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ख़बरनामा:200... इस शृंखला के लेख हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्षों के इतिहास की प्रवृत्तियों, सीमाओं, उपलब्धियों और अंतर्विरोधों को समझने का प्रयास हैं। इन लेखों को इन्हें लिखने वाले पत्रकार की ओर से स्वीपिंग स्टेटमेंट या सार्वभौम सत्य नहीं बल्कि दीर्घकालिक और प्रमुख प्रवृत्तियों की पहचान के रूप में देखा जाये। असहमति और सहभागी आलोचना का स्वागत।
अजय शर्मा की कलम से....

संपादक का अंत: जुगलकिशोर से एल्गोरिद्म तक

            हिंदी पत्रकारिता के दो सौ साल के इतिहास का जश्न मनाना आसान है, मनाइए, पर कुछ मुश्किल सवाल भी पूछिए। ऐसा एक सवालिया निशान है, उसका संपादक।

पिछला लेख पढ़ें: हिंदी पत्रकारिता का इतिहास बोध

कभी संपादक हिंदी अख़बार का सबसे मुखर चेहरा था। वह केवल ख़बरें ही नहीं चुनता था। वह भाषा का निर्णायक, सत्ता का आलोचक, देश-दुनिया का व्याख्याकार और कई बार अपने समय का पब्लिक इंटेलेक्चुअल था। उसकी इतनी हैसियत थी कि वह पाठकों को समझाए कि किसी घटना का अर्थ क्या है।

आज इस नाम के बहुत-से पद हैं, अख़बारों में उप से लेकर प्रधान तक, टीवी चैनलों में एडिटर इन चीफ़ और मैनेजिंग एडिटर, डिजिटल में एडिटोरियल हेड और ढेरों न्यूज़ एडिटर्स, पर वह ख़ुद कहाँ है, जिसके पास ख़बरों के तेवर और चरित्र तय करने की सार्वजनिक ज़िम्मेदारी थी। इन 200 सालों का सिंहावलोकन करें तो पता चलता है वह तीन मौतें मर चुका है। मगर यह सिर्फ़ पतन की दास्तां नहीं है। हमें संपादक का अंत समझने के लिए पहले देखना होगा कि वह पैदा कैसे हुआ था।

हिंदी संपादक की पहली सदी

भारत में पत्रकारिता अंग्रेज़ी में शुरू हुई, पर जल्द ही भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता ने अपना सार्वजनिक संसार खड़ा करना शुरू कर दिया था। अंग्रेज़ी के पास पहले ही कमो-बेश एक शहरी पाठक, प्रशासनिक और औपनिवेशिक सूचना संसार और अंग्रेज़ी के विशाल ज्ञान संसाधन थे। छापाख़ाना भारत में 16वीं सदी में आया, पर 18वीं सदी के आख़िर तक बांग्ला, फ़ारसी और दूसरी भाषाओं में पत्र निकलने लगे। हिंदी में उदंत मार्तंड (1826) सिर्फ़ एक अख़बार की शुरूआत नहीं थी। हिंदी के पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों को पाठक भी बनाने थे, भाषा भी खड़ी करनी थी। इसीलिए हिंदी का शुरूआती संपादक आधुनिक अर्थ में सिर्फ़ पत्रकार नहीं था। वह एक साथ लेखक, अनुवादक, शिक्षक, सार्वजनिक मामलों पर बोलने वाला व्यक्ति और सुधारक, सभी एक साथ था। यानी हिंदी में संपादक की संस्था शुरू से व्यक्ति में थी।

यह कहना आसान है कि अंग्रेज़ी पत्रकारिता ज़्यादा पेशेवर थी और भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता कम। पर यह निष्कर्ष ऐतिहासिक परिस्थितियों को छिपाता है। अंग्रेज़ी प्रेस को एक औपनिवेशिक सत्ता का वरदहस्त हासिल था। वह उसी के केंद्रों में पली-बढ़ी। फिर टेलीग्राफ़, समाचार एजेंसियों और अंतर्राष्ट्रीय समाचार प्रवाह ने अंग्रेज़ी पत्रकारिता को एक ऐसी व्यवस्था से जोड़ा, जिसमें समाचार इकट्ठा करना एक अलग पेशेवर कौशल बनने लगा।

माइकल मान ने 1880 से 1930 के बीच भारतीय स्वामित्व वाले सात अंग्रेज़ी अख़बारों का अध्ययन करके दिखाया है कि टेलीग्राफ़िक समाचार ने अख़बारों के ले-आउट, फ़ॉर्मेट और सामग्री को गहराई से बदला। इसी के साथ समाचार उत्पादन और लेखन की पद्धति भी बदली और पत्रकार का पेशा नयी तरह से सामने आया। हिंदी में यह बदलाव बाद में आया। इसलिए दोनों के बीच शुरूआती फ़र्क को यूँ समझना ज़्यादा सही होगा, कि अंग्रेज़ी पत्रकारिता जल्दी-जल्दी न्यूज़ प्रोडक्शन सिस्टम बन रही थी, उधर हिंदी पत्रकारिता पहले पब्लिक स्फ़ियर और भाषाई-सांस्कृतिक प्रोजेक्ट खड़ा कर रही थी। इसका अर्थ यह नहीं कि हिंदी संपादक कम पेशेवर था। उसकी प्रोफ़ेशनल कॉम्पिटेंस अलग क़िस्म की थी। उसका पहला सवाल था कि वह आधुनिक भारत की कल्पना किस भाषा में करे?

राममोहन राय से द्विवेदी तक समाज निर्माण

राजा राममोहन राय कम-से-कम पाँच पत्र-पत्रिकाओं से जुड़े थे। आधुनिक भारतीय पत्रकारिता उन्हें ऐसे बहुभाषी सार्वजनिक बुद्धिजीवी के बतौर देखती है, जो प्रिंट को समाज सुधार, धार्मिक बहस और राजनीतिक प्रतिरोध के माध्यम में बदल रहा था। इसके समानांतर हिंदी में संपादक का चरित्र थोड़ा अलग ढंग से बना।

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भारतेंदु हरिश्चंद्र के समय से हिंदी पत्रकारिता में भाषा, समाज और राष्ट्र की त्रयी बनती दिखती है। महावीर प्रसाद द्विवेदी के हाथों यह बाक़ायदा संपादकीय प्रोजेक्ट बना। सरस्वती के संपादक के बतौर द्विवेदी क़रीब दो दशक तक (1903-1920) आधुनिक हिंदी साहित्य और भाषा के मध्यस्थ बने रहे। सुजाता एस. मोदी ने उन्हें आधुनिक हिंदी साहित्यिक प्राधिकरण के निर्माण का केंद्रीय व्यक्तित्व माना है। द्विवेदी के समय का संपादक केवल यह नहीं पूछता था कि लेख अच्छा है या नहीं। वह पूछता था, भाषा कैसी हो, लेखक को क्या लिखना चाहिए, समाज को कैसे शिक्षित किया जाये, आधुनिक हिंदी क्या है, कौन-सा साहित्य समाज के लिए उपयोगी है।

इसी जगह हिंदी संपादक की वह ताक़त पैदा हुई, जो आगे चलकर उसकी कमज़ोरी बनी। यानी हिंदी संपादक के पास भाषा को मानक बनाने के साथ यह तय करने की ताक़त भी आ गयी कि कौन-सी भाषा वैध है, कौन-सी नहीं। द्विवेदी ने खड़ी बोली को मानक हिंदी बनाने पर ज़ोर दिया और भाषा के दूसरे रूपों के प्रति उनका रुख़ कठोर था। इसी दौरान हिंदी को राष्ट्रीय भाषा के रूप में स्थापित करने का सांस्कृतिक प्रोजेक्ट भी चल रहा था।

हिंदी का संपादक आधुनिकता तो ला रहा था, पर मानकीकरण के ज़रिये विविधता को सीमित कर रहा था। वह यह भी तय करने की कोशिश में था कि “सही” भाषा क्या है। यही वजह है कि हिंदी संपादक की संस्था को केवल उसकी बौद्धिक क्षमता से नहीं उसके पीछे मौजूद राजनीतिक-सामाजिक सत्ता से भी देखा जाना चाहिए।

किस समाज का संपादक?

इलाहाबाद और भारतीय प्रेस पर संजुक्ता पोद्दार का अध्ययन यहाँ अहम है। वह दिखाती हैं 1890–1920 के दौरान इलाहाबाद एक समृद्ध और बहुभाषी प्रिंट संस्कृति का केंद्र था, जहाँ हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी और बंगाली जैसी भाषाओं में पत्र-पत्रिकाएँ और किताबें छप रही थीं। सरस्वती, बंगाली प्रबासी, अंग्रेज़ी मॉडर्न रिव्यू और उर्दू अदीब जैसे पत्र एक ही प्रकाशन संसार का हिस्सा थे। मगर इन पत्रिकाओं के संपादकीय विचारों में भाषा, पहचान और राष्ट्र की अलग-अलग कल्पनाएँ थीं। सरस्वती और मॉडर्न रिव्यू जैसी पत्रिकाओं ने हिंदी को राष्ट्रीय भाषा और एक व्यापक हिंदू सांस्कृतिक दृष्टि से जोड़ा, जबकि अदीब ने बहुभाषिक सह-अस्तित्व की ज़्यादा कॉस्मोपॉलिटन कल्पना पेश की।

यह तथ्य हिंदी संपादक की दुनियावी सोच-समझ को पकड़ने में अहम है। हिंदी का संपादक सिर्फ़ पत्रकार नहीं था। वह एक सांस्कृतिक राष्ट्र की कल्पना उकेरने में जुटा था। तो उस राष्ट्र की कल्पना में कौन शामिल था और किसकी आवाज़ केंद्रीय थी? यहीं हिंदी संपादक की सबसे बड़ी ऐतिहासिक शक्ति और सबसे बड़ी ऐतिहासिक सीमा एक-दूसरे से मिलते हैं। वह जनता की आवाज़ बनना चाहता था, पर ‘जनता’ की परिभाषा वही तय करता था। वह समाज को तो संबोधित करता था, पर समाज के भीतर अपनी जगह पर सवाल नहीं उठाता था।

हिंदी पत्रकारिता के इतिहास पर नज़र दौड़ाएँ तो उसका ज्ञान-संसार लंबे समय तक शिक्षित, शहरी, पुरुष और ऊँची जातियों के अनुभवों के असर में रहा है। इसका मतलब यह नहीं कि हर हिंदी संपादक निजी तौर पर जातिवादी था। अहम बात यह है कि जिस सामाजिक संसार को मुख्यधारा का हिंदी संपादक “सामान्य भारतीय समाज” मानता और समझता था, उसकी बनावट ही पूरी तरह से असमान थी।

पत्रकार से राजनीतिक कार्यकर्ता तक

आज़ादी के आंदोलन के दौरान हिंदी के संपादक का नज़रिया बदला। अब उसका केंद्र भाषा और समाज सुधार से आगे जाकर राष्ट्र हो गया। गणेश शंकर विद्यार्थी, बाबूराव विष्णु पराड़कर, माखनलाल चतुर्वेदी और दूसरे संपादक इसकी नुमाइंदगी करते हैं, जिनके लिए पत्रकारिता और राष्ट्रीय आंदोलन अलग-अलग क्षेत्र नहीं थे। ऑब्जेक्टिविटी यहाँ सबसे ऊँचा संपादकीय आदर्श नहीं थी। ब्रिटिश शासन के ख़िलाफ़ संघर्ष में हिंदी संपादक राजनीति के भँवर में खड़ा था।

1930 और 1940 के दशक में अंग्रेज़ी प्रेस भी स्वतंत्रता संघर्ष का केंद्र बनी रही। टीजी नारायणन जैसे पत्रकारों ने बंगाल के अकाल और दूसरे विश्वयुद्ध को रिपोर्ट किया। आधुनिक शोध उन्हें भारत के शुरूआती वॉर कॉरेस्पॉन्डेंट्स और इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्टर्स में शुमार करता है। इस समय अंग्रेज़ी और हिंदी पत्रकारिता के बीच अंतर घटता है। दोनों में संपादक अब महज़ लेखक नहीं था, बल्कि राजनीतिक पत्रकार बन गया था। मगर दोनों के पास राष्ट्र की अलग-अलग कल्पनाएँ थीं।

नैतिक पत्रकारिता का कोण

गांधी के दौर में हिंदी पत्रकारिता में एक और तत्व जुड़ा था, नैतिकता। अब यह पत्रकारिता केवल सत्ता की दबी-छिपी आलोचना नहीं कर रही थी बल्कि आत्मसंयम, सत्य, सामाजिक सुधार, अस्पृश्यता, ग्राम समाज, श्रम और सांप्रदायिक सद्भाव भी उसके विषय बने। लेकिन यहाँ एक मुश्किल थी। गांधीवादी ‘सुधार’ और आंबेडकरवादी ‘सामाजिक न्याय’ एक ही बातें नहीं थीं। और यह दुविधा 1920 से लेकर आज़ादी के बाद तक हिंदी पत्रकारिता में रही है।

मुख्यधारा में लंबे समय तक दलित अनुभव और दलित बौद्धिकता हिंदी पत्रकारिता के केंद्र में नहीं आये, जो जाति के सवाल की गंभीरता को समझने के लिए ज़रूरी था। यानी संपादक समाज सुधारक तो था, पर वह समाज के वंचित हिस्सों को पूरे समाज का हिस्सा नहीं मानता था बल्कि ख़ुद को उसके व्याख्याकार की तरह देखता था। यह फ़र्क मौजूदा पत्रकारिता को समझने के लिए भी अहम है।

दूसरी भाषाओं के संपादक

हिंदी संपादक को समझने के लिए हिंदी से बाहर दूसरी भाषाओं में जाकर देखना चाहिए। मसलन…

  • बंगाली पत्रकारिता में राममोहन राय से शुरू हुई आर्ग्यूमेंटेटिव पब्लिक कल्चर साफ़ दिखती है। यहाँ संपादक सामाजिक सुधार, धर्म, औपनिवेशिक सत्ता और आधुनिकता पर बहस शुरू कर रहा था और चला रहा था। अंग्रेज़ी और बांग्ला के बीच कॉन्टेंट की आवाजाही भी थी।
  • मराठी में तिलक का केसरी संपादक को राजनीतिक आंदोलनकारी में बदल रहा है। केसरी और मराठा दोनों ने राजनीतिक शिक्षा और औपनिवेशिक सत्ता की आलोचना को पत्रकारिता का हिस्सा बनाया। मराठी सार्वजनिक क्षेत्र में फुले और बाद में आंबेडकर की परंपरा ने दूसरे सवाल जोड़े जैसे यदि समाज में जातिगत असमानता है, तो राष्ट्र किसका है?
  • तमिल पत्रकारिता में जी सुब्रमण्य अय्यर और स्वदेसमित्रन राष्ट्रवादी पत्रकारिता के अहम उदाहरण हैं। बाद के दशकों में तमिल सार्वजनिक क्षेत्र में भाषा, जाति, ग़ैर-ब्राह्मण राजनीति और द्रविड़ आंदोलन के उभार ने पत्रकारिता के सामने राष्ट्रवाद और सामाजिक समानता के बीच रिश्तों को लेकर प्रश्न भी उठाये।
  • मलयालम में के रामकृष्ण पिल्लै और स्वदेशाभिमानी के उदाहरण बताते हैं संपादक सत्ता से सीधे जाकर टकरा सकता था। पिल्लै ने त्रावणकोर के प्रशासन और दीवान की आलोचना की। 1910 में अख़बार बंद कर उसकी प्रेस ज़ब्त कर ली गयी और उन्हें गिरफ़्तार करके निर्वासित कर दिया गया। यहाँ एक बात अहम है।

स्वदेशाभिमानी की कहानी केवल संपादक रामकृष्ण पिल्लै की नहीं है। इसके संस्थापक और मालिक वक्कम मौलवी ने उन्हें ऐसी संपादकीय आज़ादी दी थी, जो उस समय ग़ैर-मामूली चीज़ थी। तो इन भारतीय भाषाओं में संपादक की सत्ता को सामाजिक प्रश्नों ने बार-बार चुनौती दी। हिंदी में यह चुनौती इतनी देर से और इतनी सीमित क्यों दिखायी देती है?

मालिक से रिश्ता कभी आसान न था

यह मानना ग़लत है कि सौ-डेढ़ सौ साल पहले मालिक और संपादक एक-दूसरे को भाई-भाई मानते थे। भारतीय प्रेस के इतिहास में संपादक, प्रकाशक, मुद्रक और प्रॉपराइटर की भूमिकाएँ शुरू से ही एक-दूसरे में घुली-मिली थीं। फिर भी 1950 के दशक तक भारत में संपादकीय नीति पर वरिष्ठ पत्रकारों की पकड़ थी।

1956 के एक अध्ययन में वीके नरसिम्हन ने 12 प्रमुख भारतीय दैनिकों के अवलोकन के आधार पर लिखा कि संपादकीय नीति तय करने में वरिष्ठ पत्रकार आगे थे और प्रकाशक उनके मु्क़ाबले पीछे था, हालाँकि नीतियाँ बनाने के दौरान वो सलाह-मश्विरा करते थे। यानी आज़ादी के बाद के शुरूआती दशकों में संपादक बस एक रोमांटिक सत्ता नहीं थी। वह असल में सांस्थानिक सत्ता थी। बाद की कहानी इस सत्ता के धीरे-धीरे भंगुर होने की कहानी है।

हिंदी संपादक की पेशेवर दक्षता

हिंदी और अंग्रेज़ी संपादकों को उनकी तीन तरह की पेशेवर दक्षताओं में कसा जा सकता है।

  1. पहली है क्राफ़्ट प्रोफ़ेशनलिज़्म। क्या हिंदी का संपादक उस पत्रकारिता को जानता था, जो पिछली एक सदी से स्थापित है? यानी रिपोर्टिंग, सोर्सिंग, वेरिफ़िकेशन, एडिटिंग, हेडलाइन राइटिंग, न्यूज़ जजमेंट आदि। इस कसौटी पर शुरूआती दौर में अंग्रेज़ी पत्रकारिता के पास कुछ बढ़त हासिल थी।
  2. दूसरा है इंस्टीट्यूशनल प्रोफ़ेशनलिज़्म। क्या हिंदी संपादक पत्रकारिता को संस्थागत नियमों से चलाता था? क्या वहाँ संपादकीय फ़ैसले की प्रक्रिया थी, रिपोर्टर और एडिटर की भूमिकाएँ अलग थीं, फ़ैक्ट चेकिंग थी, सुधार की व्यवस्था थी, कॉन्फ्लिक्ट ऑफ़ इंटेरेस्ट के नियम थे या संपादक मालिक से संस्थागत रूप से स्वतंत्र था? इस कसौटी पर भी अंग्रेज़ी पत्रकारिता आगे रही। हिंदी संपादक देश की आज़ादी के बाद कुछ हद तक इस अंतर को कम कर पाया।
  3. तीसरा है एथिकल प्रोफ़ेशनलिज़्म। क्या संपादक सत्ता, मालिक, विज्ञापनदाता और अपने पूर्वाग्रह से स्वतंत्र होकर काम कर पाता था? यहाँ मामला पूरी तरह उलट जाता है। अंग्रेज़ी पत्रकारिता को हिंदी से ज़्यादा नैतिक श्रेष्ठता नहीं मिल सकती। अंग्रेज़ी प्रेस ब्रिटिश सत्ता से जुड़ी थी, अभिजात्य पाठक-वर्ग पर निर्भर थी, उसमें वर्गीय पूर्वाग्रह थे और वह भी 1990 के दशक के आसपास कॉर्पोरेट हितों के दबाव में आयी।

पहली मौत

आज़ादी के बाद हिंदी के राष्ट्रवादी संपादक के सामने बुनियादी संकट था। जिस सत्ता के ख़िलाफ़ वह लड़ रहा था, वह जा चुकी थी। सरकार, संविधान, संसद सब अपने थे, तो वह किसके ख़िलाफ़ खड़ा हो। उसे नये स्थापित लोकतंत्र का वॉचडॉग बनना था।

राज्य लोकतंत्र का प्रतिनिधि बन गया था और अब उसी से नागरिक स्वतंत्रता को बचाना था। मगर यह आसान नहीं था। हिंदी पत्रकारिता का बहुत छोटा हिस्सा ही ऐसा कर पाया। मसलन, रघुवीर सहाय की पत्रकारिता और बाद में दिनमान, रविवार, जनसत्ता ने संपादक को सत्ता से सवाल करने वाले नागरिक-बुद्धिजीवी में खड़ा किया। उन्होंने हिंदी पत्रकारिता में पेशेवराना सोच और अधिक सहज, पाठक केंद्रित भाषा को सामने रखा, पाठकों को पत्र लिखने और संपादकीय बहसों में हिस्सा लेने को प्रोत्साहित किया। तो क्या यह हिंदी संपादक का स्वर्णयुग था?

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पुराने संपादक यक़ीनन पढ़े-लिखे और बहुविषयी थे, पर अपने समय की सीमाओं से बँधे थे। अधिकतर शहरी या अर्ध-शहरी शिक्षित, सवर्ण पुरुष थे जो मध्यवर्ग से आते थे और संपादक की कुर्सी पर बैठकर पिता का व्यवहार करते थे। वह रिपोर्टर को प्रशिक्षित करता था लेकिन उसे यह पसंद नहीं था कि वह रिपोर्टर उससे सवाल पूछे। अधिकतर हिंदी पत्रकारिता के संस्थानों में प्रश्न पूछने की संस्कृति के बजाय निष्ठा की संस्कृति खड़ी हुई।

इस संपादक की पहचान उसकी निजी सत्ता थी। यह अथॉरिटी उसकी जाति के विशेषाधिकार से, पढ़ाई से, लेखन से, उसके परिवार से और कभी-कभी केवल पद से आती थी। कभी-कभार ही संपादक इसका इस्तेमाल रिपोर्टर या अख़बार को बेहतर बनाने में करता था। तो क्या हिंदी संपादक नार्सीसिस्ट था? इसे किसी मनोवैज्ञानिक तरीक़े से नहीं बल्कि संपादकीय संस्कृति की तरह देखा जाना चाहिए।

हिंदी संपादक से एक और अहम सवाल जुड़ा है जाति का। 19वीं और 20वीं सदी के शुरूआती हिंदी सार्वजनिक क्षेत्र को जिन संपादकों ने खड़ा किया, उनमें निर्विवाद तौर पर अधिकतर हिंदू थे, सवर्ण थे, पुरुष थे। इसलिए हिंदी पत्रकारिता में जाति रिपोर्टिंग का तो विषय रही, पर ख़ुद संपादकीय ढाँचे में नहीं दिखती। यह फ़र्क काफ़ी बड़ा है। एक अख़बार दलित अत्याचार पर ख़बर कर सकता है। मगर सवाल यह है कि क्या ख़बर दलित पत्रकार लिख रहा है? और उससे भी बड़ा सवाल कि क्या दलित अनुभव यह तय कर पा रहा है कि वह ख़बर अहम क्यों है?

सुबिन पॉल और रूथ पाल्मर ने एक गाँव में बलात्कार हत्या की घटना पर हिंदी मीडिया कवरेज का अध्ययन करते हुए पाया कि जातिवाद और पितृसत्ता की हक़ीक़त सेल्फ़-सेंसरशिप के साथ मिलकर समाचार कवरेज को दबाने में भूमिका निभा सकती हैं। उनका तर्क है कि हिंदी प्रेस की आज़ादी को केवल सरकारी सेंसरशिप के सवाल से नहीं समझ सकते। उसके लिए आपको हिंदी पत्रकारिता में सामाजिक ढाँचों, जाति और लिंग को भी देखना होगा।

इन हिंदी संपादकों में कितनी महिलाएँ थीं और कितने महिला स्वर? दिक़्क़त सिर्फ़ आंकड़ों की नहीं है। समस्या यह रही कि ख़बरों का मूल्य भी पुरुष अनुभवों ने तय किया। किस घटना को गंभीर मानना है, किस भाषा में महिला की ख़बर लिखनी है, महिला की ज़िंदगी को कितना सार्वजनिक करना है, यौन हिंसा को कैसे रिपोर्ट करना है, महिला नेता को कैसे दिखाना है, ये सारे सवाल केवल भाषा के सवाल नहीं थे।

संपादक की संस्था का लोकतांत्रिक मूल्य शायद तब पूरा होता जब न्यूज़रूम ख़ुद ऐसी जगह बनता, जहाँ जूनियर सीनियर से सवाल पूछ सके, संवाददाता संपादक को तथ्यों पर चुनौती दे सके, महिला पुरुष से असहमति जता सके, दलित पत्रकार भारी-भरकम सवर्ण न्यूज़रूम संस्कृति पर सवाल उठा सके और मालिक के बारे में भी रिपोर्टर संपादकीय स्वतंत्रता के भीतर सवाल कर सके। हिंदी मीडिया पर शोध बताते हैं कि जाति और पितृसत्ता किस तरह न्यूज़रूम की रिपोर्टिंग और सेल्फ़ सेंसरशिप से जुड़े रहे हैं। और संपादक की पहली मौत के साथ ये सारे सवाल बुरी तरह गुँथे हैं।

दूसरी मौत

1990 के दशक की शुरूआत में भारतीय मीडिया का कारोबारी चरित्र तेज़ी से बदला। आर्थिक उतार-चढ़ाव, बढ़ता उपभोक्ता बाज़ार और विज्ञापन ने समाचार संस्थानों के काम करने के तरीक़े पर काफ़ी असर डाला। सी. राममनोहर रेड्डी ने इसे पत्रकारिता के कमोडीफ़िकेशन यानी वस्तुकरण के बतौर देखा है। वह कहते हैं कि मीडिया लाभकारी कारोबार में बदलने लगा और विज्ञापनदाताओं को लुभाने की ज़रूरत ने इन मीडिया आउटलेट्स को अपने प्रोडक्ट (ख़बर या अख़बार) को ज़्यादा से ज़्यादा पाठकों और दर्शकों के लिए माल की तरह पैकेज करने को मजबूर किया।

यहीं संपादक की दूसरी मौत होती है। मालिक पहले भी था, विज्ञापन पहले भी था, कारोबार पहले भी था लेकिन अब बिज़नेस एडिटोरियल लॉजिक को परिभाषित करने लगा था। पहले सवाल होता था, क्या छपना चाहिए, अब नया सवाल जुड़ा, क्या बिकेगा। फिर आया, किसे बेच सकते हैं और आख़िर में किस ऑडिएंस को मॉनिटाइज़ किया जा सकता है। अब संपादक का पेशेवर चरित्र बदला। वह न्यूज़रूम की सर्वोच्च संपादकीय अथॉरिटी होने के बजाय मैनेजमेंट और संपादकीय के बिचौलिये में ढलने लगा। मालिक की घुसपैठ नयी नहीं थी। नया यह था कि मालिक की कारोबारी भाषा धीरे-धीरे हिंदी संपादक इंटरनलाइज़ करने लगा था।

यह कहना ग़लत होगा कि अकेले हिंदी में ऐसा हुआ। नहीं, अंग्रेज़ी और दूसरी भारतीय भाषाओं की पत्रकारिता में भी संपादक कमज़ोर हुआ। पर एक अहम फ़र्क था। अंग्रेज़ी पत्रकारिता ने न्यूज़रूम को संस्था की तरह खड़ा कर लिया था। हिंदी में संपादक की भूमिका लंबे समय तक व्यक्ति-केंद्रित रही थी। इसलिए अंग्रेज़ी में संपादक की सत्ता को मिला झटका कई बार संस्था के रिस्ट्रक्चर के रूप में देखा गया। हिंदी में वह साफ़ तौर पर व्यक्ति के अवसान की तरह दिखायी दिया। हिंदी पत्रकारिता में महान संपादक तो कई मिलेंगे, पर मज़बूत संपादकीय संस्थाएँ न के बराबर हैं।

साल 2000 के आस-पास टेलीविज़न ने पत्रकारिता की पूरी अर्थव्यवस्था उलट दी। टीवी संपादक अब अपने दर्शक का एजेंडा तय कर रहा था। अब ख़बरों की ताक़त उनकी सार्वजनिक महत्ता के साथ-साथ उसकी दृश्यता, तात्कालिकता और ड्रामे से तय होने लगी। ब्रेकिंग न्यूज़ ने ख़बरों का जजमेंट रियलटाइम कॉम्पिटीशन में बदला। एंकर ने संपादकीय सत्ता अपने हाथ में ले ली। अब संपादक न्यूज़रूम के भीतर था, एंकर स्क्रीन पर।

टीवी ने संपादकीय अधिकार को दृश्य प्रदर्शन में बदल दिया। टीआरपी ने ख़बरों के जजमेंट पर दबाव बनाया। राजनीतिक बहस नूराकुश्ती में बदलने लगी। 2019 में हिंदी टीवी के बारे में पत्रकारों की चर्चाओं में हिंदू-मुस्लिम बाइनरी और टीवी डिबेट्स के ग्लेडियटोरियल चेहरे की आलोचना दिखती है। जिस ख़बर की सार्वजनिक महत्ता ज़्यादा है, ज़रूरी नहीं कि वह स्क्रीन पर दिखेगी। बल्कि जिसे स्क्रीन पर ज़्यादा जगह मिली, वही दर्शक के लिए सबसे बड़ी ख़बर बन गयी।

तीसरी मौत

डिजिटल युग में और ज़्यादा गंभीर चीज़ हुई। संपादक बँट गया। कहानी एक थी, पर कई शक्तियां अब उसे सजाती-सँवारती हैं, रिपोर्टर, कॉपी एडिटर, एसईओ एडिटर, सोशल मीडिया एडिटर, वीडियो प्रोड्यूसर, ऑडिएंस टीम, प्रोडक्ट टीम, एनेलिटिक्स, प्लेटफ़ॉर्म और ब्रैंड या मार्केटिंग। पहले संपादक कह पाता था, “यह ख़बर ज़रूरी है, इसलिए इसे प्रमुखता दो।” अब उससे पूछा जाता है, “कितने लोग इसे पढ़ेंगे” फिर “इसका सीटीआर क्या है” और “क्या इसे गूगल में ट्रैक्शन मिलेगा।”

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पाठक की रुचि को समझने के लिए संपादक को डैशबोर्ड दिया गया है। और समस्या यह है कि जो मापा जा सकता है, वह धीरे-धीरे अहम मान लिया जाता है और जो अहम है पर कम क्लिक लाता है, वह धीरे-धीरे ग़ायब हो सकता है।

अख़बार में संपादक गेटकीपर था, टीवी में एंकर गेटकीपर और परफ़ॉर्मर बना, डिजिटल में गेटकीपिंग चली गयी। सोशल मीडिया पर पत्रकार ख़ुद ब्रैंड है। सब्सटैक, यूट्यूब, इंस्टाग्राम, एक्स, पॉडकास्ट जैसे प्लेटफ़ॉर्म्स पर पत्रकार की अपनी ऑडिएंस है।

यह उस संपादक की संस्था की तीसरी मौत है, पर सिर्फ़ नकारात्मक मायने में नहीं। क्योंकि इससे न्यूज़रूम की पुरानी ऊँच-नीच भी टूटी है। अब पत्रकार को संपादक नहीं चाहिए, वह उसकी निगरानी के बिना पाठकों तक पहुँच सकता है। मगर संपादक के रहने से जो होता था, अब नहीं होता या हो सकता, जैसे मिस-इनफ़ॉर्मेशन, फ़ैक्ट-चेकिंग, नैरेटिव कोहेरेंस, लोक हिमायती नज़रिया। अब एल्गोरिद्मिक इंसेंटिव्स, ऑडिएंस कैप्चर और पर्सनल ब्रैंड पॉलिटिक्स पत्रकार के शब्द और पंक्ति को तय करते हैं।

यह शोक-गीत नहीं

कुल मिलाकर अंग्रेज़ी के मुक़ाबले हिंदी में संपादक की मौत काफ़ी नाटकीय है। इन 200 सालों को देखें तो हिंदी संपादक का जटिल रेखाचित्र कुछ यूँ उभरता है। वह अमूमन पढ़ा-लिखा, विशेषाधिकार प्राप्त सामाजिक पृष्ठभूमि से आया हिंदू मध्यवर्गीय पुरुष था। अक्सर साहित्य से आने के कारण वह भाषाई शुद्धता को लेकर सख़्त, परंपरावादी, राष्ट्रवादी और जाति की गहरी संरचना के प्रति बेरुख़ था। वह संस्थान को परिवार के मुखिया की तरह चलाना चाहता था, उसे ख़ुद से प्रश्न पूछा जाना पसंद नहीं था और उसे कभी सीधे तो अक्सर परोक्ष रूप से चाटुकारिता पसंद थी।

माना कि हर दौर की अपनी कठिनाई और चुनौती होती है, मगर इससे हिंदी संपादक को हिस्टॉरिकल इम्यूनिटी नहीं मिल जाती। उसे उसके समय में रखकर सवाल पूछे जाने चाहिए:

  • उसने किसे स्वर दिया, किसे जनता माना?
  • किसकी भाषा को शुद्ध कहा, किसकी पीड़ा की अनदेखी की?
  • वह ख़ुद प्रश्नों से ऊपर क्यों रहा?
  • क्या वह जाति और पितृसत्ता के इन्हेरिटेड नज़रिये से मुक्त था?
  • क्या उसने लोकतंत्र का रक्षक होने के बाहरी स्वरूप के साथ अपने संस्थान के भीतर ऊँच-नीच को कट्टरता से ज़िंदा रखा?

तो संपादक का अंत वास्तव में किसका अंत है? असल में हिंदी संपादक के अंत का मतलब है अहंकारी, साहित्यिक सामंत, निरंकुश, चाटुकारितापसंद और सिर्फ़ मालिक के हितों को आगे बढ़ाने वाले किरदार का अंत।

तो क्या आज की हिंदी को वह संपादक चाहिए? नहीं। उसकी वापसी न संभव है, न वांछनीय। आज का पत्रकारिता संसार बेहद जटिल है। कई तरह के पाठक, प्लेटफ़ॉर्म, सूचना के स्रोत और माध्यम। पुराना संपादक लौटेगा नहीं।

यह लेख हिंदी संपादक का शोक-गीत नहीं है। हिंदी को नया संपादक चाहिए। अब वह ख़बर का दरवाज़ा रोककर नहीं खड़ा हो सकता। उसे तय करना होगा कि शोर में क्या अहम है, कौन-से स्वर डूबने न पाएँ, तथ्य और प्रचार में फ़र्क क्या और कितना है, किस दावे की जाँच ज़रूरी है। सत्ता से सवाल पूछना उसका दायित्व है, पर अब उसे अपने आग्रहों की भी पड़ताल करनी होगी।

अजय शर्मा, ajay sharma

अजय शर्मा

पत्रकारिता में दो दशक से अधिक का अनुभव। इतिहास विषयक एवं अछूते विषयों को लेकर शोध की ओर गहरा रुजहान रखने वाले अजय इन दिनों स्वतंत्र रूप से लेखन एवं शोध कर रहे हैं। शोध आधारित आपकी कुछ पुस्तकें प्रकाशनाधीन हैं।

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