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डॉ. वीरेन्द्र कुमार शेखर की कलम से....

सीजेपी आन्दोलन और लोकतंत्र का कल

           कुछ घटनाएँ ऐसी होती हैं, जिनका वास्तविक महत्व उनके घटित होने के समय पूरी तरह समझ में नहीं आता। वे तत्कालीन राजनीतिक घटनाक्रम का एक सामान्य अध्याय प्रतीत होती हैं, किन्तु समय बीतने के साथ वही घटनाएँ सामाजिक चेतना के निर्णायक मोड़ के रूप में प्रतिष्ठित हो जाती हैं। फ़्रांसीसी दार्शनिक एलेक्सिस द टॉकविल ने लोकतन्त्र को केवल शासन-प्रणाली नहीं, बल्कि एक सामाजिक संस्कृति माना था। इस दृष्टि से किसी भी लोकतान्त्रिक समाज में समय-समय पर उभरने वाले जन-आन्दोलन सत्ता के विरोध या समर्थन की घटनाएँ मात्र नहीं होते; वे उस समाज की सामूहिक चेतना, उसकी आकांक्षाओं और उसके भविष्य की दिशा के दर्पण होते हैं।

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भारत का नवीनतम जेन-ज़ेड आन्दोलन, जिसे उसके समर्थक सीजेपी आन्दोलन के रूप में पहचानते हैं, इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में विचारणीय है। इस आन्दोलन का महत्व केवल इस बात में नहीं है कि उसने कितने लोगों को प्रभावित किया या कितने दिनों तक सार्वजनिक विमर्श का केन्द्र बना रहा। उसका वास्तविक महत्व इस तथ्य में निहित है कि उसने भारतीय राजनीति के व्याकरण, सार्वजनिक संवाद की शैली और युवा सहभागिता के स्वरूप पर नये प्रश्न खड़े किये। किसी आन्दोलन की ऐतिहासिक भूमिका प्रायः उसकी तात्कालिक उपलब्धियों से नहीं, बल्कि उन स्थायी परिवर्तनों से निर्धारित होती है, जिन्हें वह समाज के मानस में अंकित कर जाता है।

प्रत्येक युग अपनी राजनीतिक भाषा स्वयं निर्मित करता है। स्वतंत्रता आन्दोलन की अपनी शब्दावली थी; संविधान-निर्माण के काल की अपनी वैचारिक भाषा थी; उदारीकरण के बाद की राजनीति ने विकास, निवेश और वैश्वीकरण जैसे नये शब्दों को लोकप्रिय बनाया। 21वीं शताब्दी के तीसरे दशक में भारत की जेन-ज़ेड पीढ़ी ने भी अपने अनुभवों के अनुरूप एक नया लोकतान्त्रिक व्याकरण विकसित करना प्रारम्भ किया है। यह व्याकरण केवल शब्दों का परिवर्तन नहीं है; यह सोचने, संवाद करने और सत्ता से प्रश्न पूछने की शैली का परिवर्तन है।

यह पीढ़ी उस भारत में जन्मी है, जहाँ इंटरनेट किसी विलासिता का साधन नहीं, बल्कि दैनिक जीवन का अंग है; जहाँ सूचना कुछ चुनिंदा संस्थानों की बपौती नहीं, बल्कि प्रत्येक नागरिक की पहुँच में है; जहाँ विचारों का आदान-प्रदान सीमाओं से परे होता है; और जहाँ किसी भी सार्वजनिक घटना पर प्रतिक्रिया देने में दिन या सप्ताह नहीं, बल्कि कुछ मिनट पर्याप्त होते हैं। ऐसी पीढ़ी स्वाभाविक रूप से राजनीति से भी उसी गति, उसी पारदर्शिता और उसी उत्तरदायित्व की अपेक्षा करती है।

इस सामाजिक परिवर्तन का एक महत्वपूर्ण परिणाम यह हुआ कि राजनीति का केन्द्र धीरे-धीरे मंचों और सभाओं से हटकर डिजिटल संवाद की दुनिया में भी स्थापित होने लगा। जनमत अब केवल समाचार-पत्रों या टेलीविजन चैनलों के माध्यम से निर्मित नहीं होता; वह लाखों नागरिकों के प्रत्यक्ष संवाद, त्वरित प्रतिक्रिया और रचनात्मक सहभागिता से आकार ग्रहण करता है। इस परिवर्तन ने नागरिक और सत्ता के बीच की दूरी को कम किया है। अब शासन केवल निर्णय लेने वाली संस्था नहीं रह गया; वह निरन्तर सार्वजनिक परीक्षण के दायरे में रहने वाली व्यवस्था भी बन गया है।

समर्थकों की दृष्टि में सीजेपी आन्दोलन इसी बदलती हुई लोकतान्त्रिक संरचना की उपज है। इसे केवल एक राजनीतिक अभियान के रूप में देखना उसकी प्रकृति को सीमित कर देना होगा। अधिक उपयुक्त यह होगा कि इसे भारतीय लोकतन्त्र में पीढ़ीगत परिवर्तन की अभिव्यक्ति के रूप में समझा जाये। प्रत्येक नयी पीढ़ी अपने समय की समस्याओं का समाधान अपने अनुभवों और अपनी भाषा में खोजती है। जेन-ज़ेड भी इसका अपवाद नहीं है। उसने परम्परागत राजनीतिक औपचारिकताओं के स्थान पर सहजता, संवाद, रचनात्मकता और डिजिटल संप्रेषण को अधिक प्रभावी माना।

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किसी भी जन-आन्दोलन का मूल्यांकन केवल उसके प्रत्यक्ष राजनीतिक परिणामों के आधार पर नहीं किया जा सकता। अनेक बार आन्दोलन अपनी घोषित माँगों से भी अधिक महत्वपूर्ण सामाजिक परिवर्तन उत्पन्न कर देते हैं। वे राजनीतिक दलों को अपनी कार्यप्रणाली बदलने के लिए विवश करते हैं, प्रशासन को अधिक उत्तरदायी बनने की प्रेरणा देते हैं, नागरिकों में नयी आशा का संचार करते हैं और लोकतन्त्र के चरित्र को अधिक सहभागी बना देते हैं।

समर्थकों की दृष्टि में सीजेपी आन्दोलन की ऐतिहासिक महत्ता भी इसी प्रकार की है। इसकी सबसे बड़ी उपलब्धियाँ किसी एक राजनीतिक निर्णय तक सीमित नहीं हैं, बल्कि भारतीय लोकतान्त्रिक संस्कृति में दिखायी देने वाले व्यापक परिवर्तनों में निहित हैं।

आन्दोलन की पहली उपलब्धि

लक्ष्य-केन्द्रित संगठनात्मक सफलता। किसी भी आन्दोलन की सफलता केवल भीड़ एकत्र कर लेने में नहीं होती, बल्कि उस भीड़ को एक साझा उद्देश्य से जोड़ने में होती है। आधुनिक समाजशास्त्र बताता है कि संगठन तभी प्रभावी बनता है, जब उसके सदस्य स्वयं को उसके उद्देश्य का स्वामी समझने लगें। समर्थकों के अनुसार इस आन्दोलन ने यही भावना विकसित की। इसमें भाग लेने वाले युवा स्वयं को केवल दर्शक नहीं, बल्कि परिवर्तन की प्रक्रिया का सक्रिय सहभागी मान पाये। यह मनोवैज्ञानिक परिवर्तन किसी भी लोकतान्त्रिक आन्दोलन की सबसे बड़ी शक्ति होता है।

दूसरी उपलब्धि

आन्दोलन का व्यापक रूप से शांतिपूर्ण स्वरूप। लोकतन्त्र में हिंसा प्रायः संवाद के द्वार बंद कर देती है, जबकि शान्तिपूर्ण आन्दोलन समाज के विभिन्न वर्गों को विचार-विमर्श के लिए आमंत्रित करते हैं। भारत की लोकतान्त्रिक परम्परा भी सत्याग्रह, संवाद और नैतिक प्रतिरोध की रही है। समर्थकों का मत है कि इस आन्दोलन ने इसी परम्परा को आधुनिक संदर्भ में पुनर्जीवित करने का प्रयास किया। यदि कोई आन्दोलन अपनी ऊर्जा को अनुशासन में रूपान्तरित कर दे, तो उसकी नैतिक विश्वसनीयता कई गुना बढ़ जाती है।

तीसरी उपलब्धि

लैंगिक समानता का स्वाभाविक प्रदर्शन। अनेक बार आन्दोलन समानता की बात तो करते हैं, परन्तु उनके संगठनात्मक व्यवहार में वह दिखायी नहीं देती। समर्थकों के अनुसार इस आन्दोलन में महिलाओं और पुरुषों की समान भागीदारी ने यह संकेत दिया कि नयी पीढ़ी लोकतन्त्र को साझी ज़िम्मेदारी के रूप में देखती है। यह केवल राजनीतिक उपलब्धि नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना के विकास का भी संकेत है। लोकतन्त्र तब अधिक परिपक्व होता है जब उसमें भागीदारी योग्यता के आधार पर हो, न कि लिंग या सामाजिक पहचान के आधार पर।

चौथी उपलब्धि

अनुशासन और संगठनात्मक मर्यादा। समर्थकों ने इस बात पर विशेष बल दिया कि आन्दोलन के दौरान ऐसा कोई व्यापक आन्तरिक वातावरण निर्मित नहीं हुआ जिसने उसके नैतिक चरित्र को गंभीर रूप से क्षति पहुँचायी हो। किसी भी आन्दोलन की विश्वसनीयता केवल उसके घोषणापत्र से नहीं बनती; वह उसके स्वयंसेवकों के व्यवहार, सार्वजनिक अनुशासन और पारस्परिक सम्मान से निर्मित होती है। यही कारण है कि सामाजिक मनोविज्ञान में आचरण को विचारों से अधिक प्रभावशाली माना जाता है।

पाँचवीं उपलब्धि

नयी राजनीतिक भाषा का विकास। भाषा केवल संप्रेषण का माध्यम नहीं, बल्कि सत्ता और समाज के बीच संबंधों का भी निर्माण करती है। परम्परागत राजनीतिक भाषा प्रायः औपचारिक और दूरस्थ रही है। जेन-ज़ेड ने उसे अधिक संवादात्मक, संक्षिप्त और सहज बनाने का प्रयास किया। व्यंग्य, प्रतीक, दृश्यात्मक प्रस्तुति और डिजिटल अभिव्यक्ति ने राजनीति को नयी पीढ़ी के अनुभवों से जोड़ा। यह परिवर्तन भविष्य की चुनावी राजनीति, जनसंपर्क और सार्वजनिक विमर्श पर भी दूरगामी प्रभाव डाल सकता है।

छठी उपलब्धि

संचार का लोकतंत्रीकरण। पहले सार्वजनिक संवाद कुछ सीमित माध्यमों तक केन्द्रित रहता था; अब प्रत्येक नागरिक संभावित रूप से संवादकर्ता भी है और श्रोता भी। समर्थकों का मत है कि आन्दोलन ने इस परिवर्तन का प्रभावी उपयोग किया। उसने यह दिखाया कि विचारों का प्रसार केवल औपचारिक मंचों से नहीं, बल्कि नागरिकों की सक्रिय भागीदारी से भी सम्भव है। इस प्रकार लोकतन्त्र का संवाद अधिक बहुआयामी बनता है।

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सातवीं उपलब्धि

स्थापित राजनीतिक नेतृत्व पर उसका प्रभाव। अनेक पर्यवेक्षकों ने यह अनुभव किया कि विभिन्न राजनीतिक दलों ने युवाओं तक पहुँचने के लिए अपनी भाषा, प्रस्तुति और डिजिटल सक्रियता पर अधिक ध्यान देना प्रारम्भ किया। यह लोकतन्त्र का स्वाभाविक नियम है कि समाज बदलता है तो राजनीति को भी स्वयं को बदलना पड़ता है। यदि कोई आन्दोलन राजनीतिक वर्ग को आत्ममंथन के लिए प्रेरित करे, तो उसका प्रभाव उसकी प्रत्यक्ष सीमाओं से कहीं आगे तक पहुँच जाता है।

आठवीं उपलब्धि

आशा का पुनर्जागरण। लोकतन्त्र केवल संस्थाओं से नहीं चलता; वह नागरिकों के विश्वास पर भी आधारित होता है। जब लोगों को यह अनुभव होने लगे कि उनकी आवाज़ का कोई महत्व नहीं है, तब लोकतान्त्रिक ऊर्जा क्षीण होने लगती है। इसके विपरीत जब नागरिक यह विश्वास करने लगें कि संगठित और शांतिपूर्ण प्रयास राष्ट्रीय विमर्श को प्रभावित कर सकते हैं, तब लोकतन्त्र अधिक सशक्त होता है। समर्थकों की दृष्टि में आन्दोलन ने विशेष रूप से युवाओं में यही विश्वास पुनर्जीवित किया।

नौवीं उपलब्धि

डिजिटल युग की लोकतान्त्रिक सम्भावनाओं का प्रदर्शन। सूचना-प्रौद्योगिकी ने राजनीतिक संगठन की प्रकृति को बदल दिया है। अब विचारों का प्रवाह ऊपर से नीचे नहीं, बल्कि अनेक दिशाओं में एक साथ होता है। इससे लोकतन्त्र अधिक संवादशील बनता है। यद्यपि डिजिटल माध्यमों के साथ तथ्य-जाँच और उत्तरदायित्व जैसी नयी चुनौतियाँ भी जुड़ी हैं, फिर भी यह स्पष्ट है कि भविष्य का लोकतन्त्र डिजिटल सहभागिता से अलग नहीं रह सकता।

दसवीं और सबसे महत्वपूर्ण उपलब्धि

भारतीय लोकतन्त्र के नैतिक विमर्श में नयी ऊर्जा का संचार। समर्थकों के अनुसार आन्दोलन ने यह संदेश दिया कि राजनीति केवल सत्ता प्राप्त करने का माध्यम नहीं, बल्कि समाज के साथ निरन्तर संवाद की प्रक्रिया है। यदि राजनीतिक दल नागरिकों की बदलती आकांक्षाओं को समझेंगे, यदि शासन अधिक पारदर्शी और उत्तरदायी होगा तथा यदि नागरिक भी लोकतान्त्रिक मर्यादाओं का पालन करेंगे, तो लोकतन्त्र अधिक सुदृढ़ होगा। इस दृष्टि से आन्दोलन को एक व्यापक लोकतान्त्रिक पुनर्जागरण की सम्भावना के रूप में भी देखा जा सकता है।

इन दस उपलब्धियों का सामूहिक अध्ययन यह संकेत देता है कि भारत की नयी पीढ़ी राजनीति को केवल विचारधाराओं के संघर्ष के रूप में नहीं, बल्कि उत्तरदायी शासन, प्रभावी संचार, सामाजिक समानता और सक्रिय नागरिकता के रूप में देखना चाहती है। यही परिवर्तन सम्भवतः आने वाले वर्षों में भारतीय लोकतन्त्र के चरित्र को सबसे अधिक प्रभावित करेगा।

जेन-ज़ी आन्दोलन का समाजशास्त्रीय विश्लेषण

इतिहास का अंतिम निर्णय कभी तत्काल नहीं होता। किसी भी जन-आन्दोलन का वास्तविक मूल्यांकन उसके समाप्त होने के तुरंत बाद नहीं किया जा सकता। समय ही यह निर्धारित करता है कि कोई आन्दोलन क्षणिक जनोत्तेजना था या वह सामाजिक इतिहास की दिशा बदलने वाली घटना सिद्ध हुआ। अनेक आन्दोलन अपने नारों के कारण प्रसिद्ध हुए, अनेक अपने नेताओं के कारण, और कुछ इसलिए कि उन्होंने समाज की चेतना को एक नयी दिशा प्रदान की। समर्थकों की दृष्टि में सीजेपी आन्दोलन का मूल्यांकन भी इसी व्यापक ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य में किया जाना चाहिए।

यदि लोकतन्त्र को केवल चुनाव जीतने की प्रणाली मान लिया जाये, तो किसी भी आन्दोलन का महत्व सीमित रह जाता है। किन्तु यदि लोकतन्त्र को एक सतत् सामाजिक संवाद, नागरिक उत्तरदायित्व और सार्वजनिक नैतिकता की प्रक्रिया माना जाये, तब ऐसे आन्दोलन कहीं अधिक महत्वपूर्ण हो जाते हैं। वे सरकारों से अधिक नागरिकों को बदलते हैं; नीतियों से अधिक राजनीतिक संस्कृति को प्रभावित करते हैं; और सत्ता परिवर्तन से अधिक लोकतान्त्रिक चेतना का विस्तार करते हैं।

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समर्थकों के अनुसार सीजेपी आन्दोलन का सबसे बड़ा योगदान यही है कि उसने युवा पीढ़ी को यह अनुभव कराया कि लोकतन्त्र केवल नेताओं का विषय नहीं है। वह प्रत्येक नागरिक का दायित्व है। लोकतन्त्र संसद की चारदीवारी में ही नहीं, बल्कि विश्वविद्यालयों, कार्यस्थलों, डिजिटल मंचों, साहित्य, कला, मीडिया और नागरिक जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में जीवित रहता है। जब नागरिक स्वयं को लोकतन्त्र का सहभागी मानने लगते हैं, तभी लोकतान्त्रिक संस्थाएँ वास्तविक अर्थों में सशक्त होती हैं।

इस आन्दोलन ने एक और महत्वपूर्ण प्रश्न हमारे सामने रखा— क्या इक्कीसवीं शताब्दी की राजनीति बीसवीं शताब्दी की भाषा में चल सकती है? सम्भवतः इसका उत्तर नकारात्मक है। प्रत्येक पीढ़ी अपनी भाषा, अपने प्रतीक और अपने संचार-माध्यम स्वयं चुनती है। यदि राजनीतिक दल समय के साथ स्वयं को परिवर्तित नहीं करेंगे, तो समाज उनसे आगे निकल जाएगा। इस दृष्टि से देखा जाये तो आन्दोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि उसकी किसी एक राजनीतिक माँग की सफलता नहीं, बल्कि राजनीतिक संवाद की शैली को बदलने का प्रयास है।

समाजशास्त्रीय दृष्टि से इस आन्दोलन का एक अन्य महत्वपूर्ण पक्ष पीढ़ीगत परिवर्तन का संकेत है। इतिहास में प्रत्येक नयी पीढ़ी अपने पूर्वजों से केवल परम्पराएँ ही नहीं लेती, बल्कि उन्हें नये संदर्भों में पुनर्परिभाषित भी करती है। स्वतंत्रता आन्दोलन की पीढ़ी ने राजनीतिक स्वतंत्रता को सर्वोच्च लक्ष्य माना। संविधान-निर्माताओं की पीढ़ी ने संस्थाओं की स्थापना पर बल दिया। आर्थिक उदारीकरण के दौर ने विकास और वैश्विक प्रतिस्पर्धा को महत्व दिया। आज की जेन-ज़ेड पीढ़ी पारदर्शिता, सहभागिता, त्वरित उत्तरदायित्व, डिजिटल संचार और सार्वजनिक जवाबदेही को लोकतन्त्र के आवश्यक तत्वों के रूप में देखती प्रतीत होती है। यह परिवर्तन अपने आप में अध्ययन का विषय है।

समर्थकों के अनुसार आन्दोलन की व्यापक रूप से शांतिपूर्ण प्रकृति ने भी यह संदेश दिया कि लोकतान्त्रिक संघर्ष की नैतिक शक्ति आज भी प्रासंगिक है। इतिहास बार-बार यह प्रमाणित करता है कि स्थायी परिवर्तन भय से नहीं, विश्वास से उत्पन्न होते हैं। जहाँ हिंसा समाज को विभाजित करती है, वहीं शान्तिपूर्ण आन्दोलन समाज को संवाद की दिशा में ले जाते हैं। यदि भविष्य के जनआन्दोलन भी संवैधानिक मर्यादाओं और अहिंसक तरीक़ों को प्राथमिकता देंगे, तो भारतीय लोकतन्त्र की संस्थागत शक्ति और अधिक सुदृढ़ होगी।

इसी प्रकार आन्दोलन में महिलाओं की सक्रिय भागीदारी आधुनिक भारत की बदलती सामाजिक संरचना का भी संकेत मानी जा सकती है। लोकतन्त्र की परिपक्वता केवल मतदान के प्रतिशत से नहीं मापी जाती; वह इस बात से भी मापी जाती है कि उसमें समाज के विभिन्न वर्ग कितनी स्वाभाविक समानता के साथ भाग लेते हैं। यदि नयी पीढ़ी लैंगिक समानता को व्यवहार का अंग बना रही है, तो यह लोकतान्त्रिक संस्कृति के विकास का सकारात्मक संकेत है।

फिर भी, किसी भी आन्दोलन का निष्पक्ष मूल्यांकन उसकी उपलब्धियों के साथ-साथ उसकी ज़िम्मेदारियों को भी ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। लोकतन्त्र में लोकप्रियता और उत्तरदायित्व साथ-साथ चलते हैं। जितना व्यापक जनसमर्थन, उतनी ही अधिक आवश्यकता तथ्यों की शुद्धता, सार्वजनिक संयम, वैचारिक सहिष्णुता और संवैधानिक मर्यादा की होती है। कोई भी आन्दोलन तभी दीर्घजीवी बनता है, जब वह आत्मालोचना की क्षमता बनाये रखता है और असहमति का सम्मान करता है। यही लोकतन्त्र की वास्तविक कसौटी है।

इस पूरे विमर्श से एक व्यापक निष्कर्ष निकलता है। भारत का लोकतन्त्र केवल चुनावी लोकतन्त्र नहीं रह गया है; वह धीरे-धीरे सहभागितामूलक लोकतन्त्र की ओर अग्रसर है। नागरिक अब केवल मतदाता नहीं रहना चाहते; वे नीति-निर्माण, सार्वजनिक विमर्श और शासन की समीक्षा में भी अपनी भूमिका देखना चाहते हैं। डिजिटल तकनीक ने इस परिवर्तन को गति दी है, किन्तु उसकी सफलता अन्ततः नागरिकों की परिपक्वता और संस्थाओं की उत्तरदायित्व-स्वीकार करने की क्षमता पर निर्भर करेगी।

अन्ततः किसी भी लोकतन्त्र की सबसे बड़ी शक्ति उसकी सरकार नहीं, उसका संविधान भी नहीं, बल्कि संविधान की आत्मा को समझने वाले जागरूक नागरिक होते हैं। जब युवा पीढ़ी प्रश्न पूछती है, संवाद करती है, शान्तिपूर्ण ढंग से संगठित होती है, विविधता का सम्मान करती है और सार्वजनिक जीवन में उत्तरदायित्व की माँग करती है, तब लोकतन्त्र केवल एक शासन-व्यवस्था नहीं रहता; वह एक जीवंत राष्ट्रीय संस्कृति बन जाता है।

यदि आने वाले वर्षों में भारत की युवा शक्ति इस लोकतान्त्रिक चेतना को रचनात्मकता, नैतिकता, संवैधानिक मर्यादा और सामाजिक उत्तरदायित्व के साथ आगे बढ़ाती है, तो सम्भव है भविष्य का इतिहास इस दौर को केवल एक आन्दोलन के रूप में नहीं, बल्कि भारतीय लोकतन्त्र के नये व्याकरण के उदय के रूप में स्मरण करे। यही किसी भी जन-आन्दोलन की सर्वोच्च ऐतिहासिक उपलब्धि होती है।

वीरेन्द्र कुमार शेखर, virendra kumar shekhar

डॉ. वीरेन्द्र कुमार शेखर

सेवानिवृत्त आई.पी.एस.। फ़ोटोग्राफ़ी, पठन-पाठन एवं लेखन में रुचि। पुलिस सेवा और किताब के लिए पुरस्कृत हो चुके हैं। तीन विषयों में स्नातकोत्तर के बाद पीएच.डी. के साथ ही खेलों में भी दिलचस्पी। फ़िलहाल गौतमबुद्ध नगर यानी नोएडा में निवास। संपर्क: 7906838651

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