति यदि अंग्रेज़ी है, हिंदी है संस्कार
हिंदी अपने हाथ बनाओ, अंग्रेज़ी हथियार
फिर देखो कैसे होता है हर सपना साकार।”

7. आपको लगता है प्रवासी साहित्य को अलग से ‘प्रवासी साहित्य’ कहना ज़रूरी है? या साहित्य की कोई भौगोलिक नागरिकता नहीं होती?

हंसा: साहित्य किसी सरहद को नहीं स्वीकारता, प्रवासी साहित्य तथाकथित ‘हिन्दीदाँ’ लोगों की देन है। अंग्रेज़ी के लेखक दुनिया के हर कोने में हैं, लेकिन उनके लेखन के लिए कोई प्रवासी रेखा नहीं खींची जाती।

अनुसूया: मेरे विचार से ‘प्रवासी साहित्य’ शब्द पहचान के लिए उपयोगी है, लेकिन साहित्य की कोई सीमा या नागरिकता नहीं होती। रचना का मूल्य उसकी संवेदना और साहित्यिक गुणवत्ता से तय होना चाहिए। प्रवास संदर्भ हो सकता है, साहित्य की सीमा नहीं।

पद्ममेश: जी, विदेशों में वहाँ की संस्कृति और जनजीवन के बीच रहकर लिख रहे हैं, वह हिंदी साहित्य को वैश्विक स्तर पर समृद्ध कर रहा है और आने वाले समय का इतिहास बनेगा। आज हम कह सकते हैं प्रवासियों की दो पीढ़ियों के अथक प्रयास और संघर्ष के बाद प्रवासी साहित्य को मुख्यधारा में मान्यता मिली है। अब हम गर्व से कह सकते हैं हम प्रवासी साहित्यकार हैं। हमारी अपनी पहचान है, ठीक उसी तरह जैसे प्रगतिशील, दलित और स्त्री साहित्य ने अपनी जगह बनायी।

8. परदेस में हिंदी लिखना और भारत में हिंदी लिखना, क्या दोनों अनुभवों में कोई मौलिक फ़र्क है?

हंसा: जी नहीं, मेरी हिन्दी तब भी सरल-सहज थी, आज और भी सहज और सरल हो गयी है।

अनुसूया: फ़र्क वातावरण का है, भाषा का नहीं। भारत में हिंदी हमारे आसपास सहज रूप से मौजूद रहती है। सिंगापुर में रहते हुए हिंदी को अपने जीवन में सक्रिय रूप से जगह देनी पड़ती है। शायद इसलिए विदेश में हिंदी के महत्व को ज़्यादा महसूसती हूँ।

पद्ममेश: हिंदी भाषा तो एक ही है, परंतु लेखन चूंकि अलग परिदृश्य और परिस्थिति में है, इस कारण लेखन का अंदाज़ अक्सर अलग हो जाता है। जैसे वहां चाय पर मिलते हैं और यहां ड्रिंक्स पर!

9. क्या परदेस में रहने से लेखक को अपने देश को अधिक स्पष्टता से देखने की दृष्टि मिलती है?

हंसा: जी बिल्कुल, दूर से देखने पर घास ज़्यादा हरी लगती है।

अनुसूया: बिल्कुल। दूरी कई बार चीज़ों को ज़्यादा साफ़ दिखाती है। भारत में रहते हुए जो बातें सामान्य लगती थीं, सिंगापुर से उन्हें देखने पर उनका महत्व अलग तरह से समझ आया। प्रवास ने मुझे भारत की ख़ूबियों और कमियों को अधिक निष्पक्षता से समझने की दृष्टि दी है।

पद्ममेश: जी ज़रूर। स्वाभाविक है। चाँद पर बैठकर धरती को देखें तो पृथ्वी घूमती नज़र आएगी और धरती से सूरज, चांद उदय और अस्त होते दिखते हैं।

10. प्रवासी होने के कारण आपको भारत में कुछ ज़्यादा महत्व मिलता है? और, हिंदी साहित्य में भारत से बाहर रह रहे लेखकों की रचनाओं को क्या पर्याप्त गंभीरता से पढ़ा और समझा जा रहा है?

हंसा: ऐसा बिल्कुल नहीं है, उल्टा ‘एनआरआई’ का तमग़ा देकर उपलब्धियों को नकारा जाता है। हाँ, इसकी ख़ुशी है कि लेखकों की रचनाओं को गंभीरता से पढ़ा जा रहा है।

अनुसूया: कभी-कभी प्रवासी होने के कारण लोगों में एक अतिरिक्त उत्सुकता ज़रूर दिखती है, लेकिन लेखक भारत में हो या विदेश में, उसकी रचना का मूल्य उसकी गुणवत्ता से होना चाहिए। मुझे लगता है प्रवासी साहित्य को पहले की तुलना में ज़्यादा गंभीरता से पढ़ा जा रहा है, लेकिन अभी भी बहुत कुछ बाक़ी है।

पद्ममेश: यह महत्वपूर्ण वैसा ही है जैसा बेटी जब विवाह के बाद मायके आती है। जब भारत से कोई हमारे पास कार्यक्रम में आता है, तो हम भी उस लेखक को स्थानीय रचनाकारों से अधिक महत्व और सम्मान देते हैं। यह हमारी भारतीय संस्कृति का हिस्सा है।

11. आपको लगता है प्रवासी हिंदी साहित्य ‘भारत की याद’ से आगे निकलकर अपनी स्वतंत्र ज़मीन बना चुका है?

हंसा: नि:संदेह, नॉस्टैल्जिया से मुक्त होकर स्थानीय सामाजिक विद्रूपताएँ अपनी ज़मीन बना चुकी हैं।

अनुसूया: हाँ, अब प्रवासी लेखक अपने वर्तमान जीवन, नयी पीढ़ी, रिश्तों, पहचान, अकेलेपन और बहुसांस्कृतिक समाज जैसे विषयों पर भी लिख रहा है। इसलिए प्रवासी हिंदी साहित्य अब केवल भारत की स्मृतियों तक सीमित नहीं है।

पद्ममेश: निश्चित रूप से। जैसे लेखन जब विद्यार्थी जीवन से शुरू होता है, तो उसमें प्रेम और छात्र जीवन की झलक मिलती है और आगे चलकर वह दूसरे सामाजिक विषयों की ओर बढ़ता है। वैसे ही प्रवासी लेखन की शुरूआत नास्टैल्जिया से होती है और फिर उसमें वैश्विक विषय शामिल होने लगते हैं।

12. जहां, आप रहते हैं, उस देश में हिंदी पढ़ने, लिखने और सुनने वाले लोगों की दुनिया कैसी है? कौन लोग हिंदी से जुड़े हैं?

हंसा: भाषा प्रेमी, शोध प्रेमी, बॉलीवुड प्रेमी और प्रेम में डूबे प्रेमी-प्रेमिकाएँ।

अनुसूया: सिंगापुर में हिंदी से जुड़ा संसार काफ़ी विविध है। भारत से आये लोग तो हैं ही, हिंदी साहित्य, गीत, सिनेमा और भारतीय संस्कृति में रुचि रखने वाले लोग भी हैं। मुझे लगता है साहित्य के साथ संगीत, कविता, नाटक और डिजिटल माध्यम हिंदी को नयी पीढ़ी तक पहुँचाने के बहुत अच्छे साधन हैं।

पद्ममेश: आज की तारीख़ में अच्छी संख्या है। प्रवासी भारतीयों की मिलेनियल पीढ़ी मुझे लगता है कि मेरी पीढ़ी के मुक़ाबले इस मामले में अधिक जागरूक है। यहाँ तक कि मैं ऐसे अनेक परिवारों को जानता हूँ जो दूसरी और तीसरी पीढ़ी के प्रवासी भारतीय हैं, अपने बच्चों को हिंदी पढ़ा रहे हैं। उभरते हुए नये लेखकों की भी संख्या है। लंदन में कविता कैफ़े-ओपन माइक के द्विमासिक कार्यक्रमों में मुझे अनेक ऐसे नये हिंदी लेखकों से मिलने का अवसर प्राप्त होता है।

13. क्या नयी पीढ़ी के बच्चे, जिनकी पहली भाषा अंग्रेज़ी है, हिंदी साहित्य से जुड़ना चाहते हैं? अगर हाँ, तो उन्हें जोड़ने का सबसे अच्छा रास्ता क्या है?

हंसा: सबसे अच्छा रास्ता है- हाई-फ़ाई जॉब उपलब्ध करवाना।

अनुसूया: हाँ, उनमें रुचि है, लेकिन हिंदी पढ़ाने से पहले उन्हें हिंदी से जोड़ना होगा। कहानी, कविता, गीत, नाटक, हास्य और सोशल मीडिया जैसे माध्यमों के ज़रिये उनके रोज़मर्रा के जीवन और भावनाओं से हिंदी को जोड़ना प्रभावी होगा।

पद्ममेश: अच्छा सवाल है। यू.के. हिंदी समिति द्वारा हिंदी ज्ञान प्रतियोगता के अंतर्गत आयोजित परीक्षाओं और प्रतियोगिताओं में प्रतिवर्ष सैकड़ों विद्यार्थी भाग लेते हैं। इस वर्ष से उसमें हिंदी साहित्य का नया लेवल जोड़ा गया है, जिसमें अनेक एडमिशन हुए हैं। यह अच्छा संकेत है।

कुछ निजी बातचीत

14. आपके जीवन में कौन-सी किताब है, जिसने आपको भीतर से बदल दिया?

हंसा: एक नहीं, कई किताबें हैं।

अनुसूया: मेरे जीवन में कुछ किताबें ऐसी रही हैं जिन्हें मैंने केवल पढ़ा नहीं, बल्कि महसूस किया है। अच्छी किताब वही होती है, जो पढ़ने के बाद हमें पहले जैसा नहीं रहने देती। उसने मेरे सोचने के तरीक़े, जीवन को देखने की दृष्टि और अपने भीतर झाँकने की क्षमता को प्रभावित किया है।

पद्ममेश: कोई एक ऐसी किताब नहीं है जिसका उल्लेख कर सकूँ।

15. आजकल क्या पढ़ रहे हैं? क्या ऐसी कोई किताब है जिसे पढ़कर लगा हो इसे पहले क्यों नहीं पढ़ा?

हंसा: जी हाँ, स्वदेश दीपक की किताब- ‘मैंने मांडू नहीं देखा’।

अनुसूया: मैं एक ही तरह का साहित्य पढ़ने तक ख़ुद को सीमित नहीं रखती। साहित्य के साथ इतिहास, समाज, संस्कृति और समकालीन लेखन भी पढ़ती रहती हूँ। कई बार कोई पुरानी किताब अचानक मिलती है और सचमुच लगता है— इसे मैंने पहले क्यों नहीं पढ़ा!

पद्ममेश: आजकल दिव्या माथुर का उपन्यास ‘तिलिस्म’ पढ़ रहा हूँ।

16. क्या लेखक के लिए देश बदलना उसकी भाषा बदल देता है, या भाषा के भीतर छिपा देश उसके साथ चलता रहता है?

हंसा: भाषा मेरे साथ रही है, भीतर छिपा देश स्वत: ही साथ चलता है।

अनुसूया: बचपन की स्मृतियाँ, घर की बोली, मुहावरे, रिश्ते और संस्कार मन में गहरे बसे होते हैं। देश बदलने से हमारा परिवेश बदल सकता है, लेकिन हमारी भाषा के भीतर जो भावनात्मक संसार बना है, वह साथ चलता रहता है।

पद्ममेश: दोनों ही बातें हो सकती हैं। यदि हम अपनी भाषा छोड़कर दूसरी भाषा में भी लिखें, हमारा मूल दृष्टिकोण नहीं बदल सकता। हमारे प्रवासी भारतीय समुदाय के अंग्रेज़ी लेखकों की पुस्तकों में भारतीयता के समस्त रंग मिलते हैं।

17. लिखते समय आपको कभी लगता है आप परदेस में बैठकर भारत को लिख रहे हैं, या भारत और उस देश के बीच एक तीसरी दुनिया को?

हंसा: जी नहीं, टोरंटो में बैठकर टोरंटो को ही लिखती हूँ, भारत यात्रा में भारत को। तीसरी दुनिया की ज़हमत उठाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती।

अनुसूया: कई बार मुझे लगता है मैं दोनों के बीच खड़ी होकर लिख रही हूँ। भारत मेरी स्मृतियों में है और सिंगापुर मेरे वर्तमान अनुभवों में। शायद यही प्रवासी जीवन की सबसे ख़ूबसूरत बात है।

पद्ममेश: एक तीसरी दुनिया। इसे मैं ब्रिटिश इंडिया लेखन भी कह सकता हूँ या इस दुनिया का नाम वैश्विक भारत भी हो सकता है।

भारत और विदेश

18. भारत और एक इस देश को पास से देखने के बाद, दोनों समाजों की ऐसी कौन-सी विशेषता है, जिसे आप एक-दूसरे से सीखते हुए देखना चाहेंगे?

हंसा: भारत से पारिवारिक-सामाजिक जुड़ाव और कैनेडा से व्यक्तिगत स्वतंत्रता एवं विविधता का सम्मान।

अनुसूया: मुझे लगता है भारत सिंगापुर से व्यवस्था, सार्वजनिक अनुशासन और नागरिक ज़िम्मेदारी जैसी बातें सीख सकता है। वहीं, सिंगापुर भारत की सामाजिक आत्मीयता, विविधता और रिश्तों की गर्माहट से बहुत कुछ सीख सकता है।

पद्ममेश: भारत की संवेदना और ब्रिटेन का अनुशासन।

19. भारत के बारे में उस देश में सबसे बड़ा भ्रम क्या है? और उस देश के बारे में भारत में?

हंसा: कैनेडा में भारत के बारे में बड़ा भ्रम है- ग़रीबी। और कैनेडा के बारे में भारत में सबसे बड़ा भ्रम है- धरती पर क़दम रखते ही पेड़ से डॉलर तोड़ लेंगे।

अनुसूया: सिंगापुर को भारत में कई बार केवल एक बहुत महँगा और अत्यधिक व्यवस्थित शहर मान लिया जाता है, जबकि यहाँ भी बहुत विविध और मानवीय अनुभव हैं। वहीं, भारत को लेकर बाहर कई बार केवल भीड़, ग़रीबी या अव्यवस्था की छवि दिखायी देती है।

पद्ममेश: जो विदेशी लोग भारत कभी नहीं गये हैं, वो भारत को लंदन के साउथहॉल जैसे भारतीय इलाक़ों-सा समझते हैं या फिर बॉलीवुड सिनेमा में जो दिखाया जाता है। भारत में लोग ब्रिटेन के जीवन को अत्यंत लक्ज़री भरा समझते हैं, जबकि ऐसा नहीं है। ब्रिटेन या पश्चिमी देशों में बर्तन धोने, घर साफ़ करने से लेकर बिजली का बिल भरने तक सब काम स्वयं करना पड़ता है।

20. वहां की बहु-सांस्कृतिक दुनिया ने आपकी सोच में क्या बदला है?

हंसा: दिमाग़ की सारी बंद खिड़कियों को पूरी तरह खोलकर, ताज़ी हवा को जगह दी है।

अनुसूया: सिंगापुर ने मुझे सिखाया कि अपनी संस्कृति से प्रेम करने के लिए दूसरी संस्कृति को कमतर समझना ज़रूरी नहीं है। अलग-अलग भाषाओं, धर्मों और संस्कृतियों के बीच रहते हुए मैंने विविधता और सह-अस्तित्व को और गहराई से समझा।

पद्ममेश: वसुधैव कुटुंबकम का अर्थ यहां व्यावहारिक रूप से समाज में मिलता है। यहां के समाज में भारत-पाकिस्तान-बांग्लादेश के लोग मिलकर काम करते हैं और रहते हैं।

21. भारत में रहने वाले किसी साहित्यकार को आप वहां की साहित्यिक दुनिया के बारे में क्या बताना चाहेंगे?

हंसा: हर ज़मीं पर साहित्यसाधक हैं, तो साहित्यबाज़ भी कम नहीं।

अनुसूया: मैं कहूँगी कि सिंगापुर भले ही छोटा देश है, लेकिन यहाँ अनुभवों की बहुत बड़ी दुनिया है। अलग-अलग संस्कृतियों और भाषाओं का साथ रहना साहित्य को नये विषय और नयी दृष्टि देता है। भारतीय साहित्यकारों के लिए यहाँ प्रवासी जीवन, बहु-संस्कृतिवाद और पहचान जैसे विषयों पर बहुत कुछ देखने और लिखने को है।

पद्ममेश: जो भारत में अपनी मार्केटिंग में विशेषज्ञ हैं, सिर्फ़ उन चंद लोगों की रचनाएं पढ़कर नहीं ​बल्कि प्रवासी साहित्य को समझने के लिए समय निकालकर कुछ शोध करिए और गंभीर लेखकों को पढ़कर मूल्यांकन करिए, फिर प्रवासी साहित्य के प्रति अपनी धारणा बनाइए।

22. क्या आपको लगता है प्रवासी भारतीय अब केवल भारत की स्मृतियों के वाहक नहीं, बल्कि दो संस्कृतियों के बीच नये संवाद के रचनाकार हैं?

हंसा: बेशक, आज के लेखन में घर-परिवार के इतर कई ऐसे विषयों पर लिखा जा रहा है, जिन पर पहले कभी हिन्दी प्रवासी लेखकों की कलम नहीं चली।

अनुसूया: बिल्कुल।

पद्ममेश: निश्चित रूप से। प्रवासी भारतीयों को दोनों ही देशों का साहित्यिक, सांस्कृतिक राजदूत कहा जा सकता है।

23. साहित्यिक पत्रिकाओं में अप्रकाशित रचना देने की परंपरा को आप किस तरह देखते हैं? व्यापक साहित्यिक हित की दृष्टि से लेखक, पत्रिका और पाठक के बीच इस संतुलन को आप कैसे देखते हैं?

हंसा: हर संपादक चाहता है भले ही वह मानदेय न दे, पर पाठक उसकी पत्रिका की ओर आकर्षित हों। अप्रकाशित रचना की माँग इसी उद्देश्य के साथ की जाती है। विडंबना यह है कि नामचीन लेखकों की रचनाएँ बार-बार प्रकाशित करके गर्व महसूस करते हैं, जबकि अन्य लेखकों के लिए सीमाएँ तय होती हैं। वैसे एक अच्छी रचना जितनी बार प्रकाशित होगी, उतने ही पाठकों तक पहुँचेगी और पढ़ी जाएगी।

अनुसूया: मेरे विचार से लेखक और पत्रिका के बीच विश्वास और पारदर्शिता बहुत ज़रूरी है। लेखक अपनी रचना को पाठकों तक पहुँचाना चाहता है और पत्रिका भी मौलिक रचनाओं के माध्यम से अपने पाठकों को बेहतर साहित्य देना चाहती है। स्पष्ट संवाद और एक-दूसरे के अधिकारों का सम्मान इस संतुलन को बनाये रखने का सबसे अच्छा तरीक़ा है।

पद्ममेश: आज इंटरनेट के समय यह बहुत बड़ी चुनौती है। 1997 में मैंने लंदन में ‘पुरवाई’ पत्रिका का प्रकाशन शुरू किया परंतु 2013-14 में उसे बंद करने का निर्णय इसी कारण से लिया क्योंकि अप्रकाशित रचनाओं का जैसे अकाल पड़ गया था। कहीं न कहीं सोशल मीडिया पर वह रचना प्रकाशित मिल जाती थी। यह अलग बात है ‘पुरवाई’ तेजेन्द्र जी के संपादन में ई-पत्रिका के रूप में अब भी चल रही है।

हालांकि सकारात्मक पक्ष यह भी है कि इंटरनेट की दुनिया हो या प्रकाशित पत्रिकाओं की, सबके पाठक वर्ग अलग हैं। अतः यदि कोई रचना चार अलग-अलग मंचों पर प्रकाशित होती है और अधिक पाठकों तक पहुँचती है तो इसमें कोई बुराई नहीं है।

कुछ हट के…

24. अगर वहां आपको एक दिन के लिए कोई भारतीय शहर मिल जाये, तो कौन-सा शहर चुनेंगे और उस दिन वहाँ क्या करेंगे?

हंसा: मैं अपनी जन्मभूमि मेघनगर चुनूँगी और वहाँ अपने घर की देहरी पर बैठकर अपनी ही कहानी लिखूँगी।

अनुसूया: मैं शायद अपना शहर या अपना गाँव चुनूँगी। किसी पर्यटन स्थल के बजाय पुराने रास्तों पर घूमूँगी, अपने लोगों से मिलूँगी, घर का खाना खाऊँगी और बहुत सारी बातें करूँगी। शायद उस एक दिन में मैं अपने बचपन को फिर से जीना चाहूँगी।

पद्ममेश: इसमें अगर का क्या, मैं लंदन को ही भारत का एक्सटेंशन मानता हूं। वैश्वीकरण के इस युग में दुनिया के कितने ही शहर अपने आँगन में अच्छा-ख़ासा भारतीय कोना संजोये हुए हैं। अपनी भाषा में घूमने, भारतीय व्यंजन, गीत-संगीत और साहित्य की आब-ओ-हवा की सुगन्ध मिल ही जाती है।

25. अगर आपकी ज़िंदगी पर लंदन की कोई सड़क, स्टेशन या नदी एक कविता लिखे, तो उसका शीर्षक क्या होगा?

हंसा: ‘अपनेपन की आहट’।

अनुसूया: शायद शीर्षक होगा— ‘दो किनारों के बीच’। मेरा जीवन भी कुछ ऐसा ही है।

पद्ममेश: ‘दूर बाग़ में सोंधी मिट्टी’।

26. ऐसी कौन-सी अंग्रेज़ी अभिव्यक्ति है जिसे आप चाहते हैं कि हिंदी में भी उसी सहजता से इस्तेमाल किया जा सके?

हंसा: Every place has its own vibe. (vibe के लिए सहज हिन्दी शब्द नहीं मिला।)

अनुसूया: “Take care” मुझे बहुत सुंदर और सहज अभिव्यक्ति लगती है।

पद्ममेश: I miss you! इसे हिंदी में इतनी ही संवेदना से कैसे लिखा जा सकता है?

27. और हिंदी का ऐसा कौन-सा शब्द है जिसका अंग्रेज़ी में आपको कोई बिल्कुल वैसा साथी शब्द नहीं मिलता?

हंसा: मस्त – “तू चीज़ बड़ी है मस्त-मस्त” (अंग्रेज़ी साथी आज तक नहीं मिला।)

अनुसूया: मेरे लिए “अपनापन” ऐसा ही शब्द है। इसका अर्थ केवल belonging नहीं है। इसमें आत्मीयता, निकटता, प्रेम और एक भावनात्मक रिश्ता सब शामिल हैं।

पद्ममेश: राम और कृष्ण! कितनी गहरी और बड़ी बातें हम राम या कृष्ण के उल्लेख के साथ आसानी से कह जाते हैं। जैसे सीताराम या राधाकृष्ण की जोड़ी!

अंत की गुफ़्तगू

28. भारत से दूर रहकर भारत के बारे में आपकी कौन-सी धारणा बदली?

हंसा: लंबी दूरी के रिश्ते भी चलते हैं। कितनी ही दूरी क्यों न हो, जड़ें मजबूत हो तो पेड़ कभी हिलता नहीं।

अनुसूया: दूरी ने मुझे भारत को केवल भावनाओं से नहीं, बल्कि अधिक व्यापक और संतुलित दृष्टि से देखने का अवसर दिया। पहले भारत मेरे लिए सिर्फ़ मेरा वर्तमान था, अब वह मेरी स्मृतियों, मेरी पहचान और मेरे अनुभवों का बहुत बड़ा हिस्सा है।

पद्ममेश: अंग्रेज़ी अंतरराष्ट्रीय भाषा नहीं है। दुनिया में 70 प्रतिशत से अधिक देशों में अंग्रेज़ी जानने वाले न के बराबर हैं। भारत में अधिकांश लोग समझते हैं कि अंग्रेज़ी विश्व-भाषा है।

29. परदेस ने आपको अपने बारे में ऐसी कौन-सी बात बतायी, जो भारत में रहते हुए आप नहीं जान पाये थे?

हंसा: बहुत बड़ी बात- ‘मैं सब कुछ कर सकती हूँ।’

अनुसूया: सिंगापुर ने मुझे सिखाया कि इंसान अपनी जड़ों से जुड़े रहते हुए भी ख़ुद को नये परिवेश में फिर से गढ़ सकता है। मैंने जाना हमारी पहचान कोई बंद कमरा नहीं है। उसमें नये अनुभवों और नयी संस्कृतियों के लिए हमेशा जगह होती है।

पद्ममेश: मैं खाना बनाने के अलावा कविता भी लिख सकता हूँ।

30. और अंत में, अगर ‘आब ओ हवा’ के पाठकों से बिना किसी औपचारिकता के बस दो मिनट गुफ़्तगू करनी हो, तो उनसे क्या कहना चाहेंगे?

हंसा: यही कहूँगी- मैं दीप हूँ, जलने के लिए नहीं, प्रकाश फैलाने के लिए। अपने भीतर की उबड़-खाबड़ पगडंडियों पर चलकर इतिहास न सही, कम से कम कहानी तो रच ही दूँगी।

अनुसूया: मैं बस इतना कहना चाहूँगी कि आप दुनिया में कहीं भी रहें, अपनी भाषा, अपनी संवेदनशीलता और अपनी जड़ों से जुड़े रहें। देश से दूर होना जड़ों से दूर होना नहीं है। कई बार दूरी ही हमें अपनी जड़ों की गहराई का अहसास कराती है। पढ़िए, लिखिए, संवाद कीजिए और अपने भीतर के इंसान को जीवित रखिए क्योंकि अंततः साहित्य हमें बेहतर इंसान बनाने की कोशिश ही तो है।

पद्ममेश: भारत से बाहर भी एक भारत बसता है, जो अपने भारत से बहुत प्रेम करता है। प्रवासी भारत से बाहर अवश्य रहता है लेकिन उसके मन में, परिधि में और सपनों में भारत रहता है।

विवेक रंजन श्रीवास्तव, vivek ranjan shrivastava

विवेक रंजन श्रीवास्तव

सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।

1 comment on “दूर देस में हिन्दी के अपनों का मन-2

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!