
- August 14, 2026
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इस बार इस कॉलम में कुछ ऐसी रचनाएं, जो न सिर्फ़ आज़ादी की बात करती हैं बल्कि तक़्सीम-ए-हिंद (भारत विभाजन) पर सवाल भी खड़ा करती हैं; आज़ादी के मतवालों की न सिर्फ़ हौसला-अफ़ज़ाई करती हैं बल्कि अवाम को भी फ़िक्र की दावत देती हैं। 'आज़ादी का ऑडिट' अंक में ख़ास तौर से यह मज़मून...
नियमित ब्लॉग डॉ. आज़म की कलम से....
जंग-ए-आज़ादी, आज़ादी और उर्दू शायरी
जंग-ए-आज़ादी की तारीख़ (इतिहास) को उर्दू अशआर और नज़्मों ने अपने ख़ून-ए-दिल से लिखा। जंग दो तरह से लड़ी जाती है अमली (व्यवहारिक) और क़लमी (लेखनी से)।

इक़बाल, जोश, फ़िराक़ ही नहीं, उस दौर के तक़रीबन सभी शायरों ने वलवला अंगेज़ (उत्साहवर्धक) नज़्में या अशआर कहे। उनकी क़लमी हिस्सेदारी ने सक्रिय स्वतंत्रता संग्राम सेनानियों के दिलों को जोश से भर दिया। चंद शायरों ने दोनों तरह से जंग आज़ादी में हिस्सा लिया जैसे हसरत मोहानी, राम प्रसाद बिस्मिल, अशफ़ाक़ उल्लाह ख़ान वग़ैरा।
सच ये है कि उर्दू ज़बान ने आज़ादी की लड़ाई में शाना-ब-शाना (कंधे से कंधे मिलाकर) काम किया। इस दौर में उर्दू प्रचलित थी, लिहाज़ा हिंदू-मुस्लिम सभी ने अपने दिली-जज़्बात के इज़हार के लिए उर्दू ज़बान का सहारा लिया। इस तरह देश प्रेम के मौज़ू (विषय-वस्तु) पर जितना अदबी सरमाया (साहित्यिक धरोहर) उर्दू के पास है, किसी दूसरी ज़बान के पास नहीं।
उर्दू ने ही “इन्क़िलाब ज़िंदाबाद” जैसा ऐसा नारा दिया जिसका कोई मुतरादिफ़ (पर्यायवाची) दुनिया की किसी भी ज़बान में भी इस क़दर प्रभावशाली नहीं है। और आज भी ये नारा उतना ही लोकप्रिय है।
आइए कुछ शायरों की रचनाएं देखते हैं और अंदाज़ा लगाते हैं कि देशभक्ति से ओतप्रोत कितनी शानदार रचनाएं उर्दू अदब और शायरी में हैं।
आमतौर से यह माना जाता है कि उर्दू शायरी सिर्फ़ मनोरंजन के साधन ही मुहैया कराती है और इसकी मौजूदगी महफ़िलों और मुशायरा तक सीमित है, मगर सच्चाई इसके बिलकुल अलग है। उर्दू शायरी ने हर दौर में आम जनता का बुरे हालात में हौसला बढ़ाया है, आंदोलन को जन्म दिया है। एक अंदाज़े के मुताबिक 1857 के गदर में कम-से-कम तीन-चार सौ शायरों ने सक्रिय रूप से जंग-ए-आज़ादी में न सिर्फ़ भाग लिया बल्कि दूसरों में जोश जगाने के लिए रचनाएं लिखीं। इस तरह भारत के स्वतंत्रता संग्राम का उर्दू ज़बान का गहरा रिश्ता है।
उर्दू ज़बान में न सिर्फ़ शायरी से लोगों के अंदर जोश और उमंग को बढ़ाने की मिसालें हैं बल्कि सहाफ़त (पत्रकारिता) और नस्र (गद्य लेखन) से ब्रिटिश साम्राज्य के ख़िलाफ़ काग़ज़ पर अपने क़लम से बेदारी की जंग छेड़ दी। दिल्ली, लखनऊ, कोलकाता से निकलने वाले उर्दू अख़बार में अंग्रेज़ों के जुल्मों की दास्तानें छपने लगीं। सहाफ़ियों पर पाबंदियां लगीं। अख़बारों को प्रतिबंधित किया गया। सहाफ़ी मौलवी मुहम्मद बाक़र को तोप के मुंह पर बांधकर उड़ा दिया गया। वह शहीद होने वाले भारत के पहले पत्रकार हैं।
उर्दू शायरी के हवाले से “मुसहफ़ी” पहले शायरों में से हैं, जिन्होंने अंग्रेज़ों के सितम के ख़िलाफ़ आवाज़ उठायी। यहां कुछ मशहूर शायरों का कलाम देखते हैं कि वो किस तरह अंग्रेज़ों के ज़ुल्म के ख़िलाफ़ क़लम उठाते हैं और लोगों का हौसला बढ़ाते हैं। या ख़ुद पर तोड़े गये सितम को इशारों-इशारों में बयान करते हैं।
बहादुर शाह “ज़फ़र”
(जन्म: 24 अक्टूबर 1775 मृत्यु: 7 नवंबर 1862)
लगता नहीं है दिल मिरा उजड़े दयार में
किसकी बनी है आलम-ए-नापाएदार में
इन हसरतों से कह दो कहीं और जा बसें
इतनी जगह कहां है दिल-ए-दाग़दार में
बुलबुल को बाग़बां से न सय्याद से गिला
क़िस्मत में क़ैद लिक्खी थी फ़स्ल-ए-बहार में
कितना है बदनसीब ज़फ़र दफ़्न के लिए
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में
अंग्रेज़ों ने वैसे तो सभी भारतीयों का जीना मुहाल कर रखा था, मगर मुसलमान क़ौम से ख़ास खुन्नस थी क्योंकि मुसलमान ऐसे जियाले थे कि जहां मौक़ा मिलता था अंग्रेज़ों को नुक़सान पहुंचा देते थे और फिर अंग्रेज़ उन पर टूट पड़ते थे।
ये हालात देखकर “ग़ालिब” (जन्म: 27 दिसंबर 1797, मृत्यु: 15 फरवरी 1869) जैसा शायर भी कह उठा:
घर से बाज़ार में निकलते हुए
ज़ोहरा होता है आब इन्सां का
चौक जिसको कहें वो मक़तल है
घर बना है नमूना ज़िंदाँ का
शहर-ए-देहली का ज़र्रा-ज़र्रा-ए-ख़ाक
तिश्ना-ए-ख़ूं है हर मुसलमां का
मोमिन खां “मोमिन”
(जन्म: वर्ष 1800, मृत्यु: 14 मई 1852)
इलाही मुझे भी शहादत नसीब
यह अफ़ज़ल है अफ़ज़ल इबादत नसीब
ये दावत हर मक़बूल दरगाह में
मिरी जाँ फ़िदा हो तिरी राह में
मैं गंज-ए-शहीदां में मसरूर हूं
इसी ज़ख़्म साथ महशूर हूं
बच्चों के शायर के नाम से मशहूर इस्माईल मेरठी (जन्म: 12 नवंबर 1844, मृत्यु: 01 नवंबर 1917) फरमाते हैं:
मिले ख़ुश्क रोटी जो आज़ाद रहकर
तो वो ख़ौफ़-ओ-ज़िल्लत के हलवे से बेहतर
अल्लामा “इक़बाल”
(जन्म: 09 नवंबर 1877, मृत्यु: 21 अप्रैल 1938)
शायर-ए-मशरिक़ (पूर्व का शायर) के लक़ब से मशहूर शायर, आज न जाने किस-किस संकीर्ण सोच के शिकार हो रहे हैं। मगर उनकी शायरी में जा-ब-जा अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ साफ़-साफ़ विरोध नज़र आता है:
ग़ुलामी में न काम आती हैं शमशीरें न तदबीरें
जो हो ज़ौक-ए-यक़ीं पैदा तो कट जाती हैं ज़ंजीरें
वतन की फ़िक्र कर नादां क़यामत आने वाली है
तिरी बर्बादियों के मशवरे हैं आसमानों में
न समझोगे तो मिट जाओगे ऐ हिंदोस्तां वालो
तुम्हारी दास्तां तक भी न होगी दस्तानों में
मौलाना मुहम्मद अली “जौहर”
(जन्म: 10 दिसंबर 1878 रामपुर, मृत्यु: 04 जनवरी 1931 लन्दन)
“मुझे आज़ादी दो या क़ब्र के लिए दो ग़ज़ ज़मीन, मैं किसी ग़ुलाम देश में वापस नहीं जाऊंगा।” और शेर कहा:
याद-ए-वतन न आये हमें क्यों वतन से दूर
जाती नहीं है बू-ए-चमन क्या चमन से दूर
“हाली” ने भी कई जगह नौजवानों को आज़ादी हासिल करने की सलाह दी।
पंडित ब्रज नारायण “चकबस्त”
(जन्म: 19 जनवरी 1882, मृत्यु: 12 फरवरी 1926)
भंवर में काम का बेड़ा है हिंदुओ हुश्यार
अंधेरी रात है काली घटा है और मंझधार
अगर पड़े रहे ग़फ़लत की नींद में सरशार
तो ज़ेर-ए-मौज-ए-फ़ना होगा आबरू का मज़ार
मिटेगी क़ौम ये बेड़ा तमाम डूबेगा
जहां में भीष्म-ओ-अर्जुन का नाम डूबेगा
और मुस्लिम नौजवानों को ललकारते हुए कहा:
दिखा दो जौहर-ए-इस्लाम ऐ मुसलमानो
वक़ार-ए-क़ौम गया क़ौम के मुसलमानो
सुतून-ए-मुल्क को हर क़द्र-ए-क़ौमियत जानो
जफ़ा वतन पे है फ़र्ज़-ए-वफ़ा को पहचानो
नहीं ख़ल्क़-ओ-मुरव्वत के बिरसादार हो तुम
अरब की शान हम्मियत की यादगार हो तुम
“हसरत” मोहानी
(01 जनवरी 1875, मृत्यु: 13 मई 1951)
ऐसे शायर थे जो सतत अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ जंग लड़ते रहे। “इंक़लाब जिंदाबाद” जैसा अमर नारा दिया। जेल गये। सक्रिय रूप से गांधी जी के साथ हर महाज़ पर डटे रहे। कहते हैं:
हम क़ौल के सादिक़ हैं अगर जान भी जाये
वल्लाह कभी ख़िदमत-ए-अंग्रेज़ नहीं होगी
और फिर कौन भूल सकता है बिस्मिल अज़ीमाबादी की ग़ज़ल और ख़ास तौर से उसका मतला, जिसे रामप्रसाद बिस्मिल इतना पढ़ते थे कि आज भी बहुत लोगों को तख़ल्लुस की वजह से ग़लतफ़हमी है कि ये उन्हीं का शेर है।
“बिस्मिल” अज़ीमाबादी
(जन्म: 1901 में, मृत्यु: 20 जून 1978)
सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-क़ातिल में है
ऐ शहीद-ए-मुल्क-ओ-मिल्लत मैं तिरे ऊपर निसार
ले तिरी हिम्मत का चर्चा ग़ैर की महफ़िल में है
वाए क़िस्मत पाँव की ऐ ज़ोफ़ कुछ चलती नहीं
कारवाँ अपना अभी तक पहली ही मंज़िल में है
रहरव-ए-राह-ए-मोहब्बत रह न जाना राह में
लज़्ज़त-ए-सहरा-नवर्दी दूरी-ए-मंज़िल में है
शौक़ से राह-ए-मोहब्बत की मुसीबत झेल ले
इक ख़ुशी का राज़ पिन्हाँ जादा-ए-मंज़िल में है
आज फिर मक़्तल में क़ातिल कह रहा है बार-बार
आएँ वो शौक़-ए-शहादत जिनके जिनके दिल में है
मरने वालो आओ अब गर्दन कटाओ शौक़ से
ये ग़नीमत वक़्त है ख़ंजर कफ़-ए-क़ातिल में है
माने-ए-इज़हार तुमको है हया, हमको अदब
कुछ तुम्हारे दिल के अंदर कुछ हमारे दिल में है
मय-कदा सुनसान ख़ुम उल्टे पड़े हैं जाम चूर
सर-निगूँ बैठा है साक़ी जो तिरी महफ़िल में है
वक़्त आने दे दिखा देंगे तुझे ऐ आसमाँ
हम अभी से क्यूँ बताएँ क्या हमारे दिल में है
अब न अगले वलवले हैं और न वो अरमाँ की भीड़
सिर्फ़ मिट जाने की इक हसरत दिल-ए-‘बिस्मिल’ में है
जोश मलीहाबादी
(जन्म: 05 दिसंबर 1898, मृत्यु: 22 फरवरी 1982)
देखकर मेरे जूनूं को नाज़ फरमाते हुए
मौत शर्माती है मेरे सामने आते हुए
फिर उठूंगा अब्र की मानिंद बल खाता हुआ
वलवलों से बर्क़ के मानिंद लहराता हुआ
मौत के साए में रहकर मौत पर छाया हुआ
काम है मेरा तग़य्युर नाम है मेरा शबाब
मेरा नारा इंक़लाब-ओ-इंक़लाब-ओ-इंक़लाब
मजाज़ लखनवी
(जन्म: 19 अक्टूबर 1911, मृत्यु: 05 दिसंबर 1955)
जलाल-ए-आतिश-ए-बर्क़-ए-शहाब पैदा कर
अज़ल भी काँप उठे वो शबाब पैदा कर
तू इंकलाब की आमद का इंतज़ार न कर
जो हो सके तो ख़ुद इंक़लाब पैदा कर
उर्दू शायरी आज़ादी-ए-वतन के लिए और आज़ादी के बाद भी देशप्रेम के नग़मे गाती है।
इस तरह उर्दू शायरी मुल्क की मुहब्बत में अहम किरदार अदा किया है। आज भी भाईचारे, गंगा-जमुना तहज़ीब, सामाजिक बराबरी की बात करती है। शायरों ने न सिर्फ़ अंग्रेज़ों के ख़िलाफ़ आवाज़ उठायी बल्कि तक्सीम-ए-हिंद पर भी सवाल उठाये। एक नज़्म देखिए:
“पाकिस्तान चाहने वालों से” – शमीम करहानी
(जन्म: 8 जून 1913-मृत्यु: 19 मार्च 1975)
हमको बतलाओ तो क्या मतलब है पाकिस्तान का
जिस जगह इस वक़्त मुस्लिम हैं नजिस है क्या वो जा
नैश-ए-तोहमत से तिरे चिश्ती का सीना-चाक है
जल्द बतला क्या ज़मीन अजमेर की नापाक है
कुफ़्र की वादी में ईमां का नगीना खो गया
हाय क्या ख़ाक-ए-नजिस में शाह मीना सो गया?
दीन का मख़दूम जो कलियर की अबादी में है
आह उसका अस्ताना किया नजिस वादी में है
हैं इमामों के जो रौज़े लखनऊ की ख़ाक पर
बन गए क्या तौबा-तौबा ख़ित्ता-ए-नापाक पर
बात ये कैसी कही तूने कि दिल ने आह की
क्या ज़मीन ताहिर नहीं दरगाह नूर अल्लाह की
आह उस पाकीज़ा गंगा को नजिस कहता है तू
जिसके पानी से किया मुस्लिम शहीदों ने वुज़ू
नाम-ए-पाकिस्तान न ले गर तुझ को पास-ए-दीन है
ये गुज़श्ता नस्ल-ए-मुस्लिम की बड़ी तौहीन है
टुकड़े-टुकड़े कर नहीं सकते वतन को अहल-ए-दिल
किस तरह ताराज देखेंगे चमन को अहल-ए-दिल
क्या ये मतलब है कि हम महरूम-ए-अज़ादी रहें
मुनक़सिम होकर अरब की तरह फ़र्यादी रहें
टुकड़े-टुकड़े हो के मुस्लिम ख़स्त: दिल हो जाएगा
नख़ल जमईयत सरासर मुज़्महिल हो जाएगा

“आज़ादी वतन” – मख़दूम मुहीउद्दीन
(जन्म 04 फरवरी 1908, मृत्यु: 25 अगस्त 1969)
कहो हिंदुस्तां की जय
कहो हिंदुस्तां की जय
क़सम है ख़ून से सींचे हुए रंगीन गुलसिताँ की
क़सम है ख़ून-ए-दहक़ाँ की क़सम ख़ून-ए-शहीदाँ की
…
बदल दी नौजवान-ए-हिंद ने तक़दीर ज़िंदाँ की
मुजाहिद की नज़र से कट गई ज़ंजीर ज़िंदाँ की
कहो हिंदुस्तां की जय
कहो हिंदुस्तां की जय
“जश्न-ए-आज़ादी” – जां निसार “अख़्तर”
(जन्म: 18 फरवरी 1914, मृत्यु: 19 अगस्त 1976)
सीने से आधी रात के/फूटी वो सूरज की किरण
बरसे वो तारों के कंवल/वो रक़्स में आया गगन
आए मुबारकबाद को/कितने शहीदान-ए-वतन
अज़ाद है अज़ाद है अज़ाद है अपना वतन
अज़ाद है अपना वतन/ए पर्चम सह रंग तू
अपने वतन की आबरू/तू है हमारा नंग-ओ-नाम
हम तुझको करते हैं सलाम
ज़र्दी से तेरी रौनुमा/बेलौस ख़िदमत की लगन
सब्ज़ी से तेरे जलवागर/हिम्मत, जवानी, बांकपन
तेरी सफ़ेदी से अयाँ/इन्सानियत, पाकीज़ापन
“यौम आज़ादी” – सिराज लखनवी
(1894-1968)
ज़मीन-ए-हिंद है और आसमानी-ए-अज़ादी
यक़ीन बन गया अब तो गुमान-ए-अज़ादी
सुनो बुलंद हुई फिर अज़ान-ए-अज़ादी
सर-ए-नियाज़ है और आस्तान-ए-अज़ादी
पहाड़ कट गया नूर-ए-सहर से रात मिली
ख़ुदा का शुक्र गु़लामी से तो नजात मिली
ज़मीन अपनी, फ़िज़ा अपनी, आसमां अपना
हुकूमत अपनी, अलम अपना और निशाँ अपना
हैं फूल अपने, चमन अपना, बाग़बाँ अपना
इताअत अपनी है, सर अपना, आस्तां अपना
जमाल-ए-का’बा नहीं या जमाल-ए-दैर नहीं
सब अपने ही नज़र आते हैं कोई ग़ैर नहीं
“मुबारकबाद आज़ादी” – इक़बाल अहमद सुहेल
(जन्म: 28 जनवरी 1885, मृत्यु: 07 नवंबर 1955)
गुलज़ार वतन की कोई देखे तो फबन आज
सरशार है ख़ुशबू से हर इक दश्त-ओ-चमन आज
ग़ुंचों का सबा तोड़ गयी कुफ़्ल-ए-दहन आज
है हर गुल-ए-ख़ंदां के ज़बां पर ये सुख़न आज
सद-शुक्र की टूटा दर-ए-ज़िंदाँ-ए-मेहन आज
रुख़स्त है शब-ए-तार-ए-गु़लामी का अंधेरा
वो सामने है सुबह सआदत का सवेरा
भारत से बिदेशी का उखड़ने लगा डेरा
लहराए ना क्यों अज़मत-ए-क़ौमी का फ़रेरा
आज़ाद हुआ कैद-ए-गु़लामी से वतन आज
“आ ही गया” – आनंद नारायण “मुल्ला”
(जन्म: 24 अक्टूबर 1901, मृत्यु: 12 जून 1997)
हुक्म माज़ूली बनाम तीरगी आ ही गया
वादी-ए-शब में पयाम-ए-रोशनी आ ही गया
ऐ अरूस हिंद के बिखरे हुए मोती के हार
गूँथने फिर तुझको तेरा जौहरी आ ही गया
शम्मा रखी जा रही है हिंद नौ के सामने
नज़्म-ए-इफ़रंगी का शे’र अख़िरी आ ही गया
एक हक़ीक़त बनके मिला ख़ाब-ए-अरमान-ए-वतन
ऐ ज़हे-क़िस्मत कि अपने जीते-जी आ ही गया
ऐलान-ए-आज़ादी – अमीन सालोनवी
आज ये महसूस होता है जहां अज़ाद है
ये ज़मीन अज़ाद है ये आसमां अज़ाद है
ख़ूँ शहीदान-ए-वतन का रंग लाकर ही रहा
आज ये जन्नत-निशां हिंदुस्तां अज़ाद है
हमारी कहानी – कमाल अहमद सिद्दीक़ी
(जन्म: 17 फरवरी 1926, मृत्यु: 24 दिसंबर 2013)
ज़िंदगी मुज़्तरिब वो नोहे-कुनां रहती थी
ज़ुल्म की दाद न थी जौर की फ़र्याद न थी
बंदिशें इतनी कि जी जलता था दम घुटता था
नज़र अज़ाद न थी सांस भी अज़ाद न थी
मक़सद-ए-ज़ीस्त थी अज़ादी-ए-जम्हूर-ए-वतन
सर में सौदा था यही दिल में यही एक लगन
ये तमन्ना थी कि अज़ाद हो अपना गुलशन
वक़्फ़ थी उस के लिए क़लब की इक-इक धड़कन
दिल में जो आग भड़कती थी भड़कती ही रही
अपनी मंज़िल से किसी वक़्त भी ग़ाफ़िल न रहे
हुर्रियत सोज़ सितम पेशा हुकूमत के ख़िलाफ़
हमने हरवक़त बग़ावत के अलम लहराए
आज अज़ादी-ए-जम्हूर कोई ख़ाब नहीं
आज आईन हमारा है हमारा है निज़ाम
मोतबर आज है दुनिया में हमारी अवाज़
आज चढ़ता हुआ सूरज हमें करता है सलाम
अशफ़ाक़ उल्ला ख़ान
(जन्म: 22 अक्टूबर 1900, मृत्यु: 19 दिसंबर 1927)
सभी सामान-ए-इशरत थे मज़े से अपनी कटती थी
वतन के इश्क़ ने हमको हवा खिलवाई ज़िंदाँ की
वो गुलशन जो कभी आबाद था गुज़रे ज़माने में
मैं शाख़ ए ख़ुश्क हूँ हाँ-हाँ उसी उजड़े गुलसिताँ की
ये झगड़े और बखेड़े मेट कर अपस में मिल जाओ
ये तफ़रीक़ अबस है तुममें हिंदू और मुसलमाँ की
हुब्ब-ए-वतन – मुहम्मद हुसैन “आज़ाद”
(जन्म: 05 मई 1830, मृत्यु: 22 जनवरी 1910)
उलफ़त से गर्म सबके दिल-ए-सर्द हों बहम
और जो कि हमवतन हों वो हमदर्द हों बहम
लबरेज़ जोश हुब्ब-ए-वतन सब के जाम हों
सरशार-ए-ज़ौक़-ओ-शौक़ दिल-ए-ख़ास-ओ-आम हों
“हुब्ब-ए-वतन” – अल्ताफ़ हुसैन “हाली”
(जन्म: 1837, मृत्यु: 31 दिसंबर 1914)
तेरी एक मुश्त-ए-ख़ाक के बदले
ना लूं हरगिज़ अगर बहिश्त मिले
“शोला-ए-फ़ानूस-ए-हिंद” – ज़फ़र अली ख़ान
(जन्म: 1873, मृत्यु: 27 नवंबर 1956)
ज़िंदाबाद-ए-इन्क़िलाब-ए-शोला-ए-फ़ानूस–हिंद
गर्मियां जिसकी फ़रोग़-ए-मिशअल-ए-जाँ हो गईं
मर्हबा-ए-नौ-गिरफ़्तारान-ए-बेदाद-ए-फ़रंग
जिनकी ज़ंजीरें ख़ुरोश-ए-अफ़ज़ा-ए-ज़िंदाँ हो गईं
ज़िंदगी उनकी है दीन उनका है दुनिया उनकी है
जिनकी जानें क़ौम की इज़्ज़त पे क़ुर्बां हो गईं
“तस्वीर-ए-दर्द” – डॉक्टर मुहम्मद इक़बाल
(जन्म: 09 नवंबर 1877, मृत्यु: 21 अप्रैल 1938)
नहीं है मिन्नतकश-ए-ताब-ए-शुनीदन दास्ताँ मेरी
ख़मोशी गुफ़्तगू है बेज़बानी है ज़बां मेरी
ये दस्तूर-ए-ज़बांबंदी है कैसा तेरी महफ़िल में
यहां तो बात करने को तरसती है ज़बां मेरी
मेरा रोना नहीं, रोना है ये सारे गुलसिताँ का
वो गुल हूँ मैं कि हर इक गुल की है गोया ख़िज़ां मेरी
रुलाता है तेरा नज़ारा-ए-हिंदुस्तां मुझको
कि इबरत-ख़ेज़ है तेरा फ़साना सब फ़सानों में
वतन की फ़िक्र कर नादाँ मुसीबत आने वाली है
तेरी बर्बादियों के मश्वरे हैं आसमानों में
न समझोगे तो मिट जाओगे ऐ हिंदुस्तां वालो
तुम्हारी दास्ताँ तक भी न होगी दास्तानों में
“सुब्ह-ए-वतन” – साग़र निज़ामी
(जन्म: 21 दिसंबर 1905, मृत्यु: 27 फ़रवरी 1983)
सुब्ह-ए-वतन ऐ सुब्ह-ए-वतन
ऐ रूह-ए-बहार ऐ जान-ए-चमन
ऐ मुतरिब या ऐ साक़ी-ए-मन
ऐ सुब्ह-ए-वतन ऐ सुब्ह-ए-वतन
ले जोश-ए-जुनूँ की ज़र्बों ने ज़ंजीर-ए-ग़ुलामी तोड़ ही दी
जम्हूर के संगीं पंजे ने शाहीं की कलाई मोड़ ही दी
तारीख़ के ख़ूनी हाथों से छीना है तिरा सीमीं दामन
ऐ सुब्ह-ए-वतन ऐ सुब्ह-ए-वतन
“आहंग-ए-नौ” – असरार-उल-हक़ मजाज़
(जन्म:19 अक्टूबर 1911, मृत्यु: 05 दिसंबर 1955)
ऐ जवानान-ए-वतन रूह जवाँ है तो उठो
आँख उस महशर-ए-नौ की निगराँ है तो उठो
ख़ौफ़-ए-बे-हुरमती-ओ-फ़िक्र-ए-ज़ियाँ है तो उठो
पास-ए-नामूस-ए-निगारान-ए-जहाँ है तो उठो
उठो नक़्कारा-ए-अफ़्लाक बजा दो उठ कर
एक सोए हुए आलम को जगा दो उठ कर
एक इक सम्त से शब-ख़ून की तय्यारी है
लुत्फ़ का वअ’दा है और मश्क़-ए-जफ़ा-कारी है
महफ़िल-ए-ज़ीस्त पे फ़रमान-ए-क़ज़ा जारी है
शहर तो शहर है गाँव पे भी बम्बारी है
ये फ़ज़ा में जो गरजते हुए तय्यारे हैं
बरसर-ए-दोश-ए-हवा मौत के हरकारे हैं
इस तरफ़ हाथों में शमशीरें ही शमशीरें हैं
उस तरफ़ ज़ेहन में तदबीरें ही तदबीरें हैं
ज़ुल्म पर ज़ुल्म हैं ताज़ीरों पे ताज़ीरें हैं
सर पे तलवार है और पाँव में ज़ंजीरें हैं
एक हो एक कि हंगामा-ए-मशहर है यही
अर्सा-ए-ज़ीस्त का हंगामा-ए-अकबर है यही
अपनी सरहद पे जो अग़्यार चले आते हैं
शोला-अफ़्शाँ ओ शरर-बार चले आते हैं
ख़ून पीते हुए सरशार चले आते हैं
तुम जो उठ जाओ तो बे-कार चले आते हैं
ख़ूँ जो बह निकला है उस ख़ूँ में बहा दो उन को
उन की खोदी हुई ख़ंदक़ में गिरा दो उन को
रंग-ए-गुल-हा-ए-गुलिस्तान-ए-वतन तुम से है
सोरिश-ए-नारा-ए-रिंदान-ए-वतन तुम से है
नश्शा-ए-नर्गिस-ए-ख़ूबान-ए-वतन तुम से है
इफ़्फ़त-ए-माह-ए-जबीनान-ए-वतन तुम से है
तुम हो ग़ैरत के अमीं तुम हो शराफ़त के अमीं
और ये ख़तरे में हैं एहसास तुम्हें है कि नहीं
ये दरिंदे ये शराफ़त के पुराने दुश्मन
तुम कि हो हामिल-ए-आदाब-ओ-रिवायात-ए-कुहन
जादा-पैमा के लिए ख़िज़्र हो तुम ये रहज़न
तुम हो ख़िर्मन के निगहबान ये बर्क़-ए-ख़िर्मन
ख़ित्ता-ए-पाक में ज़िन्हार न आने पाएँ
आ ही जाएँ जो ये ज़िंदा तो न जाने पाएँ
मर्द-ओ-ज़न पीर-ओ-जवाँ इन के मज़ालिम के शिकार
ख़ून-ए-मासूम में डूबी हुई इन की तलवार
ये क़यामत के हवसनाक ग़ज़ब के ख़ूँ-ख़ार
इन के इस्याँ की न हद है न जराएम का शुमार
ये तरह्हुम से न देखेंगे किसी की जानिब
इन की तोपों के दहन कर दो उन्ही की जानिब
ये तो हैं फ़ित्ना-ए-बेदार दबा दो इन को
ये मिटा देंगे तमद्दुन को मिटा दो इन को
फूँक दो इन को झुलस दो कि जिला दो इन को
शान-ए-शायान-ए-वतन हो ये बता दो इन को
याद है तुम को किन अस्लाफ़ की तुम यादें हो
तुम तो ख़ालिद के पिसर भीम की औलादें हो
दूर इंसान के सर से ये मुसीबत कर दो
आग दोज़ख़ की बुझा दो इसे जन्नत कर दो
…
बहे ज़मीं पे जो मेरा लहू तो ग़म मत कर
इसी ज़मीं से महकते गुलाब पैदा कर
तू इंक़लाब की आमद का इंतिज़ार न कर
जो हो सके तो अभी इंक़लाब पैदा कर
आज़ादी का जज़्बा हर किसी में होता है मगर इज़हार सब के बस की बात नहीं। तहरीक-ए-आज़ादी के दौरान उर्दू के हर छोटे-बड़े शायर ने नज़्म या अशआर लिखे और आज़ादी के मतवालों का हौसला बढ़ाते रहे। बहुत से शायर और अदीब सीधे इस जंग में सशरीर भी कूदे। एक ऐसी फ़ेहरिस्त ऐसे नग्मों की है, जिन्हें पढ़कर दिल जोश से भर जाता है। अगर सब रचनाएं इक्ट्ठा की जाएं तो मोटी-मोटी किताबों के कई भाग बन जाएंगे।
आज भी हर हिंदुस्तानी, अपने मुल्क पर मर मिटने को तैयार रहता है। आख़िर में अपना एक क़िता पेश करता हूं:
मेरे ख़ूं से ही सही सब्ज़ चमन हो जाये
सारी दुनिया से हंसीं अपना वतन हो जाये
बा’द मरने के भी तक़दीर पे इतराऊँ मैं
इक तिरंगा अगर अपना भी कफ़न हो जाये

डॉक्टर मो. आज़म
बीयूएमएस में गोल्ड मेडलिस्ट, एम.ए. (उर्दू) के बाद से ही शासकीय सेवा में। चिकित्सकीय विभाग में सेवा के साथ ही अदबी सफ़र भी लगातार जारी रहा। ग़ज़ल संग्रह, उपन्यास व चिकित्सकी पद्धतियों पर किताबों के साथ ही ग़ज़ल के छन्द शास्त्र पर महत्पपूर्ण किताबें और रेख्ता से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ग़ज़ल विधा का शिक्षण। दो किताबों का संपादन भी। मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी सहित अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं से सम्मानित, पुरस्कृत। आकाशवाणी, दूरदर्शन से अनेक बार प्रसारित और अनेक मुशायरों व साहित्य मंचों पर शिरकत।
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