ओम निश्चल, om nishchal
पाक्षिक ब्लॉग ज्ञानप्रकाश पांडेय की कलम से....

ओम निश्चल: हिंदी ग़ज़ल में वरिष्ठों का नौसीखियापन!

          मेरे गाँव में कहावत है- ‘नाऊ की बारात में सब ठाकुर’। यह कहावत हिंदी ग़ज़ल पर चरितार्थ होती-सी दिखायी देती है। कहने का अर्थ है कि हिंदी साहित्य में ग़ज़ल क्या आयी, हर कोई अपने आप को महाशायर सिद्ध करने में लग गया। हिंदी ग़ज़ल का पूरा आंगन नागपंचमी का अखाड़ा बन गया है। सब एक-दूसरे को चित्त करने में लगे हैं। इस अखाड़े में एक से एक मल्ल देखे जा सकते हैं। बड़ा ही चिताकर्षक रूप दिखता है। तुलसी बाबा की एक पंक्ति याद आ रही है– “एकहि एक सकइ नहिं जीती”। हर कोई अपना पौरुष जाँच लेना चाहता है।

यहां ग़ज़ल अब ग़ज़ल नहीं, पूरे गांव की सरहज बन चुकी है। जो कुछ नहीं कर सकता या जो कुछ नहीं कर पा रहा, अब वह ग़ज़लकार है। ऐसा लगता है जैसे हर आता-जाता यह कहकर गुज़र जा रहा हो कि “भौजी पाय लागूँ”। इस नयी भौजी के साथ खिसनिपोरई करने वाले कई देवरों की कुंडली पहले बनायी जा चुकी है, आज किसी नये पर चर्चा करता हूं। उपर्युक्त बातें मैंने किसी रचनाकार विशेष के लिए नहीं कही हैं बल्कि हिंदी ग़ज़ल की त्रासदी बयान की है। कोई रचनाकार इसे अपने पर न ले और अगर लेता है, तो ले, अपने अंदर सुधार करना ऐसा कुछ ग़लत भी नहीं है।

दोस्तों का दबाव भी बड़ा अजीब होता है। न चाहते हुए भी मुझे आदरणीय ओम निश्चल साहब पर लिखना पड़ रहा है। ऐसा नहीं कि मैं ओम निश्चल साहब पर लिखना नहीं चाहता था, बस ज़रा देर से लिखता लेकिन दोस्तों के दबाव के आगे किसकी चलती है।

निश्चल साहब को लोग अच्छा शोधार्थी मानते हैं। इन्होंने कई रचनाकारों की प्रेम कविताओं का संकलन किया है, संभवतः इसी संकलन ने इन्हें ग़ज़ल लिखने के लिए भी प्रभावित किया होगा। मुझे तो इनके इन्हीं कार्यों ने प्रेरित किया। आपने कुछ ग़ज़लकारों की ग़ज़लों के संकलनों का भी ‘संपादन’ किया है, तब तो निश्चित रूप से आपके अंदर ग़ज़ल की सलाहीयत होना ही चाहिए।

चलिए अब इस भूमिका से निकलकर ग़ज़ल की तरफ़ चलते हैं। आज हिंदी ग़ज़ल आगे “नाथ न पीछे पगहा” वाली स्थिति से होकर गुज़र रही है। ऐसे में ओम निश्चल साहब से उम्मीद करना हिंदी ग़ज़ल की ज़रूरत के साथ मजबूरी भी बन जाती है। अब उनके शेर देखना शुरू करते हैं:

सभ्यताओं की हिफ़ाज़त में हैं मानव टोलियाँ
और तानाशाह फिर बरसा रहे हैं गोलियाँ

ओम साहब का पहला ही शेर ऐसा मिला कि सिर के बल खड़े होकर पढ़ूं या पादहस्तासन लगाकर। सच कहें तो उनके कार्यों को देखते हुए उनसे जिस साहित्यिक कसाव की उम्मीद थी, वह यहां पूरी तरह नदारद है। प्रायः हिंदी के ग़ज़लकारों में जो ख़ामियां देखने को मिलती हैं, वे यहां भी हू-ब-हू मौजूद हैं। इस शेर के दूसरे मिसरे में आया ‘फिर’ चिल्ला-चिल्लाकर अपनी उपस्थिति की वजह पूछ रहा है। यह ‘फिर’ ग़ज़ल के आरिज़ो-रुख़्सार पर दांत गड़ाता-सा नज़र आ रहा है।

ओम निश्चल, om nishchal

एक और बात कहना चाहूंगा कि ऊपर ‘मानव टोलियाँ’ लिखा गया है किंतु नीचे ‘तानाशाह’ पदबंध आया है। क्या ‘तानाशाह’ मानव नहीं होता? कहने का अर्थ यह है कि किस शब्द के समानांतर कौन-सा शब्द रखना है, इसका ज्ञान होना भी अति आवश्यक है। ग़ज़ल की एक बहुत बड़ी त्रासदी, जो हर दिन हमारी नज़रों से होकर गुज़रती है, वह यह कि कुछ लोग उसे अख़बार बनाने पर तुले हैं। कोई घटना घटती नहीं है कि आधा घंटा के अंदर उससे जुड़ी ग़ज़लें फ़ेसबुक पर तैरने लगती हैं। यह ठीक है “साहित्य जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब है”, किंतु इसका अर्थ अख़बार नहीं होता। इसमें कुछ ज़रूरी बातों का होना अति आवश्यक है। साहित्यिकता का होना सबसे ज़रूरी बात है। चित्रों की स्थूलता की जगह भावों की सूक्ष्मता हो। ख़ैर, हम निश्चल जी पर आते हैं। शेर देखें:

सीता की रसोई ख़तरे में है राम रसोई ख़तरे में है
गैस की क़ीमत ऐसी यहां घर-घर की रसोई ख़तरे में है

इस शेर में हम साहित्यिक सूक्ष्मता की तरफ़ नहीं जाते हैं, बेसिक बातों पर ही चर्चा करते हैं। इस शेर की रदीफ़ है ‘रसोई ख़तरे में है’ जो ठीक है, लेकिन ऊपर के मिसरे में रदीफ़ के पहले ‘म’ व्यंजन की वजह से ‘अ’ स्वर आया है। जबकि नीचे के मिसरे में रदीफ़ के पहले ‘की’ की वजह से ‘ई’ स्वर आया है। ऐसे में रसोई तो बाद में ख़तरे में आएगी, ग़ज़ल की सिन्फ़ पहले ही दुर्घटनाग्रस्त हो गयी है। ख़ैर, आप भाषा के अधिकारी हैं। हो सकता है आप कोई नयी विद्या जानते हों। इस शृंखला की शुरूआती कड़ियों में मैंने एक और भाषा अधिकारी माधव कौशिक साहब के तथाकथित शेरों में भाषा की पड़ताल की थी, वहां से भी कुछ सूत्र आपको मिल सकते हैं। ख़ैर अभी ओम निश्चल साहब का एक और शेर:

युद्ध फसल जिनकी ख़ातिर सींचेंगे सदा तन-मन-धन से
पर आम आदमी की तो है कल्छुल बटलोई ख़तरे में

इस शेर पर कुछ भी लिखने से पहले बता दूं कि मैं यदि कभी निश्चल साहब से मिला तो ज़रूर पूछूंगा कि किस वैद्य ने उनसे ग़ज़ल लिखने के लिए कहा था? हो सकता है ऐसी ग़ज़ल लिखने से कवि का बवासीर तो ठीक हो जाये मगर हिंदी ग़ज़ल को जो भगंदर होगा, उसका इलाज शायद सुषेण वैद्य के पास भी न रहा हो। यह तो हुई रदीफ़ की बात। अब ज़रा इस शेर की बह्र भी देख लें। पहले मिसरे का वज़्न है:

मफ़ऊल मुफ़ाईलुन फ़ेलुन मफ़ऊल मुफ़ाईलुन फ़ेलुन

जबकि दूसरा मिसरा बाग़ी विधायकों की तरह नयी पार्टी बनाने पर अड़ा है। दूसरा मिसरा अगर किसी भी बह्र में होता तो मैं पार्टी का नाम भी बता देता। एक कहावत “जेठ के भरोसे पेट” याद आ रही है, मगर हिंदी ग़ज़ल की त्रासदी है कि “केकरे माथे करूँ गुमान पिया हैन मोर आँधर”। हिंदी ग़ज़ल के पास तो जेठ का भी भरोसा नहीं है। सारे जेठ तो अद्भुत क़िस्म के नौसीखिये हैं। हर तरफ बाँह पकड़कर महफ़िल की ओर खींचने वाले दलाल दिखायी दे रहे हैं। सबको मुख्य अतिथि बनना है…

मैं जानता हूँ कि रह-रह कर भटक जाता हूँ, मगर क्या करूँ! स्थिति ही ऐसी बन जाती है। ख़ैर, ओम साहब पर ग़ौर फ़रमाते हैं। जिस ग़ज़ल पर मैं बातें करने जा रहा हूँ वह ग़ज़ल पूरी-की-पूरी बकवास है मगर ओम साहब का भाषा ज्ञान समझने के लिए देख लेते हैं:

दाने-दाने की तंगी है यह दुनिया फिर भी नंगी है
धनिया की धनिया ख़तरे में होरी की रसोई ख़तरे में

मैं ओम साहब से ही पूछना चाहूंगा, यदि दाने-दाने की तंगी है तो दुनिया कैसी होनी चाहिए? क्या तंगी में दुनिया को संपन्न दिखायी देना चाहिए? दुनिया तंगी में नंगी नहीं रहेगी तो कब रहेगी? यह लॉजिक ओम साहब के भाषा अधिकारी होने पर प्रश्नचिह्न खड़ा करता है। एक लोकोक्ति याद आ रही है “ज्यों नकटे को आरसी होत दिखाएं क्रोध” कहने का अर्थ यह कि इस लेख को पढ़कर ओम साहब नाराज़ हो सकते हैं। उनके चमचे भी नाराज़ हो सकते हैं। मगर इसमें मैं क्या कर सकता हूं? जो है सो है। वरिष्ठों का नौसीखियापन और भदेस हमें भी कम नहीं खलता।

इस बिंदु से मैं हिंदी ग़ज़ल की एक प्रवृत्ति की ओर ध्यान खींचना चाहूंगा, जो वरिष्ठ रचनाकार के ग़ज़ल की दुनिया में प्रवेश से जुड़ी है। इन दिनों चलन है आप कुछ न सीखें या फिर जल्दबाज़ी में अधकचरा-सा कुछ का कुछ लेकर चले आएं और शेरों की दुकान सजाकर बैठ जाएं। चूंकि आप अनुभव, उम्र या पद में बड़े होते हैं इसलिए विधा में नौसीखिये और भदेस होने के बावजूद एक लॉबी होती है, जो आपका मंच, आपकी कुर्सी सजाने को बौखलायी दिखती है। आप अपने अज्ञान को ‘प्रयोग’ और ‘नवीनता’ के अहंकार से जोड़ने में भी गुरेज़ नहीं करते। जबकि हिंदी में ऐसे कवि हुए हैं, जिन्होंने ग़ज़ल के फ़न की बारीकियां सीखीं और उर्दू भी, तब ग़ज़ल या शेर कहने की तरफ़ आये। और वह भी इस विनम्रता के साथ कि शेर होना बहुत बड़ी बात है, हम तो बस कोशिश करते हैं…

ख़ैर, हम ओम साहब की तरफ़ लौटते हैं और उनके कुछ और कारनामे देखते हैं:

मैं अक्सर डूब जाता हूं गहन एकांत में अपने
मगर इसको मेरी वह निपट तन्हाई समझते हैं

ग़ज़ल के नाम पर कुछ भी खपा देने की इच्छा रखने वाले ये वरिष्ठ भी साहित्य को न जाने क्या समझते हैं? यह भदेस नहीं तो और क्या है? इस शेर में मैं बिल्कुल यह नहीं कहूंगा कि ओम जी के अनुसार ‘एकांत’ को ‘तन्हाई’ समझने वाला व्यक्ति कितना ग़लत है लेकिन यह तो कह ही सकता हूं कि इस शेर के दूसरे मिसरे में थोड़ा-सा लंगड़ापन है, ठीक वैसा ही जैसा बेल का कांटा गड़ जाने पर होता है। इस ग़ज़ल का मूल रुक़्न है:

मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन मुफ़ाईलुन

मगर दूसरा मिसरा ‘निपट’ शब्द तक आते-आते स्वयं ही निपट गया है। इसी ग़ज़ल का एक और शेर:

अदब से पेश आते हैं सभी उनसे मगर क्या है
हर एक हरकत को वो अपनी ही रुसवाई समझते हैं

अर्थहीन शब्दक्रमों के इस समूह में इतना उलझाऊपन है कि कुछ सूझता-सा नज़र ही नहीं आ रहा है। रचनाकार न जाने किस लोक की बात समझाने की कोशिश कर रहा है। कौन हरकत को रुसवाई समझ रहा है, क्यों समझ रहा है? आख़िर हरकत में रुसवाई कैसे आ सकती है? कुछ भी समझ नहीं आ रहा है। इसे आप ओम साहब से ही पूछिएगा। ये सारे शब्द बर्दमूतन की तरह आपस में उलझ-से गये हैं। एक और शेर देखें जो उन पर ही सटीक बैठ रहा है:

ज़रा-सा छंद और छलछंद में उनकी महारत है
मगर वह गर्व से इस शै को कविताई समझते हैं

ऐसा लग रहा है ओम साहब ने यह शेर हिन्दी वालों के लिए ही कहा है। कुछ अपवादों को छोड़ दें तो, हिन्दी वालों के पास छंद तो बिल्कुल नहीं है किंतु छलछंद बहुत है। हर दूसरे क़दम पर इनकी ग़ज़लें लड़खड़ाकर मुंह के बाल गिरती हैं मगर फिर भी न जाने कैसे ये अपने आप को ग़ज़लकार मनवा लेते हैं। अपने इस छल के परिणाम को ये ग़ज़लकार कविताई भी समझने लगे हैं। लगे हाथ एक और शेर देख लेते हैं। जो बात इन्होंने इस शेर में कही है, वही बात इस लेख की शुरूआत में मैंने कही है।

न जाने क्या हुआ है सभ्यता के धनकुबेरों को
कि वे हिंदी को जैसे अपनी भौजाई समझते हैं

जिस तरह लोग हिंदी को भौजाई समझ रहे हैं, ओम साहब ने ग़ज़लों को अपनी भौजाई समझ लिया है। इतने अ-शालीन मज़ाक़ किये हैं कि क्या कहूँ। अब यही देखिए:

बेहाल थे ख़ुदी में मगर होंठ थे सिले
हम अगले ज़माने की प्रजा खोज रहे थे

इस शेर को पढ़कर कुछ भी समझ पाना टेढ़ी खीर लग रहा है। भगवान ही बता पाएंगे कि इन दोनों मिसरों में संबंध क्या है? अगले ज़माने की प्रजा कैसी थी? उनकी क्या विशेषताएं थीं? ओम साहब उन्हें क्यों खोज रहे थे? मैं तो बस इतना ही कह सकता हूं मेरी समझ में कुछ नहीं आया। अब इस शेर में ओम साहब ने सारे समझदारों की नसें ढीली कर दी हैं:

जम्हूरियत के नाम पर जितने हुए फ़साद
हम थे शिकारे-ज़ुल्म ख़ता खोज रहे थे

धर्म के नाम पर अनेक दंगों के बारे में सुना था मगर जम्हूरियत के नाम पर कौन-सा दंगा हुआ था! आपको पता है? विभाजन के समय भी दंगा हुआ था लेकिन उसे जम्हूरियत के नाम पर हुआ दंगा नहीं कहा जा सकता। जम्हूरियत के नाम पर हुआ दंगा तो राजद्रोह की श्रेणी में आएगा। ऐसा लगता है ओम साहब को दिशा भ्रम है या फिर..।

ख़ैर, आगे बढ़ते हैं। ओम साहब की ग़ज़लों को पढ़कर मुझे यह कहने में कतई संकोच नहीं होता कि हिंदी ग़ज़ल के साथ ओम साहब के बड़े ही नाजायज़ संबंध हैं। उस पर भी गलढेठरई ये कि उपदेश पिलाने का मौक़ा कभी नहीं छोड़ते। अरे! इच्छा यही रहती है कि सब जगह मुख्य अतिथि आप ही बनें मगर ग़ज़ल में आता क्या है? ग़ज़लों से पूरा फ़ेसबुक भर डाला है मगर सब कचरा! यह देखें:

दूर भटके कहीं अश्वारोही
कैसा यह घुड़सवार मौसम है

अरे! विकृत कल्पना से तहदारी नहीं आती। भाई! कुछ तो सोच-समझकर लिखो या व्याख्या भी साथ-साथ लिख दो, जिससे लोग समझ सकें। भला अश्वारोहियों के भटकने से मौसम घुड़सवार कैसे हो सकता है? इसी को कहते हैं “डेढ़ पाव आटा पुल पर रसोई” मतलब ‘ग़’ आता नहीं बनेंगे ग़ज़लकार। इतनी इज़्ज़त इसलिए नवाज़ रहा हूं क्योंकि सिर्फ़ कल्पनात्मक त्रुटि ही नहीं, शेर लंगड़ा-लूला भी है। वज़्न से भी ख़ारिज है। इस ग़ज़ल की मूल रुक़्न है:

फ़ाइलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन

इस नज़रिये से देखने पर उपर्युक्त शेर ख़ारिज हो जाता है। इस ग़ज़ल में और शेर भी खारिज़ हैं, ज़रा उन्हें भी देख लें:

बेचो-बेचो ख़ुशी से ग़म अपने
दर्द का खरीदार मौसम है

दूसरा मिसरा बह्र से बग़ावत करता-सा दिख रहा है। कुछ और शेर भी देखते हैं:

संवादों की सुंदरता थी
बातों में मसखरी नहीं थी

सबसे पहले तो मैं ये कहना चाहूंगा कि ये शेर है ही नहीं, दूसरी बात यह कि ग़ज़ल में बड़े-बड़े कार्य करने का दावा करने के बाद भी ओम साहब को तक़ाबुले-रदीफ़ का ज्ञान क्यों नहीं है? क्या सारा संपादन ढोंग है? दोनों मिसरों के अंत में ‘थी’ आने की वजह से तकाबुले-रदीफ़ का दोष पैदा हो गया है। जहां-जहां से मुझे जिस तरह की ग़लतियां मिल रही हैं, मैं दिखाता चल रहा हूं:

तर्जुमा उसकी मोहब्बत का अगर मिल जाये
सारी दुनिया को रफ़ाकत की डगर मिल जाये

इस मतले में क़ाफ़िया ‘अगर’ और ‘डगर’ है, लेकिन यहीं बाद के एक शेर का क़ाफ़िया ‘घर’ हो जाने की वजह से ‘ग़ज़ल कहेंगे’ वाले एटिट्यूड की पतलून उतर गयी है। कहने का अर्थ यह कि जिस विधा का ज्ञान न हो उसे सीख लेने के बाद ही हाथ लगाना चाहिए या फिर उससे तौबा ही कर लें।

युद्ध में बिछड़ के रोता है फिर कोई बच्चा
पता लगाओ कि खोया हुआ घर मिल जाये

इस ग़ज़ल में सिर्फ़ क़ाफ़िया का ही दोष नहीं है, बह्र भी मतले की उंगली पकड़कर चलने से इन्कार कर रही है। मूल रुक़्न है:

फ़ाइलातुन फ़इलातुन फ़इलातुन फ़ेलुन

इस दृष्टि से देखने पर उपर्युक्त शेर गरियार बैल की तरह पहली ही हराई में घस्स से बैठ गया है। इतना ही नहीं मतले का पहला मिसरा भी ओम साहब की पोल खोलने पर आमादा है। मक़ते में शान से लिखा गया ‘निश्चल’ तख़ल्लुस भी मक़ते की बेबह्री के कारण शर्मिंदा होता-सा नज़र आ रहा है। मक़ता भी यहां लिख दे रहा हूं, विद्वान पाठक स्वयं जांच लें:

किसको परवाह आंसुओं की पड़ी है निश्चल
काश ग़मगीन-सी आंखों को गुहर मिल जाये

इस शेर के बेतर्तीब से वाक्य विन्यास पर मैं कुछ नहीं कहूंगा। मैं तो सिर्फ़ इतना कहना चाहता हूं कि काफ़िया यहां भी मुंह चुराकर खड़ा है। गौहर तो क्या ठेंगा भी मिलने से रहा। हमारे गांव में कहावत है, इस कहावत का एक शब्द अश्लील भले है मगर बड़ी ही माज़रत के साथ मैं यहां उद्धृत कर रहा हूं, क्योंकि कहावत की यही मांग होती है कि उसे बदला न जाये। कहावत है– “मुँह माठा के ललाइ गाँ*ड़ दहू-दहू चिल्लाइ”। अंग्रेज़ी में इसके लिए एक विशेष शब्द है HYPOCRISY। ओम साहब में ग़ज़लों को लेकर जो विरोधाभासी आचरण है, उसके लिए इससे अच्छी लोकोक्ति नहीं सूझ रही। आपको चाहिए तो गुहर, मगर काम ढेले/कंकड़/पत्थर का भी नहीं कर रहे। इतनी जल्दबाज़ी किस बात की?

रामदरश मिश्र ने भी बुढापे ने ग़ज़ल लिखकर इसी तरह की गोबरगंधई की। ओम साहब ने, ग़ज़ल को लेकर बड़े-बड़े पॉडकास्ट किये। अनेकानेक किताबों का संपादन किया तथा फ़ेसबुक पर आपकी ग़ज़लों की बहार भी है, मगर उसके बाद एक ही ग़ज़ल में तीन-चार बह्रों का प्रयोग आश्चर्य में डाल देता है तथा इस तरह की लोकोक्तियों को उद्धृत करने के लिए बाध्य करता है। क़ाफ़िया, रदीफ़, बह्र और मिसरों के रब्त जैसी साधारण और बेसिक बातों का ज्ञान तक नहीं है।

क्या पाठकों को नहीं लगता कि ग़ज़ल पर काम करने से पूर्व इन्हें ग़ज़ल का प्रारंभिक ज्ञान तो प्राप्त कर ही लेना चाहिए था? क्या आपको नहीं लगता कि इनके द्वारा किया गया कार्य पाठकों को भ्रमित करेगा? मैं इस तरह के कार्य को धोखा मानता हूं। ख़ैर, आगे बढ़ते हैं। कुछ और शेरों की पूँछ उठाते हैं। यह ग़ज़ल देखें, इसमें बह्र का ‘ब’ भी नहीं निभाया गया है…

नमी रहने दे अभी मुझमें तू सहरा न बना
धूप सहने दे मेरे सर पर तू साया न बना

ज़िंदगी को ज़रा-सा ख़ुद भी परखने दे मुझे
पहले से ही मेरे मन में कोई नक़्शा न बना

भींग लेने दे मुझे दर्द की इस बारिश में
लज़्ज़ते-सुकून का मेरे लिए छाता न बना

न बुझ सके किसी की प्यास जिसके पानी से
ऐ ख़ुदा तू मुझे ऐसा कभी दरिया न बना

बिछड़ के तुमसे न रह जाऊं मैं इस दुनिया में
दूर ही रह मुझे इस क़दर अपना न बना

सब मिला-जुलाकर इसके मूल अरक़ान होने चाहिए:

मुफ़ाइलुन फ़इलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन

क्योंकि इसी के इर्द-गिर्द ये मिसरे घूम रहे हैं। इस कसौटी को ध्यान में रखकर इस ग़ज़ल पर दृष्टिपात करने पर हम पाते हैं यह ग़ज़ल गाभिन गाय की तरह ज़मीन पर पसर गयी है।बह्र के हिसाब से देखने पर पूरी ग़ज़ल ही भकुआ बनकर खड़ी है। ज़्यादा कुछ नहीं कहूंगा क्योंकि अभी कहने को बहुत कुछ है, एक और शेर देखते हैं, जो बह्र के साथ हाथापाई कर रहा है:

जैसे भी हो इस ख़्वाब को आंखों में बसा लो
इस झील को तालाब को आंखों में बसा लो

मतले का वज़न है: मफ़ऊल मफ़ाईल मफ़ाईल फ़ऊलुन

अब इसी ग़ज़ल का दूसरा शेर:

जन्मे हो जिसकी कोख में गंगो जमन की है
आओ कि इस दोआब को आंखों में बसा लो

अब इस शेर के पहले मिसरे का वज़न है: मफ़ऊल फ़ाइलात मफ़ाईल फ़ाइलुन

वहीं दूसरे मिसरे का वज़न है: मफ़ऊल फ़ाइलात मफ़ाईल फ़ऊलुन

एक ग़ज़ल में चार तरह के वज़न लिखने का कारनामा तो ओम साहब ने किया ही है, मिट्टी तब और पलीद होती है कि जब कोई दमदार मज़मून भी नज़र नहीं आता। ऐसी ग़ज़लों की महफ़िल से उठकर जब आप अपने घर की तरफ़ जाने लगते हैं तो आपकी जुबान पर किसी शेर की गुनगुन नहीं बल्कि कटुता और झुँझलाहट बचती है।

लगे हाथ कुछ बे-रब्त ग़ज़लों का भी उदाहरण देख लेते हैं। ओम साहब ने इन तथाकथित शेरों को क्यों लिखा है, ओम साहब ही जानें, मैं तो सिर्फ़ इसलिए इन्हें यहां उद्धृत कर रहा हूं क्योंकि ये मेरी समझ में नहीं आ रहे। आप लोगों से कभी यदि ओम साहब मिलें तो आप समझने की कोशिश ज़रूर करें…

ज़ुल्म ख़ुद पर मेरे सहे न गये
वार क़ुदरत के अनकहे न गये

बनाओ मीम उड़ाओ किसी की भी खिल्ली
हंसी के वास्ते कुछ और चुटकुला लाओ

महफ़िल में बस इक बार उसे कह दिया था कुछ
साधा है उसने ख़ूब निशाना जो सच कहा

इसी को कहते हैं– “झटपट की घानी आधा तेल आधा पानी”, कहने का मतलब कि ओम साहब यदि ग़ज़लकार बनने में इतनी जल्दबाज़ी नहीं दिखाते तो लोगों के सामने उनका इतना हल्का स्वरूप नहीं आता। पहला शेर जो है, वहां रब्त की तो ऐसी-तैसी है ही, ‘सहे’ और ‘कहे’ काफ़िया के बाद, आगे के शेरों में क़ाफ़िया ‘पूछने’ आ जाता है। बाद में ‘सींचने’, ‘लड़ने’, ‘हौसले’ जैस शब्द क़ाफ़िये के रूप में बांध दिये गये हैं। और फिर न जाने क्या-क्या अगड़म-बगड़म लिख डाला है। दूसरे शेर में तक़रीबन एक-से आवाज़ वाले शब्द चाएं-चाएं कर रहे हैं तो तीसरे शेर के दोनों मिसरे एक-दूसरे से पीठ लगाये उकड़ू बैठे दिख रहे हैं।

ओम साहब के कितने ही शेरों पर कितनी ही सारी बात की जा सकती है। बारीकियों की बात बिल्कुल नहीं, बिल्कुल बेसिक चीज़ों में ही आप और हम समय बर्बाद करते जा सकते हैं। चलते-चलते यहां एक ग़ज़ल और:

चाहता हूं कि तितलियां बांटूं
साथ मिलकर उदासियां बांटूं
उसकी खुशियों में झूमकर नाचूं
और लोगों में टाफियां बांटूं
वो जो घर में उदास बैठे हैं
उनकी ख़ातिर कहानियां बांटूं
उसके दिल को जरा तसल्‍ली दूं
पास जाऊं ख़ामोशियां बांटूं
जिनको तालीम की ज़रूरत है
ऐसे बच्चों को कापियां बांटूं

एक तो मतले के बाद दो शेरों में तक़ाबुला-ए-रदीफ़ मुंह चिढ़ा रहा है, दूसरे कुछ क़ाफ़िये सिर्फ़ तुकबंदी दिख रहे हैं क्योंकि कोई अर्थ नहीं निकल रहा है। जैसे जो उदास बैठे हैं, उनके लिए कहानियां बांटने से क्या मतलब है? इसी तरह तालीम देने के लिए किताबें बांटना तो समझा जा सकता है, कापियां बांटकर क्या हो जाएगा? इन शेरों को दरअसल मैंने इसलिए यहां रख दिया क्योंकि हैरानी इस पर हुई कि ओम साहब की इस ग़ज़ल को फ़ेसबुक पर ओमा अक्क ने पोस्ट किया।

ओमा अक्क को मैंने जितना सुना है, मुझे लगता है वह प्रवचन देते हुए विद्वान लगते हैं और ग़ालिब या शायरी वग़ैरह पर भी जो बातचीत करते हैं, प्रभावशाली होती है। मुझे हैरानी इस हुई कि उन्होंने इस ग़ज़ल को पोस्ट क्यों किया! क्या वह भी ग़ज़ल की बेसिक बातों से अनजान हैं? या फिर किसी प्रकार का प्रमोशन या ऐसा कोई और कारण है?

हिंदी ग़ज़ल में अपने आप को स्थापित करने की एक और भी बड़ी ज़बरदस्त तरक़ीब देखने को मिलती है। आप यदि ग़ज़लकार बनना चाहते हैं, तो फटाफट चार-छः चर्चित लोगों की ग़ज़लों का संपादन कर दें जैसा ओम साहब ने भी किया है। फिर धीरे-से उन्हीं में से किसी एक के द्वारा अपनी तुकबंदियों को भी ग़ज़ल के नाम पर संपादित करवा लें, फिर क्या है, आप ग़ज़लकार बन गये। इसके बाद भाड़े के कुछ लोगों से अपने ऊपर लेख लिखवा लें। ‘भाड़े’ शब्द पर आप आश्चर्य न करें, हिंदी में ऐसे बहुत-से लोग हैं, कुछ को तो मैं भी जानता हूं, जो थोड़ी-सी ख़ातिरदारी करते ही आप पर कुछ भी लिख सकते हैं। एक समय था जब नचिकेता साहब इस तरह का कार्य किया करते थे। उन्हें ग़ज़ल का ‘ग़’ भी नहीं आता था, मगर अपने दौर में ग़ज़ल के सबसे बड़े समीक्षक माने जाते थे।

इस लेख के अंत में, इतना ही कहना चाहूंगा कि ओम निश्चल साहब अपनी ग़ज़लों पर और काम करें तब मंज़रे-आम पर आएं। ऐसा न करने से वे ही मज़ाक़ का पात्र बनेंगे। उनकी एक किताब भी कहीं देखी है। उसके शीर्षक को लेकर भी बहुत कुछ कहा जा सकता है लेकिन फ़िलहाल मैं यहां और कुछ नहीं कहना चाहूंगा। सभी वरिष्ठ कवियों से मेरा आग्रह है, नौसीखिया होने से बचें क्योंकि इससे ग़ज़ल का विकास तो कम होता है, भदेस अधिक बढ़ता है।

(पुन:श्च: पुस्तक समय रहते न मिलने के कारण, अपवादस्वरूप यह लेख सोशल मीडिया पर कवि द्वारा प्रसारित अशआर पर आधारित)

ज्ञानप्रकाश पांडेय, gyan prakash pandey

ज्ञानप्रकाश पांडेय

1979 में जन्मे, पेशे से शिक्षक ज्ञानप्रकाश को हिन्दी और उर्दू की शायरी में समकालीन तेवरों के लिए जाना जाता है। अमिय-कलश (काव्यसंग्रह), सर्द मौसम की ख़लिश (ग़ज़ल संग्रह), आसमानों को खल रहा हूँ (ग़ज़ल संग्रह) प्रकाशित हैं। कुछ एक प्रतिष्ठित संस्थाओं से नवाज़े जा चुके हैं।

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