
- August 14, 2026
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मासिक ब्लॉग निशांत कौशिक की कलम से....
क्यों पढ़ना चाहिए 'डेथ इन वेनिस'?
मैंने लगभग चार महीने पहले थॉमस मान कृत ‘द मैजिक माउंटेन’ पढ़ा था। वह लंबी अवधि और विराट फ़लक का उपन्यास था- जिसे अक्सर नॉवेल आफ़ आइडियाज़ कहा जाता है। उसमें मान ने यूरोप के भीतर पल रहे लगभग हर वैचारिक अंतर्विरोध को जगह दी थी। आज पढ़ने पर ऐसे उपन्यास कई बार बहुत रूखे लगते हैं, जिनमें पात्र अक्सर मनुष्यों की तरह कम और विचारों, दार्शनिक मतों तथा ऐतिहासिक स्थितियों के प्रतिनिधियों की तरह अधिक बोलते हैं। यह यूरोपीय उपन्यास की एक केंद्रीय प्रवृत्ति थी; इसलिए इन उपन्यासों में पठनीयता का अभाव भी उनका सामान्य लक्षण रहा है।
डेथ इन वेनिस कुछ दूसरी प्रकृति का उपन्यास है। उसमें आत्मकथात्मक छाया अवश्य है लेकिन उसका सार वहाँ नहीं है।
कथा गुस्ताव फ़ॉन आशेनबाख नाम के एक प्रतिष्ठित जर्मन लेखक की है, जो लंबे समय तक अनुशासन और साहित्यिक श्रम में जीवन बिताने के बाद विश्राम के लिए वेनिस आता है। एक होटल में ठहरने के दौरान उसकी नज़र एक पोलिश किशोर ताद्ज़ियो पर पड़ती है, जिसकी असाधारण सुंदरता उसे लगातार अपनी ओर खींचती है। दोनों किरदारों के बीच कभी कोई परिचय या संवाद नहीं होता लेकिन आशेनबाख धीरे-धीरे अपने दिन इस तरह बिताने लगता है कि ताद्ज़ियो उसे बार-बार दिखायी दे। इसी बीच वेनिस में हैज़ा फैलने लगता है, जिसे शहर के अधिकारी और होटल वाले छिपाने की कोशिश करते हैं। आशेनबाख कुछ समय के लिए शहर छोड़ने का विचार करता है लेकिन लौट आता है और ताद्ज़ियो के निकट रहने की अपनी आदत को जारी रखता है। वह अपने आप को कृत्रिम रूप से युवा बनाने की कोशिश भी करता है।
बीमारी पूरे शहर में फैलती जाती है और उपन्यास का अंत अपने शीर्षक के इशारे के अनुरूप होता है।
इस उपन्यास (या लंबी कथा) के साथ सबसे बड़ा अन्याय यह होगा कि इसे केवल एक वर्जित आकर्षण की कथा समझ लिया जाये, जैसा अक्सर नबूकोफ़ के उपन्यास के साथ होता रहा है।
पॉलिश युवक ताद्ज़ियो यहाँ सौंदर्य का वह रूप है, जो लगभग मिथकीय है- असाध्य, अप्राप्य, दुर्लभ और असंभव। आशेनबाख की त्रासदी प्रेम में नहीं; इसमें है कि जीवन भर जिस अनुशासन, नैतिकता और श्रम के सहारे उसने अपने व्यक्तित्व का निर्माण किया था- वह सब इस घातक सौंदर्य के सामने दरकने लगता है। मान सौंदर्य को यहाँ सांत्वना की वस्तु नहीं बल्कि रिक्तता को उजागर करने वाली शक्ति की तरह बरतते हैं।

मान के यहाँ जर्मन साहित्यिक और यूरोपीय प्रतीकों की एक समृद्ध और बेहद विद्वतापूर्ण परंपरा लगातार उपस्थित रहती है। ‘द मैजिक माउंटेन’ में वे वॉलपुर्गिस नाइट का संदर्भ गोएथे के फ़ाउस्ट से लेते हैं; उसी तरह ‘डेथ इन वेनिस’ में समुद्र, वेनिस और ताद्ज़ियो का सौंदर्य धीरे-धीरे मिथकीय रूप ग्रहण करने लगता है। आशेनबाख का नाम भी संभवतः संगीतकार गुस्ताव महलर की ओर संकेत करता है, और यह संयोग नहीं कि बाद में लुकीनो विस्कोंती ने उपन्यास पर फ़िल्म बनाते समय आशेनबाख को लेखक के बजाय संगीतकार में रूपांतरित कर दिया।
इस कथा को मान के शक्तिशाली गद्य और मानवीय विडंबनाओं की उनकी विलक्षण गहन और सामर्थ्यपूर्ण अभिव्यंजना के लिए पढ़ा जाना चाहिए।

निशांत कौशिक
1991 में जन्मे निशांत ने जामिया मिल्लिया इस्लामिया, दिल्ली से तुर्की भाषा एवं साहित्य में स्नातक किया है। मुंबई विश्वविद्यालय से फ़ारसी में एडवांस डिप्लोमा किया है और फ़ारसी में ही एम.ए. में अध्ययनरत हैं। तुर्की, उर्दू, अज़रबैजानी, पंजाबी और अंग्रेज़ी से हिंदी में अनुवाद प्रतिष्ठित पत्रिकाओं में प्रकाशित। पुणे में 2023 से नौकरी एवं रिहाइश।
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