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डायरी शशि खरे की कलम से....

यही तो है ड्रैकुलावाद

           दिनांक 19.04.26 समय 23.10

           शाम सात बजे सहेलियों से वीडियो कॉल पर ख़ूब गपशप हुई। साधना ने बताया कि हर जगह एपस्टिन फ़ाइल की चर्चा हो रही है। हमने भी उसके वीडियो देखे हैं।

क्या आदमी फिर गुफाओं की तरफ मुड़ रहा है? फिर से आदिम पशु बन जाएगा?

डायरी-1 पढ़ने के लिए क्लिक करें: चमगादड़ की शवयात्रा और सूरज का इंतज़ार

दुनिया के हालात कितने भयंकर हो गये हैं। काजल ने कहा लेखक भविष्यदृष्टा होता है। ब्रेम स्टोकर ने ये सारी बातें 130 साल पहले अपने उपन्यास ड्रैकुला में रूपक की तरह लिख दी थीं।

बाक़ी तीन सहेलियों ने यह उपन्यास नहीं पढ़ा था इसलिए सबके कहने पर काजल ने सार सुनाया- एक कंपनी का मातहत जोनाथन हार्कर, युवा वकील ट्रांसिल्वेनिया में ड्रैकुला के महल में पहुँचता है। उसे ये सब लोग बहुत अमीर काउंट समझते हैं।

ड्रैकुला 400 साल पुराना योद्धा काउंट का प्रेत है। वासना, भोग और सत्ता से अतृप्ति है और मिट जाने का डर है उसे इसलिए अपने लिए पचास बॉक्स में अपनी जन्मभूमि की मिट्टी भरकर उसे सुरक्षित रखना चाहता है। वह कभी समाप्त नहीं होना चाहता है।

सारी दुनिया पर शासन चाहता है इसलिए लंदन भेजना चाहता है अपने बॉक्स। दिन में उसे सूरज से डर है इसलिए इनमें से किसी एक में छुपकर सोता है। रात के अंधेरे में ताक़तवर होकर उठता है। सारी दुनिया को ग़ुलाम बनाना चाहता है।

आज भी दुनिया की ये ताक़तें ऐसा ही नहीं कर रहीं हैं? मुझे तो लगता है यही… यही ताक़तें ड्रैकुला हैं।

ये भी दिन में अच्छे भले बनकर राष्ट्र सेवा, जनता की भलाई रूपी संदूक़ में रहते हैं और दुनिया से छुपाकर पाप करते हैं।

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शोभा चिल्लाने लगी थी तुम सबको पता है, मैं अकेली रहती हूँ ऐसी बातें क्यों करना?

दिनांक 20.04.26 समय 01.10

पुष्य नक्षत्र में सप्तमी का चाँद खिड़की के ठीक सामने वाले बादल पर टिका है। रंग थोड़ा पीलापन लिये हुए है लेकिन निर्भीक, प्रशान्त चमक मन को भली लग रही है, किन्तु उपन्यास में यही पूरा चाँद अपने इर्द-गिर्द सन्नाटा, सुनसान काली रात को उभारकर ड्रैकुला के लिए भयावह माहौल बनाता है।

इसी चाँद के लिए कितने देश चंद्र अभियान चला रहे हैं। अमेरिका का आर्टेमिस, अभी दस दिनों का फेरा लगाकर वापस आया है।

अपनी धरती को बर्बाद करते हुए मन नहीं भरा, क्यों ये देश इस निर्मल चन्द्र को अपने कब्ज़े में लेना चाहते हैं। इसी अमेरिका के वर्जिन द्वीप समूह में जैफ़री एपस्टिन का ड्रैकुला महल है।

ग़ज़ब संयोग है ड्रैकुला भी सारे क़ानूनी कागज़ात संभालकर तैयार करवाता था। दोनों के काम करने के तरीक़े में समानता है, हनी ट्रैप, ब्लैकमेल, प्रलोभन, धन पैसे का भरपूर उपयोग किया है। बढ़िया प्रीडेटरी नेटवर्क (शिकारी जाल) बुनते थे।

जब कोई महत्वपूर्ण व्यक्ति जैफ़री एप्स्टीन की लग्ज़री का उपभोग कर लेता था, तो उसका बंधक जैसा बन जाता था। चाहकर भी अलग नहीं हो सकता था। एपस्टिन ख़ुद को क़ानूनी सलाहकारों, पूर्व अधिकारियों से घेरकर सुरक्षित रखता था।

ठीक इसी प्रकार ड्रैकुला ने भरपूर पैसा देकर लंदन में ज़मीन के काग़ज़, बक्सों का कस्टम सब के क़ानूनी कागज़ात बनवाकर रखे थे। और फिर भी किसी गवाह को ज़िंदा नहीं छोड़ता था।

इस फ़ाइल में दुनिया भर के महत्वपूर्ण लोगों के नाम जोड़कर रखे हैं, भारत के भी। जिन्होंने सत्ता को अपना धर्म मान लिया, संसार भर के ये विशिष्ट महत्वाकांक्षी सफल नेता, उद्योगपति आदि असीमित भोग, असीमित शक्ति और अमरता की चाह रखते हैं।

इंद्रियों को जब ठूँस-ठूँसकर तृप्त किया जाता है तो कभी तो वे दम तोड़ेंगी और फिर अघाने के बाद शुरू हो जाता है विकृतियों का खिलवाड़। यही तो है ड्रैकुलावाद।

वैन हेलेंस्की मानवता का पक्षधर पवित्र होस्ट लेकर कब आएंगे, कब सूरज निकलेगा और ड्रैकुला की ताक़त ख़त्म होगी।

Shashi khare, शशि खरे

शशि खरे

ज्योतिष ने केतु की संगत दी है, जो बेचैन रहता है किसी रहस्य को खोजने में। उसके साथ-साथ मैं भी। केतु के पास मात्र हृदय है जिसकी धड़कनें चार्ज रखने के लिए लिखना पड़ता है। क्या लिखूँ? केतु ढूँढ़ता है तो कहानियाँ बनती हैं, ललित लेख, कभी कविता और डायरी के पन्ने भरते हैं। सपने लिखती हूँ, कौन जाने कभी दुनिया वैसी ही बन जाये जिसके सपने हम सब देखते हैं। यों एक कहानी संकलन प्रकाशित हुआ है। 'रस सिद्धांत परम्परा' पुस्तक एक संपादित शोधग्रंथ है, 'रस' की खोज में ही। बस इतना ही परिचय- "हिल-हिलकर बींधे बयार से कांटे हर पल/नहीं निशाजल, हैं गुलाब पर आंसू छल-छल/झर जाएंगी पुहुप-पंखुरी, गंध उड़ेगी/अजर अमर रह जाएगा जीवन का दलदल।

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