
- August 14, 2026
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पाक्षिक ब्लॉग रति सक्सेना की कलम से.....
सिकंदर का देश-2
आज के दिन हम लोग नाश्ते के बाद फिर नदी के किनारे चल दिये, आज पुनः मेसीडोनिया के कवियों की पुस्तकों का विदेशी भाषाओं में अनुवादों का विमोचन था। लेकिन जगह बड़ी दिलचस्प थी- पोएट्री मिल। दरअसल, यह मकानों के बीच एक चौराहा था, जिसमें एक बेहद पुराने ज़माने की पनचक्की लगी हुई थी। इसी पनचक्की को चालू करके फूस आदि से सजा रखा था, लोग इसके चारो तरफ बैठे थे। स्त्रुगा में मैंने ऐसे कई प्रयोगों को काफ़ी देखा था, जहाँ पुरातन से जुड़े रहते हुए नवीनतम को स्वीकारने की भावना दिखायी देती है।
यहाँ भाषा बाधक बनी, सब कुछ मेसीडोनियन भाषा में चल रहा था, लेकिन अब तक मुझे बिन भाषा के भाषा समझ में आने लगी थी। अंग्रेज़ी का प्रयोग बहुत कम लोग ही कर पा रहे थे, वे अधिकतर अन्य यूरोपीय देशों के थे, जहाँ कभी अंग्रेज़ों का शासन रहा होगा। इसके उपरान्त हम सबको बसों में भरकर Courtyard of the Monastery of Our lady in Kalishta ले जाया गया। हम वक़्त से काफ़ी पीछे चल रहे थे। हम लोगों की गाइड छोटी-छोटी लड़कियाँ थीं, जो अपनी पढ़ाई ख़त्म करके बिना वेतन के हम लोगों की सहायता में लगी हुई थीं। अब मेरी तबीयत ख़राब होने लगी थी, पता नहीं पानी का प्रभाव था या भोजन का, मेरा पेट बुरी तरह गड़बड़ा गया था। शायद हम लोग थक भी चले थे।
मॉनेस्ट्री के अहाते में हम लोगों को काफ़ी इंतज़ार करना पड़ा, फिर काव्य पाठ आरंभ हुआ। सबको एक-एक कविता पढ़ने का अवसर मिला। इसके उपरान्त हम होटल आये और भोजन के बाद थोड़े आराम के बाद Old City of Ohrid की सैर को लाये गये। मेरी उन लड़कियों से बात होने लगी, जो हम लोगों की सहायता कर रही थीं। यहाँ हमने क़रीब 2000 साल पुराना रोमन ओपन थिएटर देखा, पुराने मकान और कई चर्च भी। लगता है सिकन्दर के उपरान्त रोमन आक्रमणकारियों ने सिकन्दर को मिटाने की पूरी कोशिश की थी।
चर्च की बनावट में ग्रीक और रोमन, दोनों शैलियों का प्रभाव था। एक जगह हमें पुराने किसी नगर के भग्नावशेष भी दिखायी दिये, जो सिन्धु घाटी की सभ्यता जैसी भग्नावस्था में थे। एक वृक्ष था, जो कि क़रीब एक हज़ार साल पुराना है। लोगों ने थोड़ी बहुत शॉपिंग भी की। घूमघाम कर हम लोग Church of St. Sophia में आये, जहाँ सम्मानित कवि Lyudomir Levcev का विशेष स्वागत किया गया। इसके उपरान्त मेसीडोनियन ओपेरा गायन हुआ प्रसिद्ध गायिका Vesna Gjinovska द्वारा।
हम लोग लौट रहे थे, लेकिन लोग मस्ती की तलाश में झील के क़रीब जा रहे थे, कहीं कच्चा मंच लगाकर नाच हो रहा था तो कहीं गायन… ओह, कितनी कोशिश करते हैं ये लोग अपने दुःखों को गाने-नाचने से ढाँपने की… कोई टीवी के सामने नहीं जमा बैठा है, सैर करना, हँसना, नाचना-गाना मनुष्यता को जीने की एक नन्हीं कोशिश है।
22 अगस्त 2010
आज के दिन हमें नौ बजे होटल के निचले हिस्से में इकट्ठा होने के लिए कहा गया था, इस बीच हमारे कमरों में एक बड़े बैग में किताबों के पुलिंदे और वाइन की बोतल पहुँच गयी थी। ये किताबें मेसिडोनिया के कवियों की कविता की थीं, जिन्हें पॉकेट बुक साइज़ में बेहद सुन्दर छपाई के साथ चिकने काग़ज़ पर छापा गया था। मैंने शुक्र मनाया कि मैं काफ़ी कम सामान लायी, क्योंकि 20 किलो से ज़्यादा सामान रख नहीं सकती थी। पढ़ने का वक़्त तो था नहीं, इसलिए सामान सहेजकर रख लिया।
नाश्ता करके होटल के हॉल में आई तो आयोजकों का पता ही नहीं था। नौ बज चुके थे, कुछ और देशों के कवि भी थे, जो यहाँ के समय से पिछड़ने वाली बात से नाराज़ थे। आज हमें सेंट नाउम मॉनेस्ट्री जाना था, रास्ते में वाइन का बाग़ीचा था, जहाँ वह डोलों में भरी रहती थी, कोई कितना भी पी सकता था। इस अवसर को कोई भी खोना नहीं चाहता था, इसलिए सभी बताये समय पर नीचे पहुँच गये। कुछ देर में पता चला कि बसें तैयार हैं, लेकिन आयोजकों का पता ही नहीं। बेचारे रात दिन काम कर रहे हैं, थक गये होंगे। कवियों का ग़ुस्सा बढ़ने लगा। मैं स्वयं आयोजक के रूप में जानती हूँ कि इस तरह के आयोजनों को घड़ी की सुइयों के साथ चलाना कितना मुश्किल होता है।
मैसिडोनिया की घड़ी भी भारतीय घड़ी की तरह चल रही थी। ख़ैर दस बजे की जगह क़रीब साढ़े ग्यारह बजे हमारी बसों का काफ़िला यात्रा पर चल दिया। हमें बताया गया कि पहले यह यात्रा नौका द्वारा की जाती थी, लेकिन पिछले दिनों एक नौका डूब गयी, इसलिए आयोजकों ने रिस्क नहीं ली, हम सब बस से ही चले। रास्ता झील के किनारे-किनारे चल रहा था, बेहद ख़ूबसूरत प्रकृति, लम्बे चारागाह और विस्तृत भूमि।
हम लोग गन्तव्य तक पहुँच गये थे। मैंने पानी की बोतल खरीदी पूरे दो यूरो की, यानी कि 1/2 लीटर पानी 120 रुपये का, जबकि मेसिडोनिया की मुद्रा और भारतीय मुद्रा क़रीब-क़रीब एक मूल्य की हैं। हमारे देश में अब भी कुछ अच्छा है, जिसे हम देख नहीं पाते। भारत में हमारे अतिथियों को हमने पानी ख़रीदने की ज़रूरत महसूस ही नहीं करने दी।
सबसे पहले हम वाइन के बाग़ीचे में गये। बताया गया कि ये डोल खोल दिये जाते हैं, जिसको जितना पीना है, पी सकता है। लेकिन कुछ देर बाद पता चला कि कार्यक्रम है कि पहले हम सेंट नाउम मॉनेस्ट्री की ओर चलें। एक बड़े किले की तरह बनी मॉनेस्ट्री अन्दर से ख़ूबसूरत होगी, लेकिन बाहर का नज़ारा बेहद ख़ूबसूरत, झील का पानी इतना नीला कि लगता है पेन्टिंग है, उसी के किनारे उगे हल्के नीले बादल, फिर आसमानी आसमान, वाह… नीले रंग की सारी शेड्स में प्रकृति।
मैं युवा स्वयंसेविका रेजाटा से मित्रता बना चुकी थी। मुझे पता चला कि नाउम्मीदी की इस स्थिति में भी ये लड़कियाँ पढ़ने को लालायित हैं, रेजाटा मुस्लिम समुदाय की, बड़े सुलझे दिमाग़ वाली लड़की है। दुनिया जानने की चाह है उसमें, काफ़ी कुछ पढ़ा भी है। मेसिडोनिया की जनता आज भी भारत के मोह से मुक्त नहीं हो पायी है। आज भी हिन्दी फिल्में देखी जाती हैं, बन्दिनी सीरियल यहाँ काफ़ी लोकप्रिय है। रेजाटा भारत आना चाहती है, आगे पढ़ना चाहती है।
क़रीब दो बजे हमें मॉनेस्ट्री के रेस्टोरेन्ट में बुलाया जाता है और वाइन सर्व की जाती है, मेरी भूख-प्यास बिलकुल बन्द हो चुकी है, इसलिए मैं अपनी बोतल से घूँट-घूँट पानी पीती रहती हूँ। लोग वाइन पर वाइन चढ़ाते जा रहे हैं, काफ़ी सारे मेसिडोनियन कवि, और कवि के नाम पर मुफ़्त खाने वाले लोग भी चले आये हैं। सब कुछ गड़बड़ाने लगता है। जब खाना लगता है तो लोग टूट पड़ते हैं, मुझे अपने देश में होने वाली गोष्ठियों की याद आती है, जहाँ खाने के वक़्त भीड़ संभाले नहीं सँभलती। मुझे कुछ खाना नहीं है, इसलिए चुपचाप बैठी हूँ।
पास ही एक बेल्जियम के कवि की ख़ूबसूरत लेखिका पत्नी बड़ी क्रोधित-सी बैठी हैं। वे बड़ी नाराज़ हैं, कहती हैं अपने पति का मन रखने के लिए मैं आ गयी, मैं तो ऐसी बदतमीज़ी बर्दाश्त नहीं कर सकती। मैं मुस्कराती रही, तो पूछने लगीं कि मैं किस देश की हूँ, मैंने कहा कि भारत की। “ओह, तभी बड़े आराम से बैठी हो।” मैं फिर मुस्करा दी, तो हमारे देश की ख़बर सबको है।
खाने के बाद वाइन कविता के विजेता की घोषणा हुई, सबसे पहला पुरस्कार मेरी मित्र ओदिवे को मिला, उन्होंने अपने पति ब्रेयान के साथ मिलकर अपना वाइन गीत गाया। पुरस्कार में वाइन ही मिली। अब हमारे लौटने का वक़्त हो चला था। लौटते वक़्त मैंने सीप से बने कुछ आभूषण खरीदे। यहाँ आभूषण पानी से सस्ते हैं। लौटने की यात्रा में सभी शांत थे, वाइन के नशे में होंगे, खाना भी भर पेट…. अब बोल कैसे फूटते….

शाम को सत्र का बेहद लुभावना कार्यक्रम था। पुल पर कविता (Poetry on the Bridge) नदी और पुल के संगम के ऊपर लोहे का एक पुल था, जिस पर लोहे के पाइप डालकर एक ऐसा मंच बनाया था, जो रोशनी से दिपदिपा रहा था, और उससे कई प्रपात नदी में झर रहे थे। नदी में नौका स्कूल के बच्चे पाल वाली नौकाओं से अठखेलियाँ कर रहे थे। पाल पर “कविता संध्या” का चिह्न अंकित था। नदी के किनारे लोग पानी में पैर डालकर कविता सुन रहे थे, बच्चे खेल रहे थे। हज़ारों की संख्या में लोग उपस्थित थे, जैसे मेला लगा हो।
बुल्गारिया के राष्ट्रपति विशेष रूप से उपस्थित थे, उनके देश के कवि को सम्मान जो मिला था। मंच पर अंतर्राष्ट्रीय कवि थे, जिन्होंने ओपनिंग में भाग नहीं लिया था। मुझे लगा अच्छा हुआ जो मैंने ओपनिंग में कविता पढ़ ली, नहीं तो इस अद्भुत नज़ारे का लाभ नहीं उठा पाती। नीली रोशनियाँ, नीले झरने, खिलंदड़ी नौकाएँ और गहगमाते लोग। यह ज़रूर था कि कविता पर लोगों का ध्यान कम था, लेकिन यह भी सच था कि यहाँ कविता को जो ग्लैमर दिया गया वह अभूतपूर्व था।
काव्यसंध्या के उपरान्त वाइन पार्टी है, बुल्गारिया के राष्ट्रपति की ओर से। लोग विदा ले रहे हैं या फिर सम्बन्ध गाढ़ कर रहे हैं, कौन जानता है। रेजोटा के अंकल आकर मुझसे बात करना चाहते हैं, लेकिन भाषा आड़े आती है, वे कहते हैं कि रेजोटा भारत आना चाहती है, तभी मिसोमा, अल्बेरियन कवियित्री नाचना शुरू कर देती हैं… मैं बार की छत पर आती हूँ, झील बह रही है… शांत…. निस्तब्ध… मैं उसे अपने भीतर भर लेना चाहती हूँ…
23 अगस्त 2010
आज Poetry on the Road का दिन है। सभी विदेशी कवियों को छोटे-छोटे समूहों में अलग-अलग शहरों में भेजा जा रहा है। मेरे समूह में मेरी मित्र ओदिवे के साथ हनान भी हैं, हम लोगों को दो जिप्सी गाड़ियों में भरकर गेवगेलिया के लिए रवाना कर दिया गया। यह नगरी पुरा एतहासिक शहर Pajonia और Gortinia (Vardarski Rid) को समेटे हुए ग्रीक देश के पड़ोस में स्थित है। काफ़ी लम्बा रास्ता है स्त्रुगा से गेवगेलिया तक। बेहद आरामदायक सड़क, लेकिन बहुत कम आबादी, मीलों तक ख़ाली ज़मीन या फिर खेत, इक्के-दुक्के गाँव, वे भी भारतीय मुहल्लों से बड़े नहीं।
ओदिवे कहती हैं, -“अरे यह तो काफ़ी कुछ नार्वे जैसा है!” तीन-चार घंटों का रास्ता पार करते ही हम लोग एक पेट्रोल पम्प तक पहुँचते हैं, तभी चीन का मस्तमौला कवि बी लिंग हमें अंजीर का पेड़ दिखाता है। हम लोग बच्चों जैसे खिलखिलाते हुए अंजीर तोड़कर फल खाने लगते हैं, तभी ताज़ी अंजीर बेचने वाला आता है, और हमें पूरी पेटी अंजीर पाँच यूरो में बेचना चाहता है। स्वीडन की Boal खरीद लेती हैं।
हम फिर चल पड़ते हैं, लेकिन यह क्या, पुलिस हमारा रास्ता क्यों रोक रही है? अरे यह क्या, कुछ लोग भीतर चले आये, ओह, ये डायरेक्टर हैं गेवगेलिया पोइट्री फ़ेस्टिवल की, जो दुभाषिये के साथ हमारा स्वागत कर रही हैं। हमें फूल देकर स्वागत किया जाता है और पाँच सितारा होटल FlaminGo Hotel की ओर ले जाया जाता है। गाड़ी से उतरते ही हम चमत्कृत रह जाते हैं… एक बाँसुरी वादक पारम्परिक वेषभूषा में बाँसुरी बजा रहा है, एक युवक बड़े-से थाल में अंजीर का मुरब्बा लिये खड़ा है और एक गुड़िया-सी ख़ूबसूरत लड़की थाल में रोटी, पानी और नमक लिये है। हमें बताया जाता है के पहले हमें रोटी का टुकड़ा तोड़ना है, उसे पानी में डुबोना है, फिर नमक छुलाकर खाना है। इसके बाद हम अंजीर के मुरब्बे से मुँह मीठा कर सकते हैं।
मुझे नमकहरामी का मतलब समझ में आ रहा है, पहले नमक चखो। फिर मीठा, जिससे पीठ पर छुरी तो नहीं मार सकें। हम तो सबको मीठा खिला देते हैं, नमक की बात भूल ही जाते हैं…. परिणाम…. सदियों से धोखा खाते रहे हैं। कितना साम्य है हममें और इनमें, हमारी प्राचीनता ही नहीं संस्कृति भी हमें जोड़ती है… हमें बीस मिनट का वक़्त दिया जाता है कि हाथ-मुँह धोकर आएँ, मेयर से मिलने जाना है।
मैं तुरन्त भारतीय वेषभूषा वाली मुद्रा में आ जाती हूँ। यहाँ अंग्रेज़ी की एक प्राध्यापिका हमारी दुभाषिया हैं। वह हमें ग्रीक और मेसिडोनिया के सम्बन्धों के बारे में बताती हैं। कहती हैं लोगों में अभी भाईचारा है, पर राजनीतिज्ञ प्रेम पनपने नहीं देते। वह बताती है उसका मित्र ग्रीकवासी है और लोग एक-दूसरे देश में खुले से आते-जाते हैं। मेयर से मिलने पर हमें फिर वाइन की बोतल उपहार में मिलती है। हम लोग फोटो खिंचवाकर वाइन फ़ैक्टरी की ओर चल पड़ते हैं… आसपास के कई गाँवों के अंगूर यहाँ वाइन बनने आते हैं।
लौटकर हम खाना खाते हैं तो चार बज जाते हैं, मेरी तबीयत ठीक नहीं है, लेकिन सब्ज़ियों की शक्ल देख रही हूँ, काफ़ी कुछ पहचाना-सा लगता है। ये सब कुछ तो माँ भी बनाती रही थीं, कीमे भरी शिमला मिर्चे, कबाब, शाही मुर्ग़ आदि…. हाँ उनके नाम अलग हैं। मैं तबीयत से फल लेती हूँ और आराम से खाती हूँ, वाह क्या फल हैं…
खाने के बाद कुछ लोग आराम करने चले गये, लेकिन हम कुछ पुरा ऐतिहासिक शहर Pajonia और Gortinia (Vardarski Rid) देखने चलते हैं। यहाँ पुरातत्त्वज्ञाता अलेक्ज़ेंडर हमें इस पुराने शहर का इतिहास बताता है। यह सिकन्दर का आरामगाह रहा होगा, और यहाँ पर उसके साथियों का, ये जगह बाज़ार रही होगी, यहाँ से सिक्के मिले हैं। बेहद क़ीमती चीज़ें मिली हैं यहाँ से… जो म्यूज़ियम में रखी हैं। म्यूज़ियम बन्द है, नहीं तो वह दिखाता। कम्युनिस्टों के प्रभाव में इस पुरात्त्व स्थान से छेड़छाड़ की गयी थी। विजय स्तंभ खड़े किये गये और कई ऐसे चिह्न, जिन्हें साम्यवाद का घोषणा पत्र माना जा सकता है। आज फिर सरकार ध्यान दे रही है और पुरातत्त्व को महत्त्व मिल रहा है।
अलेक्ज़ेंडर नीली आँखों वाला युवक है, जो क़ब्र की खुदाई में माहिर है। हम उससे सिकन्दर की क़ब्र के बारे में पूछते हैं तो बताता है कि सिकन्दर कहाँ मरा, किसी को ज्ञात नहीं। ऐसा भी माना जाता है कि उसे दफ़नाया नहीं जलाया गया था। भारतीय दर्शन का उस पर काफ़ी प्रभाव था। वह बताता है ग्रीक देश का कहना है कि सिकन्दर उनका है, जबकि सिकन्दर के पिता मैसिडोनिया यानी कि स्कोप्जे के आस-पास के थे लेकिन माँ ग्रीकवासी थी।
वह बताता है फ़िलहाल ग्रीक के पास पुरातन मैसिडोनिया का काफ़ी बड़ा भाग है, जो उसे मैसिडोनिया से तुर्क के ख़िलाफ़ लड़ाई में सहायता करने के एवज़ एक हज़ार साल की लीज़ में दिया गया था, यह लीज़ दो-तीन वर्षों में ख़त्म होने वाली है, संभवतः इसीलिए ग्रीस इस तरह के अड़ंगे लगा रहा है। सिकन्दर के दो हज़ार साल बाद भी उसके लिए लड़ाई चल रही है, युद्ध का बीज नश्वर नहीं होता।
हम लौटे तो मैंने ध्यान से देखा कि ये पाँच सितारा होटल बेहद विशाल कैसीनो भी है, हज़ारों की संख्या में कैसीनो लगे हैं, ऊपर से नीचे तक। मुझे बेहद आश्चर्य हुआ, इतने सारे लोग कहाँ से आते होंगे, मुझे तो कोई बस्ती दिखाई तक नहीं दी।
हमें रात को आठ बजे तैयार होने को कहा गया है। मैं अपनी इकलौती साड़ी पहनकर नीचे आती हूँ तो देखती हूँ कि सारा का सारा होटल हज़ारों की संख्या में लोगों से भरा है। बाप रे! मैं घबरा जाती हूँ तो रिसेप्शन पर बैठी लड़की मुझे अंडरग्राउंड हॉल में जाने को कहती है। नीचे पहुँचकर मैं दंग रह जाती हूँ, बेहद ख़ूबसूरत हाल, फूलों से सजा हुआ, मैसिडोनिया की ख़ूबसूरत लड़कियाँ, हॉल खचाखच भरा हुआ है, और ज़्यादातर छात्र हैं। कुछ छात्राएँ हमारी कविता के अनुवाद पर क़रीब दो सप्ताह से रिहर्सल कर रही हैं। वाह! क्या ख़ूबसूरती है यहाँ।
अब पता चला कि चन्द्रगुप्त मौर्य ने क्यों सिल्यूकस की बेटी से शादी की.. इस बीच कुछ गड़बड़ी भी होने लगी, स्वीडन के बौल, हनान आदि ज़िद करते हैं कि उन्हें एक से ज़्यादा कविताएँ पढ़नी हैं। आयोजकों का अपना विचार है, वे इसके लिए तैयार नहीं होते, बात खिंचने लगती है। कार्यक्रम शुरू होता है, यहाँ पुनः सांस्कृतिक मंत्री उपस्थित हैं, लगता है कि मैसिडोनिया की महिलाएँ राजनीति में सजग हैं। कार्यक्रम बड़ा सधा, मंत्रमुग्ध करने वाला। मैसिडोनिया पारम्परिक संगीत, इसके बाद तीन देशों के तीन कवियों की कविताएँ अनुवादकों के साथ, हर कवि के साथ पार्श्व में बाँसुरी वादन, पुनः संगीत, पुनः तीन कवि… इस तरह नौ विदेशी कवि, अन्त में दो मैसिडोनिया गायक, ऐसे लगा कि फ़िल्म की रील चल रही हो, पूरा कार्यक्रम बिना टेक के, बिना रुकावट के ख़ूबसूरती से ख़त्म हो गया। अन्त में हम सब को सर्टिफ़िकेट दिये गये… फिर फोटो सेशन।
काफ़ी देर बाद हमें एक बैरा भोजन कक्ष में ले जाने आया। दरअसल उस वक्त होटल में हजारों की संख्या में कैसीनो खेलने वाले लोग थे, उनमें अधिकतर महिलाएँ थीं, जो खेलती और खाती जा रही थीं। इस भीड़ में जगह बनाना हमारे लिए मुश्किल होता, यदि हमारे साथ बैरा नहीं होता। मैंने पूछा ये लोग कहाँ से आये तो पता चला कि अधिकतर लोग ग्रीस से आये हैं। ग्रीस में जुआ खेलना क़ानूनी अपराध है, तो लोग यहाँ चले आते हैं। वाह क्या बदला है, पड़ोसी की रक़म भी आ गयी गाँठ में, और अपनी धाक भी जम गयी, क्या ऐसा प्रयोग भारत-पाक बार्डर पर शुरू कर दें?
रात का खाना… पूरा शाही दस्तरख़ान, वाइन पर वाइन, शैम्पेन, रोज़ वाइन और फिर एक के बाद एक लज़ीज़ व्यंजन परोसे जाना। नॉर्वे की ओदिवे और उसके पति ब्रेयान को छोड़ कर सभी के हाथ रुके थे। नॉर्वे ठंडा प्रदेश है, शायद इसलिए उन्हें इतनी वाइन हज़म करने की आदत होगी। ब्रेयान को मैं बताती हूँ किस तरह ये सारे व्यंजन भारतीय दस्तरख़ान के भी हैं, तो वे कहते हैं ज़रूर, भोजन की यात्रा पर अधिक नहीं लिखा गया है, यह भी कम रोचक विषय नहीं है।
मैं सोचती हूँ सिल्यूकस की बेटी दासियों के साथ आयी होगी तो साथ में व्यंजन भी लायी होगी! भोजन इतना कि हम उसे देख कर हँस रहे हैं, वाइन इतनी कि सब भीग रहे हैं, कैसीनो अभी भी ठसाठस है… कल हमें स्कोप्ये जाना है, जहाँ हमारी कविता यात्रा का आख़िरी पड़ाव है, लेकिन हम कुछ लोग उसमें भाग नहीं ले सकते, क्योंकि हमारी उड़ानें कुछ जल्दी हैं। दूसरे दिन पुरातत्त्वशात्री अलेक़्जेंडर कुछ पेम्फ्लेट लेकर आता है, मुझसे कहता है मैं भारत आना चाहता हूँ…. ज़रूर ज़रूर…. सिकन्दर की ज़मीन को सलाम…. मैं विएना के लिए अपनी यात्रा शुरू करती हूँ..

रति सक्सेना
लेखक, कवि, अनुवादक, संपादक और वैदिक स्कॉलर के रूप में रति सक्सेना ख्याति अर्जित कर चुकी हैं। व्याख्याता और प्राध्यापक रह चुकीं रति सक्सेना कृत कविताओं, आलोचना/शोध, यात्रा वृत्तांत, अनुवाद, संस्मरण आदि पर आधारित दर्जनों पुस्तकें और शोध पत्र प्रकाशित हैं। अनेक देशों की अनेक यात्राएं, अंतरराष्ट्रीय कविता आंदोलनों में शिरकत और कई महत्वपूर्ण पुरस्कार/सम्मान आपके नाम हैं।
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