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नियमित ब्लॉग डॉ. संजीव जैन की कलम से....

जब पुस्तकें ताबूत बन जाती हैं

              किसी-किसी रात अचानक यह ख़याल आता है – हमने इतना कुछ लिख डाला, इतना कुछ बचा लिया, फिर भी न जाने क्यों लगता है कि हाथ से कुछ फिसल गया। भविष्य का कोई इंसान शायद हमारे इस दौर को देखकर हैरान रह जाएगा। सोचेगा – यह वह समय था जब आदमी ने ज्ञान का सबसे बड़ा ढेर इकट्ठा किया, पर जीना सबसे कम आया उसे। सूचना बिजली की रफ़्तार से दौड़ रही थी, और उसी रफ़्तार में चेतना जैसे कहीं ठहर गयी, जड़ हो गयी। हमने हर चीज़ रिकॉर्ड कर ली – हर बात, हर अनुभव, हर घटना – बस अनुभव करने की तमीज़ कहीं छूट गयी।

हमने यादों को बचाने के लिए बड़े-बड़े सर्वर बना डाले। इतिहास को महफ़ूज़ रखने के लिए डिजिटल संग्रहालय खड़े कर दिये। विचारों को सुरक्षित करने के लिए पुस्तकालयों के अंबार लगा दिये। और इसी हड़बड़ी में यह भूल बैठे कि ज़िन्दगी का काम जमा होना नहीं, घटना है – घटित होते रहना है।

असल विडम्बना यह नहीं कि हम भूल जाते हैं। विडम्बना यह है कि हम स्मृति को ही जीवन समझ बैठते हैं।

आजकल तो हाल यह है कि ज़िन्दगी से ज़्यादा उसका रिकॉर्ड क़ीमती लगने लगा है। यात्रा तब तक अधूरी लगती है जब तक तस्वीरें सेफ़ न हो जाएँ। अनुभव तब तक सच नहीं लगता जब तक शब्दों में उतार न लें। और विचार की तो क़ीमत ही तब है जब वो किसी किताब, लेख या डिजिटल मंच पर छप जाये। धीरे-धीरे ऐसा हुआ कि ज़िन्दगी पीछे रह गयी, उसका काग़ज़ी सबूत आगे निकल गया।

बस यहीं से लेखन का असली संकट शुरू होता है।

मैं अक्सर सोचता हूँ — लेखन आख़िर है क्या अपने मूल में? क्या यह ज़िन्दगी को पकड़ने की कोशिश है? क्या समय को रोकने की कोई तरक़ीब? या स्मृति का ही फैला हुआ रूप? या फिर इससे भी कहीं गहरे किसी जगह से इसका जन्म होता है?

बहुत दिनों तक हम मानते रहे कि लेखन अनुभव को बचाने का ज़रिया है। पर यह समझ अधूरी निकली। क्योंकि जो सचमुच जीवित है, उसे बचाया नहीं जा सकता — उसे सिर्फ़ जिया जा सकता है। फूल को सहेज सकते हो, उसकी ख़ुशबू को नहीं। पंछी को पिंजरे में रख सकते हो, उसके आकाश को नहीं। नदी के पानी को बाँध में रोक सकते हो, उसकी यात्रा को नहीं। ठीक वैसे ही शब्दों में अनुभव का ढाँचा भर सकते हैं, अनुभव ख़ुद नहीं।

और यहीं से एक बुनियादी फ़र्क़ सामने आता है — जीवन और लेखन के बीच का। जीवन हमेशा अभी में घटता है। लेखन हमेशा किसी बीते हुए का इशारा भर होता है। जब मैं किसी पेड़ को देख रहा होता हूँ, तो देखना ख़ुद एक ज़िंदा घटना है। पर जैसे ही मैं उसे लिख देता हूँ, वो घटना स्मृति में बदल जाती है। लेखन उस जिये हुए पल का अवशेष है, वो पल ख़ुद नहीं।

शब्द असल में सच्चाई नहीं होते। वे बस उस सच्चाई की ओर इशारा करने वाली उँगलियाँ भर हैं। पर हमारी एक पुरानी आदत है— उँगली को ही चाँद समझ बैठना। इशारे को ही सच मान लेना। नक़्शे को ही धरती समझ लेना। सिद्धांत को ही ज़िन्दगी मान लेना। और यहीं से शब्द धीरे-धीरे जीते-जागते अनुभवों पर क़ब्ज़ा जमाने लगते हैं।

असल में तहज़ीबों का पूरा इतिहास इसी क़ब्ज़े की कहानी है। हर बड़ी अनुभूति पहले अनुभव के रूप में जन्म लेती है। फिर उसे भाषा मिलती है। फिर वो विचार बनती है, सिद्धांत बनती है, संस्था बनती है, परंपरा बनती है — और आख़िर में वही जीता-जागता अनुभव मुर्दा ढाँचे में बदल जाता है।

बुद्ध का अनुभव जीवित था, पर बौद्ध धर्म का बड़ा हिस्सा स्मृति बन गया।

महावीर का साक्षात्कार जीवित था, पर उसके इर्द-गिर्द जो ढाँचा बना, वो अनुभव से ज़्यादा व्यवस्था में तब्दील हो गया।

यह हर दौर में होता आया है। जीवन तब तक ज़िंदा है जब तक वो अनुभव है। जैसे ही वो सिर्फ़ दस्तावेज़ बनता है, उसमें जड़ता घुसने लगती है।

बस यहीं से समझ आता है कि किताब और ताबूत का रिश्ता क्या है। ताबूत का काम किसी मरी हुई चीज़ को महफ़ूज़ रखना है — गति को नहीं, बस अवशेष को बचाना उसका मक़सद है। जब लेखन सिर्फ़ बचाने का साधन बन जाता है, तो वो भी कुछ-कुछ ताबूत जैसा ही काम करने लगता है। तब किताबें जीती-जागती चेतना का विस्तार नहीं रह जातीं, वे विचारों की समाधियाँ बन जाती हैं— उनमें अनुभव का शरीर तो होता है, आत्मा नहीं होती।

शायद आने वाली भाषा इस फ़र्क़ को हमसे बेहतर समझ पाये।

आज हम ज्ञान को संग्रह कहते हैं, शायद कल कोई उसे प्रवाह कहे।

आज किताब को हम ज्ञान का घर मानते हैं, शायद कल कोई उसे बस एक अस्थायी पड़ाव समझे।

आज हम सच को किसी जमे हुए वाक्य में ढूँढते हैं, शायद कल कोई उसे लगातार बदलती हुई प्रक्रिया के तौर पर देखे…

क्योंकि यह ब्रह्मांड ख़ुद तो किसी दस्तावेज़ की तरह नहीं चलता। आकाश किसी सिद्धांत के हिसाब से नहीं फैलता। नदी किसी किताब के निर्देश पर नहीं बहती। पेड़ किसी दर्शनशास्त्र को पढ़कर बड़ा नहीं होता। ज़िन्दगी अपने भीतर से ही चलती है।

लेखन का असली संकट तब पैदा होता है, जब वो ज़िन्दगी की जगह लेने लगता है। आज दुनिया में हर रोज़ अरबों शब्द लिखे जा रहे हैं, लाखों किताबें छप रही हैं, कृत्रिम बुद्धिमत्ता बेशुमार लेख गढ़ रही है, डिजिटल स्मृति लगभग अनंत होती जा रही है। पर एक सवाल पहले से कहीं ज़्यादा ज़रूरी हो गया है —

क्या शब्दों का बढ़ना ज़िन्दगी का भी बढ़ना है?

जवाब आसान नहीं। क्योंकि सूचना और चेतना एक चीज़ नहीं। ज्ञान और जागरण एक चीज़ नहीं। स्मृति और समझ एक चीज़ नहीं। कोई हज़ारों किताबों का ज्ञान रखते हुए भी ख़ुद को न जान पाये, यह मुमकिन है। कोई इतिहास की हर तारीख़ याद रखे और फिर भी अपने वर्तमान से ग़ायब रहे, यह भी मुमकिन है। कोई दर्शनशास्त्र का माहिर हो और फिर भी ज़िन्दगी के प्रति बेख़बर बना रहे — यह भी हो सकता है।

तो शायद लेखन की भूमिका को नये सिरे से देखना पड़ेगा। लेखन का काम जानकारी देना नहीं होना चाहिए — यह काम मशीनें हमसे बेहतर कर लेंगी। लेखन का काम विचारों को दोहराना भी नहीं — एल्गोरिद्म यह भी ज़्यादा कुशलता से कर लेते हैं। लेखन का असली काम चेतना को जगाना है। मनुष्य को उसके सीधे अनुभव की तरफ़ वापस मोड़ना है।

आने वाला बड़ा लेखक वो नहीं होगा जिसके पास सबसे ज़्यादा जानकारी है। वो होगा जो लोगों को फिर से देखना सिखा दे। क्योंकि देखने की कला ही तो खोती जा रही है। हम पढ़ते बहुत हैं, देखते कम। विश्लेषण बहुत करते हैं, अनुभव कम। व्याख्या बहुत करते हैं, साक्षात्कार कम।

लेखन तभी ज़िंदा रह पाएगा जब वो व्याख्या से ज़्यादा उपस्थिति को अहमियत दे। निष्कर्षों से ज़्यादा सवालों को। विचारधाराओं से ज़्यादा चेतना को।

शायद आने वाला लेखन सीधी लकीर की तरह नहीं, नदी की तरह होगा — तयशुदा जवाब देने की बजाय संभावनाएँ खोलेगा, पाठक को तैयार निष्कर्ष थमाने की बजाय उसे ख़ुद देखने के लिए बुलाएगा। सच्चा लेखन कभी पाठक को अपने भीतर क़ैद नहीं करता, बल्कि उसे उसके भीतर से आज़ाद करता है।

अगर कोई किताब पढ़कर इंसान ज़्यादा आज़ाद हो जाये, तो समझो वो किताब ज़िंदा है।

अगर वही किताब पढ़कर वो ज़्यादा कट्टर हो जाये, तो समझो वो ताबूत बन चुकी है।

जो विचार देखने की ताक़त दे, वो जीवित है। जो विचार वही ताक़त छीन ले, वो मर चुका है।

ज़िन्दगी की सबसे ख़ास बात यही है कि वो अधूरी रहती है, हर पल बदलती रहती है, किसी आख़िरी नतीजे को मानती ही नहीं। इसीलिए ज़िंदा चेतना हमेशा खुली रहती है, जबकि मुर्दा चेतना निश्चितताओं में क़ैद हो जाती है।

आज इंसानियत का असली संकट सूचना की कमी नहीं, निश्चितताओं की भरमार है। हर किसी के पास जवाब है, पर देखने की विनम्रता नहीं। हर किसी के पास विचार है, पर अनुभव की ताज़गी नहीं। हर किसी के पास सिद्धांत है, पर आश्चर्य नहीं। और जहाँ आश्चर्य ख़त्म होता है, वहीं ज़िन्दगी धीरे-धीरे काग़ज़ में बदलने लगती है।

शायद आने वाली भाषा आश्चर्य की भाषा हो। ज्ञान से ज़्यादा जिज्ञासा की। निष्कर्ष से ज़्यादा खोज की। उसमें शब्द मंज़िल नहीं, दरवाज़े होंगे। किताबें ठिकाना नहीं, यात्राएँ होंगी। लेखन कोई जमी हुई चीज़ नहीं, बल्कि चेतना और भाषा के बीच लगातार घटती रहने वाली एक घटना होगा। तब लेखक ख़ुद को सच का मालिक नहीं समझेगा, बस एक हमसफ़र होगा।

वो यह नहीं कहेगा — “यही सच है।” वो कहेगा — “मैंने यहाँ तक देखा है, अब तुम आगे देखो।”

यही शायद लेखन का भविष्य है।

और शायद यही उसका सबसे पुराना रूप भी रहा होगा। जब कोई ऋषि बोलता था, कोई कवि गाता था, कोई संत बात करता था — तो उसका मक़सद ज्ञान जमा करना नहीं होता था। वो चेतना में एक हलचल पैदा करना चाहता था। ज़िन्दगी को जगाना चाहता था। इंसान को उसी के पास लौटाना चाहता था।

लेखन की असली कामयाबी यह नहीं कि उसकी किताबें सदियों टिकी रहें। असली कामयाबी तो तब है जब उसकी ज़रूरत ही ख़त्म हो जाये, और इंसान सीधे ज़िन्दगी से बात करने लगे — जैसे दीये का मक़सद ख़ुद जलते रहना नहीं, बस सूरज निकलने तक साथ देना होता है। वैसे ही लेखन का मक़सद ख़ुद को स्थापित करना नहीं, बस ज़िन्दगी की तरफ़ इशारा करना है।

और जब लेखन यह भूल जाता है, तभी किताबें ताबूत बनने लगती हैं — ज़िन्दगी को बचाने के भ्रम में उसकी धड़कन को ही क़ैद कर बैठती हैं। पर जब लेखन विनम्र रहता है, ख़ुद को आख़िरी सच नहीं मानता, शब्दों को दीवार नहीं पुल बनाता है — तब किताबें ताबूत नहीं बनतीं। तब वे ज़िंदा चेतना के बीज बन जाती हैं। और बीज कभी ताबूत नहीं होते, वे तो हमेशा भविष्य की संभावना होते हैं।

शायद आने वाले वक़्त का सबसे बड़ा सवाल यह नहीं होगा कि हमने कितना लिखा। सवाल यह होगा कि हमने कितना जिया। क्योंकि आख़िर में ज़िन्दगी को किताब में नहीं रखा जा सकता, उसे सिर्फ़ जिया जा सकता है।

जो लेखन हमें दोबारा जीना सिखा दे — बस वही ज़िंदा लेखन है, वही आने वाले कल का लेखन है, वही इंसान की अगली चेतना की शुरूआत है।

संजीव कुमार जैन

संजीव कुमार जैन

लंबे समय से साहित्य के स्वाध्याय एवं अध्यापन से जुड़े संजीव शासकीय महाविद्यालय, गुलाबगंज में हिंदी के सह प्राध्यापक हैं। आपकी अभिरुचि पढ़ना लिखना है लेकिन अधिक प्रकाशन से आप गुरेज़ करते हैं।

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