
- April 26, 2026
- आब-ओ-हवा
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डायरी शशि खरे की कलम से....
चमगादड़ की शवयात्रा व सूरज का इंतज़ार
दिनाँक 12.04.26
वैशाख में आषाढ़ जैसा मौसम बना हुआ है। दस दिनों से आँधी-पानी ने अचंभे में डाल रखा है। अभी तो मानसून बहुत दूर है, बिजली विभाग ने मानसून की तैयारी के लिए बिजली को तो जैसे आटो सिस्टम पर डाल दिया है, इसलिए बिजली लगातार आती-जाती रहती है…
जैसे-जैसे उम्र के सिक्के ख़र्च होते जाते हैं, हम उत्तरोत्तर बचपन में सिखायी गयी अच्छी नैतिक बातों पर विचार करना शुरू कर देते हैं, जैसे अपरिग्रह, दिनचर्या में सादगी किंतु बिजली मूल आवश्यकता बन चुकी है। बिजली की ईजाद ने संसार को ईश्वरीय नहीं मानवीय सृष्टि बना दिया है..!
बत्ती गुल है, अब इसके बिना न कुछ पढ़ा जा सकता है और न सोना संभव है। गर्मी के मारे नींद भी उड़ गयी है। ऊब न हो और समय व्यर्थ न जाये, इसके लिए मैंने पढ़ी हुई किताबों को याद कर उनकी कहानियों में रस लेना शुरू किया। बचपन में बेहिसाब उपन्यास पढ़ने की लत लग गयी थी। किताब के पीछे लेखक की किताबों की सूची रहती थी, उस पर टिक लगाती थी, कौन-सी बची है पढ़ने को।
भारतीय सरकार और यूएसएसआर की सरकार दोनों मेहरबान थीं। भारतीय सरकार ने 11 से 5 बजे तक चैन से बैठने के लिए शासकीय कन्या शाला खोल दी थीं और रशिया से मैगज़ीन और भरपूर क़िताबें आती थीं। आज उन सभी को दिल से धन्यवाद जिन्होंने रूसी उपन्यासों का हिंदी अनुवाद किया।
स्कूल में एकाध पीरियड में शिक्षिका आतीं थीं, बाकी ख़ाली। चार-पांँच झुँडों में बँटकर लड़कियाँ कशीदे, क्रोशिए, बिनाई के नमूनों का आदान-प्रदान करतीं, फ़िल्मों की कहानी सुनातीं और भावी जीवन के लिए गप्पें लड़ाने का अभ्यास करती रहतीं। मेरे लिए हर दिन कोई न कोई लड़की दो तीन उपन्यास ले आती थी घर से।
घर पर चोरी से पढ़ना पड़ता था, किताब पर ख़ाकी कव्हर चढ़ाकर या किताब के अंदर किताब रखकर। जब उपन्यास में बुरी तरह डूब जाती थी, तब चोरी पकड़ी जाती थी। रूसी उपन्यासों में ऐसा जादू होता है। रूसी उपन्यासकार केवल कहानी नहीं कहते, पात्र की अंतर्रात्मा से मिलवाते हैं, अपराध-बोध या अंतर्द्वंद्व, प्रत्येक पात्र अपने ईश्वर, पाप और मुक्ति की विचारधारा से जूझता है।
रूसी उपन्यासकार को जल्दी नहीं रहती, वे आराम से बीच में रुककर दर्शन, धर्म, इतिहास, किसान समस्या या उच्च-मध्य वर्गीय परिवारों व समाज की मानसिकता पर लंबे-लंबे संवाद लिखेंगे। इसलिए ऐसा अनुभव होता था कि हम वहीं कहीं हैं, सब कुछ अपनी आंँखों से देखते हुए और उस दुनिया से बाहर आने की सुध ही नहीं रहती थी।
शायद एक भेड़चाल के तहत सभी आस-पास के एवं घर के लोग मना करते होंगे, सिनेमा नहीं देखना, नावेल नहीं पढ़ना।
एक बात और है ग़ौर करने लायक़ जब उपन्यास कहा जाता था, तब साहित्यिक उपन्यासों से तात्पर्य होता था किन्तु नाॅवेल से लोगों का तात्पर्य होता था जासूसी और वे तमाम उपन्यास जिन्हें साहित्य के क़िले में कभी प्रवेश नहीं मिलता था। गुलशन नंदा, इब्ने सफी वग़ैरह की किताबें। इस तरह की किताबों के कारण उपन्यास व नावेल शब्द ही ख़राब-से माने जाने लगे।
‘शशि बहुत नाॅवेल पढ़ती है’, यह वाक्य हमेशा मेरी बुरी आदत और शिकायत के अर्थ में कहा जाता था। जबकि मैं प्रसिद्ध साहित्यिक उपन्यास भी ख़ूब पढ़ती थी।
उन दिनों ये साहित्य से बाहर अछूत माने गये उपन्यास भी मर्यादा में ही रहते थे। ऐसा कुछ भी वल्गर नहीं होता था, जिसके लिए उनका निषेध किया जाता। संयमित भाषा थी, कोई छोटी-मोटी गाली का भी शब्द नहीं होता था। इश्क़ अपराध है, इसका बहुत ध्यान रखकर ही संभाल कर लिखते थे लेखक।
इन बहिष्कृत उपन्यासों में तत्कालीन समाज का चित्रण लोगों की आपबीती, सुख-दुःख, हँसी खुशी, उनकी समस्याएंँ उलझनें और रास्ते, चिंतन, सुझाव विभिन्न विमर्श जैसा कुछ नहीं होता था। उनमें केवल समय काटने के लिए हल्की-फुल्की बातें और थोड़ी-बहुत उठापटक रूढ़ियों के विरोध में या प्रेम के लिए मामूली विद्रोह होता था इसलिए इन किताबों को युवा होती पीढ़ी के लिए ख़तरा माना गया।
इसके विपरीत 19वीं सदी में मुख्यधारा के साहित्य में सभी वे बातें थीं, जिन्होंने प्रत्येक वर्ग के लोगों को पाठक बना लिया। देशभक्ति, कुरीतियों का उन्मूलन प्रकृति, प्रेम और जनजागृति के साथ लिखा गया काव्य-मधुर रससिक्त गीतिमय था।
बाद में कवियों ने सरलता-सरसता दोनों को त्यागकर शुष्क बौद्धिक कविता को असामान्य बिम्बों में बाँध दिया। काव्य को जनवादी होने का मुखौटा पहनाकर पाठक से दूर कर दिया है। अब इन्हें मर्यादा में लजालु प्रेम लिजलिजा, बेवकूफ़ी भरा लगता है। गालियों की भरमार, अपशब्द भाषा का हिस्सा हैं।
लेखक घोषणा करते हैं कि हम आम आदमी की जद्दोजहद, उलझनें, भ्रष्टाचार, राजनीति और पूंजी के षड्यंत्र लिखते हैं। यह साहित्य ही क्रांति का बिगुल बजाएगा।
अभी तक तो कोई क्रांति शुरू भी नहीं हुई। घूम-फिरकर फिर पुराने उपन्यास याद आने लगे। याद आ गया ब्राम स्टोकर का ड्रैकुला। सतना में राजा की एक छोटी हवेली जो कॉलेज के प्रोफ़ेसरों को आवास के लिए दी गयी थी। उसके बड़े-बड़े कमरों में एक भरी दोपहरी सन्नाटा पसरा था।

मैं, मांँ से नज़र बचाकर छत पर चली गयी थी ड्रैकुला पढ़ने के लिए। बीस-पच्चीस पेज डूबकर पढ़े होंगे कि लगा सन्नाटा धूप से अधिक तीव्र है, फिर अहसास हुआ कि ड्रैकुला पास ही खड़ा है। हवा थमी हुई थी फिर भी उसका काला गाउन उड़कर मुझे छू गया। नीचे जाने के लिए दरवाज़ा मीलों दूर दिखायी दे रहा था।
मेरे चेहरे से पसीना बहने लगा। ड्रैकुला ढिठाई से मुस्कुराते हुए पास खड़ा था फिर वह मेरी गर्दन पर झुका… और मैंने दौड़ लगा दी। नीचे आकर मांँ के पास बैठ गयी। ड्रैकुला माँ से डरता था, चला गया।
दिनांक 13.4.26, सुबह 9.33
आज आधी रात वह डर क्यों याद आया? प्रत्येक रस अपनी चरम अवस्था में ब्रह्मानंद सहोदर होता है, इसलिए डर भी आनंद देता है। हाॅरर उपन्यासों और फ़िल्मों में अधिकाधिक भयभीत करने के दृश्य और घटनाएंँ रखी जाती हैं, जिससे दर्शक सिहरन का रोमांचित हो उठने का सुख लेते हैं।
पहले लोगों के हृदय कम जानकारी के कारण भी सरल और भोले होते थे तो डर भी जाते थे, थोड़ी-सी हिंसा से काँप जाते थे। अब लोग बहुत पक्के, मट्ठर, संवेदनहीन हो गये हैं।
अब लेखक और फ़िल्ममेकर ख़ून की नदियाँ बहा देते हैं, तो भी दर्शक पाॅपकार्न खाते देखते रहते हैं और यही कट्टरता वास्तविक जीवन में भी घर कर गयी है।
लाइट नहीं थी, पंखा बंद था फिर भी जाने कब नींद लग गयी थी। चीखती हुई तेज़ आवाज़ और धड़ाक-से खिड़की के शीशों से कुछ टकराने की आवाज़ से नींद खुली। खिड़की के बाहर सुबह के पहले का अंधेरा था। बिजली की प्रतीक्षा में बल्ब का स्विच बंद किया था और पंखा चालू रहने दिया था इसलिए बत्ती बंद थी और पंखा चल रहा था।
खुली खिड़की से कुछ अंदर आकर तेज़ आवाज़ के साथ गिरा था। शीशे अभी भी थोड़े हिल उठते थे। भयावह तेज़ आवाज़ से नींद टूटने से मैं घबरायी हुई थी।
एक काले रंग की पोटली फ़र्श पर पड़ी हुई थी! यह क्या है सोच रही थी कि हवा के झोंके के साथ किसी कपड़े का स्पर्श मेरे पैरों को हुआ। यह तो ड्रैकुला का गाउन था। इतने वर्षों बाद यह फिर से क्यों आया है? यद्यपि अब मुझे आदत हो गयी है, आज हर इंसान के अंदर एक ड्रैकुला छुपा हुआ है। मित्र, रिश्तेदार, व्यापारी, प्रत्येक व्यवसाय में, शिक्षा, चिकित्सा सभी में मौक़ा मिलते ही ख़ून चूस लेना चाहता है।
बादलों ने उजाला होने नहीं दिया था, लेकिन अब अंधेरा कमज़ोर हो रहा था। उस धुंधयारे में फ़र्श पर काली पोटली पड़ी दिखायी दी। वह चमगादड़ थी, दोनों पैने पंजे और नुकीली चोंच ऊपर उठाये हुए आसमान का मुख नोंचने को बेताब, स्वर्ग सिधार गयी थी, पंखे से टकराकर।
मतलब ड्रैकुला ही था, ड्रैकुला ही कभी धुँध, कभी भेड़िया और कभी चमगादड़ का रूप धरकर आता था। क्या मेरे अंदर का ड्रैकुला मर गया?
इस समय दो बच्चों और उनके माता-पिता की चिल्लाने की आवाज़ें कमरे में घुस आयीं। पड़ोस के दो किशोर अंधियारी सुबह से रात के अंधेरे तक पढ़ाई और बहुत सारे कौशल में अव्वल रहने के लिए किताबों और कोचिंग सेंटर में सिर झुकाये बैठे रहते हैं। इन मध्यम वर्गीय बच्चों को शायद कभी सूर्योदय के सुहाने समय का सुख लेने का समय मिले।
अभी भी अंधेरा नहीं छंटा। वह काली चीज़ डरा रही थी, स्पष्ट दिखायी दे तो देखभाल कर पाँव ज़मीन पर रखूँ। आज सूरज कब आएगा?
वृद्धों का एक दल मंजीरे बजाते ‘राधे कृष्णा राधे कृष्णा’ गाते हुए निकला। उनके सामने आने के कारण साइकिल भगाने में बाधा पड़ती देख फ़ैक्ट्री मज़दूर भन्नाकर बोले-ज़रा तो सूरज निकलने का इंतज़ार कर लेते।
रूस और यूक्रेन, ईरान-इज़रायल/अमेरिका के युद्धों के विनाशक मेघ शैतानी ताक़त की तरह दुनिया पर छाये हुए हैं। कब चैन और सुकून का सूरज निकलेगा?
पूरी धरती पर रंग-रंग के अंधकार हैं, मिसाइल के धुएंँ से छाया सफ़ेद-सा अंँधेरा, जलवायु, पानी, धर्म की रार और विवाद से भरे लोगों के मन में स्याह अंँधेरा, जहाँ आतंक ने ख़ून फैलाया, वहाँ लाल अंधेरा।
ऐसा लगता है तमाम शान्ति, सौंदर्य और कलाओं, सभ्यता और संस्कृति की स्थिति अंधकारमय हो चुकी है, सभी को इंतज़ार है सूरज का।
छोटी बाई आयी, सफ़ाई करने तो मैं उस डरावनी चीज़ से नज़रें बचाकर हट गयी। वह खिलखिलाकर बोली आ जाओ दीदी, इस काली पोटली में दुनिया की सब अलाएँ-बलाएँ हैं, सारा अंधेरा है। चमगादड़ की शवयात्रा में दो लोग तो हों। आओ यह शवयात्रा निकाली जाएगी, तभी सूरज निकलेगा।

शशि खरे
ज्योतिष ने केतु की संगत दी है, जो बेचैन रहता है किसी रहस्य को खोजने में। उसके साथ-साथ मैं भी। केतु के पास मात्र हृदय है जिसकी धड़कनें चार्ज रखने के लिए लिखना पड़ता है। क्या लिखूँ? केतु ढूँढ़ता है तो कहानियाँ बनती हैं, ललित लेख, कभी कविता और डायरी के पन्ने भरते हैं। सपने लिखती हूँ, कौन जाने कभी दुनिया वैसी ही बन जाये जिसके सपने हम सब देखते हैं। यों एक कहानी संकलन प्रकाशित हुआ है। 'रस सिद्धांत परम्परा' पुस्तक एक संपादित शोधग्रंथ है, 'रस' की खोज में ही। बस इतना ही परिचय- "हिल-हिलकर बींधे बयार से कांटे हर पल/नहीं निशाजल, हैं गुलाब पर आंसू छल-छल/झर जाएंगी पुहुप-पंखुरी, गंध उड़ेगी/अजर अमर रह जाएगा जीवन का दलदल।
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मन की उलझन सुलझन से वार्ता करती, दिल को छू लेने वाली डायरी के अधुरे पन्नो को पूरा पढ़ने का इंतज़ार रहेगा ।
शशि जी को बधाई सुंदर लेखन के लिए ….