shukriya kitab, saanjh ki bela, gulshan nanda book
(विधाओं, विषयों व भाषाओं की सीमा से परे... मानवता के संसार की अनमोल किताब -धरोहर- को हस्तांतरित करने की पहल। जीवन को नये अर्थ, नयी दिशा, नयी सोच देने वाली किताबों के लिए कृतज्ञता का एक भाव। आब-ओ-हवा पर 'शुक्रिया किताब'... इस बार एक संस्मरण के रास्ते से हिंदी के एक लोकप्रिय उपन्यास की चर्चा। -संपादक)
मनोज जैन मधुर की कलम से....

अध्ययन को व्यसन बना देने वाली किताब

           यह लेख लिखते समय संपादक को श्रेय न देना मुझे निजी तौर पर बेमानी लग रहा है। यदि आब-ओ-हवा ने मुझे अपनी पसंद की पुस्तक के संदर्भ में न उकसाया होता, तो शायद ही मैं अपने बचपन में लौट पाता। अपनी प्रिय पुस्तक के बहाने आज पचपन वर्ष की उम्र में भी मैं अपने मन में छिपी कुछ उजली, तो कुछ धुंधली तस्वीरों को जस का तस देख पा रहा हूँ। स्मृतियाँ सचमुच समय की सबसे विश्वसनीय पोटली होती हैं, जिन्हें खोलते ही जीवन के कई भूले-बिसरे दृश्य आँखों के सामने जीवित हो उठते हैं।

मेरा बचपन शिवपुरी ज़िले के एक छोटे-से गाँव में बीता, जहाँ न पहले कोई पुस्तकालय था और जहाँ तक मुझे स्मरण है, न ही आज है। पढ़ने-लिखने से लगाव बचपन से ही रहा। गर्मियों की लंबी छुट्टियों के बाद जब जुलाई में स्कूल खुलते, तब गाँव के छोटे-से बाज़ार की इक्का-दुक्का स्टेशनरी दुकानों पर नयी किताबें सज जाती थीं। मेरी इच्छा हर बार नया कोर्स लेने की होती, पर हाथ प्रायः पुरानी किताबें ही लगतीं।

पूरे कोर्स में सबसे पहले हिंदी की पुस्तक खोलना, उसमें छपी कविताएँ और कहानियाँ पढ़ जाना मेरे लिए किसी उत्सव से कम न था। वही जुनून धीरे-धीरे साहित्य की ओर ले गया। साहित्य की जो थोड़ी-बहुत समझ बनी, उसकी पहली नींव वहीं पड़ी। कथा-सम्राट मुंशी प्रेमचंद मेरे लिए सदाबहार नायक रहे हैं। उनके बाद भले हज़ारों लेखक आये हों, पर मेरे भीतर उनकी जगह कोई नहीं ले सका। उनकी अनेक कहानियाँ पढ़ीं, पर नमक का दरोगा आज भी स्मृति में वैसी ही ताज़ा है।

पाठ्यक्रम में प्रस्तुत कविता— फिर विद्या चाहे कोई-सी भी— कभी नहीं छूटी। तब का बना संस्कार आज भी बदस्तूर है। मूलतः छंद, उसमें भी गीत-नवगीत लिखने के बावजूद, मुझे हर फ़ॉर्मेट की कविता पसंद है। गीत-नवगीत को मैंने कभी खांचे में बाँटकर नहीं देखा; यह मेरे लिए आज भी कविता का एक प्रारूप और प्रकार ही है।

shukriya kitab, saanjh ki bela, gulshan nanda book

मुझे याद है, उन दिनों मेरे गाँव में लाइट के कनेक्शन सिर्फ़ दो-चार संभ्रांत घरों में हुआ करते थे। हम लोग लालटेन की चिमनी के प्रकाश में पढ़ा करते थे। उन दिनों आस-पास के इलाक़ों में दस्युओं का बोलबाला था। सारा गाँव रात भर जागता था। कड़ाके की ठंड में बिताये सर्दियों के दिन हों या गर्मियों की उमस भरी रातें, धीरे-धीरे सारी यादें इस कॉलम के बहाने ताज़ा हो रही हैं।

अमावस की काली रात हो या पूर्णिमा की चाँदनी, आज अचानक सारा गाँव आँखों के सामने तैर आया। सबसे पहले याद आया बब्बा का वह कुआँ, जो पूरे गाँव में पीने के पानी का एकमात्र स्रोत था। भीषण गर्मियों में जब तालाब सूख जाते, पोखरों की मिट्टी फट जाती और धरती तपने लगती, तब भी बब्बा का कुआँ अपनी गहराई में जीवन सँजोये रहता। सुबह-शाम वहाँ घड़ों की खनक, रस्सियों की चरमराहट और लोगों की बातचीत से ऐसी चहल-पहल रहती कि वह कुआँ गाँव का धड़कता हृदय लगता था।

इन्हीं स्मृतियों के बीच मुझे गाँव का एक अनोखा व्यक्ति याद आता है—रमेश, जिसे सब लोग प्यार से “फ़ौजी” कहते थे। शायद उसके स्वभाव, चाल-ढाल या फ़ौज से जुड़े अनुभवों के कारण यह नाम पड़ा होगा। फ़ौजी को किताबों के बाहरी आकर्षण से बड़ा प्रेम था। जिल्द, काग़ज़, चित्र और छपाई, इन सबमें वह एक अलग ही सौंदर्य देखता था। इसी अनुराग ने उसे प्रेरित किया और उसने गाँव में पुरानी पुस्तकों की एक छोटी-सी दुकान खोल ली। उस दुकान से किसने कितना लाभ उठाया, यह कहना कठिन है, पर मेरे जैसे पुस्तक-प्रेमी के लिए वह किसी ख़ज़ाने से कम न थी।

मेरे भीतर पढ़ने की तीव्र ललक थी, इसलिए मैंने फ़ौजी से दोस्ती गाँठ ली। हमारी उम्र में लगभग दुगुना अंतर रहा होगा, पर मन की निकटता ने उस दूरी को कभी महत्व नहीं दिया। मैं उससे वही बातें करता जो उसे प्रिय थीं— फ़ौज के क़िस्से, अनुशासन की बातें, दूर-दराज़ की यात्राओं के अनुभव और किताबों की दुनिया के प्रसंग। वह बड़े रस लेकर सुनाता और मैं मंत्रमुग्ध होकर सुनता। धीरे-धीरे उसकी दुकान केवल पुस्तकों की जगह न रहकर संवाद, सीख और आत्मीयता का ठिकाना बन गयी।

जहाँ तक मुझे याद है, मैंने फ़ौजी की दुकान से तत्कालीन अनेक पत्र-पत्रिकाओं सहित मंटो, प्रेमचंद, हरिशंकर परसाई, ओशो, शरतचंद्र, अमृता प्रीतम, निराला, बच्चन, दिनकर, त्रिलोचन जी सहित लुगदी साहित्य के भी अनेक उपन्यास पढ़े। पर गुलशन नंदा का एक उपन्यास ‘सांझ की बेला’ ऐसा दिलो-दिमाग़ पर छाया कि आज तक विस्मृत नहीं हो सका।

गुलशन नंदा का उपन्यास ‘सांझ की बेला’ मानवीय रिश्तों की सूक्ष्म संवेदनाओं और प्रेम के जटिल रूपों को अत्यंत भावनात्मक ढंग से प्रस्तुत करता है। कहानी की धुरी संध्या, बेला और आनंद के त्रिकोणीय संबंधों पर टिकी है, जहाँ स्नेह, ईर्ष्या और अधिकार की भावनाएँ एक साथ उलझती हैं। संध्या का शांत और त्यागमयी स्वभाव उसके चरित्र को गहराई देता है, वहीं बेला का चंचल और स्वार्थी व्यवहार कथा में द्वंद्व और तनाव पैदा करता है। जब बेला को संध्या के गोद लिये जाने का रहस्य पता चलता है, तो वह इस सत्य को हथियार बनाकर संध्या के आत्मसम्मान को आहत करती है, जिससे कहानी में भावनात्मक संघर्ष तीव्र हो जाता है।

कथा आगे बढ़ते हुए प्रेम और कर्तव्य के बीच टकराव को उजागर करती है। संध्या का अपने वास्तविक अतीत की खोज में जाना और दूसरी ओर बेला द्वारा आनंद को अपने आकर्षण में बाँधकर उससे विवाह कर लेना, घटनाओं को निर्णायक मोड़ पर ले आता है। लेकिन यह विवाह सुख का नहीं, बल्कि विघटन का कारण बनता है— जहाँ महत्वाकांक्षा और विचारों के टकराव से आनंद का मानसिक संतुलन डगमगाने लगता है। अंततः उपन्यास यह प्रश्न छोड़ जाता है कि क्या सच्चा प्रेम त्याग में है या अधिकार में, और क्या समय के साथ पात्र अपनी ग़लतियों को समझकर जीवन में संतुलन स्थापित कर पाएँगे।

बचपन में पढ़े इस उपन्यास की मूल थीम आज अपने वास्तविक जीवन से कई जगह हू-ब-हू मेल खाती हुई प्रतीत होती है; रोमांस से भरे संवादों को पढ़ते हुए निजी अनुभूतियाँ आज भी दृश्य बनकर आँखों के सामने उतर आती हैं। नंदा जी ने प्राकृतिक दृश्यों— बारिश में भीगते पेड़ों, खिलखिलाते फूलों और उड़ते बादलों— का ऐसा स्वाभाविक और जीवंत चित्रण किया है कि वे कथा के साथ-साथ मन के भीतर भी एक अलग ही संसार रच देते हैं। लेकिन समय के साथ जीवन की प्राथमिकताएँ भी बदलती चली जाती हैं— अब न तो पहले जैसी छुप-छुपकर उपन्यास पढ़ने की आदत रही और न ही वैसी इच्छाशक्ति; समय ने बहुत कुछ बदल दिया है, फिर भी मन के किसी शांत कोने में वह पुराना पाठक आज भी चुपचाप जीवित है, जो अवसर मिलते ही उन पन्नों की दुनिया में लौट जाना चाहता है।

घर वालों की नज़रों से बच-बचाकर कोर्स की किताबों से अधिक उपन्यास और साहित्यिक पुस्तकें पढ़ने की मानो लत लग गयी थी। इन पुस्तकों के बीच सोवियत रूस से आने वाली एक स्निग्ध कवर और ग्लेज़ पेपर पर छपी पत्रिका भी होती थी, जिसमें मैं छिपकर कुछ विशेष क़िस्म की तस्वीरें ढूँढा करता था। बचपन की जिज्ञासाएँ भी कितनी मासूम और रोचक होती हैं।

आज पीछे मुड़कर देखता हूँ तो लगता है— बब्बा का कुआँ गाँव की प्यास बुझाता था और फ़ौजी की दुकान मन की प्यास। एक ने जीवन को जल दिया, दूसरे ने विचारों को उजाला। सच कहूँ तो गाँव की असली समृद्धि वही थी। एक बात मैं पूरे विश्वास से कह सकता हूँ कि बचपन में लगी पढ़ने की यह लत आज पचपन की उम्र तक ज्यों की त्यों बरकरार है।

समय बदला, परिवेश बदला, साधन बदले, पर पुस्तक से जुड़ने का आनंद कभी नहीं बदला। शायद मनुष्य के भीतर यदि कोई सबसे सुंदर व्यसन है, तो वह पढ़ने का व्यसन ही है।

(क्या ज़रूरी कि साहित्यकार हों, आप जो भी हैं, बस अगर किसी किताब ने आपको संवारा है तो उसे एक आभार देने का यह मंच आपके ही लिए है। टिप्पणी/समीक्षा/नोट/चिट्ठी .. जब भाषा की सीमा नहीं है तो किताब पर अपने विचार/भाव बयां करने के फ़ॉर्म की भी नहीं है। edit.aabohawa@gmail.com पर लिख भेजिए हमें अपने दिल के क़रीब रही किताब पर अपने महत्वपूर्ण विचार/भाव -संपादक)

मनोज जैन मधुर, manoj jain madhur

मनोज जैन मधुर

समकालीन हिंदी काव्य जगत में चर्चित नवगीतकार। लगभग आधा दर्जन काव्य संग्रह प्रकाशित। नियमित प्रकाशन और अनेक पुरस्कार/सम्मान। कुछ साहित्यिक संस्थाओं एवं आनलाइन काव्य समूहों आदि का संचालन। पेशे से फार्मा व्यवसाय से संबद्ध लेकिन साहित्यिक व सांस्कृतिक गतिविधियों में विशेष रुचि।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!