जगदीश श्रीवास्तव, jagdish shrivastava, geet ashtak

एक ‘थे’ गीतकार जगदीश श्रीवास्तव…

मध्य प्रदेश के चर्चित गीतकारों में कभी शुमार रहे जगदीश श्रीवास्तव 26 अगस्त को अपने गृहनगर विदिशा में अपने परिजनों एवं मित्रों को छोड़ हमेशा के लिए विदा हो गये। ‘नटवर गीत सम्मान’ से सम्मानित जगदीश श्रीवास्तव साहित्य जगत में अपने गीतों के प्रस्तुतिकरण एवं हंसमुख स्वभाव के लिए जाने जाते थे।

वर्षों तक मंच पर प्रभावी प्रस्तुतियों से अपनी धाक जमाने वाले, पेशे से शिक्षक और हृदय से संवेदनशील गीतकार के रूप में चर्चित रहते हुए ‘सृजन क्षण’ पत्रिका का संपादन उनकी साहित्य यात्रा में उल्लेखनीय रहा। साथ ही ‘संघमित्रा प्रकाशन’ जैसा उपक्रम भी उनकी पहचान रहा।

वे साहित्य अकादमी मध्यप्रदेश संस्कृति परिषद द्वारा संचालित पाठक मंच विदिशा के संयोजक भी रहे और पाठक मंच भोपाल के संयोजक के नाते पुस्तक विमर्श के आयोजनों में भी उनकी भूमिका रही।

पहला नटवर गीत सम्मान

भोपाल से प्रकाशित होती रही कीर्तिशेष साहित्यिक पत्रिका ‘साहित्य सागर’ के संपादक के रूप में ख्यात रहे यशशेष कमलकांत सक्सेना जी। कमलकांत जी ने अपने पिता की स्मृति में ‘नटवर गीत सम्मान’ की स्थापना की थी, जो उस समय गीत साहित्य जगत में 11 हज़ार की राशि वाला अपने ढंग का एक अनोखा सम्मान था।

जगदीश श्रीवास्तव, jagdish shrivastava, geet ashtak

स्थापना के पहले वर्ष ही इस पुरस्कार से विदिशा के जगदीश श्रीवास्तव को नवाज़ा गया था। इस पुरस्कार के लिए प्रविष्टि आधारित एक प्रतियोगिता के माध्यम से अंकों के आधार पर निर्णायक मंडल विजेता को चुनता था। जगदीश श्रीवास्तव को यह पुरस्कार भोपाल में राष्ट्रीय गीत उत्सव में एक यादगार समारोह में प्रदान किया गया था।

2012 में जब कमलकांत जी के ही संपादन में ‘गीत अष्टक’ संकलन का महती प्रकाशन हुआ, तब पहले अष्टक में मध्य प्रदेश के आठ गीतकारों में एक नाम जगदीश जी का भी था। साहित्य सागर एवं आब-ओ-हवा परिवार की ओर से जगदीश जी को विनम्र श्रद्धांजलि। दूसरे नटवर गीत सम्मान से नवाज़े गये डॉ. रामवल्लभ आचार्य ने जगदीश जी को इन शब्दों में याद किया:

जन-मन की पीड़ा के गायक

15 नवम्बर 1937 को शाजापुर में जन्मे ख्याति प्राप्त गीत/नवगीतकार जगदीश श्रीवास्तव का 26 अगस्त 2026 को जीवन के‌ 89वें सोपान पर दिवंगत हो जाना गीत विधा के एक महत्वपूर्ण हस्ताक्षर का अवसान है। क़रीब सात दशक तक छंद को समर्पित जगदीश जी ने गीत, नवगीत, मुक्तक और हिंदी ग़ज़ल विधा में उल्लेखनीय सृजन कर साहित्य में अपना विशिष्ट स्थान बनाया और अनेक दशकों तक देश के काव्यमंचों‌ पर अपनी विशिष्ट शैली में काव्यपाठ कर ख्याति अर्जित की।

आपने जहाँ राष्ट्र भक्ति व शृंगारपरक रचनाएँ लिखीं, वहीं सामाजिक व राजनीतिक जीवन में नैतिक मूल्यों के‌ क्षरण, व्यवस्था की विद्रूपताओं और विसंगतियों को रेखांकित करते नवगीतों का भी सृजन किया। प्राकृतिक बिम्बों और प्रतीकों के प्रयोग‌ ने आपकी रचनाओं को धार दी। आपने क्लिष्ट साहित्यिक शब्दावली से बचते हुए जनसामान्य की भाषा में उसकी बात कही। इसी कारण, आपके‌ गीत‌ जन जन में सराहे गये‌। आपके गीतों की भावभूमि अत्यंत विस्तृत है जिनमें आम आदमी के संघर्ष और उसकी पीड़ा के दर्शन होते हैं।‌

श्री जगदीश श्रीवास्तव के समग्र रचनाकर्म‌ से गुज़रना सामाजिक‌ सरोकारों‌ से रूबरू होना है। वे अपनी व्यथा नहीं कहते अपितु जन मन के भावों और उनके दुख दर्द को उजागर करते हैं। यही सच्चे कवि का धर्म है, जिसे उन्होंने जीवन भर निभाया और एक सार्थक जीवन जी कर आने वाली पीढ़यों के समक्ष उदाहरण छोड़ गये। उन्हें विनम्र श्रद्धांजलि!

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