
- May 12, 2026
- आब-ओ-हवा
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चुनावी मौसम यूं तो मुल्क में कभी ख़त्म होता नहीं, फिर भी ताजपोशी की हालिया सुर्ख़ियों से 'कुर्सी' लफ़्ज़ एकदम से ज़ेह्नों में ताज़ा हो चला है। इस लफ़्ज़ के इर्द-गिर्द शायरों के कितने बयान सुने हैं आपने? कौन-से आपके ज़ेह्न में उभरते हैं? देवदत्त संगेप ने तैयार किया है एक संकलन - आब-ओ-हवा की एक पेशकश...
शायरी के निशाने पर 'कुर्सियाँ'
मैं कब हिलाने लगूं दुम बता नहीं सकता
कि ख़्वाब आने लगे हैं मुझे भी कुर्सी के
-एहतराम इस्लाम
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फिर बचाना है मेज़ कुर्सी को
फिर ख़लाओं पे शेर कहना हैं
-फ़हमी बदायुनी
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देखना सुनना व सच कहना जिन्हें भाता नहीं
कुर्सियों पर फिर वही बापू के बंदर आ गये
-अदम गोंडवी
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लोग भूखे हैं कुर्सियों के लिए,
ये सियासत भी इक बीमारी है
-आक़िब जावेद
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कुर्सी औ सियासत में कब्ज़ा मदारियों का है
लगता है अब कोई नया खेल बंदर दिखाएंगे
-अल्फ़ाज़ सिंगरौली
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देश की छाती में जिनके पाँव धँसते जा रहे
उन सियासी कुर्सियों को तोड़ देना चाहिए
-अभिषेक सिंह
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कुर्सियां लीडरों को देनी थी
जो सुख़नवर थे वो उठाये गये
-शादाब अंजुम
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मैंने कहा कि है मुझे कुर्सी की आरज़ू
उसने कहा कि आयत-ए-कुर्सी पढ़ा करो
-दिलावर फ़िग़ार
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न करना चापलूसी कुर्सियों की
क़लम के साथ गद्दारी से बचिए
-दिनकरराव दिनकर
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कुर्सी-ए-दिल पे तिरे जाते ही दर्द आ बैठे
जैसे आईना-ए-बे-कार पे गर्द आ बैठे
-फ़रहत एहसास
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इल्म फ़न के दम पर अब अगली सफ़ नहीं मिलती
कौन किस जगह बैठे कुर्सियां बताती हैं
जाने किस ने श्राप दिया है सियासत की हर कुर्सी को
इस पर जो भी बैठेगा वो फ़ौरन बहरा होता है
-डॉ.गणेश गायकवाड
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क़िस्सा कुर्सी का जब छिड़ा होगा
मुल्क़ नीलाम हो गया होगा
-गोविन्द वर्मा सिराज
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हमने देखा है इन्हीं आँखों से कुछ बंदों का
चढ़ के कुर्सी-ए-वज़ारत पे ख़ुदा हो जाना
-हाशिम अज़ीमाबादी
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कुर्सी भी चाहिए इन्हें दौलत भी चाहिए
इस दौर के तो सारे क़लंदर बदल गये
-हर्ष अदीब
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कुर्सी है तुम्हारा ये जनाज़ा तो नहीं है
कुछ कर नहीं सकते तो उतर क्यों नहीं जाते
-इरतिज़ा निशात
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इस दौर की है देन कि कुर्सी पे आज-कल
आँखों का अंधा गाँठ का पूरा दिखाई दे
-जौहर सीवानी
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अपने इस अहद का इंसाफ़ है ताक़त का ग़ुलाम
आँच भी कुर्सी-नशीं पर नहीं आने देता
-ज़फ़र सहबाई
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कुर्सियाँ ब्याही गईं कुछ ख़ानदानों में सदा
कार्यकर्ता तो फ़क़त जलपान करते रह गये
-जनार्दन पाण्डेय नाचीज़
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वो बदलते रहे कुर्सियों की तरह
हम उजड़ते रहे बस्तियों की तरह
-कुमार कर्ण
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सब कुछ हलाल हो गया कुर्सी की आड़ में
मेआर ख़ुद गिराती सियासत है रोज़-ओ-शब
-मुदस्सर हुसैन
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हर इक ना-अहल यूँ चिपका हुआ है अपनी कुर्सी से
समझता है ये सरकी और हुआ सब कर्र-ओ-फ़र्र ग़ाएब
-नाज़िर टोंकी
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कुर्सी की अदला-बदली है लेकिन कहां निशाने बदले
खेल वही है चौसर का ये गोटी के बस खाने बदले
-राजेंद्र टेलर राही
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फिर उजली कुर्सी पर बैठें मुल्ज़िम का इंसाफ़ करें
पहले मुंसिफ़ गंगा-जल से अपनी नीयत साफ़ करें
-सरदार पंछी
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शोर है घर में मगर, क्यूँ खिड़कियाँ चुपचाप हैं?
क्या कहें इस मुल्क की सब कुर्सियां चुपचाप हैं?
-सत्याधार ‘सत्या’
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था फटेहाल मगर हाथ लगी जब कुर्सी
तबसे कुर्ता भी कलफ़दार हुआ जाता है
धूल झोंकने वालो देखो आँख देश की नम नहीं है
है कुर्सी की हाथापाई इससे बढ़कर धरम नहीं है
-सुधा राठौर
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कौन समझाएँ इन सनकी हुक्मरानों को
कुर्सियों से उतार फेकों इन नादानों को
-शांति जैन
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कुर्सी, कुर्सी, केवल कुर्सी, सब ये राग लिये बैठे हैं
उधर भूख के मारे बच्चे मुँह में झाग लिये बैठे हैं
भाषणवीरो राशन भेजो, शर्म करो कुछ खुदगर्ज़ो
कितने चूल्हे इंतज़ार में जलती आग लिये बैठे हैं
-तेज नारायण शर्मा ‘तेज’
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लोग ऊंची कुर्सियों पर बैठकर भी
बात अक्सर बिन विचारे बोलते हैं
-उदयप्रताप सिंह
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उनको कुर्सी पे बैठने तो दो
वो भी फिर वाहियात बोलेंगे
-उर्मिलेश
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कुर्सी बग़ैर रहबर मुझको लगे हैं ऐसे
जैसे कि कोई बेवा इद्दत गुज़ारती है
-उस्मान मीनाई
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कहाँ फिर देखने देती है किनसे वोट मांगे थे
यह वो कुर्सी है जो आंखों पे परदा डाल देती है
-ज़मीर दरवेश
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देखना है अब यही देता है किसको कौन मात
सामना जनता का फिर कुर्सी के फ़रियादी से है
वो मस्जिद हो कि मंदिर हो अदब हो या सियासत हो
वही है जंग कुर्सी की वही दस्तार का झगड़ा
-ज़फ़र कमाली
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देवदत्त संगेप
बैंक अधिकारी के रूप में भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त। शायरी के प्रति ख़ास लगाव। उर्दू, हिन्दी और मराठी ग़ज़लों में गहरी दिलचस्पी। मिज़ाह शायरी करने के भी शौक़ीन और चुनिंदा शेरों और ग़ज़लों के संकलनकर्ता के रूप में पहचान।
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