gautam, buddha, satya ki khoj
नियमित ब्लॉग सलीम सरमद की कलम से....

सत्य एक अद्भुत भ्रम

             “हम सत्य नहीं पा सकते हैं।” -नोवालिस

गैलीलियो ने एक सत्य को दिखाया। इसके कारण उन्हें अपने घर में नज़रबंद कर दिया गया, उनके लिए मृत्यु दंड भी सोचा जाने लगा जबकि गैलीलियो का सत्य, देखने में कैसा कलात्मक और सुंदर था।

पृथ्वी इस ब्रह्मांड का केंद्र है- यह सोच श्रेष्ठता बोध की तृप्ति के लिए एक ख़ासा है मगर यह विचार ‘स्थायी सत्य’ की संकल्पना को धक्का देने वाला साबित हुआ।

शहर का सत्य उसकी सड़कें होती हैं… जैसे दीवारें मकान का सत्य हैं लेकिन अदृश्य सत्य किसी भी प्रकार की मान्यता का हक़दार नहीं हो सकता।

आदिम युग ‘अनुमान’ को सत्य कह सकता था। उनकी अपनी सीमाएं थीं। मगर आज जिसे शब्दों में व्याख्यायित किया जाये और उसका प्रमाण न हो- सत्य नहीं है।

जैसे प्रेतात्मा एक काल्पनिक सत्य है… और अब तक एक कल्पना को किसी दूसरी कल्पना से ही प्रतिस्थापित किया गया है।

इंसान के साथ उसके सत्य की भी प्रगति होनी चाहिए। भगवान बुद्ध के चार सत्य हैं:

  • सब दुखमय है- जन्म, रोग, सुख भी
  • दुख का कारण है- तृष्णा, विषय आदि
  • दुख का निरोध संभव है- परित्याग से
  • दुख निरोध का मार्ग है- जैसे सम्यक दृष्टि

बुद्ध के सारे सत्य बुद्ध के साथ ही समाप्त हो गये।

सत्य कथाओं की सूरत में हमसे बारंबार टकराता है- कथाएं सत्य की ‘प्रतिच्छाया’ हैं।

हमने कुछ सत्य निर्धारित किये और उनकी ख़ातिर पथ भी बनाये जबकि सत्य किसी कौंध की तरह जीवन में आया और विलोपित हो गया।

  • धर्म- नैतिकता के प्रति ईमानदार है।
  • राजनीति- सामर्थ्य को हासिल करने की जद्दोजहद है।
  • विज्ञान में- प्रकृति के सिद्धांत हैं।

क्या इनमें किसी के पास शाश्वत सत्य है? जो शाश्वत नहीं है- सत्य नहीं है।

समय मात्र बदलाव का आभास है और जो समय के दायरे में फंस जाये वो सत्य नहीं है।

सभ्यता का सत्य इतिहास की गर्त में छुपा है लेकिन इतिहास, कल्पना और संभावना के दरम्यान है। जिसका चुनाव करना पड़े वो सत्य कैसे हो सकता है…

सत्य जैसे तितली और कॉकरोच को तुलनात्मक देखने का नज़रिया है- ऐसा कोई भी सत्य नहीं है जिसे खंडित न किया जा सके।

सबका अपना-अपना सत्य है- ये कहना भी मिथ्या है।

भीड़ और एकांत का सत्य ‘अनुभव’ है। अनुभव जैसे किसी उन्माद की रौ में बह जाना, पुरसुकून… बिल्कुल शांत रहना। अनुभव मन की दशा है।

यदि स्थिरता सत्य की शर्त है फिर मृत्यु भी सत्य नहीं है। जैसे पेड़ पर फूल लगते हैं, फूल की आत्मा से फल बाहर आता है, फल में बीज का वास है और बीज की परिणति है पेड़ यानी एक चक्र जिसमें चेतना के उच्च और निम्न स्तर आते और जाते हैं। चेतना सत्य नहीं है।

सत्य एक मात्र और अद्वितीय है- जबकि यथार्थ ऑब्जेक्टिव नहीं है। यथार्थ दृष्टिकोण है।

आत्मज्ञान- शब्दों की व्यर्थ अकुलाहट है।

ज्ञान वास्तव में बाहरी चीज़ है। जैसे अहंकार, संतोष, करुणा परिस्थिति-जन्य है। कोई भी ज्ञान सत्य का विकल्प नहीं हो सकता।

पवित्रता, विकार, आनंद इनमें कुछ अलौकिक नहीं है। अलौकिकता सत्य का प्रतिनिधित्व नहीं करती। ‘सर्वव्यापी सत्य’ जैसे जीव और परमात्मा एक हैं- ये कहना आलस्य की पराकाष्ठा है।

अध्ययन से विचार पनपते हैं- सत्य नहीं मिलता।
सत्य कोरी अवधारणा है- एक झूठा सा प्रोपेगैंडा।
समाज पर नियंत्रण रखने की चेष्टा…

सत्य एक अद्भुत भ्रम है। जिसने सत्य को प्रत्यक्ष देखने का दावा किया, जिसने अकेले ही सत्य को सुनने का ऐलान किया, जिसने सत्य को अनुभूत किया अस्ल में उसने कुछ नहीं किया। हाँ, उसने बहुत-सी वास्तविकताओं से आँखें फेर लीं।

सलीम सरमद

सलीम सरमद

1982 में इटावा (उ.प्र.) में जन्मे सलीम सरमद की शिक्षा भोपाल में हुई और भोपाल ही उनकी कर्म-भूमि है। वह साहित्य सृजन के साथ सरकारी शिक्षक के तौर पर विद्यार्थियों को भौतिक विज्ञान पढ़ाते हैं। सलीम अपने लेखन में अक्सर प्रयोगधर्मी हैं, उनके मिज़ाज में एकरंगी नहीं है। 'मिट्टी नम' उनकी चौथी किताब है, जो ग़ज़लों और नज़्मों का संकलन है। इससे पहले सरमद की तीन किताबें 'शहज़ादों का ख़ून' (कथेतर) 'दूसरा कबीर' (गद्य/काव्य) और 'तीसरा किरदार' (उपन्यास) प्रकाशित हो चुकी हैं।

1 comment on “सत्य एक अद्भुत भ्रम

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