
- August 14, 2026
- आब-ओ-हवा
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स्वास्थ्य से जुड़ी हमारी धारणाओं, प्रैक्टिसों, नीतियों और अप्रोच आदि को लेकर यह ब्लॉग लगातार चिंतन प्रस्तुत कर रहा है। 'आज़ादी का ऑडिट' अंक में देश की स्वास्थ्य नीतियों से संबंधित आंकड़ों और फ़ैक्ट्स के साथ इस बार एक और गहन विश्लेषण...
नियमित ब्लॉग डॉ. आलोक त्रिपाठी की कलम से....
प्रधानमंत्री के 'मन की बात' के मन में
मैंने प्रधानमंत्री मोदी के ‘मन की बात’ के 52 ऐसे एपिसोड का विश्लेषण किया, जिनमें सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े विषयों पर चर्चा थी। एक पैटर्न बहुत स्पष्ट रूप से सामने आया—समय के साथ “रोकथाम” (Prevention) की अवधारणा लगातार सिकुड़ती गयी और केंद्र में मुख्यतः टीकाकरण आता गया। जबकि यह प्रतिरक्षा की मूल भावनाओं के विपरीत है और पैथोलॉजी के नियमों पर भी खरा नहीं उतरता।

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स्वास्थ्य तंत्र को एक बेहद संकीर्ण दिशा में मोड़े जाने की चिंता पर मेरा पिछला ब्लॉग भी आप पढ़ सकते हैं और इस ब्लॉग को उसी की अगली कड़ी के रूप में भी समझा जा सकता है।
कार्यालय संभालने के तुरंत बाद सरकार ने टीकाकरण कार्यक्रमों को तेज़ किया और यह सुनिश्चित करने का लक्ष्य रखा कि कोई भी बच्चा टीकाकरण से वंचित न रहे। ‘मिशन इन्द्रधनुष’ शुरू किया गया, जिसके बाद IPV, रोटावायरस वैक्सीन, MR अभियान, इंटेंसिफ़ाइड मिशन इन्द्रधनुष और बाद में कोविड-19 टीकाकरण कार्यक्रम का विस्तार हुआ।
ये सभी घटनाक्रम WHO, UNICEF, GAVI, बिल एवं मेलिंडा गेट्स फाउंडेशन (BMGF), CEPI, PATH, FIND, ग्लोबल फ़ंड, विश्व बैंक तथा ग्लोबल पोलियो उन्मूलन पहल (GPEI) जैसी संस्थाओं द्वारा आगे बढ़ायी जा रही वैश्विक स्वास्थ्य प्राथमिकताओं के साथ उल्लेखनीय सामंजस्य दिखाते हैं। यह समन्वय था, नीति प्रसार था या केवल साझा प्राथमिकताएँ? यह व्याख्या का विषय हो सकता है, लेकिन टाइमलाइन अक्सर एक साथ चलती दिखायी देती है।
उलेख्यनीय है कि वैश्विक महामारी (pandemic) जैसे शब्द का प्रसार 2007 में WHO ने किया था। यहाँ यह समझना काफ़ी मुश्किल है कि जब बीमारी रोगाणु, मानव और वातावरण का समयक फलन है तो कोई भी बीमारी पूरे ग्लोब पर कैसे फैल सकती है? इसके लिए सिर्फ दो ही कारण हो सकते हैं, या तो इसे प्रयोगशाला में बनाया गया हो जैसा कि कोविड के समय विमर्श हुआ या फिर यह संभव नहीं है।
दूसरा प्रमुख विषय अंगदान रहा। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर टीकाकरण या टीबी की तुलना में अपेक्षाकृत कम ध्यान मिलने के बावजूद ‘मन की बात’ में इसका बार-बार उल्लेख किया गया। इसी अवधि में NOTTO का विस्तार हुआ, प्रत्यारोपण अवसंरचना मज़बूत हुई और भारत को एक वैश्विक चिकित्सा हब के रूप में स्थापित करने के प्रयास बढ़े।
यह लेख अंतरराष्ट्रीय प्राथमिकता निर्धारण, घरेलू संदेश, कार्यक्रमों के कार्यान्वयन और उनके बाद होने वाली आर्थिक गतिविधियों के क्रम को समझने का प्रयास करता है।
1. टीकाकरण, मिशन इन्द्रधनुष और पोलियो
पूरे अध्ययन में सबसे मज़बूत और लगातार दिखायी देने वाला तालमेल टीकाकरण के क्षेत्र में था। मिशन इन्द्रधनुष, पल्स पोलियो और नियमित टीकाकरण पर प्रधानमंत्री की चर्चाएं WHO के ‘ग्लोबल वैक्सीन एक्शन प्लान (GVAP 2011–2020)’ की अवधि के दौरान हुईं, जिसे 2012 में WHO सदस्य देशों ने वैश्विक टीकाकरण ढाँचे के रूप में स्वीकार किया था। उसी समय GAVI, UNICEF और गेट्स फ़ाउंडेशन भारत सहित निम्न और मध्यम आय वाले देशों में टीकाकरण कवरेज, कोल्ड-चेन और डिलीवरी सिस्टम को मज़बूत करने में बड़े पैमाने पर निवेश कर रहे थे।
ऐसा ही दूसरा ‘इत्तेफ़ाक़’ दिखता है, भारत में मिशन इन्द्रधनुष के विस्तार के समय, IPV, रोटावायरस और MR वैक्सीन जोड़ी गयीं तथा इंटेंसिफ़ाइड मिशन इन्द्रधनुष लागू किया गया।
मुख्य लाभार्थी: वैक्सीन निर्माता, सिरिंज निर्माता, कोल्ड-चेन उद्योग, लॉजिस्टिक्स कंपनियाँ और टीकाकरण वितरण प्रणाली।
2. कोविड-19 और कोविड टीकाकरण
कोविड सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ा सबसे अधिक चर्चा में रहने वाला विषय था। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर यह WHO द्वारा PHEIC घोषणा, महामारी घोषणा, CEPI द्वारा वैक्सीन प्लेटफ़ॉर्म को वित्तपोषण तथा WHO-GAVI-CEPI के COVAX तंत्र की स्थापना के समानांतर चला।
भारत में इसके बाद RT-PCR नेटवर्क, CoWIN प्लेटफ़ॉर्म, कोल्ड-चेन व्यवस्था, वैक्सीन ख़रीद और बड़े पैमाने पर टीकाकरण अभियान का विस्तार हुआ।
मुख्य लाभार्थी: वैक्सीन उद्योग, डायग्नोस्टिक्स उद्योग, डिजिटल स्वास्थ्य प्लेटफ़ॉर्म, कोल्ड-चेन उद्योग और चिकित्सा उपभोग्य सामग्री निर्माता।
3. क्षय रोग (टीबी)
टीबी उन विषयों में से एक था, जहाँ अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक समानता सबसे स्पष्ट दिखायी दी। WHO ने ‘End TB Strategy’ शुरू की, जबकि गेट्स फ़ाउंडेशन टीबी डायग्नोस्टिक्स, वैक्सीन और कार्यान्वयन कार्यक्रमों के सबसे बड़े वित्तपोषकों में से एक बन गया। ग्लोबल फ़ंड ने भारत में टीबी कार्यक्रमों के लिए सैकड़ों मिलियन डॉलर उपलब्ध कराये।
भारत में इसके बाद निक्षय, निक्षय मित्र और आण्विक जांच प्रणालियों का विस्तार हुआ।
मुख्य लाभार्थी: आण्विक डायग्नोस्टिक्स कंपनियाँ, औषधि निर्माता और टीबी तकनीक विकसित करने वाली कंपनियाँ।
4. सर्वाइकल कैंसर और HPV
हालाँकि इस विषय का प्रत्यक्ष उल्लेख सीमित था, लेकिन आश्चर्यजनक रूप से इसकी टाइमलाइन भी WHO की ‘Cervical Cancer Elimination Strategy’ तथा GAVI के वैश्विक HPV विस्तार कार्यक्रमों के साथ मेल खाती दिखायी देती है।
भारत में HPV पारिस्थितिकी तंत्र में PATH, ICMR, गेट्स फ़ाउंडेशन और Merck तथा GSK जैसी कंपनियों की पूर्व भागीदारी रही है। इसके बाद भारत में Cervavac और HPV टीकाकरण कार्यक्रमों पर चर्चा तेज़ हुई।
मुख्य लाभार्थी: HPV वैक्सीन निर्माता, स्क्रीनिंग सेवाएँ और डायग्नोस्टिक्स कंपनियाँ।
5. अंगदान और प्रत्यारोपण
अंगदान इसलिए अलग दिखायी देता है क्योंकि इसे टीबी या टीकाकरण की तुलना में कहीं छोटे अंतरराष्ट्रीय तंत्र के बावजूद बार-बार प्रमुखता मिली। WHO प्रत्यारोपण के लिए नैतिक दिशा-निर्देश प्रदान करता है, लेकिन GAVI या CEPI जैसी कोई वैश्विक संस्था इस क्षेत्र में मौजूद नहीं है।
भारत में NOTTO का विस्तार, डिजिटल रजिस्ट्रियाँ और अंतरराज्यीय अंग-साझाकरण सुधार लागू किये गये।
दिलचस्प बात यह है कि भारत में लगभग 80% प्रत्यारोपण निजी अस्पतालों में होते हैं। यह क्षेत्र विदेशी निवेश और निजी इक्विटी की मज़बूत उपस्थिति के साथ संचालित होता है। Temasek, IHH Healthcare, Blackstone, KKR, TPG और Mubadala जैसे वैश्विक निवेशक भारतीय अस्पताल क्षेत्र में सक्रिय हैं।
मुख्य लाभार्थी: प्रत्यारोपण अस्पताल, डायग्नोस्टिक प्रयोगशालाएँ, अंग परिवहन नेटवर्क और प्रत्यारोपण के बाद उपयोग होने वाली प्रतिरक्षा-दमनकारी दवाओं का बाज़ार।
6. डिजिटल स्वास्थ्य
डिजिटल स्वास्थ्य WHO की ‘Global Digital Health Strategy’ और डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना की वैश्विक अवधारणा के साथ निकटता से जुड़ा दिखायी देता है। इसके बाद भारत में CoWIN, ABDM, ABHA और e-Sanjeevani का बड़े पैमाने पर विस्तार हुआ।

मुख्य लाभार्थी: सॉफ्टवेयर कंपनियाँ, इंटरऑपरेबिलिटी प्लेटफ़ॉर्म, क्लाउड सेवाएँ और टेलीमेडिसिन कंपनियाँ।
7. मलेरिया
मलेरिया WHO की वैश्विक रणनीति, गेट्स फ़ाउंडेशन के निवेश और अफ्रीका में RTS,S तथा R21 वैक्सीन विस्तार के साथ जुड़ा हुआ दिखायी देता है। हालाँकि भारत में इसके बाद मुख्य ध्यान निगरानी और वेक्टर नियंत्रण पर रहा, न कि वैक्सीन ख़रीद पर।
8. मोटापा, मधुमेह और उच्च रक्तचाप
टीकाकरण या टीबी के विपरीत, मोटापा एक अलग वैश्विक पारिस्थितिकी तंत्र से जुड़ा नज़र आता है, जिसका केंद्र WHO का NCD एजेंडा और तेज़ी से बढ़ता GLP-1 दवा बाज़ार है। दिलचस्प बात यह है कि प्रधानमंत्री द्वारा खाद्य तेल की खपत कम करने और मोटापे पर नियंत्रण की अपील के कुछ ही महीनों के भीतर Eli Lilly की ‘Mounjaro (tirzepatide)’ और Novo Nordisk की ‘Wegovy (semaglutide)’ जैसी दवाएँ भारतीय बाज़ार में आ गयीं।
भारत को अब वैश्विक मोटापा-रोधी दवाओं के लिए सबसे बड़े संभावित बाज़ारों में से एक माना जा रहा है।
9. एंटीमाइक्रोबियल रेज़िस्टेंस (AMR)
‘मन की बात’ के उल्लेखनीय विषयों में से एक यह था। संदेश स्पष्ट था— अनावश्यक एंटीबायोटिक उपयोग से बचें और स्वयं दवा न लें।
लेकिन यह मुद्दा इससे कहीं बड़ा है। जैसे-जैसे एंटीबायोटिक्स की प्रभावशीलता घटती है, रोकथाम का महत्व बढ़ता जाता है। इससे सार्वजनिक स्वास्थ्य में टीकों और अन्य निवारक उपायों की भूमिका स्वाभाविक रूप से बढ़ जाती है।
WHO और GAVI जैसी वैश्विक संस्थाएँ भी AMR के ख़िलाफ़ कार्रवाई के साथ-साथ टीकाकरण और रोकथाम आधारित रणनीतियों पर ज़ोर देती रही हैं।
भारत ने AMR निगरानी, स्टेवार्डशिप कार्यक्रमों और राष्ट्रीय कार्ययोजना (NAP-AMR) का विस्तार किया है। यह सामान्य तैयारी है या रोकथाम-आधारित स्वास्थ्य व्यवस्था की ओर एक बड़े बदलाव का हिस्सा… यह बहस का विषय हो सकता है, लेकिन दिशा स्पष्ट दिखायी देती है।
आब-ओ-हवा पर मेरे लिखे पिछले तक़रीबन तीन ब्लॉग्स आप देखेंगे तो पाएंगे कि हमने लगातार इस मुद्दे पर बात की है कि स्वास्थ्य के प्रति भारत की अप्रोच को किस तरह दिशा दी जा रही है।

डॉ. आलोक त्रिपाठी
2 दशकों से ज्यादा समय से उच्च शिक्षा में अध्यापन व शोध क्षेत्र में संलग्न डॉ. आलोक के दर्जनों शोध पत्र प्रकाशित हैं और अब तक वह 4 किताबें लिख चुके हैं। जीवविज्ञान, वनस्पति शास्त्र और उससे जुड़े क्षेत्रों में विशेषज्ञता रखने वाले डॉ. आलोक वर्तमान में एक स्वास्थ्य एडवोकेसी संस्था फॉर्मोन के संस्थापक हैं।
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बहुत परिश्रम पूर्वक लिखा व समझाया गया लेख — साधुवाद।।