
- May 7, 2026
- आब-ओ-हवा
- 0
गूंज बाक़ी... हिंदी लेखक और कवि सुमति अय्यर के साथ यह साक्षात्कार प्रसिद्ध लेखक/कवि अमृता प्रीतम ने लिया था। अंतरंग संबंधों पर आधारित यह बातचीत 1978 की एक पुस्तक में 'दो समानांतर लकीरों की एक लकीर सुमति अय्यर' शीर्षक से प्रकाशित हुई थी। उन्हीं यादगार पन्नों से साभार बातचीत, जो संबंधों के बीच पसरे सन्नाटों और कंपनों का दस्तावेज़ है...
सुमति अय्यर से अमृता प्रीतम की अंतरंग बातचीत
अमृता : सुमति, शुक्र है महान लोगों के देश में कोई तो साधारण आदमी जन्मा। तुम्हारी कविता के अनुसार साधारण वह है, जो हाथ में काग़ज़-क़लम पकड़े। तो दोस्त, पहले यह बताओ कि तुम साधारण कब बनीं?
सुमति : यूं तो मैं बहुत छोटी थी, जब महसूस किया कि अलग क़िस्म की हूं।

अमृता : सो अलग क़िस्म का होना ‘साधारण’ होना है-यह बढ़िया तशरीह है।
सुमति : इसी तशरीह के मुताबिक़ बताती हूं कि मैं बहुत छोटी थी, जब अपना या किसी का भी छोटा-सा दुःख देखकर रो पड़ती थी। लिखना मेरे लिए नियम नहीं है, भीतर जब बहुत कुछ भर जाता है, तो वह अक्षर बनकर बाहर आ जाता है। यह भी नहीं जानती कि यह कविता है। केवल यह जानती हूं कि यह ‘मैं’ हूं।
अमृता : मैं की पहचान कब पायी?
सुमति : शायद बहुत बाद में। एक घटना हुई, जैसे देश में अक्सर होती है और जिनसे घबराकर या उदासीन होकर कोई संन्यासी बन जाता है- मैं अपनी उस घटना से ‘मैं’ बन गयी। जो कुछ बचकाना था, वह गंभीर हो गया।
अमृता : वह घटना मैं सुन सकती हूं?
सुमति : हो, ज़रूर। 1974 की घटना है, जब मैं रमेश बक्षी से मिली थी। उनकी शख़्सियत से भी प्रभावित नहीं हुई, न उनके ‘लेखक’ से। केवल यह जाना कि वह बहुत टूट चुका आदमी है। उसे ‘कोई’ चाहिए। ‘कोई’ से मेरी मुराद है- एक औरत, जो उसकी मां भी हो सके, बहन भी और प्रेयसी भी।
अमृता : सो ‘सुमति’ से ‘कोई’ बनकर ‘मैं’ की पहचान पायी?
सुमति : हां, यही मैं हूं जो रमेश की ‘कोई’ हूं।
अमृता : पर सुमति! अब अचानक तुमने किसी से ब्याह कर लिया है, विवाह के बाद ‘कोई’ रह सकोगी?
सुमति : रह सकूंगी।
अमृता : शादी तो सोच-समझकर की होगी, पर…
सुमति : यह फ़ैसला पिछले साल किया था, फिर भी एक पल सोचती रही। इसलिए कह सकती हूं कि मैं रमेश की ‘कोई’ रह सकूंगी।
अमृता : सुमति! तुम अपनी एक कविता में ‘किसी पुस्तक का अध्ययन नहीं, केवल भूमिका बनी और भूमिका भी वह, जिसे विश्वास नहीं कि वह पुस्तक के अगले संस्करण में भी रह सकेगी।’ सो यह पुस्तक रमेश बक्षी है?
सुमति : जी हां।
अमृता : किसी और के साथ शादी का विचार इसी अविश्वास में से आया?
सुमति : नहीं। अपनी और रमेश की पहचान में से। यह जान लिया था कि अगर रमेश को प्यार करना है, तो इस प्यार को रिश्ते के नाम से बचाना होगा।
अमृता : यह शायद दो व्यक्तियों का दो समानान्तर लकीरों का रिश्ता है, जिसमें दोनों को अपनी-अपनी जगह पर रहना होता है।
सुमति : मैं अपने आपको उनके बराबर की लकीर नहीं समझती। यह भी हो सकता है कि उनके सामने मैं ख़ुद को कहीं बहुत छोटा महसूस करती हूं। यह ज़रूर जाना कि रमेश को एक दूरी पर रखकर प्यार किया जा सकता है। दोस्त हूं, इसलिए उनके पलों, क्षणों के जितने भी संबंध हैं, जितनी भी लड़कियों से दोस्ती है, वह सब देखे हैं। कोई ऐतराज़ नहीं किया। पर यह दोस्त बनकर ही हो सकता है, बीवी बनकर नहीं।
अमृता : सुमति! यह ठीक है ऐतराज नहीं किया, पर ऐतराज और तकलीफ़ में बहुत फ़र्क होता है। तुम्हें तकलीफ़ नहीं हुई?
सुमति : क्यों नहीं? झगड़ा भी किया। पर इसी झगड़े में से ‘मैं’ को समझ पायी।
अमृता : अब मद्रास में ख़ास तौर पर उनके जन्मदिन पर आना ‘मैं’ की समझ में तो शामिल है, पर क्या यह ‘वह’ के अस्तित्व में भी शामिल है? ‘वह’ जिससे ब्याह किया?
सुमति : हां। उन्होंने जिसे क़बूल किया यह उसका हिस्सा है। एक प्रकार के साथ बनाया हुआ दायरा, जिसे दूसरे दायरे की लकीरें नहीं काट सकतीं। मुझे आना ही था। एहसास था कि मेरा बच्चा है, जिसे दूर दिल्ली में छोड़ आयी हूं। उससे मिलना बहुत ज़रूरी है। हमारे रिश्ते में बहुत छोटी बातें हैं, जिनके बहुत बड़े बंधन हैं, जैसे सुबह उठकर अपने हाथों रमेश के लिए चाय लाना, उसे कहीं पीड़ा हो तो आयोडेक्स मलना, रात उसे काम्पोज़ देना। उसे ऐसे ही एक हाथ की ज़रूरत थी, जो उसे न मां से मिला, न किसी बीवी से, न प्रेयसी से।
अमृता : सुमति! तुम्हारे इस बहुत लंबे और प्यारे हाथ को, जिसने मंत्रों को साक्षी रखकर पकड़ा है, वह भी ज़रूर कोई प्यारा इंसान होगा?
सुमति : वह रमन, मेरे बचपन का दोस्त था। दोनों परिवारों में भी दोस्ती थी। जब हम दोनों जवान हुए, उसने शादी का पैग़ाम भेजा। तब तक मैं रमेश से मिल चुकी थी। ब्याह का नहीं सोचा था, तब भी यह ज़रूर सोचा था कि कुछ वर्ष उसके साथ गुज़ारूंगी। इसलिए रमन का पैग़ाम मंजूर नहीं किया। पर पता चला रमन ने कहलवा भेजा- शादी करूंगा तो सिर्फ़ उससे। सो पिछले साल मैंने उससे मिलकर अपनी मुश्किल बतायी। रमेश की बात भी उसने सब सुनी, कहा-उसका पैग़ाम अभी भी मेरे लिए है। और यह भी कहा कि शादी का यह रिश्ता रमेश वाली दोस्ती के रास्ते में रुकावट नहीं बनेगा। अब रमन ने अपने हाथों रमेश के लिए जन्मदिन का तोहफ़ा भेजा है, जो लेकर आयी हूं।
अमृता : सच, सुमति! ज़िंदगी के कितने रेशमी तार टूटने से बच सकते थे, अगर उन्हें इंसानों की कोमल उंगलियां नसीब हो जातीं! अच्छा, यह बताओ शादी के बाद कैसी नज़्में लिखीं?
सुमति : एक काव्य-संग्रह ‘मैं, तुम और जंगल’ पिछले साल छपा था। शादी के बाद कुछ नज्में ज़रूर लिखी हैं जो अभी कहीं नहीं छपीं।
अमृता : उनमें से किसी की कुछ पंक्तियां याद होंगी?
सुमति : एक नज़्म की कुछ पंक्तियां याद हैं-
जाने क्यों
हर रात हम
होश के हाशिये पर सरककर
टूटी प्लेटों के टुकड़ों से, निर्णय
लिखते हैं,
और फिर
सुबह होते ही
उन टुकड़ों को तुम चुनते हो,
अपनी उंगलियों पर उभरती
नन्ही खरोंचों से बेपरवाह।
सच कहूं,
मुझे तो वे टुकड़े सफ़ेद फूल लगते हैं
जो संबंधों की लाश पर उछाल दिये जाते हैं।
अमृता : यह कविता बहुत उदास है…
सुमति : हां, है। …
अमृता : इस उदासी को क्या कहना होगा?
सुमति : यही कि जो खोया है, वह खोया है। उससे इनकार नहीं कर सकती।
अमृता : पर जो सोच-समझकर खोया हो?
सुमति : वह अचेतन है जो चेतन मन के निर्णय की सीमा में नहीं आता।
अमृता : क्या दोनों का निर्णय एक नहीं हो सकता था?
सुमति : हो सकता था, पर नहीं हुआ। चेतन मन से निर्णय लिया था। दोनों के भले के लिए।
अमृता : इससे दोनों का भला हुआ?
सुमति : हां, कुछ हद तक हुआ। दोनों ने अपनी-अपनी गहराई को जाना है। यह और इतना पहले नहीं था।
अमृता : कल मैंने देखा था कि रमेश ने अपने तकिये के पास रखे हुए कैक्टस की एक टहनी को दो चूड़ियां पहनायी हुई थीं। शायद तुम्हारी बांह समझकर?
सुमति : हां, मेरी बांह समझकर। यही गहराई है जिसे रमेश ने जाना है।
अमृता : गहराई को जानने के लिए जो क़ीमत रमेश ने दी है या तुमने दी है, क्या वह क़ीमत बहुत ज़्यादा नहीं है?
सुमति : नहीं, यह नहीं लगता कि बहुत क़ीमत दी है। गहराई को जानना ज़रूरी था।
अमृता : सच?
सुमति : वैसे यह भी सच है कि सोचती हूं- मुझे यह शादी वाला ‘प्रयोग’ नहीं करना चाहिए था।
अमृता: फिर इस ‘प्रयोगशाला’ की ख़ुदा ख़ैर करे! यह तुमसे या रमेश से, या रमन से किसी बहुत बड़ी उदासी की क़ीमत न मांगे!
सुमति : अभी तक ऐसा कोई ख़तरा नहीं। हम तीनों बहुत ‘मैच्योर’ हैं।
अमृता : शादी के बाद रमेश के पास रहने को पहली बार आयी हो! सुमति! ये दिन कैसे लग रहे हैं?
सुमति : और कोई फ़र्क नहीं लग रहा है। पर एक फ़र्क है। पहले रमेश को छूते हुए कभी मेरा हाथ नहीं झिझका था। अब हाथ में एक झिझक है।
अमृता : ऐसी झिझक हमें हमारे संस्कारों ने दी होती है, इसलिए होती है…
सुमति : हां, विवाह की वेदी पर- मंत्रों के उच्चारणों से जिन वचनों के आगे सिर झुकाया था, उन्होंने मेरे संस्कारों का हिस्सा बनना ही था, बने हैं। रमन साथ नहीं है पर उसके लिए सच्ची हूं। यह झिझक ही जैसे रमन है। संस्कारों से इनकार कर भी लें पर इख़लाक को तो मानना होगा- अपनी ख़ातिर, अपने ‘मैं’ की ख़ातिर…
Share this:
- Share on Facebook (Opens in new window) Facebook
- Share on X (Opens in new window) X
- Share on Reddit (Opens in new window) Reddit
- Share on Pinterest (Opens in new window) Pinterest
- Share on Telegram (Opens in new window) Telegram
- Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp
- Share on Bluesky (Opens in new window) Bluesky
