मैं वापस आऊंगा, नसीरुद्दीन शाह, naseeruddin shah, main vaapas aaunga
फ़िल्म चर्चा आकांक्षा की कलम से....

क्यों देखी जाये "मैं वापस आऊंगा"?

             ऐसा नहीं कि विभाजन पर पहले फ़िल्में नहीं बनीं। ऐसा भी नहीं कि अच्छी नहीं बनीं। गर्म हवा, 1947 अर्थ, पिंजर और भी कुछ, कमाल कर चुकी हैं। विभाजन की पृष्ठभूमि पर मोहब्बत को परवान चढ़ते भी गदर जैसी फ़िल्म में पहले देखा गया है।

इन दो थीम को मिलाकर किसी एक थीम के साथ नाइंसाफ़ी हो जाना कोई अचरज की बात नहीं! हमें या विभाजन का दर्द ही महसूस होता रहेगा या तो दो प्रेमियों के मुक्कमल मिलने की तीव्र इच्छा होती रहेगी।

इम्तियाज़ अली की फ़िल्म “मैं वापस आऊंगा” ने कुछ ऐसी थीम भी इनसे जोड़ी, जो अब तक इतने सफल तरीक़े से याद्दाश्त में नही आती। मोहब्बत, उसके सपने, दूरी, मिलने का वादा, वफ़ादारी, जुनून… सब साथ-साथ चलता है।

“तकलीफ” बोला गया है इश्क़ को। “प्यार किया नहीं जाता, हो जाता है” जैसे पुराने पड़ चुके स्लोगनों का दोहराव नहीं है बल्कि कुछ नये शब्द हैं, जैसे “प्यार का हमारे अंदर होना, जिसको उंड़ेलने के लिए जब कोई या कुछ मिल जाये, तो दिये बिना लौटा नहीं जा सकता”। ऐसे संवाद आज की सेल्फ़-लव की परिभाषाओं के बहुत ऊपर महसूस होते हैं। सूफ़ी पोएट्री में ऐसे ख़यालों का भरपूर ज़िक्र आता है।

मैं वापस आऊंगा, नसीरुद्दीन शाह, naseeruddin shah, main vaapas aaunga

विभाजन की बात पर एक संवाद है- “तुम समझोगे नफ़रत, क़ौमी दुश्मनी! इसलिए बेहतर है कि ये दुःख, इनके राज़, हमारे साथ दफ़न हो जाएँ, ख़ाक हो जाएँ।” सपनों की वो दुनिया, जिसमें इंसानियत की जगह हो – कुछ ऐसी तामीर की गयी है। पूरी दुनिया ने कोविड के बाद की दुनिया में देखा था – दर्द की कोई जात नहीं होती, बिछड़ने और खोने का कोई धर्म नहीं होता। सबको एक जैसी ही चुभन होता है, टीस वैसी ही होती है, आँसुओं का रंग भगवा या हरा या नीला नहीं होता!

इम्तियाज़ अली रोमांस और सफ़र की कहानियों के लिए पहले से ही मशहूर हैं। मुझे लगता है उनके “चमकीला” जैसे पिछले कुछ काम और अब “मैं वापस आऊंगा” के बाद उनके क्रेडिट में हर तरह की इमोशनल जर्नी और हर तरह के प्रेम को रख देना ठीक होगा।

चमकीला में ऑडियंस पूरे समय दिलजीत के किरदार के लिए डरती रहती है कि कुछ हो न जाये उसको! इस फ़िल्म में दूरी का दर्द, विस्थापन का दुःख लगातार ऑडियंस को रुलाता रहा। थिएटर में एक व्यक्ति अकेला फ़िल्म देखने आया था, पीछे से जब भी दिखा, रोता दिखा। यह फ़िल्म भले ही पार्टिशन पर है, हिंसा भी दिखाती है, फिर भी इम्तियाज़ किस तरह प्यार को इसका अंडरकरंट बनाये रखते हैं, यह एक बारीक कला है, उनके निर्देशन की। यह एक अलग मास्टरक्लास हो सकती है!

नसीरुद्दीन शाह के साथ ही वेदांग रैना जैसे नये कलाकारों की कमाल की ऐक्टिंग इस फ़िल्म को यादगार बनाती है। रहमान का संगीत एक ताज़गी देता है हालांकि उनसे जो अपेक्षा होती है, वह कम ही पूरी हो पाती है। फ़िल्म लेखन में तकनीकी बात भी साफ़ दिखती है कि फ़िल्म में टाइम लैप्स और फ़्लैशबैक बहुत हैं। कहानी कहने में ये बहुत ज़रूरी भूमिका रखते हैं। अन्य अधिकतर फ़िल्मों में इनकी वजह से कभी ऑडियंस कन्फ़्यूज़ भी होती है और असंतुष्ट भी। लेकिन यहां नहीं। इस फ़िल्म में अलग-अलग समय के मोती, पत्थर, पत्ते, चांद, मिट्टी, नहर ऐसे पिरोये गये हैं कि अंत तक आते-आते एक संपूर्ण माला बनी दिखती है।

हमारी और हमसे पिछली कुछ पीढ़ियों को लग सकता है कि बँटवारे का दुःख हमने अपनी आंखों से तो नहीं देखा, वह वक़्त ख़ुद तो नहीं झेला, हम कैसे महसूस करें, या क्या कर सकते हैं अब? हालाँकि यह भी सच है कि हम लगातार जड़ों से टूटना, अपनी जगहों को छोड़ना और कहीं पहुँचने में ख़ुद से दूर होना लगातार जी रहे हैं। ऐसे में उस दुःख को सम्मान देना ही शायद एक रास्ता है और दिशा देता है कि आने वाली पीढ़ी, अपने बच्चों को, हम ऐसे दुख देने के कारण न पैदा होने दें। जिन बच्चों की इतनी लालसा की, जिन पोते-पोतियों और नाती-नातिन की प्रार्थना की, जिनकी हर इच्छा को सर-आंखों पर रखा, उनके लिए अपने बाद की दुनिया सुरक्षित देने के अलावा और क्या देकर जा सकते हैं?

एक संवाद इस फ़िल्म का, जिसमें यात्रा, मोहब्बत और दुनिया के लिए एक फ़ल्सफ़ा कह दिया गया है – “सीधा रास्ता नहीं है आपके यहाँ आने का। बहुत घूम-घूमकर आना पड़ता है”।

अब से, इम्तियाज़ अली को महान निर्देशक कहना चाहिए। बस।

akanksha tyagi, आकांक्षा त्यागी

आकांक्षा त्यागी

अपने करियर में पहले क़रीब 6 वर्ष पत्रकार रहीं आकांक्षा पिछले क़रीब 15 वर्षों से शिक्षा में नवाचार के क्षेत्र में सक्रिय हैं। शोधकर्ता और ट्रेनर के रूप में वह राष्ट्रीय स्तर तक के प्रोजेक्ट लीड कर चुकी हैं। साहित्य, कला और सिनेमा में गहरी रुचि रखती हैं और गाहे-ब-गाहे सरोकार से जुड़े विषयों पर लेखन में भी।

4 comments on “क्यों देखी जाये “मैं वापस आऊंगा”?

  1. Nice elaboration.Each and Every sentence reflected a clarity on life in this article.It’s look like a writer observe beyond observation of film.And this type of observation gave us a positive aura.

  2. ये शायद एक मुरीद एक fan का रिएक्शन ज़्यादा है… मुझे इस फ़िल्म से कुछ मायूसी हुई और यह भी अर्ज़ कर दिया जाए कि इम्तियाज़ इससे बहुत बेहतर सिनेमा बना चुके हैं. उनके बेहतरीन सिनेमा में यह फ़िल्म शुमार न ही हो तो बेहतर होगा.

  3. वाक़ई नसीर साहब के लिए इस फ़िल्म को एक बार ज़रूर देखा जा सकता है।

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