nyaypalika aur cockroach party par mukesh assemit ka vyangya
हास्य-व्यंग्य मुकेश असीमित की कलम से....

कोर्ट का टाइम खोटी करने का नहीं!

            काहे को टाइम खोटी कर रहे हैं जी! माननीय न्यायालय का वक़्त है जी, बड़ा क़ीमती वक्त!

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और वक़्त-बेवक़्त माननीय ऐसे वक्तव्य दे ही देते हैं कि भारत की राजनीति में भूचाल आ जाता है। पहले यह विशेषाधिकार केवल हमारे राजनेताओं के पास था। वे ही किसी को देशद्रोही, किसी को दीमक और किसी को नालायक़ कहकर राष्ट्र को बहस का नया चारा दिया करते थे। अब न्याय के गलियारों ने भी शब्दों की इस सियासी स्पर्धा में शानदार सहभागिता कर ली है। नेता बोलें तो बयान, न्याय बोले तो ज्ञान; जनता बोले तो व्यवधान और युवा बोले तो संविधान ख़तरे में!

समय वो भी था, जब युवाओं की ग़लती पर हमारे माननीय नेता वात्सल्य से भर उठते थे,

“बच्चे हैं जी… ग़लतियाँ हो जाती हैं!”

मगर इस बार न्यायालय ने युवाओं की महत्त्वाकांक्षाओं पर ऐसा पोंछा फेरा कि वे अपने ‘पैरों’ पर खड़े हो गये। उन्हें सुनाया गया कि ये तो “कॉकरोच” हैं, देश को खोखला कर रहे हैं।

बस फिर क्या था! कॉकरोचों के एंटीना तन गये। बेकारी के बिलों से सिर निकल आये। डिग्रियों पर जमी धूल झड़ी और निराशा ने नारा पहन लिया।

बच्चों ने सोचा, जब हमें कॉकरोच घोषित ही कर दिया गया है, तो क्यों न इस आपदा को अवसर में बदल दिया जाये! आख़िर आपदा में अवसर खोजने की कला उन्होंने भी अपने बड़ों से ही सीखी थी।

इस प्रकार अपमान अभियान बना, तंज़ तराना बना, और कॉकरोच चुनाव-चिह्न बन गया।

कॉकरोचों ने माननीय को दिखा दिया कि कॉकरोच केवल रसोई और नाली तक ही सीमित नहीं, राजनीतिक क्रांति में भी काम आ सकते हैं।

ये युवा पुराने ज़माने के क्रांतिकारी नहीं थे कि घर से निकले और सीधे जेल पहुँच गये। इन्होंने क्रांति में कॉमेडी, कटाक्ष और कंटेंट का तड़का लगा दिया… हाथ में संविधान, जेब में बेरोज़गारी की डिग्री, आँखों में भविष्य की फ़िक्र, मोबाइल में लाइव प्रसारण और माथे पर पुलिस की लाठी का छोटा-सा लोकतांत्रिक निशान!

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न्याय के ऊँचे आसन से युवाओं को “कॉकरोच” कहा गया, तो उन्होंने इसे अपमान नहीं, उनका भविष्य निर्धारित करने वाला कोई देवदूत-सा सन्देश समझ लिया। वे संगठित हो गये। नारे लगाने लगे। प्रश्न पूछने लगे।

बस, यहीं उनसे भूल हो गयी!

लोकतंत्र में युवाओं से अपेक्षा होती है कि वे प्रेरक भाषण सुनकर जागें अवश्य, मगर भाषण समाप्त होते ही चुपचाप दोबारा सो जाएँ। उन्हें जागना है, पर जगाना नहीं।

उन्हें बोलना है, पर सवाल उठाना नहीं।

उन्हें आगे बढ़ना है, पर सत्ता से आगे निकलना नहीं।

लेकिन ये बच्चे सचमुच जाग गए! जिन्होंने टिप्पणी की थी, वे आश्चर्यचकित हो उठे, “हमने तो केवल शब्द छोड़ा था, इन्होंने आंदोलन क्यों पकड़ लिया?” इस बार शब्द सिंहासन से उतरा और सड़क पर पहुँचते-पहुँचते शंखनाद बन गया।

युवा निकल पड़े। एक प्रतिनिधि पहुँचा न्यायालय के द्वार पर। उसके हाथ में संविधान था, जेब में बेरोज़गारी की डिग्री और माथे पर पुलिस की लाठी का ताज़ा लोकतांत्रिक तिलक। उसने द्वारपाल से पूछा, “न्यायमूर्ति महोदय मिलेंगे?”

द्वारपाल ने गंभीर होकर पूछा, “विषय क्या है?”

बच्चे ने कहा, “हमें पहले कॉकरोच कहा गया। हमने उसी नाम की पार्टी बना ली। अब पुलिस हमें इंसान समझकर पीट रही है। इसी विषय में थोड़ा न्याय चाहिए।”

द्वारपाल भीतर गया। कुछ देर बाद लौटकर बोला, “माननीय ने पूछा है, काहे को टाइम खोटी कर रहे हैं? इन बच्चों को देखने-सुनने के लिए न्यायालय के पास समय नहीं है। न्याय बहुत व्यस्त है।”

बच्चे ने मासूमियत से पूछा, “न्याय अभी किस काम में व्यस्त है?”

द्वारपाल फुसफुसाया, “बेटा, न्याय के पास बड़े-बड़े काम हैं। किसी बड़े आदमी की बड़ी पैरवी सुननी है, किसी पुरानी फ़ाइल में नयी तारीख़ लगानी है, किसी नयी तारीख को पुरानी फ़ाइल तलाशनी है। किसी रईस की राहत पर विचार करना है और किसी ग़रीब को अगली तारीख़ तक धैर्य धारण करने की सलाह देनी है।”

“और हमारे लिए?”

“तुम्हारे लिए परामर्श है,शांत रहो।”

“लेकिन हम शांत ही तो थे।”

“वही तो समस्या है। पहले शांत थे, फिर अचानक बोलने लगे। व्यवस्था को आकस्मिक आवाज़ों से घबराहट होती है।”

बच्चा चुप हो गया।

उसे पहली बार समझ आया कि न्याय माँगना और न्यायालय का समय बर्बाद करना, इन दोनों के बीच केवल एक महँगे वकील का अंतर होता है।

वकील महँगा हो तो समय ‘बहस’ कहलाता है। वकील न हो तो वही समय ‘बर्बादी’ कहलाता है।

कहते हैं, शब्दों में बड़ी शक्ति होती है। उसी रात मैंने सपने में न्यायदेवी की नयी प्रतिमा देखी… आँखों पर पट्टी थी। एक हाथ में तराज़ू था। दूसरे हाथ में डायरी!

तराज़ू के एक पलड़े पर बेरोज़गार युवा, परीक्षा-पर्चा, पुलिस की लाठी और संविधान रखा था। दूसरे पलड़े पर लिखा था, “न्यायालय का बहुमूल्य समय।”

समय भारी निकला… इसे विरोधाभास मत कहिए। यह न्यायिक विकासक्रम है। पहले टिप्पणी, फिर उत्तेजना, फिर उपेक्षा, फिर सुरक्षा, और अंत में न्यायपालिका की संरक्षक भूमिका पर परिचर्चा!

न्याय भी सरकारी फ़ाइल की तरह चलता है, पहले लौटाया जाता है, फिर सूचीबद्ध किया जाता है, फिर टरकाया जाता है, फिर सुना जाता है… और अंत में बताया जाता है कि न्यायपालिका नागरिक अधिकारों की सबसे बड़ी संरक्षक है।

न्याय देर से मिला तो ‘न्याय’ था, देर ही मिली तो ‘प्रक्रिया’ थी।

इधर विपक्ष के भीतर अचानक वात्सल्य का विस्फोट हो गया। जिस युवा को कल तक पार्टी कार्यालय में कुर्सियाँ लगाने योग्य समझा जाता था, आज वही “लोकतंत्र का भविष्य” घोषित हो गया।

विपक्षी नेता बोले, “बच्चों की आवाज़ दबायी जा रही है!”

बच्चों ने पूछा, “आप हमारी आवाज़ कबसे सुनने लगे?”

नेता जी बोले, “जब से तुम्हारी आवाज़ सरकार के विरुद्ध सुनायी देने लगी।”

युवाओं ने पूछा, “और यदि कल हमारी आवाज़ आपके विरुद्ध उठी?”

नेताजी ने प्रेमपूर्वक कहा, “तब तुम बच्चे नहीं रहोगे; अराजक तत्व हो जाओगे।”

सत्ता ने बच्चों में षड्यंत्र देखा। विपक्ष ने उनमें वोट देखा। मीडिया ने उनमें टीआरपी देखी।पुलिस ने उनमें आरोपी देखे। न्यायालय ने पहले समय देखा।

और बच्चों ने इन सबमें अपना भविष्य देखना चाहा, जो कहीं दिखायी नहीं दिया।

उन्होंने जान लिया कि व्यवस्था की दरारों में जीवित रहने के लिए केवल डिग्री नहीं, मज़बूत एंटीना भी चाहिए। कौन-सा बयान किधर से आ रहा है, कौन-सा नेता समर्थन की चप्पल लेकर दौड़ रहा है और कब कौन-सा संस्थान कीटनाशक छिड़कने वाला है, सबका संकेत पहले ही पकड़ना पड़ता है।

फ़िलहाल तो बच्चो, न्यायालय का समय मत खोटी करो। पहले अपनी पीड़ा को पोस्ट बनाओ, पोस्ट को प्रचार बनाओ, प्रचार को प्रचंड बनाओ और जब पूरा देश पूछने लगे, “सुनवाई कब होगी?”…. तब व्यवस्था स्वयं कहेगी, “बच्चों को तुरंत प्रस्तुत कीजिए… माननीय के पास अब समय ही समय है!”

डॉ. मुकेश असीमित, dr mukesh aseemit

डॉ. मुकेश असीमित

हास्य-व्यंग्य, लेख, संस्मरण, कविता आदि विधाओं में लेखन। हिंदी और अंग्रेज़ी में लिखे व्यंग्यों के संग्रह प्रकाशित। कुछ साझा संकलनों में रचनाएं शामिल। देश-विदेश के प्रतिष्ठित दैनिक, साप्ताहिक, मासिक, पाक्षिक, त्रैमासिक पत्र-पत्रिकाओं एवं साहित्यिक मंचों पर नियमित प्रकाशन।

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