
- July 21, 2026
- आब-ओ-हवा
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उलटबाँसी विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से....
कॉकरोच वहीं होते हैं, जहाँ गंदगी है
सुनो साधो!
पहले कॉकरोच घर के कोनों में मिलते थे। बड़े समझदार जीव थे। जानते थे उजाले में निकलेंगे तो चप्पल पड़ेगी। इसलिए अँधेरे, सीलन और दरारों से अपनी पुरानी दोस्ती निभाते थे।
पर समय बड़ा शिक्षक है। पेपर लीक, व्यवस्था वीक और जनता की चीख ने कॉकरोचों को भी राजनीति पढ़ा दी।
अब वे कोनों में नहीं मिलते… अधबीच में मिलते हैं।
रोटी और भूख के बीच।
सच और बयान के बीच।
क़ानून और न्याय के बीच।
जनता और व्यवस्था के बीच।
और जबसे हर नाली का रास्ता जंतर-मंतर होकर जाने लगा, तबसे कॉकरोचों ने भी समझ लिया कि सबसे सुरक्षित जगह कोना नहीं, व्यवस्था का अधबीच है। वहाँ जानलेवा चप्पल से अधिक बहसें चलती हैं, निर्णय नहीं।
फ़ायर ब्रिगेड की गाड़ियों से बौछारें चलीं। लगा था कॉकरोच बह जाएँगे…! पर नालियों ने पानी कम, कॉकरोच ज़्यादा उगले।

दूर-दूर से बसों, ट्रेनों और गलियों से वे ऐसे उमड़े, जैसे चुनाव आते ही वादे निकलते हैं… रंग-बिरंगे, आत्मविश्वासी और संख्या में अकूत।
सत्ता ने चप्पल उठायी।
सबसे बुज़ुर्ग कॉकरोच मुस्कराया… “इतनी पुरानी तकनीक? अब इससे कुछ नहीं होगा।”
पुलिस ने ‘हिट’ छिड़का।
वह बोला… “धन्यवाद! विरोध हमारे लिए वही काम करता है, जो खाद फसल के लिए।”
अफ़सर ने फ़िनाइल बहायी। कॉकरोच उसमें ऐसे तैरने लगे जैसे कुछ लोग योजनाओं के बजट में तैरते हैं।
झाड़ू उठायी ही थी कि सलाह आ गयी… “पहले यह सिद्ध कीजिए कि आपकी झाड़ू निष्पक्ष है।”
कॉकरोच अब कीट नहीं रहे थे।
वे प्रतिक्रिया बन चुके थे।
समाचार आया जंतर-मंतर पर उनका धरना चल रहा है।
तख़्तियों पर लिखा था… “अँधेरा हमारा मौलिक अधिकार है।”
“दरारें बचाओ, लोकतंत्र बचाओ।”
“चप्पल हिंसा है, सड़ांध सह-अस्तित्व है।”
देखते-देखते नेता पहुँच गये।
हर दल के दलदल में फँसे नेता कॉकरोच-फ़ौज से मिलने लगे। उन्हें लगा… यह भविष्य का वोट बैंक है।
सरकार के मैनेजमेंट विभाग ने कॉकरोच नेता घर बुलवाये। दो घंटे इंतज़ार भी करवाया, जिससे कॉकरोच अपना महत्व समझ सकें। डमरू भी बजाया पर जादू चला नहीं।
कहा… “कॉकरोच हमारी प्राचीन विरासत हैं।” हमारी संस्कृति हैं।
दूसरे नेता कॉकरोच मंच से बोले… “इन्होंने सदियों का संघर्ष किया है।”
तीसरे ने ट्रूथ सोशल पर घोषणा कर दी… “हमारी सरकार बनी तो हर सीलन को राष्ट्रीय धरोहर घोषित किया जाएगा।”
तालियाँ बजीं।
कॉकरोचों ने मूँछों पर ताव दिया।
पास बैठी छिपकली को पहली बार लगा लोकतंत्र सचमुच सबको अवसर देता है।
इधर एक गृहिणी अपनी रसोई बचाने में लगी थी। उधर टीवी पर बहस चल रही थी… “क्या चप्पल असंवैधानिक है?” “क्या फ़िनाइल पर्यावरण-विरोधी है?” “क्या सफ़ाई सामाजिक न्याय के विरुद्ध है?”
पाँच एंकर गरज रहे थे।
कॉकरोच चुपचाप पिज़्ज़ा, बर्गर, मैगी, ब्रेड और बिस्कुट कुतर रहे थे।
वे जानते थे… खिसियानी बिल्ली खंभा नोचे, कॉकरोच मौज करे।
नगर निगम ने घोषणा की… “इस वर्ष ‘स्वच्छता सम्मान’ उस मोहल्ले को मिलेगा, जहाँ सबसे अधिक स्वस्थ कॉकरोच पकड़कर लाये जाएँगे।”
कारण पूछा गया।
उत्तर मिला… “जैव-विविधता हमारी प्राथमिकता है।”
तर्क, कुतर्क से हार गया। उसने चुपचाप अपना तबादला करा लिया।
एक बूढ़ी अम्मा शिकायत लेकर पहुँचीं… “बाबू, रसोई कॉकरोचों से भर गयी है।”
अधिकारी मुस्कराया… “ऑनलाइन आवेदन कीजिए।”
“फिर?”
“जाँच होगी।”
“उसके बाद?”
“विशेषज्ञ समिति बनेगी।”
“तब तक?”
“सह-अस्तित्व का अभ्यास कीजिए।”
अम्मा लौट आयीं।
उधर कॉकरोच अचार के मर्तबान पर विजय-नृत्य कर रहे थे। तभी मुझे पहली बार कॉकरोचों पर दया आयी।
वे बेचारे तो वही कर रहे थे, जिसके लिए प्रकृति ने उन्हें बनाया है। ग़लती उनकी नहीं थी।
ग़लती तो उनकी थी, जिन्होंने सड़ांध को व्यवस्था और व्यवस्था को उपलब्धि घोषित कर रखा है।
कॉकरोच कभी गंदगी पैदा नहीं करते… वे केवल यह बता देते हैं कि गंदगी कहाँ है।
जिस घर में वे अधिक दिखायी दें, समझ लीजिए वहाँ सफ़ाई कम है।
और जिस समाज में उनकी पैरवी अधिक होने लगे, समझ लीजिए वहाँ सफ़ाई से अधिक सड़ांध की राजनीति होने लगी है।
आँखों पर काली पट्टी, गले में सफ़ेद कॉलर-बैंड और तन पर काला कोट पहने कुछ स्वयंभू न्याय-देवताओं ने भी कॉकरोचों को मुख्यधारा का नागरिक बना दिया था।
अब झाड़ू से पहले उसकी नीयत की जाँच होती है।
चप्पल से पहले उसका चरित्र-प्रमाणपत्र माँगा जाता है।
सफ़ाई से पहले उसकी विचारधारा पूछी जाती है।
और गंदगी…
वह सम्मानित अतिथि की तरह मंच पर विराजमान रहती है।
सुनो साधो!
अब बसंती को डर कोनों में दुबके कॉकरोचों से नहीं लगता… वे तो रोशनी होते ही भाग जाते हैं। डर उन कॉकरोचों से लगता है जो अधबीच में आ बैठते हैं—
रोटी और भूख के बीच,
सच और झूठ के बीच,
क़ानून और न्याय के बीच,
आदमी और उसकी समझ के बीच।
और सबसे अधिक डर उन लोगों से लगता है जो दिखने में साफ़-सुथरे होते हैं, पर अँधेरा मिलते ही अपने भीतर का कॉकरोच बाहर निकाल लेते हैं।
असल कॉकरोच तो केवल सड़ांध में जीते हैं।
पर मनुष्य जब सड़ांध को ही सिद्धांत बना ले, तब वह हर कॉकरोच से अधिक भयावह हो जाता है।

विवेक रंजन श्रीवास्तव
सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।
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