
- September 14, 2026
- आब-ओ-हवा
- 4
नियमित ब्लॉग भवेश दिलशाद की कलम से....
हिंदी की ज़मीनें: परत-दर-परत
हिंदी पर बात शुरू करने से पहले साफ़ समझिएगा मैं जिसे हिंदी कहता, समझता हूं वह समावेशी भाषा है। वह भाषा, जो सदियों की हमारी थाती को सहेजती है न कि उसे किसी तरह बांटने की हामी है। इस अंक की थीम ‘हिंदी की ज़मीनें’ रखने के पीछे संपादकीय विचार यही रहा कि हम इस शब्द की गूंज तक जाएं। इस शब्द के तमाम आयामों तक पहुंचने की कोशिश करें। आप इस ध्वनि का विस्तार किस तरह देख पाते हैं!
मैं परतें खोलता हूं तो बहुत-से सिरे दिखने लगते हैं, जहां से बात की जा सकती है। पहला तो यही कि क्या हिंदी की ज़मीनों से हमारी मुराद किसी भौगोलिकता से है! क्या हम हिंदी का भौगोलिक विस्तार चाह रहे हैं? इसका अर्थ यह है कि हिंदी पट्टी या हिंदी समाज जहां-जहां फैलता है, वक़्त के साथ हिंदी की एक ज़मीन तैयार होती ही है। हालात के मुताबिक़ हर सफ़र में कुछ अलग, कुछ अनोखापन हो सकता है… इस अंक में विभिन्न भू-भागों में बसे हिंदी कलमकारों के ख़यालों, शब्दों का समावेश है भी।
हिंदी की ज़मीनों की बात करते दूसरा ख़याल उभरता है, हिंदी का अपनी सगी ज़ुबानों के साथ रिश्ता क्या है! क्या हम उर्दू को हिंदी की एक ज़मीन या हिंदी को उर्दू की एक ज़मीन कहने के क़ायल हैं? इसी तरह, संस्कृत के लिहाज़ से भी यही सवाल है। और इसके बाद हमारी पुरानी भाषाएं जो अब किसी म्यूज़ियम में ‘बोलियों’ के नाम से फ़्रेमबंद करके रख दी गयी हैं, हिंदी की मौजूदा ज़मीन में वो सब कहां हैं? ऐसे सवाल आते ही जाने कितने ही भाषाई टंटों की तरफ़ ध्यान ज़ियादा जाता है।
इसी बारे में और सोचता हूं तो पुरानी ज़बान और नयी ज़बान वाले पहलू भी भीतर कहीं उछलकूद करते हैं। श्रीलाल शुक्ल के शब्द याद आते हैं:
“जो सारा दिन ऐसी भाषा और शब्दावली का प्रयोग करता है, जिसके शब्द बरसों के इस्तेमाल से अपनी सभी नयी संभावनाएँ खो चुके हैं, जिसका सारा चिंतन और आचरण निर्दिष्ट पद्धति और पूर्वदृष्टांत का पिछलगुआ हो, जिसकी धारणाएँ और विवेक पूर्व के अनुभव से या किसी ऊपरी सत्ता से अनुशासित हों, वह धीरे-धीरे अपने व्यक्तित्व में उन तत्त्वों को आत्मसात् करेगा ही, जो बुनियादी तौर पर अच्छे सर्जनात्मक लेखन के ख़िलाफ़ हैं।”
मुझे याद है पहले दो जुमलों को डॉ. बशीर बद्र अपने ढंग से मुझे समझाया करते थे। कहते थे कि उन्होंने जब शायरी शुरू की थी, तब ऐसे कई अल्फ़ाज़ की लिस्ट बनायी थी, जो अपने मा’नी या तो खो चुके थे, या जिनमें नये मा’नी की गुंजाइश न बची थी। फिर हमेशा एहतियात रखा कि उनकी शायरी में वो तमाम शब्द जगह न पाएं।

दरअसल शुक्ल जी के विचार में बाद के जो जुमले हैं, उन्हें सिरा बनाकर कुछ बात करने का मेरा मन है। ‘जिसकी धारणाएँ और विवेक पूर्व के अनुभव से या किसी ऊपरी सत्ता से अनुशासित हों’, यह वाक्य मुझे पकड़े बैठा रहा है। जब हिंदी के संदर्भ में सोचता हूं तो मुझे यह वाक्य बहुत परेशान करने लगता है।
हिंदी किसकी भाषा है?
मौजूदा हालात में क्या हिंदी कविता की भाषा है? सवाल यह नहीं है कि इस भाषा में कविता लिखी जा रही है, सवाल यह है कि क्या कविता की भाषा इतनी सशक्त है कि हिंदी समाज का प्रतिनिधित्व करती है? क्या कविता किसी दबाव समूह की भूमिका में है? क्या हिंदी समाज कविता की भाषा का ग्राहक है, समर्थक है और उसे अपनी पंचायत या चौपाल में कोई आसन देता है?
क्या अब हिंदी पत्रकारिता की भाषा है? अव्वल तो ‘पत्रकारिता’ शब्द ही अपना अर्थ कितना बचा पा रहा है! रही-सही कोशिशों को मद्देनज़र रख भी लिया जाये, तो पत्रकारिता भी क्या हिंदी समाज के लिए कोई वांछनीय वस्तु रह गयी है? इससे जुड़े तमाम मुद्दों पर आब-ओ-हवा की साप्ताहिक शृंखला ‘ख़बरनामा’ एक बड़ी तस्वीर आपको दे सकती है। एक और लेख इस अंक में इस विषय पर है।
क्या अब हिंदी धर्म की भाषा है? धर्म से आशय कथित चमत्कारी बाबा, कथित प्रवचनकार, कथित भजन मंडली जैसे व्यावसायिक समाजों से नहीं है। धर्म से आशय उस शाश्वत, सनातन ज्ञान से है, जो दरअसल प्रकृति से जोड़ता है, नैसर्गिकता से जोड़ता है। आडंबरों और कुतर्क के नंगे शोर में सच्चे धर्म की आहट तक भी है?
क्या हिंदी ज्ञान-विज्ञान की भाषा कहा सकती है? कुछ विद्वानों का तर्क है स्थिति में लगातार सुधार हुआ तो है, फिर भी हमारा शिक्षा-ढांचा, रोज़गार-ढांचा और महत्वाकांक्षा के ग्राफ़ चीखकर गवाही देते हैं कि हिंदी अब भी बदहाल है। शोध, अनुसंधान, दर्शन जैसे कितने ही मोर्चों पर हिंदी अपनी पट्टी में ही प्रतिनिधि भाषा नहीं है।
और क्या अब हिंदी कला की भाषा है? हमारा कला संसार कलात्मक मूल्यों पर कितना चल पा रहा है? यह कला जगत भी कोई आवाज़ पैदा कर पा रहा है? विनोबा भावे ने लिखा था, जिस समाज की वाणी दूषित हो उसकी उन्नति नहीं होती। विकास के दावों और हंगामों का अर्थ अलग है और समाज की उन्नति का अलग।
असल में बहुत-सी भाषाओं की स्थिति चिंताजनक है, लेकिन हिंदी का हाल कुछ मामलों में विशिष्ट भी है और क्लिष्ट भी। कविता, साहित्य, विज्ञान, कला जैसी संस्थाएं अब हिंदी समाज की भाषा की झंडाबरदार हैं ही नहीं। हिंदी का सर्वेसर्वा अब किसी को कहा जा सकता है तो, राजनीति और बाज़ार। विद्वान इन दो शब्दों को हिंदी की उपलब्धि भी बता सकते हैं लेकिन यक़ीनन यह धीमा ज़हर ही है।
हिंदी के भविष्य के मुद्दे
इन दोनों शब्दों को व्यापक अर्थों में लिया जाये तो एक बड़ा संसार इन दो शब्दों के भीतर है। बाज़ार शब्द में मनोरंजन से लेकर विज्ञापन, प्रचार और तमाम क्षेत्रों के तमाम तरह के आडंबर शामिल हैं। और राजनीति शब्द के फैलाव से कौन वाकिफ़ नहीं। मोहल्ले से लेकर सूबे तक, दफ़्तर से लेकर घर तक, सड़क से लेकर संसद तक और विकास से लेकर पतन तक… और जाने कहां-कहां से कहां-कहां तक। बात तब और पेचीदा भी होती जाती है, जब राजनीति और बाज़ार दोनों की मिलीभगत को समझने के सिलसिले शुरू होते हैं।
ग़ौर करें तो हिंदी का वर्तमान इसी ज़मीन पर खड़ा है। राजनीति और बाज़ार नाम के दो क्रूर तानाशाह हिंदी को किसी ग़ुलाम शय की तरह अश्लील नाच नचा रहे हैं। हिंदी की इस हालत का सीधा मतलब है कि हिंदी समाज की दुर्गत क्या है। महादेवी जी कहती थीं ऐसा विकास किस काम का कि मनुष्य तो बेहतर हो ही नहीं रहा। वह शायद 80 के दशक में यह चिंता कर रही थीं। तब भी, हिंदी समाज ने अनसुना किया था और हिंदी को ज्ञान, साहित्य, कला के सुपुर्द न कर सौदा सियासत व बाज़ार के हाथ पटा दिया।
महादेवी से बरसों, दशकों पहले गणेश शंकर विद्यार्थी क्या सपना देख रहे थे?
“कोई भाषा मनुष्य जाति को उतना ऊँचा उठाने, मनुष्य को यथार्थ में मनुष्य बनाने और संसार को सुसभ्य और सद्भावनाओं से युक्त बनाने में उतनी सफल नहीं हुई, जितनी कि आगे चलकर हिंदी होने वाली है।”
हिंदी समाज ने ऐसे सपनों की चिता जलाने का काम किया। हिंदी पट्टी पितृपक्ष में कागौर तो रोबोट की तरह (कौए बचे नहीं परंपरा जारी) देती रही, लेकिन अपनी भाषा, अपने पुरखों की भावनाओं की लाज रत्ती भर न रख सकी।
“अब अगर सोच ज़बान को भ्रष्ट करती है, तो ज़बान भी सोच को भ्रष्ट कर सकती है।”
ऑर्वेल के इस आरोप को समझना निहायत ज़रूरी है। सियासत और बाज़ार ने भाषा बल्कि हिंदी को जिस ज़मीन पर ला खड़ा किया है, वह हमारे ख़यालो-फ़िक्र को तबाह कर चुकी है। फिर इसी तबाह सोच-समझ की बैसाखियों पर हमारे शब्द चल रहे हैं।
झकझोरना पड़ेगा ज़मीरे-अवाम को
अब कुछ नहीं मिलेगा सियासत को कोसकर
हिंदी समाज जब हिंदी के भविष्य की चिंता करता है, तो उसके केंद्र में तकनीक का असर, लिपि की बहस, अंग्रेज़ी मानसिकता के प्रभाव जैसे मुद्दे निकलकर आते हैं। ये बहुत सतही बातें हैं। दरअसल हिंदी को अपनी ज़मीन अपने वैचारिक आधारों, अपनी भाव-संपदा और अपनी मानव-कल्याणकारी संवेदना में खोजना है। जब तक हिंदी के इन्फ़्लुएंसर, कंट्रोलर, रेगुलेटर और ऑपरेटर राजनीति और बाज़ार जैसे बदमाश बने रहेंगे, तब तक हिंदी के भविष्य की चिंता के बाक़ी तमाम मुद्दे कोरी बकवास ही हैं।

भवेश दिलशाद
क़ुदरत से शायर और पेशे से पत्रकार। ग़ज़ल रंग सीरीज़ में तीन संग्रह 'सियाह', 'नील' और 'सुर्ख़' प्रकाशित। रचनात्मक लेखन, संपादन, अनुवाद... में विशेष दक्षता। साहित्य की चार काव्य पुस्तकों का संपादन। पूर्व शौक़िया रंगमंच कलाकार। साहित्य एवं फ़िल्म समालोचना भी एक आयाम। वस्तुत: लेखन और कला की दुनिया का बाशिंदा। अपनी इस दुनिया के मार्फ़त एक और दुनिया को बेहतर करने के लिए बेचैन।
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बहुत उम्दा लिखा।
शुक्रिया अनिता जी
बहुत बढ़िया लिखा है मित्र. तुमने हिंदी के आकाश के तक़रीबन सभी पहलुओं को समेटा है.
हिंदी के लोग मूलतः आत्मघाती हैं, अपनी ही भाषा और संस्कृति के दुश्मन. साथ ही वे कमतरी के एहसास में भी डूबे हैं. हिंदी में जो अपनी-अपनी भाषाएँ (जैसे ब्रज,भोजपुरी, मागधी, अंगिका, अवधी) बोल रहे हैं, वो उन्हें जानबूझकर कमतर मानते हैं, शर्म महसूस करते हैं और उन्हें किसी भी तरह से भुलाना चाहते हैं. ऐसा कृत्य केवल बाज़ार का उपभोक्ता करता है, जिसे अपने प्रोडक्ट को ख़राब मानकर दूसरा ख़रीदने की पड़ी है. इसीलिए हिंदी के लोग गंभीर या गहरे सृजन के काम में नहीं जुटते, वहाँ पैसा नहीं है, थोड़ा-बहुत अनुवाद करते हैं, उसमें पैसा है, उसका बाज़ार है. इसीलिए हिंदी में इंफ्लुएंसर संस्कृति उफ़ान पर है और वह इंफ्लुएंसर भी कचरा ही बेच रहा है हिंदी में दूसरी भाषा या डोमेन का लिया हुआ. कमोबेश यही हाल उर्दू का है, जिसे पूरी तरह शायरी की भाषा मान लिया गया है. पाकिस्तानियों ने उसे अपनी भाषा माना, फिर भी उसमें सृजन नहीं करते, हिंदुस्तानियों के लिए तो वह मुसलमानों की भाषा है ही. और हिंदी और उर्दू का यह हाल है, इसी वजह से इनके दिवस मनाए जाते हैं ताकि लोग भूल न जाएँ. क्या पानी में तैर रही मछली को यह रिमाइंडर देना पड़ता है कि यह पानी है जिसमें तुम तैर रही हो? जिन्हें मेरी बातें कटु लगें, वो ज़रा हिंदी और उर्दू के कूप से निकलकर आसपास अपने ही देश की दूसरी भाषाओं पर नज़र दौड़ाएँ.