राहुल सांकृत्यायन, rahul sankrityayan, statue vandalism
महापंडित कहे जाने वाले राहुल सांकृत्यायन (09.04.1893-14.04.1963) की प्रतिमा ध्वस्त किये जाने की घटना के परिप्रेक्ष्य में प्रतिमा-स्थापना एवं ध्वंस की संस्कृति के एक दशक (2016-2026) की पड़ताल
निबंध भवेश दिलशाद की कलम से....

प्रतिमाएं और स्मृति-राजनीति का एक दशक

            मूर्तिपूजक भारतीय समाज में प्रतिमाएँ किसी व्यक्ति की आकृति भर नहीं, बल्कि सामूहिक स्मृति की जन-अभिव्यक्ति के रूप में रही हैं। प्रतिमा स्थापना केवल सम्मान का कार्य नहीं, बल्कि घोषणा भी है कि समाज कौन-से मूल्य और आदर्श आने वाली पीढ़ियों को सौंपना चाहता है। मूल्यों व आदर्शों की चर्चा में यह प्रश्न विचारणीय है कि धार्मिक चरित्रों या फिर पूर्व क्रांतिकारियों, प्रसिद्ध नेताओं आदि की मूर्तियों की बहुलता के बीच किसी लेखक, कवि, दार्शनिक या समाज-सुधारक की प्रतिमा स्थापित करने के उपक्रम कितने हुए हैं!

इस संदर्भ में हिंदी-भाषियों के समाज को देखना अपने आप में शोध का विषय है। पिछले एक दशक (2016-2026) में भारत में प्रतिमाओं को लेकर दो परस्पर विरोधी प्रवृत्तियाँ साथ-साथ नज़र आती हैं। एक ओर जगह-जगह प्रतिमाओं के साथ तोड़फोड़ और वैचारिक टकराव, तो दूसरी ओर, देश के विभिन्न कोनों में अनेक साहित्यकारों, कवियों और विचारकों की नयी प्रतिमाएं। दरअसल, स्मृति की राजनीति केवल विध्वंस की कहानी नहीं बल्कि अपने हितों/स्वार्थों के प्रतीकों को स्थापित करने की प्रक्रिया भी है। इन शब्दों से समझें:

“यह विनाशकारी कृत्य पश्चिम बंगाल में भाजपा के उभरने और संघ परिवार की उस सियासी ज़रूरत के साथ गहराई से जुड़ा हुआ है, जिसके तहत वे राहुलजी के जीवन, भारत के स्वतंत्रता संग्राम में उनके योगदान तथा हिन्दी साहित्य में उनके अद्वितीय अवदान के महत्व को कमतर सिद्ध करना चाहते हैं।”

राहुल सांकृत्यायन, rahul sankrityayan, statue vandalism

ये शब्द महापंडित राहुल सांकृत्यायन के वृद्ध पुत्र प्रोफ़ेसर जेता के हैं, जिन्होंने जुलाई 2026 में ही महापंडित राहुल सांकृत्यायन की एक प्रतिमा पश्चिम बंगाल में ध्वस्त किये जाने पर बयान जारी किया। इस बयान में उन्होंने यह भी कहा:

“राहुलजी की प्रतिमा का ध्वंस, त्रिपुरा में सत्ता परिवर्तन के बाद लेनिन की प्रतिमा को जान-बूझकर गिराये जाने की घटना की याद दिलाता है। यह उस मानसिकता का प्रतीक है, जो राहुलजी के विचारों, उनके लेखन और उनके आदर्शों (ख़ासकर हिंदी-भाषी क्षेत्र में, जहाँ युवा पाठक अब भी उनसे प्रेरणा लेते हैं) को मिटा देना चाहती है। प्रगतिशील विचारधारा को स्थायी रूप से समाप्त करने के उद्देश्य से राहुल के स्थान पर राम को स्थापित करने का एक सुनियोजित प्रयास किया जा रहा है।”

हिंदीभाषियों के समाज में किस तरह का प्रतिमा-विस्तार हुआ है, इसकी चर्चा लेख में आगे करेंगे, फ़िलहाल हम प्रतिमा-निर्माण के एक दशक पर नज़र करते हैं।

दक्षिण भारत: साहित्यिक स्मृति का विस्तार

पिछले एक दशक में तमिलनाडु सर्वाधिक ध्यान खींचता है। यहाँ कवि चक्रवर्ती कंबर, तिरुवल्लुवर, वल्ललार, सुब्रमण्यम भारती और पेरियार जैसे साहित्यिक एवं वैचारिक व्यक्तित्वों की प्रतिमाएँ न केवल स्थापित की गयीं, बल्कि उन्हें सार्वजनिक संस्थानों, विश्वविद्यालयों और सरकारी परिसरों में स्थान भी मिला।

2026 में चेन्नई के लोक भवन परिसर में कंबर की प्रतिमा का अनावरण इसी सांस्कृतिक परंपरा की महत्त्वपूर्ण कड़ी है। इसी वर्ष जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में तमिल के महान नैतिक दार्शनिक तिरुवल्लुवर की प्रतिमा की स्थापना को इस तरह प्रचारित किया गया है कि भारतीय विश्वविद्यालय अब क्षेत्रीय साहित्यिक परंपराओं को राष्ट्रीय विमर्श का हिस्सा बनाने का प्रयास कर रहे हैं।

पूर्वोत्तर भारत: साहित्य का सम्मान

पूर्वोत्तर भारत में बीते कुछ वर्षों में साहित्यकारों के सम्मान की उल्लेखनीय घटनाएं मिलती हैं। 2025 में असम के धाकुआखाना में असमिया साहित्यकार होमेन बोर्गोहाईं की विशाल कांस्य प्रतिमा स्थापित की गयी। इसे केवल एक लेखक के सम्मान से नहीं, बल्कि असमिया भाषा और साहित्यिक परंपरा के प्रति सार्वजनिक प्रतिबद्धता के प्रतीक के रूप में भी देखा गया।

बंगाल: साहित्यिक विरासत का पक्ष

रवीन्द्रनाथ ठाकुर और ईश्वरचंद्र विद्यासागर जैसे व्यक्तित्व बंगाल की सांस्कृतिक पहचान का अभिन्न अंग हैं। 2026 में झारखंड के हज़ारीबाग स्थित अन्नदा कॉलेज में रवीन्द्रनाथ ठाकुर की नयी प्रतिमा का अनावरण उदाहरण है कि उनकी स्मृति आज भी शैक्षणिक संस्थानों में प्रेरणास्रोत बनी हुई है।

2019 में कोलकाता में ईश्वरचंद्र विद्यासागर की प्रतिमा तोड़े जाने के बाद पश्चिम बंगाल सरकार ने कम समय में ही नयी कांस्य प्रतिमा स्थापित कर दी। यह पुनर्स्थापना मात्र नहीं थी, बल्कि एक सांस्कृतिक घोषणा भी समझी गयी कि बंगाल अपने नवजागरण के प्रतीकों को सार्वजनिक जीवन से हटने नहीं देगा। इनके अलावा बंकिमचंद्र, काज़ी नज़रूल इस्लाम आदि की प्रतिमाओं का विस्तार अथवा सम्मान बीते एक दशक में दिखता रहा है।

दार्शनिकों की वापसी

भारत में पिछले दस वर्षों में सबसे अधिक नयी प्रतिमाएँ यदि किसी विचारक की स्थापित हुई हैं, तो वे संभवतः डॉ. आंबेडकर हैं। महाराष्ट्र व दक्षिणी राज्यों में ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले की प्रतिमाओं की स्थापना के कई समाचार हैं। बसवन्ना, पेरियार आदि के बीच इस दशक की रोचक प्रवृत्ति यह भी है कि केवल भारतीय ही नहीं, बल्कि विश्व के प्रभावशाली दार्शनिक भी सार्वजनिक स्मृति में पुनः प्रतिष्ठित होते दिखे।

2026 में चेन्नई के कोन्नेमारा सार्वजनिक पुस्तकालय परिसर में कार्ल मार्क्स की प्रतिमा की स्थापना एक उदाहरण है। भारतीय सार्वजनिक जीवन में वैचारिक परंपराओं के विविध स्रोतों को स्थान देने की प्रवृत्ति ख़त्म नहीं हुई है।

हिन्दी पट्टी: जागरूकता के विरुद्ध

इन सबके बीच एक प्रश्न स्वाभाविक रूप से उभरता है… हिन्दी क्षेत्र में ऐसी कोशिशें अपेक्षाकृत कम क्यों दिखायी देती हैं?

हिंदी के महत्वपूर्ण हस्ताक्षरों में कबीर, प्रेमचन्द, प्रसाद, निराला, महादेवी, दिनकर, नागार्जुन, मुक्तिबोध, रेणु, परसाई, राहुल सांकृत्यायन जैसे लेखकों का राष्ट्रीय महत्व निर्विवाद है। फिर भी, पिछले एक दशक में इनकी नयी सार्वजनिक प्रतिमाओं की स्थापना के उदाहरण बिरले ही हैं। जहाँ इनकी प्रतिमाएँ पहले से मौजूद हैं, वहाँ भी अधिक चर्चा उनके संरक्षण, रख-रखाव और स्मारकों की बदहाली को लेकर होती है, न कि नये स्मारकों के निर्माण को लेकर।

यह अंतर केवल सांस्कृतिक नहीं, बल्कि नीति और सामाजिक प्राथमिकताओं का भी संकेत देता है। दक्षिण भारत में भाषा और साहित्य को क्षेत्रीय अस्मिता के साथ जोड़ा गया है, जबकि हिन्दी पट्टी के समाज में साहित्यकारों के सार्वजनिक स्मरण की संस्थागत एवं वैचारिक परंपरा अपेक्षाकृत बेहद लचर है।

क्या समाज प्रतिमा-भंजक ज़्यादा है?

ऐसा नहीं है कि दक्षिण भारत या भारत का कोई और कोना प्रतिमा-निर्माता या विस्तारक के रूप में ही समझा जा सकता है, बल्कि प्रतिमाओं का विध्वंस भी ख़ासी तादाद में होता रहा है। पिछले एक दशक में, दक्षिण भारत में पेरियार की मूर्तियों को क्षतिग्रस्त किये जाने की चार-पांच बड़ी घटनाएं हैं। इसके अलावा, भारत में सबसे अधिक प्रतिमा-हमलों का सामना करने वाले सार्वजनिक व्यक्तित्वों में से एक नाम डॉ. आंबेडकर का रहा है।

बंगाल और असम में नेहरू की प्रतिमाओं पर हमले, विभिन्न राज्यों में महात्मा गांधी की प्रतिमाओं का अपमान/ध्वंस होता रहा है। हाल ही, जुलाई 2026 में बंगाल में घुमक्कड़/लेखक/विचारक राहुल सांकृत्यायन की प्रतिमा ध्वस्त की गयी। प्रतिमाओं के निर्माण को अधिकतर सांस्कृतिक परिदृश्य से जोड़कर समझ लिया जाता है, वहीं प्रतिमाओं का अपमान एवं ध्वंस अधिकतर मामलों में राजनीतिक रंग में दिखता है।

स्मृति-निर्माण बनाम स्मृति-संघर्ष

पिछले दशक का अनुभव बताता है भारत में प्रतिमाएँ दो समानांतर प्रक्रियाओं का हिस्सा हैं। एक प्रक्रिया स्मरण, सम्मान और विरासत के संरक्षण की है; दूसरी प्रक्रिया वैचारिक संघर्ष और प्रतीकों पर नियंत्रण की राजनीति की है। किसी स्थान पर नयी प्रतिमा स्थापित होती है, तो कहीं और कोई प्रतिमा क्षतिग्रस्त। इस विरोधाभास को समझे बिना समकालीन भारत की स्मृति-राजनीति को समझना कठिन है।

2016 से 2026 के बीच भारत का सार्वजनिक परिदृश्य दर्शाता है कि प्रतिमाएँ केवल अतीत की स्मृति नहीं, बल्कि वर्तमान की राजनीतिक और सांस्कृतिक अभिव्यक्ति भी हैं। जहाँ अनेक नयी प्रतिमाएँ प्रमाण हैं कि भारतीय समाज अब भी अपने कवियों, लेखकों, दार्शनिकों और समाज-सुधारकों को सम्मान देने की परंपरा भूला नहीं है, तो वहीं कुछ घटनाएँ असहिष्णुता और वैचारिक टकराव की ओर संकेत करती हैं। और अंतत: हिंदीभाषी समाज इस संदर्भ में जागरूकता, वैचारिकता एवं प्रगतिशीलता के प्रश्नों के कठघरे में दिखता है।

भवेश दिलशाद, bhavesh dilshaad

भवेश दिलशाद

क़ुदरत से शायर और पेशे से पत्रकार। ग़ज़ल रंग सीरीज़ में तीन संग्रह 'सियाह', 'नील' और 'सुर्ख़' प्रकाशित। रचनात्मक लेखन, संपादन, अनुवाद... में विशेष दक्षता। साहित्य की चार काव्य पुस्तकों का संपादन। पूर्व शौक़िया रंगमंच कलाकार। साहित्य एवं फ़िल्म समालोचना भी एक आयाम। वस्तुत: लेखन और कला की दुनिया का बाशिंदा। अपनी इस दुनिया के मार्फ़त एक और दुनिया को बेहतर करने के लिए बेचैन।

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