
- August 14, 2026
- आब-ओ-हवा
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पाक्षिक ब्लॉग सलीम सरमद की कलम से....
इतिहास बकवास है!
“इतिहास बकवास है।” – हेनरी फ़ोर्ड
लोग बीते काल की पीठ पर लदे हुए… रेले की तरह किसी एक दिशा में बहे जा रहे हैं। आख़िरकार बे-ठिकाना हो जाना उनकी नियति है।
भीड़ का नेतृत्व करने वाले झूठे गुमान के शिकार हैं। भीड़ को इतिहास संचालित करता है- वे निमित्त हैं।
कल जो लोक में डूबे हुए थे, जिन्होंने इतिहास की किताबों के पन्ने नहीं पढ़े थे, उनके मुंह से वीर-पुरुषों की गाथाएं शोभा देती थीं लेकिन आज क्या इन मासूमों को नहीं पता इतिहास राजनीति का पार्टनर बन चुका है। क्या ये ख़ुद अपनी अस्मिता का सौदा करते हैं? गौरवान्वित इस्तेमाल हो जाना चाहते हैं क्योंकि इसके लिए ‘स्खलन’ का एक कोना इनके भीतर मौजूद है।
प्राचीन भित्तियों पर संस्कृति को उकेरा गया। लाखों वर्षों पहले आदिम लोगों द्वारा पलायन करते हुए धर्म की नींव डाली गयी और खंडित बर्तन-भांडों से नागरिकता का अस्थायी प्रमाण पत्र हासिल किया गया…
लेकिन अब इतिहास के बाड़े में संस्कृति, धर्म और नागरिकता मामूली जानवरों की तरह क़ैद हैं।
समाज ऐसी स्मृति को भूलता क्यों नहीं जिसका उससे सीधा-सीधा कोई वास्ता नहीं है…
इतिहास उन घटनाओं का विवरण है, जो कभी हमारे सामने घटित ही नहीं हुईं। आख़िरकार कहानियां हमारी समझ को प्रभावित करने वाली हैं।
इतिहास परमिट करता है सब क़त्ल-ओ-ग़ारत में भागीदार हों… सब दंगाई बनें।
इतिहास व्यक्ति या देश की आत्मा पर ही नहीं, समय की देह पर चिपके हुए गुनाहों को धोने में भी सक्षम है।
इतिहास हमें फ़ैसला-क़ुन होने पर मजबूर करता है।
इतिहास ही भीड़ से नारे लगवाता है। सड़कों पर हंगामा-बरपाता है। शोर-शराबा, शक्ति-प्रदर्शन, नंगी तलवारों का लहराना, ये फूहड़ नृत्य, ये मातम इतिहास की देन है। अगर इतिहास न होता फिर भीड़ किसके नाम का आवाहन करती?
इतिहास ने ही जातियों को बरगलाया है। उनके घरों पर लहराता हुआ एक प्रकार का झंडा-उदंडता का प्रतीक है। एक व्यर्थ-सी अकड़ उनकी गर्दन में भी है। उदंडता व्यक्ति की नज़रों को कमज़ोर कर देती है। यही कारण है समय के लचीलेपन से ये बे-ख़बर हैं।

आदमज़ात का प्रकृति से कट जाने का दोष भी- मैं इतिहास के सर पर मढ़ता हूँ।
इतिहास ने ज्योग्राफ़िकल पहचान को पीछे धकेला है।
इतिहास ने लोक साहित्य पर भी बट्टा लगाया है।
प्रगतिशील सोच के मालिक, स्वतंत्र विचारों के हामी, सुधारवादी नज़रिये के रखवाले भी इतिहास के फेर में पड़ गये।
इतिहास को…
ग़रीब, अमीर, सर्वाहारा हर कोई सर-माथे पर लगाये घूमता है। इतिहास के कारण ही- पवित्र धागे हैं, प्रार्थनाओं और इबादतों का दुहराव है।
जिस इतिहास ने समाज का कुछ भला नहीं किया, वह चौक-चौराहों पर प्रेत-आत्माओं-सा उल्टे पैर किये हुए नाचता है।
इतिहास किसी सभ्यता को जीवित नहीं कर सकता और न ही किसी संस्कृति को ख़त्म कर सकता है। इतिहास एक आत्मघाती गुंडा है, जो अपने ही अस्तित्व से घायल होने वाला है, जो इसके साथी बनेंगे एक दिन अपना नुक़सान ही करेंगे।
इतिहास की आड़ लेने वालों में…
सांप्रदायिक राजनेता हैं।
पाखंडी धर्मालंबी हैं।
घूसख़ोर अधिकारी हैं।
ठग समाजसेवी हैं।
एक रोज़ इतिहास कल्पनाओं की झाड़ियां से भेड़िया बनकर बाहर आएगा और पहले उनको खाएगा, जो इसकी आस्था में तल्लीन हैं।
मैं सोचता हूँ-
यदि इतिहास हमारी स्मृति से विलोपित हो जाये क्योंकि इसे हमने जिया नहीं है, तो जीवन की आधी विपदाएं दूर हो जाएंगी। शेष मनोविज्ञान के हवाले कर दी जाएं।
इतिहास आमजन के लिए परी-कथाओं, कहानियों के सिवा और कुछ नहीं है।
इतिहासकार और पुरातत्ववेत्ता जैसा अभिनय करने में अड़चन ये है कि तुम मूर्ख कहलाओगे।

सलीम सरमद
1982 में इटावा (उ.प्र.) में जन्मे सलीम सरमद की शिक्षा भोपाल में हुई और भोपाल ही उनकी कर्म-भूमि है। वह साहित्य सृजन के साथ सरकारी शिक्षक के तौर पर विद्यार्थियों को भौतिक विज्ञान पढ़ाते हैं। सलीम अपने लेखन में अक्सर प्रयोगधर्मी हैं, उनके मिज़ाज में एकरंगी नहीं है। 'मिट्टी नम' उनकी चौथी किताब है, जो ग़ज़लों और नज़्मों का संकलन है। इससे पहले सरमद की तीन किताबें 'शहज़ादों का ख़ून' (कथेतर) 'दूसरा कबीर' (गद्य/काव्य) और 'तीसरा किरदार' (उपन्यास) प्रकाशित हो चुकी हैं।
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