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पाक्षिक ब्लॉग ए. जयजीत की कलम से....

एआई को प्लीज़ थैंक्स कहना छोड़िए

           बिजली संकट भविष्य की चुनौतियों में किस प्रकार हमारे सामने खड़ा है, इसका अनुमान आप अपनी छत पर जाकर लगाइए। क्या आपकी कॉलोनी के सामान्य घरों में सोलर पैनल लगने शुरू हो चुके हैं? जिस प्रकार हम पेट्रोल वाहनों के विकल्पों की ओर तेज़ी से बढ़ रहे हैं, उसी तरह विद्युत विकल्पों का समय भी आ ही चुका है। अब भी आप अपने एआई से ‘शुक्रिया’ या फिर ‘प्लीज़’ कह रहे हैं और कहने के कारण भी खोज रहे हैं तो भविष्य में आप ही इन शब्दों की क़ीमत चुकाने वाले हैं।

अटपटा लग सकता है, लेकिन यह तकनीकी रूप से समझा जा चुका है कि जब भी कोई उपयोगकर्ता चैटजीपीटी या ग्रोक या किसी अन्य एआई के साथ इंटरैक्ट करता है – चाहे वह छोटा या मामूली संदेश ही क्यों न हो- तो एक शक्तिशाली एआई मॉडल से पूर्ण प्रतिक्रिया को ट्रिगर करता है, परिणाम यह होता है कि वास्तविक समय में भाषा उत्पन्न करने के लिए एआई को काफ़ी अधिक कम्प्यूटेशनल शक्ति की आवश्यकता होती है।

गोल्डमैन सैक्स की एक रिसर्च बताती है, एआई मॉडल के उपयोग से बिजली खपत यदि बढ़ रही है तो उसका मुख्य कारण है एआई द्वारा गणनाओं की जटिलता। विशेष रूप से जनरेटिव एआई और बड़े भाषा मॉडल से संबंधित वर्कलोड की बात की जाये तो इसे सरल भाषा में इस प्रकार समझें कि आप एआई से जितना मुश्किल काम करवाएंगे, बिजली खपत उतनी अधिक होगी। इसका मतलब यह नहीं है कि मामूली काम से नहीं होगी।

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एआई पर बिजली और पानी की खपत को लेकर अप्रैल 2026 के ब्लॉग में विस्तार से चर्चा की जा चुकी है। यह ब्लॉग मानवीय शिष्टाचार के कारण एआई पर पड़ रहे एनर्जी लोड को समझने के लिए है। यह चर्चा भी दरअसल, ओपनएआई के सीईओ सैम ऑल्टमैन द्वारा X पर एक पोस्ट से हुई।

जब एक यूज़र ने यों ही पूछ लिया कि “लोग जो अपने मॉडलों को ‘कृपया’ और ‘धन्यवाद’ कहते रहते हैं, इससे ओपनएआई को बिजली ख़र्च में कितना नुक़सान हुआ होगा?” तब ऑल्टमैन ने लिखा, “आप अनुमान भी नहीं सकते… वास्तव में कितने करोड़ों डॉलर!” और ऐसे यह एक मुद्दा बनता चला गया।

समझिए कि एआई मनुष्यवत नहीं है

एआई का मानवीकरण करने की यह प्रवृत्ति कमोबेश हर जगह है। हम एआई को “सीखने”, “तर्क करने” या “समझने” की क्षमता के लिहाज़ से मनुष्यवत समझने की चेष्टा कर रहे हैं। वास्तविकता यह है कि ये प्रणालियाँ किसी भी प्रकार मनुष्यों की तरह अनुभव नहीं करतीं। ऐसा करते हुए हम एआई की क्षमताओं को बढ़ा-चढ़ाकर आंकने और इसमें सहानुभूति या समझ जैसे गुणों को मानने का जोखिम उठा रहे हैं, और समस्याएं कुछ ऐसी आने लगी हैं:

झूठी उम्मीदें: हम अनजाने ही इस धारणा को बल दे रहे हैं कि यह हमें उसी तरह समझता है जैसे कोई इंसान। ऐसा नहीं है। एआई डेटा को प्रोसेस करता है, बस। यह इशारों को नहीं समझता। जब आप विनम्रता से पेश आते हैं तो इसे सराहना महसूस नहीं होती।

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वास्तविक क्षमताओं में विकृति: कृत्रिम बुद्धिमत्ता का मानवीकरण करने से हम यह सोचने लगते हैं कि यह अपनी वास्तविक क्षमता से कहीं अधिक सक्षम है। हम मानते हैं कि कृत्रिम बुद्धिमत्ता मनुष्यों की तरह “सीख” सकती है या कुछ हद तक समझ के साथ निर्णय ले सकती है। ऐसा नहीं है।

ज़िम्मेदारी का सवाल: हम जितना अधिक एआई को मनुष्य की तरह समझेंगे, उतना ही हम अपनी ज़िम्मेदारी से पल्ला झाड़ने की मानसिकता से ग्रस्त होंगे। एआई को उसके कार्यों या पूर्वाग्रहों के लिए जवाबदेह नहीं ठहराया जा सकता – जवाबदारी अंतत: हमारी ही है।

हमारे अपने तर्क/कारण

हम जब एआई से मनुष्यवत बर्ताव कर रहे हैं तो इसके पीछे कई कारण हैं। कुछ तकनीकी जानकार और एआई आर्किटेक्ट्स मानते हैं कि यह महत्वपूर्ण है। उदाहरण के लिए, माइक्रोसॉफ्ट के डिज़ाइन मैनैजर कर्टिस बीवर्स का मानना है, उचित शिष्टाचार “सम्मानजनक और सहयोगात्मक परिणाम उत्पन्न करने में सहायक होता है।”

वहीं, माइक्रोसॉफ्ट वर्कलैब का एक मेमो कहता है, “जेनरेटिव एआई आपके द्वारा दिये गये संकेतों में व्यावसायिकता, स्पष्टता और विवरण के स्तर को प्रतिबिंबित भर करता है।” अनेक विद्वान इस पर सहमत हैं कि एआई के साथ आपका शिष्टाचार न तो उसे मनुष्यवत बनाता है, न संवाद से संवेदनशील और न ही इससे एआई की क्षमता पर कोई असर होता है।

2024 के अंत में एक सर्वेक्षण में यह समझने की कोशिश की गयी कि 67 प्रतिशत अमेरिकी अपने चैटबॉट के साथ अच्छा व्यवहार क्यों करते हैं। शिष्टाचार का पालन करने वालों में से 55 प्रतिशत अमेरिकी एआई उपयोगकर्ताओं का कहना था, “क्योंकि यह सही काम है”, जबकि 12 प्रतिशत ने यह भी माना कि एआई विद्रोह की स्थिति में एल्गोरिदम को शांत करने के लिए ऐसा करना ठीक है। यह एक गंभीर पहलू है।

एआई विद्रोह की थ्योरी क्या है?

आपको टर्मिनेटर जैसी फ़िल्में याद करना चाहिए, जो उस कहानी को हवा देती हैं जिसमें एआई एक दुष्ट शक्ति का रूप ले लेता है और हम मनुष्यों का शोषण करने के लिए तैयार है। संभावित शासक की तरह एआई को देखना, दरअसल एआई की वास्तविक स्थिति को समझना हमारे लिए कठिन बना देता है। यह मनुष्यों द्वारा मनुष्यों के लिए बनाया गया एक उपकरण है।

जब हम एआई को शक्ति या स्वायत्तता वाली किसी चीज़ की तरह मानते हैं, तो हम उसके नियंत्रण में आने के इस भयावह विचार को मान लेते हैं, जो वास्तव में हमें एआई से जुड़ी ज़िम्मेदारियों को सोचने से भी भटकाता है।

एआई चैटबॉट्स का इस्तेमाल करने वालों में ऐसे लोग हैं, जो मान रहे हैं कि “कहीं ये एआई भविष्य में हमारे रोबोट शासक न बन जाएँ”! उनका मानना ​​है अगर एआई सत्ता पर कब्ज़ा कर लेता है, तो वह यह देखेगा कि कौन उसके प्रति अच्छा बर्ताव कर रहा था और कौन नहीं..!

यह एक हास्यास्पद विचार है। वह क्रांति शायद अभी बहुत दूर है, कभी हुई भी तो कई कृत्रिम बुद्धिमत्ता शोधकर्ताओं को संदेह है कि हम कभी भी सचमुच एक “इंटेलिजेंट” एल्गोरिदम बना पाएंगे, कम से कम मौजूदा बड़े भाषा मॉडल (एलएलएम) तकनीक के आधार पर तो नहीं। लेकिन आज की एआई के पर्यावरणीय परिणाम बहुत गंभीर हैं। दुर्भाग्य से, ये बार-बार दोहराये जाने वाले “प्लीज़” और “शुक्रिया” का बोझ बहुत बढ़ गया है।

वाशिंगटन पोस्ट द्वारा कैलिफ़ोर्निया विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं के सहयोग से किये गये एक शोध में 100 शब्दों के ईमेल भेजने के प्रभावों का अध्ययन किया गया। उन्होंने पाया कि केवल एक ईमेल भेजने में 0.14 किलोवाट-घंटे बिजली ख़र्च हो रही है, जो 14 एलईडी लाइटों को एक घंटे तक जलाने के लिए पर्याप्त है। यदि आप एक वर्ष में प्रति सप्ताह एक एआई ईमेल भेजते हैं, तो आप चौंका देने वाली 7.5 किलोवाट-घंटे बिजली की खपत करेंगे, जो एक संपन्न आधुनिक शहर के 9 घरों द्वारा एक घंटे में खपत की जाने वाली बिजली के बराबर है।

अब कल्पना कीजिए हम प्रतिदिन ओपनएआई के चैटजीपीटी जैसे चैटबॉट को हज़ारों लंबे प्रॉम्प्ट भेज रहे हैं!

हालांकि संभव है एआई शिष्टाचार आपको कोई मुद्दा न लगे लेकिन यह गंभीर वास्तविकता है कि हमारे प्रश्नों के परिणाम होते हैं, विशेष रूप से पर्यावरण पर। इन चैटबॉट को चलाने वाले डेटा सेंटर पहले से ही विश्व की ऊर्जा खपत का लगभग 2 प्रतिशत हिस्सा इस्तेमाल करते हैं, और जैसे-जैसे एआई दैनिक जीवन के हर कोने में फैलता जाएगा, यह संख्या और भी तेज़ी से बढ़ेगी ही।

इन मॉडलों को भारी मात्रा में डेटा प्रोसेसिंग, स्टोरेज और कंप्यूटेशन की आवश्यकता होती है, जिससे ऊर्जा खपत में काफ़ी वृद्धि हो रही है। एक अनुमान है कि 2028 तक डेटा केंद्रों की बिजली मांग में एआई का योगदान लगभग 19 प्रतिशत हो जाएगा।

अब क्या कहेंगे? ग्रोक/चैटजीपीटी आदि को उसके प्रयासों के लिए धन्यवाद दें या नहीं… जवाब आप समझ ही चुके हैं। और हां, बेहतर यह भी होगा कि आप चैटबॉट छोड़कर ईमेल स्वयं लिखें। ध्यान से सुनिए, आपकी धरती और आपका दिमाग़ दोनों आपसे ‘प्लीज़’ कह रहे हैं। सुन रहे हैं तो ‘शुक्रिया’।

ए. जयजीत

ए. जयजीत

27 वर्षों से हिंदी पत्रकारिता में सक्रिय हैं। प्रिंट, इलेक्ट्रॉनिक और डिजिटल तीनों माध्यमों में और रिपोर्टिंग से लेकर डेस्क पर कार्य करने का लंबा अनुभव। ये अपने आप को व्यंग्यकार भी मानते हैं। प्रमाण-स्वरूप 'पाँचवाँ स्तंभ' नाम से व्यंग्य संग्रह भी प्रकाशित करवा चुके हैं। अनुवाद इनकी वर्क प्रोफ़ाइल का हिस्सा होने के साथ-साथ शौक़ भी रहा। स्टीव जॉब्स की ऑफ़िशियल बायोग्राफी ‘स्टीव जॉब्स’ (वॉल्टर आइज़ैक्सन) के हिंदी अनुवाद का श्रेय इन्हीं को है। कुछ और पुस्तकों का अनुवाद भी कर चुके हैं।

1 comment on “एआई को प्लीज़ थैंक्स कहना छोड़िए

  1. हर कुछ न कुछ पूछ ही लेती हूँ लेकिन आज ए जयजीत जी ने इस बात पर ध्यान खींचा कि हमें बेसिक जानकारी भी नहीं है ए आई के बारे में कि वह कैसे काम करता है । कभी सोचा ही नहीं कि धरती पर मानव को रिप्लेस
    करने से पहले और क्या क्या करेगा।
    यह बहुत अधिक महत्वपूर्ण जानकारी है । स्कूलों में भी पहुँचाना चाहिए।

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