
- August 14, 2026
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ख़बरनामा:200... इस साप्ताहिक शृंखला के लेख हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्षों के इतिहास की प्रवृत्तियों, सीमाओं, उपलब्धियों और अंतर्विरोधों को समझने का प्रयास हैं। इन लेखों को इन्हें लिखने वाले पत्रकार की ओर से स्वीपिंग स्टेटमेंट या सार्वभौम सत्य नहीं बल्कि दीर्घकालिक और प्रमुख प्रवृत्तियों की पहचान के रूप में देखा जाये। असहमति और सहभागी आलोचना का स्वागत...
अजय शर्मा की कलम से....
हिंदी पत्रकारिता का भारत-बोध
कोई भी पत्रकारिता केवल घटनाओं की सूचना पाठकों तक नहीं पहुँचाती। वह पाठकों तक एक भूगोल और उसकी समझ लेकर जाती है। पाठकों की चेतना में वही भूगोल उनकी चिंताओं, आकांक्षाओं और संवेदनाओं का संदर्भ बिंदु बनता है। जिस समाज को पत्रकार लगातार बताते-दिखाते हैं, वही समाज पाठक के मन में ‘देश’ का प्रतिनिधि बनता है और जिसे वे लगातार अनुपस्थित रखते हैं, वह धीरे-धीरे उनकी चेतना से कूच कर जाता है।
हिंदी पत्रकारिता के दो सौ में से बीस बरस से कुछ ज़्यादा काम करते हुए बार-बार लगा कि हिंदी पत्रकार का भारत-बोध कितना सीमित रहा है। वह बहुत बार दिल्ली से भारत को देखता है, उत्तर प्रदेश-बिहार से भारत को समझता है और नौ उत्तरी राज्यों के अनुभवों के आधार पर पूरे भारत और उसके इतिहास-भूगोल-अर्थ-धर्म की व्याख्या करता है।
क्या सचमुच हिंदी पत्रकारिता ने हिंदी-भाषी समाज को भारत से परिचित कराया है या उसने दिल्ली और हिंदी पट्टी को ही भारत माना है? मुझे लगता है कि 200वें बरस में तो यह पड़ताल करना बनता है।
कलकत्ता से आगरा के तक के हिंदी अख़बार
1826 से 19वीं सदी के आख़िर तक हिंदी पत्रकारिता का भूगोल बहुत सीमित था। इसमें कलकत्ता, बनारस, इलाहाबाद, आगरा और कुछ बड़े ब्रिटिश प्रशासनिक केंद्र थे। इन इलाक़ों के धार्मिक और सामाजिक सुधार, साहित्यिक गतिविधियाँ और औपनिवेशिक शासन इन अख़बारों की चिंताओं और दिलचस्पी के विषय थे।

और हिंदी पत्रकारिता में भारत भौगोलिक नहीं, सांस्कृतिक सीमाओं में निहित था। उसकी कल्पना में ऐसी सभ्यता थी, जो मूल रूप से उत्तर भारतीय अनुभवों पर आधारित थी। पश्चिम से राष्ट्र का विचार आ चुका था, पर उस राष्ट्र की भूगोल चेतना नहीं थी।
राष्ट्रवादी पत्रकारों का ‘कल्पित भारत’
19वीं सदी के आख़िरी बरसों में हिंदी प्रोजेक्ट ने आकार लिया। भारतेंदु हरिश्चंद्र, राजा शिवप्रसाद सितारेहिंद और आर्यसमाज के संस्थापक दयानंद सरस्वती की बदौलत हिंदी धीरे-धीरे परवान चढ़ी। 20वीं सदी की शुरूआत में गांधी आये और कांग्रेस के आंदोलन ने हिंदी क्षेत्र में विस्तार लिया, हिंदी पत्रकारिता पहली बार अखिल भारतीय चेतना से रूबरू हुई। अगर 1850 के बाद के हिंदी अख़बार देखें तो लगता है कि अभी यह भौगोलिक चेतना धुँधली ही थी।
दोआबी पत्रकार
भारत राष्ट्र की कल्पना शुरू हो चुकी थी, पर हिंदी पत्रकारिता का असल सामाजिक भूगोल गंगा-जमुना के दोआब से बहुत दूर नहीं था। इसकी वजह भी साफ़ थी। हिंदी के ज़्यादातर बड़े संपादक, पत्रकार और विचारक उत्तर से थे। तब के सबसे असरदार नामों में भारतेंदु हरिश्चंद्र का पूरा बौद्धिक जीवन बनारस में बीता। उनके समय के पंडित बालकृष्ण भट्ट प्रयाग, प्रताप नारायण मिश्र उन्नाव, बद्रीनारायण चौधरी मिर्ज़ापुर, राधाचरण गोस्वामी वृंदावन, बालमुकुंद गुप्त रोहतक, अंबिकादत्त व्यास जयपुर, बाबूराव विष्णु पराड़कर वाराणसी, माधवराव सप्रे दमोह, श्यामसुंदर दास वाराणसी से थे। फिर महावीर प्रसाद द्विवेदी का जन्म रायबरेली में हुआ, जिन्होंने सरस्वती पत्रिका से हिंदी का संसार रचा। इसके अलावा जनपक्षधर पत्रकार गणेश शंकर विद्यार्थी का जीवन इलाहाबाद और कानपुर के बीच बीता और प्रताप के ज़रिये उन्होंने किसान, मज़दूर और स्वतंत्रता आंदोलन की आवाज़ को हिंदी में जगह दी।
इसके बाद 1900 से 1947 के बीच के प्रमुख हिंदी पत्रकारों और संपादकों का सामाजिक भूगोल रहा, काशी (बनारस), इलाहाबाद (प्रयाग), कानपुर, लखनऊ, आगरा, झाँसी, रायबरेली, पटना और कलकत्ता। इसी दौर में जन्मे सच्चिदानंद हीरानंद वात्स्यायन ‘अज्ञेय’ कुशीनगर से, रामवृक्ष बेनीपुरी मुज़फ़्फ़रपुर और शिवपूजन सहाय बक्सर से थे।
आज़ादी के बाद दिल्लीकरण
1947 के बाद हिंदी पत्रकारिता को पहली बार देश भर की रिपोर्टिंग का मौक़ा मिला। मगर हिंदी पत्र-पत्रिकाओं के ब्यूरो दिल्ली, संयुक्त प्रांत, मध्य प्रांत, राजपूताना जैसे इलाक़े छोड़कर दक्षिण, पश्चिम या उत्तर पूर्व की ओर नहीं गये। राजधानी दिल्ली उत्तर में ही थी, तो उन्होंने आगे जाना मुनासिब नहीं समझा। उनके लिए भारत का मतलब था, संसद, केंद्र सरकार, कांग्रेस, योजना आयोग, प्रधानमंत्री और राष्ट्रीय नीतियाँ। राजधानी होने और कुछ प्रमुख अख़बारों के दफ़्तर होने के बावजूद दिल्ली हिंदी पत्रकारों का गढ़ नहीं थी, जिस तरह अंग्रेज़ी थी।
1990 में उदारीकरण के आस-पास हिंदी पत्रकारिता ने दिल्ली में जड़ें जमानी शुरू कीं। फिर उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान या मध्य प्रदेश से अपेक्षाकृत बड़ी तादाद में पत्रकार राजधानी में पत्रकारिता का सपना लिए पहुँचने लगे। अब हिंदी पत्रकारिता का भूगोल दो परतों में सिमटकर आया; मूल सामाजिक अनुभव हिंदी पट्टी का, पेशेवर अनुभव दिल्ली का। उनके लिए भारत का अर्थ बना, दिल्ली+हिंदी भाषी राज्य। बाक़ी भारत थोड़ा-बहुत समाचारों में उतरा, पर चेतना में नहीं।
उत्तर प्रदेश, बिहार, राजस्थान और मध्य प्रदेश के अलावा किसी और राज्य की चर्चा हुई भी तो किसी राजनीतिक संकट, भाषा विवाद या प्रशासनिक टकराव के कारण। इसी समय में हिंदी पत्रकारिता ने भारत देश को राजधानी दिल्ली में स्थापित केंद्र सरकार के चश्मे से देखना सीखा और इसे संस्थागत (इंस्टीट्यूशनलाइज़) कर दिया।
1990 के बाद हिंदी पत्रकारिता के जो बड़े नाम रहे हैं, उनका सामाजिक भूगोल भी देख लेते हैं। धर्मवीर भारती प्रयागराज से, मनोहर श्याम जोशी अजमेर से, रघुवीर सहाय लखनऊ से थे। अज्ञेय उत्तर प्रदेश से दिल्ली आये, राजेंद्र माथुर मध्य प्रदेश के मालवा इलाक़े (धार) से, राजेंद्र अवस्थी जबलपुर से, प्रभाष जोशी मध्य प्रदेश के सिहोर से, राहुल देव मध्य प्रदेश से, वेद प्रताप वैदिक मध्य प्रदेश से, विद्यानिवास मिश्र गोरखपुर से, आलोक मेहता बिहार से आये, ओम थानवी राजस्थान के फलोदी (जोधपुर) से, पुण्य प्रसून वाजपेयी ग्वालियर से, रवीश कुमार मोतिहारी से, उर्मिलेश उत्तर प्रदेश से, अजीत अंजुम बेगूसराय से दिल्ली पहुँचे। उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल से मंगलेश डबराल, वीरेन डंगवाल, हरिश्चंद्र चंदोला और राजीव लोचन साह नैनीताल आदि। ज़्यादातर हिंदी के पत्रकार उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश, उत्तराखंड और राजस्थान से दिल्ली आये।
हिंदी पत्रकारिता का ‘दक्षिण’
दक्षिण भारत हिंदी पत्रकारिता में समाज, संस्कृति, अर्थव्यवस्था जैसी चीज़ों के बतौर नहीं, घटनाओं की तरह प्रवेश करता है।
हिंदी अख़बारों में मद्रास (तमिलनाडु) पहली बार बड़े पैमाने पर 1965 के हिंदी विरोधी आंदोलन के दौरान दिखता है। फिर द्रविड़ आंदोलन, सी.एन. अन्नादुरै, एम. करुणानिधि, एम.जी. रामचंद्रन और जयललिता के कारण वह ख़बरों में रहा। मगर इन वजहों से भी तमिलनाडु की निरंतर मौजूदगी नहीं थी। 1990 के दशक में तमिलनाडु को श्रीलंका में चल रहे लिट्टे के संघर्ष और राजीव गांधी की हत्या से जगह मिलनी शुरू हुई। अधिकतर कवरेज ‘पराये’ की तरह थी। हिंदी पत्रकारिता ने तमिल राजनीति को लोकप्रियता और सतही चश्मे से तो देखा, मगर तमिल समाज को नहीं।
हिंदी पत्रकारिता में एन.टी. रामाराव और तेलुगु देशम आंदोलन के कारण आंध्र प्रदेश को जगह मिली। बाद के दशकों में हैदराबाद में आईटी उद्योग और तेलंगाना आंदोलन ने इसे हिंदी में अपनी जगह दिलायी।
हिंदी में कर्नाटक लंबे समय तक तक़रीबन अदृश्य था। उसे जगह मिली कावेरी जल विवाद, बंगलोर में आईटी उद्योग और स्टार्टअप संस्कृति के कारण। यहाँ भी कर्नाटक का समाज, साहित्य, इतिहास और सांस्कृतिक जनजीवन हिंदी पत्रकारिता के लिए अनजान ही रहे।
हिंदी में केरल की मौजूदगी लंबे समय से वामपंथी राजनीति, खाड़ी देशों में लोगों का प्रवासन, साक्षरता दर, सबरीमला विवाद जैसी वजहों से रही है। घरेलू पर्यटन का थोड़ा हिस्सा छोड़ दें तो केरल का रोज़मर्रा का सामाजिक जीवन हिंदी पत्रकारिता में अनुपस्थित है।
फ़िल्मों और खिलाड़ियों में मिला भारत
विडंबना यह है कि दक्षिण और उत्तर-पूर्व के कई राज्यों को हिंदी पाठकों ने पहली बार पत्रकारिता से नहीं, खिलाड़ियों और फ़िल्मों के ज़रिये जाना। पी.टी. उषा के ज़रिये केरल, विश्वनाथन आनंद के माध्यम से तमिलनाडु, मेरी कॉम के ज़रिये मणिपुर और हिमा दास के माध्यम से असम पहली बार व्यापक हिंदी पाठक वर्ग की चेतना में घुसे।
फ़िल्मों सितारों पर ध्यान रहा, जैसे रजनीकांत, कमल हासन, चिरंजीवी, नागार्जुन, प्रभास या अल्लू अर्जुन को तो हिंदी पत्रकारिता ने जाना, तमिल, तेलुगु या मलयाली समाज को नहीं।
पश्चिम भारत का अधूरा चित्र
पश्चिम भारत में महाराष्ट्र को थोड़ी बहुत जगह मिली है, पर हिंदी जगत में गुजरात की सबसे बड़ी स्मृति तीन घटनाओं के कारण दिखती है, 2001 का भूकंप, 2002 के दंगे और नरेंद्र मोदी।
हिंदी पत्रकारिता ने समूचे महाराष्ट्र सूबे को मुंबई में समेट दिया है, जो काफ़ी हद तक आज तक दिखता है। महाराष्ट्र का अर्थ बना फ़िल्म उद्योग, शिवसेना, अंडरवर्ल्ड, 1993 के बम धमाके, 26/11 हमला। विदर्भ, मराठवाड़ा, कोंकण या पश्चिमी महाराष्ट्र शायद ही कभी हिंदी विमर्श का हिस्सा बने।
गोवा का अर्थ लंबे समय तक केवल पर्यटन, समुद्र तट और विदेशी पर्यटक रहा है। इसमें समाज नहीं, केवल दृश्य हैं।
आतंकवाद का उत्तर!
हिंदी पट्टी को अक्सर भूलवश उत्तर भारत भी कह दिया जाता है, लेकिन हिंदी पत्रकारिता ने उत्तर भारत के दो प्रमुख राज्यों जम्मू व कश्मीर और पंजाब को कितना समझा-समझाया? यह पड़ताल भी ज़रूरी हो जाती है। धारा 370 की वजह से कश्मीर की चर्चा होने से पहले भी और अब भी कश्मीर को हिंदी पत्रकारिता आतंकवाद की शब्दावली से ही व्याख्या देती रही है। पूरा न भी हो तो बड़ा सच यही है कि कश्मीर को पर्यटन के नक़्शे पर भी हिंदी पट्टी ठीक से खोज नहीं सकी। और न ही जम्मू के बारे में जानकार बन सकी।

इसी तरह, पंजाब भी हिंदी पत्रकारिता में आपेरशन ब्लूस्टार, 1984 में इंदिरा गांधी की हत्या और सिख दंगों के साथ ही उग्रवाद या ख़ालिस्तान जैसे शब्दों से दोहराया जाता रहा। पंजाब में हिंदी अख़बार पहुंचे, लेकिन हिंदी-भाषी समाज तक पूरा पंजाब एक समाज की तरह लगभग नदारद रहा। यह प्रश्न भी अकारण नहीं उठता कि हिंदी पत्रकारिता में कश्मीरी या सिख समुदाय से कितने पत्रकारों की गिनती की जा सकती है?
हिंसा ने खोजा उत्तर-पूर्व
हिंदी पत्रकारिता के भूगोल का सबसे बड़ा ब्लैक होल है उत्तर-पूर्व, जो भारत के मानचित्र पर तो 1947 से ही बैठा है, पर हिंदी के सामाजिक भूगोल से अनुपस्थित रहा है। प्रश्न यह नहीं है कि उत्तर-पूर्व को जगह कम मिली। सवाल यह पूछा जाना चाहिए कि हिंदी पत्रकारिता को उसके अस्तित्व का पता कब चला। जवाब है, जब-जब वहाँ हिंसा हुई…
नागालैंड नगा विद्रोह के कारण, मिज़ोरम मिज़ो विद्रोह के कारण, असम बोडो आंदोलन और 1983 के नेल्ली नरसंहार के कारण, मणिपुर उग्रवाद, AFSPA और इरोम शर्मिला के कारण, अरुणाचल प्रदेश चीन सीमा विवाद के कारण, त्रिपुरा उग्रवाद के कारण हिंदी पत्रकारिता के नक़्शे पर उभरे और फिर ग़ायब भी हो गये। मेघालय अभी तक अदृश्य है, शायद इसलिए कि वहाँ कोई बड़ी हिंसात्मक गतिविधि नहीं रही है।
कुल-मिलाकर उत्तर पूर्व की कवरेज के चार विषय प्रमुख रहे हैं, आतंकवाद, अलगाववाद, सेना, सीमा विवाद। जो मुद्दे कभी कवर नहीं किये गये वहाँ का साहित्य, शिक्षा, संस्कृति, अर्थव्यवस्था, खेल, रोज़मर्रा का जीवन।
भूला-बिसरा द्वीपीय भारत
दो सौ वर्षों की हिंदी पत्रकारिता में अंडमान-निकोबार और लक्षद्वीप लगभग ग़ायब रहे हैं। अंडमान की थोड़ी-बहुत चर्चा काला पानी के बतौर सेल्युलर जेल की कुख्याति की वजह से होती रही है। जिसमें बाद में 2004 की सुनामी और जुड़ गयी। लक्षद्वीप का उल्लेख कभी-कभार हुए प्रशासनिक विवादों या सामरिक महत्व के संदर्भ में हुआ। इन द्वीपों पर रहने वाले कौन हैं, क्या है उनका समाज और संस्कृति, भाषा और जीवन, इस पर दो सौ साल बाद भी गंभीर हिंदी रिपोर्टिंग मिलना दुर्लभ है।
उदारीकरण से उपजा भूगोल
1991 के आर्थिक उदारीकरण ने हिंदी पत्रकारिता के इस भूगोल को पहला विस्तार दिया। पहली बार चेन्नई, हैदराबाद, बंगलोर और पुणे ख़बरों में आने शुरू हुए।
हिंदी में उदारीकरण के साथ एक अर्थ-बोध भी उपजा। पहली बार उसे देश के उन हिस्सों की ओर देखना पड़ा, जहाँ पूँजी, उद्योग और नयी अर्थव्यवस्था आकार ले रही थी। 1998 में भारत के सॉफ़्टवेयर निर्यात का बड़ा हिस्सा कर्नाटक से आने लगा था। बाद में 2000 और 2010 के दशकों में भारत के आईटी निर्यात में बंगलुरु की हिस्सेदारी लगभग एक-तिहाई तक पहुँच गयी। 1990 के दशक के अंत में और विशेषकर एन. चंद्रबाबू नायडू के दौर में हैदराबाद को “साइबराबाद” की तरह तैयार किया गया। चेन्नई भारत की ऑटोमोबाइल राजधानी के रूप में उभरने लगा।
1991 से पहले अधिकांश हिंदी अख़बारों में आर्थिक ख़बरें सीमित थीं बजट, महँगाई, खाद्यान्न, सरकारी योजनाएँ। इसके आगे की आर्थिक दुनिया लगभग साफ़ थी। 1990 के बाद नये शब्द हिंदी पत्रकारिता की शब्दावली का हिस्सा बने जैसे निजीकरण, विनिवेश, विदेशी निवेश, शेयर बाजार, सेंसेक्स, जीडीपी, वैश्वीकरण, आउटसोर्सिंग आदि। 1990 और 2000 के दशक में हिंदी पत्र-पत्रिकाओं और टीवी ने अंग्रेज़ी के मुक़ाबले कहीं तेज़ी से पाठक तक पहुँच बनायी। नये पाठक को नौकरी, उद्योग, उपभोक्ता बाज़ार और करियर की जानकारी चाहिए थी। इस माँग ने आर्थिक पत्रकारिता को विस्तार दिया।
यह नया भारत-बोध भी मूल रूप से आर्थिक ही था। हिंदी पत्रकारिता ने इन शहरों को बाज़ार के रूप में देखा, समाज की तरह नहीं। और शायद इसकी बड़ी वजह यह थी कि वहाँ उसका पाठक नहीं था।
अनुपस्थित भूगोल
दो सौ साल पर नज़र डालें तो एक सवाल उठने लगता है कि क्या हिंदी पत्रकारिता का भारत वास्तव में विस्तारित हिंदी पट्टी ही रहा है?
1950 से 2026 के बीच हिंदी पत्रकारिता के कितने बड़े-छोटे संपादक तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, नागालैंड, गुजरात, महाराष्ट्र, कश्मीर, उड़ीसा, अंडमान-निकोबार आदि से आये हैं? जवाब होगा लगभग शून्य। उत्तर पूर्व, दक्षिण, पश्चिम भारत में हिंदी मीडिया के कितने ब्यूरो मौजूद हैं? जवाब होगा लगभग शून्य। अगर यह समावेशीकरण और संवाद नहीं है, तो हिंदी पत्रकारिता का भारत-बोध कैसे पूरा माना जा सकता है? संख्या बल को छोड़ दें तो कैसे हिंदी भारत की सबसे बड़ी भाषा की दावेदारी कर सकती है? उसे इस देश भारत की तरह पत्रकारों की विविधता, भाषाई समाज बोध, उनके भिन्न सामाजिक भूगोलों और उनके लिए अपने भीतर स्थान से भी पढ़ना-समझना चाहिए।
हिंदी पत्रकारिता के अधिकांश बड़े-मँझले-छोटे नाम उत्तर भारतीय हैं। उनकी कर्मभूमि भी उत्तर भारत के हिंदीभाषी राज्य ही हैं। और यह कोई दोष नहीं है। मगर समस्या तब पैदा होती है, जब हिंदी पत्रकारिता दिल्ली को राष्ट्र का केंद्र, उत्तर प्रदेश-बिहार-मध्य प्रदेश को उसका मानक अनुभव और पूरी हिंदी पट्टी को भारत की स्वाभाविक सांस्कृतिक इकाई की तरह देखती है।

इसलिए सवाल उठता है, अगर उसने दक्षिण भारत को केवल चुनावों और हिंदी फ़िल्मों में पहचाना हो, उत्तर-पूर्व को केवल उग्रवाद और सैन्य कार्रवाई के ज़रिये जाना हो, केरल को केवल वामपंथ और साक्षरता के माध्यम से समझा हो, महाराष्ट्र को केवल मुंबईया फ़िल्म उद्योग के चश्मे से देखा हो और अंडमान और लक्षद्वीप को कभी देखा ही न हो… क्या कोई पत्रकार या लेखक अखिल भारतीय समझ की दावेदारी कर सकता है?

अजय शर्मा
पत्रकारिता में दो दशक से अधिक का अनुभव। इतिहास विषयक एवं अछूते विषयों को लेकर शोध की ओर गहरा रुजहान रखने वाले अजय इन दिनों स्वतंत्र रूप से लेखन एवं शोध कर रहे हैं। शोध आधारित आपकी कुछ पुस्तकें प्रकाशनाधीन हैं।
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