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पाक्षिक ब्लॉग डॉ. संजीव जैन की कलम से....

लेखन: दस्तावेज़ीकरण नहीं, जीवन प्रवाह

                ध्वनि से अर्थ तक: लेखन की आंतरिक यात्रा का दसवां अध्याय… हमने जीवन को जीना कम और सुरक्षित रखना अधिक शुरू कर दिया। पहले अनुभवों को सँभाला, फिर विचारों को, फिर सिद्धांतों को, फिर स्वयं को। धीरे-धीरे ऐसा हुआ कि हम जीते हुए मनुष्य नहीं रहे, अपने ही भीतर रखे हुए दस्तावेज़ बन गये। हम अपने अनुभवों के जीवित प्रवाह से अधिक उनके अभिलेखों में रहने लगे। हमने स्मृतियों को संग्रहालयों की तरह सजा लिया, विचारों को संविधान बना लिया और स्वयं को उन संविधानों का क़ैदी।

यहीं से लेखन का प्रश्न जन्म लेता है। लेखन क्या है?

क्या लेखन अनुभवों का संरक्षण है? क्या लेखन विचारों का संग्रह है? क्या लेखन इतिहास को बचाने का माध्यम है? या लेखन कुछ और है? कुछ ऐसा जो किसी दस्तावेज़, किसी संग्रह, किसी प्रमाणपत्र से कहीं अधिक जीवित है?

सामान्यतः मनुष्य लेखन को स्मृति बचाने का उपकरण मानता है। जो देखा गया, उसे लिख लिया गया। जो सोचा गया, उसे शब्दों में बाँध लिया गया। जो घटा, उसे दर्ज कर लिया गया। ऐसा लगता है लेखन का कार्य जीवन को सुरक्षित रखना है।

किन्तु यहीं एक सूक्ष्म ख़तरा छिपा हुआ है।

जीवन को सुरक्षित रखने की हर कोशिश, जीवन को रोकने की शुरूआत भी बन सकती है।

नदी को यदि हम संरक्षित करना चाहें और उसे काँच के पात्र में भर लें, तो हमारे पास नदी का जल तो होगा, नदी नहीं होगी। नदी का सार उसके बहाव में है, संग्रह में नहीं। उसी प्रकार जीवन का सार उसके घटित होने में है, उसके अभिलेखन में नहीं।

जब लेखन जीवन के बहाव को समझने के बजाय उसे स्थिर करने लगता है, तब वह दस्तावेज़ बनने लगता है। और जब दस्तावेज़ स्वयं को जीवन समझने लगते हैं, तब वे ताबूत बन जाते हैं।

मनुष्य की सबसे बड़ी भूल यही रही कि उसने शब्दों को जीवन से अधिक वास्तविक मान लिया।

एक बच्चा जब पहली बार आकाश देखता है, तब उसके भीतर जो विस्मय जन्म लेता है, वह किसी शब्द में नहीं होता। वह अनुभव शब्दों से पहले घटित होता है। बाद में हम उसे भाषा देते हैं। हम कहते हैं— “आकाश सुंदर है।”

लेकिन यह वाक्य आकाश नहीं है। यह केवल आकाश की ओर संकेत है।

समस्या तब शुरू होती है, जब संकेत को ही सत्य मान लिया जाता है।

लेखन का वास्तविक संकट यही है कि मनुष्य संकेतों में रहने लगता है और सत्य से दूर चला जाता है।

धीरे-धीरे शब्द वास्तविक हो जाते हैं और जीवन उनकी छाया…

धर्मों के साथ यही हुआ।

दर्शन के साथ यही हुआ।

विचारधाराओं के साथ यही हुआ।

और साहित्य के साथ भी यही हुआ।

जो बातें किसी जीवित अनुभव से निकली थीं, वे पुस्तकों में क़ैद होकर सिद्धांत बन गयीं। फिर सिद्धांतों को बचाने के लिए संस्थाएँ बनीं। संस्थाओं को बचाने के लिए व्यवस्थाएँ बनीं। और अंततः मनुष्य अनुभव से दूर होता गया।

एक दिन ऐसा आया जब पुस्तकें बची रहीं, जीवन खो गया।

लेखन का उद्देश्य जीवन को क़ैद करना नहीं है। क्योंकि जीवन क़ैद नहीं किया जा सकता।

जीवन को शब्दों में पूरी तरह उतारने का प्रयास वैसा ही है, जैसे हवा को मुट्ठी में पकड़ने की कोशिश। जितना कसकर पकड़ोगे, उतनी ही तेज़ी से वह निकल जाएगी।

लेखन का काम पकड़ना नहीं, स्पर्श करना है।

लेखन का काम कब्ज़ा करना नहीं, संकेत देना है।

लेखन का काम निष्कर्ष देना नहीं, द्वार खोलना है।

महान लेखन कभी उत्तर नहीं देता, वह प्रश्नों को जीवित कर देता है।

महान लेखन कभी जीवन का स्थान नहीं लेता, वह जीवन की ओर लौटाता है।

जब कोई लेखक अपने अनुभव को अंतिम सत्य घोषित कर देता है, तब उसका लेखन मरने लगता है। लेकिन जब लेखक अपने अनुभव को एक खिड़की की तरह प्रस्तुत करता है, तब उसका लेखन जीवित रहता है।

जीवित लेखन पाठक को अपने निष्कर्ष नहीं देता। वह उसे देखने की क्षमता देता है।

वह कहता है— “मैंने ऐसा देखा, अब तुम भी देखो।”

वह आदेश नहीं देता। वह आमंत्रण देता है।

यही कारण है कुछ पुस्तकें शताब्दियों बाद भी जीवित रहती हैं और कुछ पुस्तकें अपने प्रकाशन के साथ ही मर जाती हैं।

जो पुस्तकें जीवन को क़ैद करना चाहती हैं, ताबूत बन जाती हैं। जो पुस्तकें जीवन की ओर संकेत करती हैं, पुल बन जाती हैं।

ताबूत और पुल में यही अंतर है। ताबूत मृत को सँभालता है। पुल जीवित को आगे ले जाता है।

आज संसार में अधिकांश लेखन ताबूतों का निर्माण कर रहा है।

सूचनाएँ बढ़ रही हैं।

डेटा बढ़ रहा है।

ज्ञान का संग्रह बढ़ रहा है।

लेकिन जीवन की समझ घट रही है।

मनुष्य पहले कभी इतना जानकार नहीं था, फिर भी शायद कभी इतना भ्रमित भी नहीं था।

क्यों?

क्योंकि ज्ञान बढ़ा है, लेकिन देखने की क्षमता नहीं।

शब्द बढ़े हैं, अनुभव नहीं।

विवरण बढ़े हैं, साक्षात्कार नहीं।

लेखन तब ख़तरनाक हो जाता है जब वह पाठक को यह भ्रम दे देता है कि पढ़ लेना ही जान लेना है।

वास्तव में पढ़ना जानना नहीं है। जानना जीना है।

किसी पुस्तक में प्रेम पर हज़ारों पृष्ठ पढ़े जा सकते हैं, लेकिन प्रेम का एक क्षण उन हज़ारों पृष्ठों से बड़ा होता है।

किसी पुस्तक में मौन पर सम्पूर्ण पुस्तकालय भरे जा सकते हैं, लेकिन मौन का एक वास्तविक अनुभव उन सबको पीछे छोड़ देता है।

किसी पुस्तक में सत्य पर अनंत विचार लिखे जा सकते हैं, लेकिन सत्य का एक प्रत्यक्ष दर्शन उन सभी विचारों को अप्रासंगिक बना देता है।

इसलिए लेखन का सर्वोच्च रूप वह नहीं जो स्वयं को अंतिम बना दे। लेखन का सर्वोच्च रूप वह है जो स्वयं को अनावश्यक बना दे।

यह सुनने में विरोधाभासी लगता है। लेकिन सोचिए—

जब एक शिक्षक वास्तव में सफल होता है, तब विद्यार्थी को शिक्षक की आवश्यकता नहीं रह जाती।

जब एक दीपक अपना कार्य पूरा कर देता है, तब सूर्योदय हो जाता है।

उसी प्रकार महान लेखन वह है, जो पाठक को ऐसी दृष्टि दे दे कि उसे पुस्तकों की बैसाखियों की आवश्यकता न रहे।

लेखन तब पूर्ण होता है, जब वह स्वयं से परे ले जाता है। अन्यथा वह केवल शब्दों का संग्रह है।

हम ऐसे युग में जी रहे हैं जहाँ मनुष्य लगातार लिख रहा है और लगातार पढ़ रहा है। लेकिन शायद पहले से कम देख रहा है।

हम शब्दों से इतने घिर गये हैं कि वास्तविकता की प्रत्यक्षता खोने लगी है।

हर अनुभव के पहले कोई विचार उपस्थित हो जाता है।

हर दृश्य के पहले कोई व्याख्या।

हर घटना के पहले कोई सिद्धांत।

और तब जीवन को सीधे देखने की क्षमता समाप्त होने लगती है।

लेखन का उद्देश्य इस खोयी हुई क्षमता को पुनर्जीवित करना होना चाहिए।

लेखन को विचारों की जेल नहीं बनना चाहिए। उसे खिड़की बनना चाहिए। उसे पाठक को यह साहस देना चाहिए कि वह शब्दों से बाहर जाकर देख सके।

वास्तविक लेखक वह नहीं, जो शब्दों को बढ़ाता है।

वास्तविक लेखक वह है, जो शब्दों के पार का मौन दिखा देता है।

क्योंकि हर महान लेखन अंततः मौन की ओर ले जाता है। जैसे नदी समुद्र में खो जाती है। जैसे संगीत अंततः निस्तब्धता में विलीन हो जाता है। जैसे प्रार्थना अंततः शब्दरहित हो जाती है। वैसे ही लेखन का अंतिम लक्ष्य शब्द नहीं है। उसका अंतिम लक्ष्य वह चेतना है जिसमें शब्द उत्पन्न होते हैं।

जब लेखन इस चेतना से कट जाता है, तब वह दस्तावेज़ बन जाता है।

और दस्तावेज़ों का स्वभाव है— वे सुरक्षित रहते हैं, जीवित नहीं।

वे संरक्षित होते हैं, विकसित नहीं होते।

वे संग्रहित होते हैं, बहते नहीं।

इसलिए संसार की सबसे बड़ी त्रासदी यह नहीं है कि पुस्तकें नष्ट हो जाएँ। सबसे बड़ी त्रासदी यह है कि पुस्तकें बची रहें और जीवन नष्ट हो जाये।

सबसे बड़ा संकट यह नहीं कि शब्द खो जाएँ। सबसे बड़ा संकट यह है कि शब्द बच जाएँ और अनुभव खो जाये।

सबसे बड़ी मृत्यु यह नहीं कि कोई पुस्तक जल जाये। सबसे बड़ी मृत्यु यह है कि मनुष्य स्वयं पुस्तक बन जाये।

जीवित मनुष्य हमेशा अधूरा होता है, खुला होता है, बदलता रहता है। दस्तावेज़ पूर्ण होता है। बंद होता है। स्थिर होता है। और स्थिरता ही मृत्यु का दूसरा नाम है। इसलिए लेखन का अर्थ जीवन को स्थिर करना नहीं है।

लेखन का अर्थ जीवन की धड़कन को सुनना है।

लेखन का अर्थ किसी निष्कर्ष को स्थापित करना नहीं है।

लेखन का अर्थ उस रहस्य के साथ चलना है जो हर क्षण नया जन्म ले रहा है।

सच्चा लेखन इतिहास नहीं है, वर्तमान है।

स्मृति नहीं है, साक्षात्कार है।

संग्रह नहीं है, प्रवाह है।

दस्तावेज़ नहीं है, संवाद है।

और जो लेखन जीवन को क़ैद करने की कोशिश करता है, वह अंततः पुस्तकों का ताबूत बन जाता है।

किन्तु जो लेखन जीवन की अनंतता के प्रति विनम्र रहता है, जो जानता है शब्द सत्य नहीं केवल उसकी दिशा हैं, जो पाठक को निष्कर्ष नहीं दृष्टि देता है, जो ज्ञान नहीं जागरण देता है— वही लेखन जीवित रहता है।

वही लेखन नदी की तरह बहता है।

वही लेखन वृक्ष की तरह बढ़ता है।

वही लेखन आकाश की तरह खुला रहता है।

और वही लेखन अंततः हमें दस्तावेज़ होने से बचाकर पुनः मनुष्य बना देता है।

संजीव कुमार जैन

संजीव कुमार जैन

लंबे समय से साहित्य के स्वाध्याय एवं अध्यापन से जुड़े संजीव शासकीय कन्या महाविद्यालय, भोपाल यानी नूतन कॉलेज में हिंदी के सह प्राध्यापक हैं। आपकी अभिरुचि पढ़ना लिखना है लेकिन अधिक प्रकाशन से आप गुरेज़ करते हैं।

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