safe bunkers for nuclear attack not safe for earth blog by vivek ranjan shrivastav

6 अगस्त 1945 को हिरोशिमा और 9 अगस्त को नागासाकी पर परमाणु बम बरसाये जाने की बरसी औपचारिक चिंताओं में सिमटकर रह गयी। परमाणु अप्रसार को बढ़ावा देने वाले जापानी संगठन को पिछले वर्षों में नोबेल भी दिया गया लेकिन क्या परमाणु ख़तरों से हम राहत पा सके? अब ब्रिटेन से ताज़ा ख़बरें और बड़ी चिंताओं व प्रश्नों का दौर ला रही हैं…

पाक्षिक ब्लॉग विवेक रंजन श्रीवास्तव की कलम से....

किस बंकर में जाये परमाणु ख़तरे से डरी धरती?

               ब्रिटेन में परमाणु युद्ध की आशंका से बचने के लिए निजी भूमिगत बंकर बनाये और बेचे जाने की ख़बरें आज के समय की एक विचित्र तस्वीर सामने रख रही हैं। ये पुराने ज़माने के साधारण आश्रय नहीं हैं। इनमें मज़बूत दरवाज़े, वायु शुद्धीकरण, पानी और ऊर्जा का भंडार, रसोई, शयनकक्ष तथा कई दिनों तक बाहर की दुनिया से लगभग स्वतंत्र रह सकने की सुविधाएँ तक दी जा रही हैं। रूस-यूक्रेन युद्ध और बढ़ते वैश्विक तनाव के बाद ऐसे निजी बंकरों में रुचि बढ़ने की ख़बरें भी हैं। यह केवल संपन्न लोगों का नया निवेश नहीं, हमारे समय की मानसिकता का संकेत है।

मनुष्य को अब ख़ुद के रचे भय से बचने के लिए ज़मीन के नीचे अपना निजी सुरक्षित संसार चाहिए।

यहाँ एक तथ्य स्पष्ट कर देना ज़रूरी है। ब्रिटिश सरकार आम नागरिकों के लिए बड़े पैमाने पर नये परमाणु बंकर नहीं बना रही है और न ही ब्रिटेन में, फ़िनलैंड या स्विट्जरलैंड जैसा व्यापक नागरिक परमाणु आश्रय नेटवर्क है। परमाणु हमले की स्थिति में अभी भी सरकारी सलाह किसी निजी बंकर पर नहीं, उपलब्ध मज़बूत भवनों में शरण लेने पर आधारित है— Go in, Stay in, Tune in, अर्थात भीतर जाएँ, भीतर रहें और सरकारी सूचना सुनते रहें।

भारत में भी आम जनता के लिए देशव्यापी परमाणु बंकरों का नेटवर्क नहीं है। भारत ने परमाणु और रेडियोलॉजिकल आपात स्थितियों से निपटने के लिए परमाणु ऊर्जा विभाग, आपदा प्रबंधन समूह, NDMA तथा रैडिएशन इमरजेंसी रिस्पॉन्स सेंटरों जैसी संस्थागत व्यवस्थाएँ विकसित की हैं। सीमा क्षेत्रों में बने युद्धकालीन शेल्टरों और बंकरों का संदर्भ अलग है।

परमाणु हथियारों की दुनिया

यानी परमाणु हमले के लिए दोनों देशों की तैयारी का आधार बड़े पैमाने पर निजी या सार्वजनिक परमाणु बंकर नहीं, बल्कि आपदा के समय शेल्टर, रैडिएशन मॉनिटरिंग, मेडिकल रिस्पान्स और आवश्यकता पड़ने पर सुरक्षित स्थान पर जाना है।

लेकिन ऐसे निजी बंकरों की सूचनाएं, हमें उस मूल प्रश्न तक ले जाती है, जिसने आधुनिक इतिहास को बदल दिया।

6 अगस्त 1945 को हिरोशिमा और 9 अगस्त को नागासाकी पर परमाणु बम गिराये गये। मानव ने पहली बार अपनी ही बनायी परमाणु शक्ति को शहरों और मनुष्यों के व्यापक विनाश में बदलते देखा। इसके बाद यह उम्मीद स्वाभाविक थी कि ऐसी भयावह शक्ति से दुनिया सबक़ लेगी।

हुआ इसके उलट। अमेरिका के बाद सोवियत संघ, ब्रिटेन, फ्रांस और चीन परमाणु शक्ति बने। भारत और पाकिस्तान 1998 में परमाणु शक्ति के रूप में सामने आये, उत्तर कोरिया ने परमाणु परीक्षण किये और इज़राइल को व्यापक रूप से परमाणु-सक्षम माना जाता है।

आज नौ देश परमाणु हथियार रखते हैं। SIPRI के 2026 के आकलन के अनुसार दुनिया में लगभग 12,187 परमाणु वारहेड हैं और सभी परमाणु-सशस्त्र देश अपने शस्त्रागारों के आधुनिकीकरण में लगे हैं।

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भय से शांति

इस पूरी व्यवस्था को एक आकर्षक नाम मिला, परमाणु प्रतिरोध या Nuclear Deterrence, तर्क यह है कि यदि दो देशों के पास एक-दूसरे को नष्ट करने की क्षमता है तो कोई भी पहला हमला करने का साहस नहीं करेगा।

इस प्रकार भय को शांति की गारंटी और विनाश की क्षमता को सुरक्षा का साधन मान लिया गया। विडंबना यह कि हर देश अपने परमाणु हथियार को सुरक्षा कहता है और दूसरे के हथियार को ख़तरा। सभी कहते हैं हथियार इसलिए ज़रूरी हैं क्योंकि दूसरा हथियार रखता है। यह भय का ऐसा चक्र है जिसे दुनिया ने ‘शक्ति संतुलन’ का सम्मानजनक नाम दे दिया है।

दुनिया की उल्टी चाल

संयुक्त राष्ट्र ने 1946 से ही परमाणु हथियारों को नियंत्रित और समाप्त करने के प्रयास किये। Nuclear Non-Proliferation Treaty सहित कई अंतरराष्ट्रीय समझौते हुए, परमाणु निरस्त्रीकरण की अनेक अपीलें हुईं, फिर भी दुनिया परमाणु हथियारों से मुक्त नहीं हो सकी। वैश्विक संस्थाएँ नियम बना सकती हैं, बातचीत करा सकती हैं और नैतिक दबाव बना सकती हैं, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा, भू-राजनीतिक प्रतिस्पर्धा और शक्ति-संतुलन की राजनीति के सामने उनकी क्षमता सीमित दिखायी देती है। मनुष्य ने विश्व शांति की संस्थाएँ तो बनायी हैं, लेकिन अपने भय और अविश्वास पर पूरी तरह नियंत्रण नहीं पा सका। ये सारे गठबंधन, संस्थाएं राजनीति की भेंट चढ़कर, किंकर्तव्य विमूढ़ता की शिकार हैं।

यहीं से इस प्रश्न का पर्यावरणीय पक्ष सामने आता है। परमाणु हथियार केवल युद्ध और कूटनीति का विषय नहीं हैं। इनके लिए यूरेनियम खनन, संवर्धन, उत्पादन, परीक्षण, भंडारण और सैन्य प्रतिष्ठानों का निर्माण होता है। परमाणु परीक्षणों और रेडियोधर्मी प्रदूषण ने दुनिया के अनेक क्षेत्रों में भूमि, जल, पारिस्थितिकी और मानव स्वास्थ्य पर दीर्घकालीन प्रभाव छोड़े हैं। किसी परमाणु दुर्घटना या युद्ध का पर्यावरणीय प्रभाव राजनीतिक सीमाओं को नहीं मानता। हवा, समुद्र, मिट्टी और जलवायु की कोई राष्ट्रीय सीमा नहीं होती।

दूसरी ओर पृथ्वी जलवायु परिवर्तन, जैव-विविधता के विनाश, वायु प्रदूषण, जल संकट, समुद्री प्रदूषण और भूमि क्षरण से जूझ रही है। हम जानते हैं कि ये दोनों अलग मुद्दे नहीं हैं।

इसके बावजूद 2025 में दुनिया का सैन्य खर्च लगभग 2.887 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँच गया। नौ परमाणु-सशस्त्र देशों ने अकेले परमाणु हथियारों पर लगभग 119 अरब डॉलर ख़र्च किये। कल्पना कीजिए, यदि इस विशाल संसाधन का एक बड़ा हिस्सा स्वच्छ ऊर्जा, जल संरक्षण, जंगलों की पुनर्स्थापना, प्रदूषण नियंत्रण, जलवायु-अनुकूल शहरों और आपदा-रोधी बुनियादी ढाँचे में लगाया जाता तो मानवता की वास्तविक सुरक्षा कितनी बढ़ सकती थी।

हमारी समस्या शायद यही है कि हमने सुरक्षा का अर्थ बहुत संकीर्ण कर दिया है। जिस देश के पास हज़ारों परमाणु हथियार हैं, लेकिन उसके नागरिक प्रदूषित हवा में सांस लेते हैं, जल संकट झेलते हैं, बाढ़ और गर्मी की आपदाओं से असुरक्षित हैं, उसके लिए सुरक्षा की परिभाषा पर पुनर्विचार ज़रूरी है। सुरक्षा केवल सीमा की नहीं, हवा की भी आवश्यक है। केवल सैनिकों की नहीं, नदियों, जंगलों, मिट्टी और आने वाली पीढ़ियों की सुरक्षा भी वांछित है।

सवाल सभ्यता और सोच का

परमाणु बंकर मनुष्य को कुछ समय के लिए बचा सकता है, लेकिन पर्यावरण की रक्षा ही मानव सभ्यता को लंबे समय तक बचा सकती है।

इसलिए ब्रिटेन में बनते निजी बंकर केवल एक कारोबारी प्रवृत्ति नहीं हैं। वे हमारे समय का प्रतीक हैं। हमने बाहर की दुनिया को सुरक्षित बनाने की जगह अपने लिए भीतर एक सुरक्षित दुनिया बनाने की नितांत ग़लत कल्पना शुरू कर दी है। प्रश्न यह है कि पृथ्वी को असुरक्षित बनाते हुए हम आख़िर कितने लोगों को बंकरों में सुरक्षित रख पाएँगे?

1945 में हिरोशिमा और नागासाकी ने परमाणु विनाश की चेतावनी दी थी। आज जलवायु संकट उसी चेतावनी का एक दूसरा, धीमा और व्यापक रूप हमारे सामने रख रहा है। एक ओर हम पृथ्वी को बचाने के लिए अंतरराष्ट्रीय सम्मेलन करते हैं, दूसरी ओर उसे नष्ट करने की क्षमता बढ़ाने पर खरबों डॉलर खर्च करते हैं। मनुष्य ने विज्ञान को अद्भुत ऊँचाइयों तक पहुँचा दिया, पर क्या उसकी सामूहिक बुद्धि और विवेक भी उतनी ही दूर तक पहुँचे हैं?

सवाल यह नहीं कि अगला बंकर कितना गहरा और कितना सुरक्षित होगा। सवाल यह है कि हम ऐसी पृथ्वी बनाने के लिए कितना प्रयास कर रहे हैं, जहाँ आने वाली पीढ़ियों को बंकर की ज़रूरत ही न पड़े।

आख़िर हमें अपने बच्चों के लिए क्या छोड़ना है, परमाणु हथियारों से भरे सुरक्षित तहख़ाने या सांस लेने योग्य एक सुरक्षित पृथ्वी?

और इस प्रश्न के सामने खड़े होकर पूछना ही होगा, कितने सभ्य बचे हैं हम?

विवेक रंजन श्रीवास्तव, vivek ranjan shrivastava

विवेक रंजन श्रीवास्तव

सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।

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