
- September 14, 2026
- आब-ओ-हवा
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नियमित ब्लॉग रति सक्सेना की कलम से....
कविता के देश मेडिलिन में
हालांकि मुझे आज तक नहीं मालूम कि मेडिलिन जैसे मशहूर फ़ेस्टिवल के लिए मेरा नाम उन तक कैसे पहुँचा, इसलिए जब आमंत्रण पत्र मिला तो मना करने का सवाल ही नहीं था। वीज़ा के बारे में खोज की तो पता चला कि अमेरिकन वीज़ा न होने के कारण आधी दुनिया का चक्कर लगाकर पहुँचना पड़ेगा। मेडिलिन, जो दक्षिण अमेरिका के देश कोलंबिया का शहर है; मेडिलिन, जो कुछ वर्ष पहले तक ड्रग माफ़िया के लिए इतना कुख्यात था कि अमेरिकियों को उस देश में न जाने की सलाह दी गयी थी!
यात्रा भी कम कठिन नहीं थी— त्रिवेंद्रम से मुंबई, मुंबई से एम्स्टर्डम, एम्स्टर्डम से करसावा द्वीप और वहाँ सात-आठ घंटे रुकने के बाद मेडिलिन, वह भी रात के 12 बजे। मैंने घंटे गिनने की कोशिश की, लेकिन जब ज़िंदगी का ही हिसाब नहीं रख पाती तो यात्रा का क्या? मैंने अपनी घड़ी उतारकर पर्स के भीतर रख दी। यात्रा की मेरी सबसे बड़ी तैयारी यही थी।
मुंबई में इमिग्रेशन आदि का झंझट कम नहीं था, लेकिन मुझे हर कहीं सहायता मिल ही जाती है। अकेली यात्राएँ अधिकतर अकेली नहीं होतीं। देश से बाहर निकलने से पहले एक दिन तो पूरा हो गया। एम्स्टर्डम तक की यात्रा भी ठीक-ठाक ही थी। सहयात्री पंजाबी था, तेल निकालने वाली कंपनी का कर्मचारी; उसने पहले अपनी नींद पूरी कर ली, फिर अपनी रामकथा अविराम सुना डाली।
एम्स्टर्डम में मैं दाँत साफ़ कर मुँह धोना चाहती थी, लेकिन इन यात्राओं में अपने सामान को ढोकर बाथरूम के भीतर रखना मुझे रुचिकर नहीं लगता था। तभी वह युवक दिख गया, जो मुंबई में चेकिंग के वक़्त मेरे साथ खड़ा था, बेहद चुपचाप-सा। मैं उस गेट को खोज रही थी जहाँ से मुझे करसावा के लिए फ़्लाइट लेनी थी। वह पास आकर बोला, ‘मैडम, कन्फ़्यूज़ हो रही हैं क्या?’ मैंने कहा, ‘हाँ वह तो है, फ़्रेश भी होना चाहती हूँ।’ उस अनजाने ने कहा, ‘तो जाइए, पहले मैं आपका सामान देखता हूँ, फिर आप मेरा…’ अनजानी जगहों पर अनजाने लोग बड़े अपने-से लगते हैं।

मैं चुपचाप बैठी थी कि कुछ अनाउंसमेंट सुना, निस्संदेह डच भाषा में; उसे सुनते ही लोग जल्दी से दूसरी ओर भागने लगे। मैं चौकन्नी तो थी, एक सुरक्षा कर्मचारी से पूछा तो उसने कहा कि गेट चेंज हो गया है। मैं घबरा गयी और भीड़ का पीछा कर चलने की कोशिश करने लगी… इस बार मेरे साथ एक कॉलेज स्टूडेंट थी, जो एम्स्टर्डम में फ़िज़ियोथेरेपी की पढ़ाई कर रही थी और अंग्रेज़ी जानती थी। उससे पता चला कि करसावा द्वीप मालदीव की तरह यात्रियों के कारण जीवित है। करसावा में पहुँचते ही भाषा का झंझट और कड़ा हो गया। अंग्रेज़ी जानने वाले अधिकारी एयरोड्रम पर न के बराबर थे। मैंने ट्रांज़िट की ओर जाने की बात की, तो वहाँ खड़ी अफ्रीकी मूल की एक ज़बरदस्त महिला ने मुझसे कहा… ‘नो नो… इमिग्रेशन…’।
एक यूरोपीय महिला ने कहा कि इमिग्रेशन की लाइन में खड़े हो जाओ, शायद ऑफ़िसर अंग्रेज़ी जानता हो। इमिग्रेशन काउंटर पर पहुँचकर मैंने ऑफ़िसर को समस्या बतायी तो उसने मुझे बैठने को कहा और ट्रांज़िट से किसी महिला को बुलाया। वह मुझसे कहने लगी कि आप केलम की फ़्लाइट की बात कर रही हो, लेकिन यह तो कोपा की है। मुझे सात घंटे गुज़ारने थे। एक घंटा तो इस ग़फ़लत में गुज़र गया, अब बाक़ी वक़्त मैं कभी काउच पर बैठती, या घूमती रहती। मुझे लगा कि अंग्रेज़ी के अलावा थोड़ी बहुत स्पेनिश, डच आदि भी आये तो कितना अच्छा हो।
मैं फ़्लाइट को लेकर चौकन्नी थी, भूखी भी थी, क्योंकि 250 रुपये की कॉफ़ी और 200 रुपये की आधा लीटर की पानी की बोतल पर गुज़ारा किया था।
मेडिलिन के लिए रवाना होने पर चैन की साँस ली, लगा कि अब तो मंज़िल क़रीब है। जहाज़ में बैठे यात्रियों का व्यवहार भी यूरोपीय यात्रियों से भिन्न था; ये लोग भारतीयों की तरह ही ज़ोर-ज़ोर से बातें कर रहे थे और हँसी-मज़ाक़ करते हुए सीटें बदल रहे थे। थकावट से मेरी आँखें बंद होने लगीं, और जब खुली तो जहाज़ में तालियाँ बज रही थीं। पूछने पर पता चला मेडिलिन आ गया है और यात्री ख़ुशी ज़ाहिर कर रहे हैं। इमिग्रेशन से निकलते-निकलते एक घंटा और बीत गया था और बाहर निकलते ही एक व्यक्ति मेरे नाम का फ़्लैग लिये खड़ा दिखा…
कविता से पहले शहर
यूँ तो मैं मुंबई से एक जुलाई 2011 को निकली और मेडिलिन एक जुलाई को ही पहुँच गयी, लेकिन यह गणित ज़िंदगी के गणित की तरह पेचीदा था, क्योंकि मुझे घर से निकले क़रीब पचास घंटे बीत गये थे।
मेडिलिन में रात के दो बजे भी अपने कमरे में खाना और जूस देखा तो मन भर आया। इतने घंटों के बाद बिस्तर देखा तो मन ख़ुश हो गया। मेडिलिन का मौसम बेहद हसीन था। न गर्मी, न ठंड; कमरे में पंखा तक नहीं था, मेज़ पर एक टेबल फ़ैन रखा था, लेकिन उसकी ज़रूरत कभी नहीं पड़ी।
बिस्तर तो बढ़िया था, पर नींद का अता-पता नहीं; शायद इतने वक़्त में मैं लगकर सोना ही भूल गयी थी। मुझे लैपटॉप के लिए स्पेशल प्लग चाहिए था। होटल के किसी कर्मचारी को अंग्रेज़ी नहीं आती थी, तभी एक युवा लड़का सहायता के लिए आया। उसने अपना नाम बताया ‘जर्मेन’ और मुझे बाज़ार ले गया। जर्मेन काजोल का प्रशंसक था और हिंदी बॉलीवुड फ़िल्मों का दीवाना। उसकी पत्नी आमिर ख़ान की दीवानी थी। होटल शहर के केंद्र में स्थित था, अतः दुकानें दूर नहीं थीं। हम कुछ दूर तक गये, जहाँ हार्डवेयर और बिजली के सामान की दुकानें थीं, लेकिन मुझे यह देखकर आश्चर्य हुआ कि अधिकतर दुकानों पर लोहे के शटर थे, जो ग्राहक और दुकानदार को अलग करते थे। संभवतः यह लूटपाट से बचने का उपाय था।
सड़कें साफ़ थीं, लेकिन किनारे पर भिखमंगों की तरह सोये हुए लोग थे, जिनसे लोग बच रहे थे। संभवतः माफ़िया के लोग रहे होंगे, जो जीर्ण अवस्था में पहुँच गये हैं। जर्मेन ने बताया उनकी वर्तमान सरकार माफ़िया के प्रति बेहद कठोर है, इसीलिए मेडिलिन बुरे वक़्त से बाहर निकल पाया है, हालाँकि अभी भी लोगों के मन में भय है कि कब ये गैंग पुनः सक्रिय हो जाएं।
दोपहर के दो बजे हमें कार्यक्रम के शुभारंभ में भाग लेने के लिए जाना था। कवितोत्सव का शुभारंभ एक खुले ऑडिटोरियम में था, जहाँ हज़ारों की संख्या में दर्शक बैठे थे; यहाँ स्त्रुगा की तरह टीम-टाम तो नहीं, लेकिन भव्यता थी। मंच पर सौ से ऊपर कवि, कलाकार, डायरेक्टर और टीम के कुछ लोग थे। बेहद सादा-सा शुभारंभ था, आरंभ में अफ्रीकन लोक गायकों द्वारा प्रस्तुति हुई। फ़ेस्टिवल डायरेक्टर ने संक्षिप्त भाषण दिया, और फिर चुने हुए कवियों का कविता पाठ आरंभ हुआ। मैं आश्चर्यचकित थी— न किसी नेता का भाषण, न ही कोई अन्य तड़क-भड़क, जनता और कविता के बीच कोई बाधा नहीं।
हज़ारों की भीड़ थी। मैं जनता की भाव-भंगिमा देखकर आश्चर्यचकित थी। वे हर कविता को ध्यान से सुन रहे थे, दाद दे रहे थे। ऐसा नहीं कविताएँ मंचीय थीं, अधिकतर तो उनके पास अनुवाद के ज़रिये ही पहुँच पा रही थीं, लेकिन फिर भी कविता का सार उनके पास था। मैं कविता के स्तर को देखकर अभिभूत थी, लेकिन श्रोताओं के चेहरे मुझे यह विश्वास ही नहीं करने दे रहे थे कि ये असली दुनिया का हिस्सा हैं।
कविता संभवतया उनकी स्मृति पर छपे दाग़ों पर फ़ाहे का काम करती है… पता नहीं… मैंने यह जुनून कहीं नहीं देखा… और अब देखा तो भूल नहीं पाऊँगी।
रात को नाच-गाने और पीने का कार्यक्रम था, मैंने इस वक़्त को सोने के लिए उपयुक्त समझा… लेकिन रात के दो बजे शोर-शराबे से नींद खुली तो भागकर हॉल में पहुँची… नाच-गाना अपने जुनून पर था। ईरान की रीरा अब्बासी ज़ोरदार ठुमके लगा रही थीं। कारागार में ज़रा-सी भी सेंध मन के पंख खोल देती है।
एक विशाल कविता उत्सव
दूसरे दिन एशिया के कवियों का पाठ म्यूज़ियम पार्क में था। हम लोग दस बजे तैयार होकर निकल पड़े थे। हर कवि को एक-एक पाठक दिया गया था, जो कवि के साथ स्पैनिश में कविता का अनुवाद पढ़ता था और एक अनुवादक था, जो तत्काल अनुवाद कर दर्शकों और कवियों के बीच सूत्र स्थापित करता था। एशिया के हम पाँच कवि थे—जापान, बर्मा, ईरान, अफगानिस्तान और भारत से मैं। कार्यक्रम शुरू होते ही भीड़ आने लगी। हमें हर कार्यक्रम में बीस मिनट दिये गये थे, जो ख़ासा लंबा वक़्त है। मज़ा तो तब आया, जब हम लोगों के मंच से उतरते ही हस्ताक्षर लेने वालों की भीड़ उमड़ पड़ी। मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी में कवियों के साथ ऐसा बर्ताव नहीं देखा। सच मुझे लगा कि मेरी यात्रा सार्थक हो गयी। सुबह का वक़्त विश्व के चौंतीस पोएट्री फ़ेस्टिवल डायरेक्टरों की मीटिंग के लिए निर्धारित किया गया था।

हम लोग सुबह-सुबह नाश्ते के बाद होटल की ऊपरी मंज़िल में बने हॉल में पहुँचते, जहाँ काफ़ी उम्दा इंतज़ाम था, ख़ास तौर पर अनुवादक बेहतरीन थे। इस फ़ेस्टिवल में सहायक बनने के लिए अनेक छात्र आवेदन देते हैं, और उनका चुनाव होता है। इसलिए लगभग हर कवि के साथ कम से कम एक सहायक होता है। फ़र्नांडो का पूरा परिवर इसमें भाग लेता है।
इस उत्सव के स्वप्नदर्शी
फ़र्नांडो बड़े ड्रीमर हैं, उन्होंने मेडिलिन पोएट्री फ़ेस्टिवल की सोच उस वक़्त रखी, जब मेडिलिन ड्रग माफ़िया का कुख्यात केंद्र बन चुका था और लोग घरों से निकलने में डरते थे। उस वक़्त फ़र्नांडो ने अपने दो मित्रों के साथ पार्क जैसे स्थानों पर बैठकर कविता पाठ शुरू कर दिया, धीरे-धीरे लोग जुड़ने लगे। चुपचाप बैठकर कविता पढ़ना एक चुपचाप-सा अनुष्ठान था, जो उन्हें संबल दे रहा था।
धीरे-धीरे कविता पाठ शुरू हुआ, पहले शहर में, फिर आसपास के इलाक़ों में, फिर पूरे कोलंबिया के कवियों के साथ… अंततः यह एक विश्वस्तरीय पोएट्री फ़ेस्टिवल के रूप में उभरकर आया, जिसमें भाग लेना कोलंबियाई संस्कृति का अहम हिस्सा बन गया। फ़र्नांडो वहीं नहीं रुके, उन्होंने पोएट्री फ़ेस्टिवल को महाकुंभ-सा रूप दे दिया, और उनका स्वप्न था कि वे सभी फ़ेस्टिवल डायरेक्टरों के साथ मिलकर एक वैश्विक मंच बनाएँ, जो एक साथ कई देशों में काम करे।
इसमें कोई संदेह नहीं कि फ़र्नांडो की सोच प्रबल है और वे कुशल मैनेजर भी हैं। सबसे पहले सभी को अपने-अपने फ़ेस्टिवल के बारे में बोलने को कहा गया; इस काम में ही दो-तीन दिन गुज़र गये। प्रस्ताव लाये गये और को-ऑर्डिनेटर कमेटी का चुनाव हुआ। मुझे पता नहीं क्या कारण था, लेकिन जिस तरह से मैं निर्भीकता से अपनी बात रख रही थी, मेरा चुनाव आराम से हो गया। दरअसल, उस वक़्त तो मुझे मालूम ही नहीं पड़ा कि यह महत्वपूर्ण स्थान है।
मेरा सत्र और फिर वापसी
सुबह की बैठकों के अतिरिक्त हम लोग दिन में कहीं न कहीं समूह में ले जाये जाते। कभी पुस्तकालय में, तो कभी बग़ीचे में, तो कभी म्यूज़ियम में। एक दिन हमें बस से नगर दर्शन करवाया गया। मेरा एक कार्यक्रम अकेला था, जिसमें मुझे वैदिक कविता के बारे में बोलना था। अनुवादक का काम बड़ा था… डेनियल नामक युवा मेरे साथ सदैव था। जब मुझे वैदिक पोएट्री के लिए बोलने का मौक़ा मिला, मेरी प्रस्तुति के उपरांत सवालों का सिलसिला शुरू हो गया।
दरअसल हॉल पूरा भरा था, शायद वे लोग किसी आध्यात्मिक गुरु के भाषण की उम्मीद कर रहे थे। मेरी प्रस्तुति तकनीकी तरीक़े से थी। दक्षिण अमेरिका में भारतीय धार्मिक व्यवसायी सजग हैं, हालात ऐसे हैं कि सामान्य जन किसी न किसी तरह शांति चाहते हैं। वे लोग भी वेदों को चमत्कारिक ज्ञान मान रहे होंगे। निसंदेह मेरी प्रस्तुति ने बहुत-से सवालों के लिए रास्ता खोल दिया; परिणाम यह हुआ कि पैंतालीस मिनट का सेशन दो घंटे से ऊपर चला और मेरा दोपहर का भोजन मिस हो गया।
डेनियल मुझे पास के चर्च में ले गया और सिद्धार्थ नामक किताब के बारे में चर्चा करने लगा, जिसे उसने अपने कोर्स में पढ़ा था। डेनियल और उसका भाई, दोनों फ़ेस्टिवल से जुड़े थे, दोनों बहुत स्मार्ट थे; डेनियल मुझे ‘इंडियन मदर’ कहने लगा। उसने बताया उसके माता-पिता का तलाक़ हो गया है। कहने लगा कि मेरे पिता अच्छे हैं, लेकिन शायद अच्छे पति नहीं हैं। ममा ने पिछले महीने फिर से शादी कर ली… अपनी लवर से, जो उन्हें फ़ेसबुक पर मिली, अब वे स्पेन में रह रही हैं… आई एम हैप्पी फ़ॉर माय मॉम।
मैं समझ रही थी कि इस देश की पारिवारिक स्थिति बहुत बिखर गयी है, यह भी मानसिक कष्ट का कारण होगा।
यह मेरी मेडिलिन की पहली यात्रा थी, पूरे दस दिन तक हम कहीं न कहीं कविता पाठ करते, सुबह बैठक में संवाद करते और शाम को सारे लोग नाचना शुरू कर देते… और नाच सुबह तक चलता।
कोलंबियन जन मयूर की तरह होते हैं, जिनके लिए नाचना सांस लेने-सा सहज है; क्या बला का नाचते हैं!
यह यात्रा मुझे पिकनिक सी लगी। बस कविता पढ़ना, बतियाना, हँसना-खिलखिलाना…
ज़िंदगी के खूबसूरत लम्हे…
मेडिलिन की पहली यात्रा में कविता को लेकर यादें थीं, हँसी थी, फ़व्वारे थे, लेकिन इस शहर को समझा तो तभी, जब दोबारा 2014 में, फिर तीसरी बार 2022 में जाना हुआ।
(चित्र परिचय: पहला चित्र सिम्पोज़िया से साभार, ड्रग माफिया पाब्लो एस्कोबार के वॉल पोस्टर का। दूसरे चित्र में मेडिलिन पोएट्री फ़ेस्टिवल में शिरकत करतीं रति सक्सेना।)

रति सक्सेना
लेखक, कवि, अनुवादक, संपादक और वैदिक स्कॉलर के रूप में रति सक्सेना ख्याति अर्जित कर चुकी हैं। व्याख्याता और प्राध्यापक रह चुकीं रति सक्सेना कृत कविताओं, आलोचना/शोध, यात्रा वृत्तांत, अनुवाद, संस्मरण आदि पर आधारित दर्जनों पुस्तकें और शोध पत्र प्रकाशित हैं। अनेक देशों की अनेक यात्राएं, अंतरराष्ट्रीय कविता आंदोलनों में शिरकत और कई महत्वपूर्ण पुरस्कार/सम्मान आपके नाम हैं।
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रति दी। संस्मरण बड़े एतिहाद से लिखा है। कई सांस्कृतिक, सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक सिरे मिलते हैं, एक दूरस्थ नगर के। हम आसानी से भौगोलिक दूरी भूलकर अपने हमसमक्ष लोगों से जुड़े, इसको पढ़ने से।
ये तार जोड़ने के लिए आभार।
अर्चना माथुर