“साथ, यक़ीं, वाबस्तगी, बिकने थे बेदाम/ आज़ादी जो रख दिया, बंटवारे का नाम”… 1947 में विभाजन की क़ीमत पर आज़ादी मिली। आज हम कितने आज़ाद हैं और कितने विभाजित?...
पाक्षिक ब्लॉग डॉ. संजीव जैन की कलम से…. लेखन: दस्तावेज़ीकरण नहीं, जीवन प्रवाह ध्वनि से अर्थ तक: लेखन की आंतरिक यात्रा का दसवां अध्याय… हमने जीवन को जीना कम...