पुरस्कार, पुलिस वेरिफिकेशन, cartoon, mukesh aseemit
हास्य-व्यंग्य डॉ. मुकेश असीमित की कलम से....

पुरस्कार का पुलिस वेरिफिकेशन

             जिस प्रकार आजकल पुरस्कार के पुरुषत्व पर चिंतन चल रहा है, मुझे लगने लगा है नारी-विमर्श के बाद अब साहित्य में पुरस्कार-विमर्श की भी एक स्वतंत्र धारा बहने वाली है।

वैसे मैंने तो पहले ही कह दिया था— पुरस्कार ही क्यों? यहाँ स्त्रीकार क्यों नहीं? पितृसत्ता तो नाम में ही साफ़ दिखायी दे रही है। ख़ैर, फ़िलहाल साहित्य को इससे बड़ी चिंताएँ घेरे हुए हैं।

पुरस्कार लेखक के लिए अब एक प्रकार का बायो-फ़्यूल है, रीन्यूएबल एनर्जी सोर्स। साहित्य में पहले संवेदनाएँ मुख्य ईंधन हुआ करती थीं। अब वे फ़ॉसिल फ़्यूल की तरह धीरे-धीरे अवशेष बनती जा रही हैं, इसलिए साहित्य-सृजन का नया ईंधन पुरस्कार हो गया है।

लेकिन जिस तरह पेट्रोल में एथेनॉल की मिलावट पर प्रश्न उठते हैं, उसी तरह साहित्य में संवेदना के ईंधन में पुरस्कार की मिलावट पर सवाल उठने लगे हैं। प्रश्न रचना पर उठें, ऐसा भी नहीं। प्रश्न अब देने वाले की नीयत, पुरस्कार की प्रोडक्शन पॉलिसी और उसकी पूरी मेकिंग प्रोसेस पर उठ रहे हैं।

समीक्षा अब रचनाओं की कम, लेखक की ज़्यादा हो रही है, और लेखक से भी आगे बढ़कर पुरस्कारदाता और पुरस्कारग्राही दोनों की।

ज़ाहिर है, मैं भी सोच रहा हूँ कि मुझे कितनी मशक्कत करनी पड़ेगी। पुरस्कार तो ले लूँगा, लेकिन उससे पहले यह जाँचना ज़रूरी होगा कि संस्था किसकी है? पैसा कहाँ से आया? संस्थापक किसे जानते हैं? संस्थापक का बेटा किसे जानता है? बेटे पर क्या आरोप हैं? और आरोप लगाने वाला किस विचारधारा का है?

रचनाएँ मर जाएँ तो अमर कहलाती हैं, लेकिन पुरस्कार हमेशा पोस्टमॉर्टम की दुधारी तलवार पर ही चलता है।

इसलिए मेरा विनम्र सुझाव है कि साहित्यिक पुरस्कारों से पहले पुलिस वेरिफ़िकेशन अनिवार्य कर दिया जाये।

मंच पर सम्मान देने से पहले संचालक घोषणा करे— “पुरस्कारदाता की तीन पीढ़ियों का सत्यापन हो चुका है। संस्था के अध्यक्ष के बहनोई के साले की राजनीतिक गतिविधियों की भी जाँच करा ली गयी है। फ़िलहाल कोई ऐसी सामग्री नहीं मिली है, जिससे कवि की कविता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़े।” तभी कवि मंच पर आये।

पुरस्कार, पुलिस वेरिफिकेशन, cartoon, mukesh aseemit

वरना हालत यह है कि शॉल अभी कंधे तक पहुँचा नहीं और सोशल मीडिया पुरस्कार की अंतरात्मा तक पहुँच चुका होता है।

आजकल साहित्य में मॉरल पुलिसिंग वही काम कर रही है, जो पार्कों में प्रेमियों के साथ हुआ करता था। वहाँ पूछा जाता था—

“कौन हो?”
“क्यों बैठे हो?”
“घर में बताया है?”

मैं तो सतर्क हूँ ही, आप भी सतर्क हो जाइए। कहीं आप पुरस्कार लेते पकड़े गये तो इन प्रश्नों के लिए तैयार रहें—

“पुरस्कार क्यों लिया?”
“किससे लिया?”
“उसकी पृष्ठभूमि जानते हो?”
“अब लौटाओगे कब?”

जी हाँ, अब तो आपसे शायद यह अपेक्षा भी है कि पुरस्कार लिया ही इसलिए जाये कि उचित समय आने पर लौटाया जा सके।

अब देखिए, पुरस्कार की सबसे बड़ी समस्या यह नहीं कि वह किसे मिला। असली समस्या यह है कि वह मुझे नहीं मिला।

इस सच को स्वीकार करने की ईमानदारी साहित्य में अभी दुर्लभ है।

हाल के एक पुरस्कार समारोह में कुछ लोग पुरस्कार-ग्रहण गतिविधि में पकड़े गये। उनसे पूछा गया— “यार, आप वहाँ क्यों गये? यह नैतिक नहीं है।”

उन्होंने कहा— “हम तो देखने गये थे कि यह अनैतिक काम आख़िर हो कैसे रहा है।”

फिर वही शाश्वत वाक्य आया— “सवाल पैसे का नहीं है।”

जी, बिल्कुल।

सवाल पैसे का तभी नहीं होता जब पैसे किसी और को मिले हों। इक्कीस लाख जैसी रक़म सुनते ही मेरे भीतर का साहित्यकार भी थोड़ा बेचैन हो गया है। अब तक वह पाठक चाहता था, अब संस्था चाहता है।

पत्नी ने पूछा—“तुम्हारी साहित्य-साधना अचानक इतनी तेज़ कैसे हो गयी?”

मैंने कहा—“समय बदल रहा है।”

फिर मैं चुप हो गया।

गृहस्थ जीवन साहित्यिक आलोचना से कहीं अधिक तीक्ष्ण होता है।

वैसे पुरस्कार जितना बड़ा हो, अंतरात्मा उतनी धीरे जागती है।

पाँच हज़ार का पुरस्कार मिले तो आदमी उसी शाम पूछ सकता है— “संस्था की विचारधारा क्या है?”

राशि इक्कीस लाख हो तो शोध में समय लगता है।

गहरा आत्ममंथन प्रायः चेक क्लियरिंग पीरियड से लंबा नहीं चलता। और यदि बाद में कोई समस्या निकल आये तो साहित्य के पास महान अस्त्र है— पुरस्कार वापसी।

साहित्य ने पुरस्कार को ऐसी अद्भुत वस्तु बना दिया है, जिसे लेने पर भी प्रसिद्धि मिलती है और लौटाने पर भी।

मुझे लगता है संस्थाओं को अब सम्मान के साथ रिटर्न पॉलिसी भी देनी चाहिए।

बॉक्स पर लिखा हो—

“सात वर्ष तक नैतिक असंतोष की स्थिति में पुरस्कार वापस किया जा सकता है।” शॉल नॉन-रीफ़ंडेबल है। माला बायोडीग्रेडेबल है, उसका हिसाब नहीं होगा। और स्मृति-चिह्न लौटाते समय ओरिजिनल पैकिंग आवश्यक हो।

और चेक?

चेक का मामला जटिल है। नैतिकता प्रायः स्मृति-चिह्न लौटा देती है, बैंक बैलेंस पर आते-आते उसकी साँस फूलने लगती है।

हम जैसे साहित्यकारों की समस्या और गंभीर है। लोग पूछते हैं— “आप पुरस्कार वापसी के बारे में क्या सोचते हैं?”

मैं कहता हूँ— “भाई, अभी प्राप्ति विभाग ने ही फ़ाइल आगे नहीं बढ़ायी है। वापसी के बारे में मामला फ़िलहाल विचाराधीन है।”

पहले पुरस्कार आने दीजिए। नैतिकता, विचारधारा, संस्था, पृष्ठभूमि— सबकी जाँच बाद में कर लेंगे। लेकिन पहले पुरस्कार।

इसीलिए आजकल जब किसी साहित्यिक सम्मान पर लंबी बहस देखता हूँ तो विवाद में नहीं पड़ता। बस धीरे से अपना पता लिखकर रख देता हूँ। कहीं संस्था परेशान होकर कह दे—

“भाई, ये लोग बहुत सवाल पूछ रहे हैं। किसी ऐसे लेखक को दे दो जो चुपचाप ले जाये।”

तो हम उपलब्ध हैं। नैतिकता को क़तई ताक़ पर रखकर।

डॉ. मुकेश असीमित, dr mukesh aseemit

डॉ. मुकेश असीमित

हास्य-व्यंग्य, लेख, संस्मरण, कविता आदि विधाओं में लेखन। हिंदी और अंग्रेज़ी में लिखे व्यंग्यों के संग्रह प्रकाशित। कुछ साझा संकलनों में रचनाएं शामिल। देश-विदेश के प्रतिष्ठित दैनिक, साप्ताहिक, मासिक, पाक्षिक, त्रैमासिक पत्र-पत्रिकाओं एवं साहित्यिक मंचों पर नियमित प्रकाशन।

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

error: Content is protected !!