
- September 19, 2026
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ख़बरनामा:200... हर शनिवार, इस शृंखला के लेख हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्षों के इतिहास की प्रवृत्तियों, सीमाओं, उपलब्धियों और अंतर्विरोधों को समझने का प्रयास हैं। इन लेखों को इन्हें लिखने वाले पत्रकार की ओर से स्वीपिंग स्टेटमेंट या सार्वभौम सत्य नहीं बल्कि दीर्घकालिक और प्रमुख प्रवृत्तियों की पहचान के रूप में देखा जाये। असहमति और सहभागी आलोचना का स्वागत।
अजय शर्मा की कलम से....
हिंदी पत्रकारिता का इतिहास-बोध
किसी भाषा की पत्रकारिता ने अपने समाज को अतीत से जोड़ने के लिए क्या तरीक़ा चुना? क्या वह तरीक़ा ऐतिहासिक प्रक्रिया की जटिलताएँ समझने का था या फिर पाठक को स्मृति, मिथक और राजनीतिक उपयोगिता के सरल पर असरदार ढाँचों में उतारने का था। हिंदी पत्रकारिता के संदर्भ में यह तनाव शुरू से दिखता है और समय के साथ यह और गहराता चला गया है।
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मिथकीय इतिहास की परंपरा
19वीं सदी के यूरोप में इतिहास एक अनुशासन और नयी विधा की तरह खड़ा हो रहा था और उसका सांस्थानीकरण हो रहा था, पर इतिहास मौजूद था। मगर 19वीं सदी की शुरूआत में जब उत्तर भारत में हिंदी पत्रकारिता आकार ले रही थी, तब हिंदी पत्र-पत्रिकाओं के लिए इतिहास कोई विषय नहीं था। उसकी जगह थीं नैतिक और सांस्कृतिक कथाएँ। उदन्त मार्तण्ड से लेकर भारतेंदु युग तक इतिहास का अर्थ था रामायण-महाभारत, पंचतंत्र और पुराणों की कहानियाँ, जिनमें सुधार, धर्म, भाषा और नैतिकता के संदेश होते थे। फिर क्या किस तरह हुआ, एक टाइमलाइन:
- 1784 में विलियम जोन्स ने एशियाटिक सोसाइटी बनायी और 1785 में चार्ल्स विल्किन्स ने भगवद्गीता का अंग्रेज़ी अनुवाद किया। 1800 में फ़ोर्ट विलियम कॉलेज में हिंदी, उर्दू, बंगाली जैसी भाषाओं के व्याकरण, शब्दकोश और साहित्य पर काम शुरू हुआ।
- 1806–1817 के दौरान औपनिवेशिक इतिहास-लेखन की कोशिशें शुरू हुईं जिनमें जेम्स मिल की हिस्ट्री ऑफ़ ब्रिटिश इंडिया ने पहली बार भारत के इतिहास को हिंदू, मुसलमान और ब्रिटिश काल में बाँटा।
- 1837 में जेम्स प्रिंसेप ने ब्राह्मी लिपि पढ़ने में कामयाबी पायी, 1840 से 1860 के बीच पुराने अभिलेख पढ़ने और पुरातात्विक सर्वेक्षणों में तेज़ी आयी। 1861 में भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण की नींव पड़ी और पुरातात्विक स्थलों का वैज्ञानिक सर्वेक्षण शुरू हुआ।
- 1860 से 1880 के बीच बौद्ध भारत को खोजा गया, 1872 में पहली अखिल भारतीय जनगणना हुई और भारत के समाज, जातियों, भाषाओं और समुदायों का व्यवस्थित दस्तावेज़ीकरण शुरू हुआ।
- 1880 से 1900 के बीच ऐतिहासिक स्रोत छपने शुरू हुए, जिनमें ब्रिटिश शासन ने दक्षिण भारत के अभिलेखों पर काफ़ी काम किया। 1890 के दशक में ही स्मारकों के संरक्षण की शुरूआत हुई।
- 19वीं सदी के अंत तक अशोक का ऐतिहासिक व्यक्तित्व सामने आया, ब्राह्मी और खरोष्ठी लिपियाँ पढ़ी गयीं और मौर्य, गुप्त और बौद्ध काल का इतिहास साकार होना शुरू हुआ। पुरातत्व एक संस्थागत चीज़ बन गयी, शिलालेख, सिक्के और पुरातात्विक अवशेष इतिहास-लेखन के स्रोत बनने लगे।
इस दौरान हिंदी पत्रकारिता का बड़ा हिस्सा ब्रिटिश प्रशासन से जुड़ी सूचनाएँ, सरकारी आदेश, कर से जुड़ी घोषणाएँ, क़ानूनी फ़ैसले, डाक व्यवस्था, ब्रिटिश भारत की प्रशासनिक गतिविधियाँ छाप रहा था। इनके अलावा धार्मिक सुधार, सांस्कृतिक पुनर्जागरण, नैतिक उपदेश और मिथकीय नायकों की पुनर्प्रतिष्ठा उसके प्रिय विषय थे। सीधी राजनीतिक आलोचना अभी बहुत सीमित थी।
सांस्कृतिक चेतना का इतिहास
भारतेंदु और द्विवेदी युग (लगभग 1870–1920) में यह प्रवृत्ति और साफ़ हो जाती है। महावीर प्रसाद द्विवेदी के संपादकीय युग में इतिहास का इस्तेमाल ख़ासकर नैतिक शिक्षा और सामाजिक सुधार के औज़ार की तरह होता है। तथ्यात्मक ढंग से ऐतिहासिक घटनाओं का कालक्रम समझने की बजाय उन्हें चरित्र-निर्माण और सांस्कृतिक चेतना के उदाहरणों के रूप में पेश किया जाता है। इस दौर की हिंदी पत्रकारिता में इतिहास राजा-रानी, धार्मिक आदर्शों और सांस्कृतिक पुनर्जागरण की कथाओं में ढलता है, साहित्यिक और नैतिक संरचना के लिए इस्तेमाल होता है।

इस समय में औपनिवेशिक इतिहासकार उस समय भारत के इतिहास पर कलम चला रहे थे, मगर उनके साथ हिंदी के पत्रकारों का कोई संवाद नहीं दिखता। थोड़ी-बहुत प्रतिक्रिया दिखती है, लेकिन वहीं तक जहाँ धार्मिक प्रतीकों और सिद्धांतों के इतिहास को लेकर कुछ कहा गया हो।
‘राष्ट्रीय अतीत’ का प्रोजेक्ट
1900 से 1947 के बीच राष्ट्रवाद का उभार हुआ और इतिहास का स्वरूप बदला। कांग्रेसी आंदोलन के साथ ‘राष्ट्रीय अतीत’ की कल्पना बननी शुरू हुई, जिसमें 1857 का विद्रोह, शिवाजी, राणा प्रताप, झांसी की रानी जैसे पात्र इतिहास के केंद्रीय नायक बनते हैं। यही दौर है, जब इतिहास को एक प्रेरक संसाधन के रूप में इस्तेमाल किया जाता है, न कि भारत के अतीत को समझने के लिए किसी सामाजिक-आर्थिक प्रक्रिया के रूप में।
इस उठापटक का एक नतीजा तो यह हुआ कि औपनिवेशिक इतिहास-लेखन के ख़िलाफ़ काउंटर मेमोरी बनी, पर इसमें ज़्यादातर प्रतीकों और भावनाओं को ही प्राथमिकता मिलती है। औपनिवेशिक इतिहास का विश्लेषणात्मक चरित्र नहीं दिखता। इस दौरान इतिहास का भूगोल भी काफ़ी सीमित था। कलकत्ता, दिल्ली, बनारस, इलाहाबाद, आगरा, जैसे केंद्र थे, जहाँ से बौद्धिक और पत्रकारीय गतिविधियाँ चल रही थीं।
‘सरकारी इतिहास’ का समय
आज़ादी के बाद शुरूआती 20-30 सालों के दौरान (1947–1970) हिंदी पत्रकारिता का इतिहास बोध राज्य-केंद्रित हुआ। भाषाई आंदोलनों से इसे हवा दी। उधर देश के निर्माण की प्रक्रिया के दौरान इतिहास तेज़ी से एक सरकारी नैरेटिव में बदला, जिसमें स्वतंत्रता संग्राम, संविधान निर्माण और राष्ट्रीय एकता मुख्य विषय बनकर उभरे।
इसी दौरान समाजवाद समर्थक नेहरूवियाई इतिहास दृष्टि भी बनी, जिसमें आधुनिक भारत की कहानी एक समावेशी और रैखिक प्रगति के रूप में दिखायी गयी। इतिहास के काले धब्बों को छिपा लिया गया या उनकी उपेक्षा की गयी। हिंदी पत्र-पत्रिकाएँ इसी की जुगाली करती रही। इस दौरान इतिहास और पत्रकारिता के बीच का संबंध संस्थागत तौर पर तो स्थिर था, पर आलोचनात्मक नहीं बना।
राष्ट्रीय एकता बनाम “गौरवशाली अतीत” का नैरेटिव
हिंदी पत्रकारिता राजनीतिक उठापठक के समानांतर अपना मार्ग खोजती रही और यात्रा करती रही। 1970 से 1990 के बीच राष्ट्रीय राजनीति में विपक्ष की मौजूदगी बहुत ताक़तवर हो गयी थी। यही हिंदी पत्रकारिता में यही प्रतिबिंबित होता है। इस दौरान ख़ासकर आपातकाल (1975–77) के बाद हिंदी पत्रकारिता में इतिहास का इस्तेमाल वैचारिक और प्रतिस्पर्धात्मक हो गया। समाजवादी/मार्क्सवादी इतिहास-लेखन की नींव तो 1940s–1950s में ही पड़ चुकी थी। आज़ादी के बाद के नेहरूवियाई अकादमिक विस्तार और वामपंथी बौद्धिक परंपरा से यह मज़बूत हुआ।
इसे संस्थागत रूप 1960 के दशक के बाद विश्वविद्यालयों में मिला और यह चरम स्तर पर पहुँचा 1970–1990 के दशकों में। इसके प्रमुख थे डीडी कौशाम्बी, इरफ़ान हबीब, रोमिला थापर, बिपन चंद्रा, सुमित सरकार, सतीश चंद्रा, आरएस शर्मा आदि। 1990 के बाद बहुलतावादी और बिखरे हुए सांस्कृतिक इतिहास के लेखन का दौर देखा जा सकता है, जिसमें सबाल्टर्न, सांस्कृतिक, राष्ट्रवादी पुनरुत्थानवादी आदि धाराएँ देखी जा सकती हैं।
कांग्रेस समर्थित समाजवादी इतिहासकार प्राचीन और मध्यकालीन इतिहास को एक ख़ास फ़िल्टर से देख और गढ़ रहे थे। उधर भारतीय विद्या भवन और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की छत्रछाया में इतिहास का एक ‘अधिक भारतीय’ नैरेटिव गढ़ा जा रहा था। राष्ट्रवादी इतिहास की नींव तो 1880 से 1947 (औपनिवेशिक काल के दौरान) के बीच ही पड़ चुकी थी। इसका मक़सद था भारत के “गौरवशाली अतीत” का निर्माण, नायकों और प्रतीकों का पुनर्पाठ, राष्ट्र-निर्माण। इसका मज़बूती के साथ लेखन और विस्तार 1980 के दशक से आज तक देखा जा सकता है। इसका आधार रहा है, औपनिवेशिक शासन के खिलाफ राष्ट्रीय पहचान को खड़ा करना।
हिंदुत्व-समर्थित इतिहास का बौद्धिक आधार 1920–1940 के बीच रखा गया। इसकी धारणा का केंद्र है, हिंदू सभ्यता की निरंतरता। इसके प्रमुख लक्ष्य थे प्राचीन भारत का गौरव-केंद्रित पुनर्पाठ, मध्यकालीन इतिहास की फिर से व्याख्या (आक्रमण/संघर्ष फ्रेम पर), संस्कृति-आधारित राष्ट्रवाद को जगह आदि। इसके प्रमुख इतिहासविद थे आरसी मजुमदार, केएस लाल, सीताराम गोयल, हर्ष नारायण, पीएन ओक आदि।
कुछ भी हो, अकादमिक काम का असर किसी भी रूप में हिंदी पत्र-पत्रिकाओं के पन्नों तक कभी-कभार ही पहुँचा, पर ‘गौरवशाली अतीत’ और ‘सांस्कृतिक पुनर्जागरण’ के नैरेटिव तेज़ी से पत्रकारिता में ढले और परवान चढ़े। इतिहास अब केवल स्मृति नहीं रहा, वह पहचान की राजनीति का औज़ार बना, जहाँ जातीय, धार्मिक और क्षेत्रीय प्रतीक ज़्यादा सक्रिय हो गए।
इतिहास बना मीडिया कॉन्टेंट
1990 के बाद ख़ासकर बाबरी मस्जिद–राम जन्मभूमि विवाद (1992) के बाद इतिहास और पुरातत्व हिंदी मीडिया में पूरी तरह से राजनीतिक संसाधन बन गये। बाबरी मस्जिद–राम जन्मभूमि विवाद (1992) में इतिहास का राजनीतिक पक्षधरता और दावों की पुष्टि के लिए जमकर इस्तेमाल हुआ। इतिहास का रणक्षेत्र बनी अयोध्या और ‘हिंदू पत्रकारिता’ की धारा बड़े पैमाने पर हिंदी पट्टी की लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं में साफ़ नज़र आने लगी।
मुख्यधारा के अख़बारों ने इसे अपने कारोबारी हितों के लिए इस्तेमाल किया और ख़ुद भी इस्तेमाल होती रही, चाहे बात पुरातात्विक अवशेषों, इतिहास के सीमित परिप्रेक्ष्यों, मृतकों की तादाद की हो या फिर दोनों पक्षों की ओर से धार्मिक प्रतीकों के इस्तेमाल को लेकर संदर्भहीन लेखन की।
यही वह मौक़ा भी था, जब इतिहास ‘क्या’ ‘क्यों’ और ‘कैसे’ के सवालों से हटकर ‘कौन सही’ और ‘कौन ग़लत’ की बहस पर मुड़ गया। टीवी चैनलों के उभार के साथ इतिहास का विज़ुअल नाटकीयकरण इसी दौर में शुरू हुआ।
इतिहास हिंदी टेलिविज़न की स्क्रीन पर धींगामुश्ती डिबेट की सामग्री बना। अकादमिक इतिहास तो पहले ही हाशिये पर था और उसकी जगह ट्रिविया और बयानों के नैरेटिव ने ले ली, जहाँ जटिलता की बजाय स्पष्ट पक्षधरता अधिक मूल्यवान थी।
कॉन्टेंट इकॉनमी की ‘पॉपुलर हिस्ट्री’
2010 के बाद डिजिटल युग में इतिहास का नया रूप देखने को मिला, जिसे ‘पॉपुलर हिस्ट्री’ या ‘वायरल हिस्ट्री’ भी कह सकते हैं। यूट्यूब, सोशल मीडिया और डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म्स पर इतिहास अब सरल, तेज़ और जज़्बाती तस्वीरों और एआई से तैयार की गयी काल्पनिक तस्वीरों में गूँथकर पेश किया जाता है। यह दौर सिंप्लीफ़ाइड हिस्ट्री, नैशनलिस्ट हिस्ट्री और मिथकीय इतिहास का है। डिजिटल के बहुसंख्यक हिंदी पत्रकारों के लिए इतिहास अब कॉन्टेंट इकॉनॉमी का हिस्सा बन चुका है।
फ़ेक न्यूज़ और व्हाट्सऐप हिस्ट्री की फैक्ट्री से बड़ी तेज़ी से मिथक-इतिहास के फ़्यूज़न के साथ माल लोगों के मोबाइल फ़ोनों में भेज दिया जाता है। हो सकता है कुछ अपवाद हों, मगर अधिकतर प्लेटफॉर्म्स पर ऐतिहासिक तथ्य नेपथ्य में जा चुके हैं। उनसे किसी हिंदी पत्रकार का कोई लेना-देना नहीं है। यूट्यूब, इंस्टाग्राम, एक्स और पर भेजी जाने वाली सामग्री अमूमन असत्यापित स्रोतों पर निर्भर होती है, जो वैकल्पिक नैरेटिव्स खड़े करती है, पूर्वाग्रह तैयार करती है और भले-बुरे, सच्चे-झूठे की बाइनरी के साथ सरल व्याख्या के लिए उपलब्ध होती है।
यह पत्रकारिता इतिहास के अकादमिक विषय का मूल्य गिराती है, उसे मामूली अवैज्ञानिक कर्म की तरह पेश करती है, भड़काऊ बनाती है और विश्वविद्यालयों में शोध और पड़ताल की जगहों को बर्बाद करती है, और ‘वैकल्पिक सत्यों’ को बढ़ावा देती है। हिंदी पत्रकारिता इन सबको प्रतिबिंबिंत करती है। वह केवल इनकी वाहक नहीं है, कभी-कभी ख़ुद सक्रिय तौर पर इन नैरेटिव्स को गढ़ती है और उन्हें आगे बढ़ाती है। हिंदी के विश्व में वायरल हिस्ट्री आर्काइवल हिस्ट्री की जगह ले चुकी है। इतिहास वहाँ अब मनचाही व्याख्या के लिए कॉन्टेंट का स्रोत मात्र है।
फ़ेक न्यूज़ और फ़ैक्ट चेक
इसकी पृष्ठभूमि में देखें तो फ़ैक्ट चेकिंग हिंदी पत्रकारिता की सबसे बड़ी चुनौती है। माइक्रोसॉफ़्ट के 2019 के अध्ययन में पता चला है कि भारत में 64 प्रतिशत लोगों का सामना झूठी ख़बरों से होता है। यह समस्या हिंदी क्षेत्रों में बेहद गंभीर है। मिथक-इतिहास का फ़्यूज़न असल में हिंदी पत्रकारिता में इतिहास-बोध का प्रमुख ऐतिहासिक पैटर्न है। वंशावलियों के दावे और किसी नायक या वंश या घटना के स्थापन का मिथक इंपिरिकल तथ्यों की जगह वैध क़रार देकर धड़ल्ले से इस्तेमाल किया जाता है।
हिंदी पत्रकारिता में इतिहास-बोध के चार पैटर्न
अगर इस सबको एक साथ रखें, तो हिंदी पत्रकारिता में इतिहास-बोध के चार ख़ास पैटर्न दिखते हैं।
- 1) इतिहास= गौरवगाथा- राजा, युद्ध, विजय, वीरता केंद्रित
- 2) इतिहास= पहचान की राजनीति- जाति, धर्म, राष्ट्रवाद आधारित पुनर्पाठ
- 3) इतिहास= विवाद- मंदिर-मस्जिद, मुगल, पाठ्यपुस्तक
- 4) इतिहास= प्रतीक- व्यक्तित्व केंद्रित (नेहरू, गांधी, मोदी आदि)
ये सारे पैटर्न इतिहास को ऐतिहासिक प्रक्रिया के रूप में नहीं, बल्कि भावनात्मक, राजनीतिक और वैचारिक औज़ार के रूप में सामने रखते हैं और उसका इस्तेमाल करते हैं।
रिपोर्टिंग में अनुपस्थित इतिहास
इसी का एक पहलू है वह ख़ालीपन जो अलग से दिखता है। औद्योगिक इतिहास, श्रमिक इतिहास, पर्यावरण का इतिहास, विज्ञान और तकनीक का इतिहास, पूर्वोत्तर और दक्षिण भारत का सामाजिक-आर्थिक इतिहास और महिलाओं और दलितों के ऐतिहासिक अनुभव।
यह अनुपस्थिति केवल विषयों की कमी नहीं है, बल्कि हिंदी पत्रकारिता की संरचनात्मक दृष्टि बताती है, जिसमें एक तरह के अनुभवों को ही समाचार योग्य माना गया और बाक़ी को अंदर के पेजों पर या हाशिये पर समेट दिया गया। भारत में औद्योगीकरण, श्रमिक आंदोलनों और उत्पादन व्यवस्था के परिवर्तन पर गंभीर रिपोर्टिंग हिंदी पत्रकारिता में लंबे समय तक लगभग नहीं के बराबर रही। श्रमिक इतिहास असल में घटनात्मक रूप में सामने आया, जैसे हड़तालें, कारख़ाना विवाद या ट्रेड यूनियन गतिविधियाँ।
1970 के दशक के चिपको आंदोलन और बाद में नर्मदा आंदोलन (वह भी आंदोलन-केंद्रित घटनाएँ) को छोड़ दें, तो पर्यावरण की गहरी समझ पर आधारित रिपोर्टिंग और कवरेज न के बराबर है। महिला मुद्दे ख़ासकर अपराध, दहेज या कुछ सामाजिक सुधार अभियानों तक सीमित रहे।
इसी तरह दलित अनुभव या तो सामाजिक करुणा के फ्रेम में कसे गये या अपराध-आधारित फ्रेम में। इतिहास की यह ग़ैर-मौजूदगी केवल संपादकीय प्राथमिकताओं का नतीजा नहीं है, बल्कि यह हिंदी पत्रकारिता की उस ऐतिहासिक संरचना से जुड़ी है जिसमें राजनीति और पहचान-आधारित विमर्श को केंद्रीय स्थान दिया गया है।
समानांतर भाषाई पत्रकारिताओं का ‘इतिहास’
19वीं सदी के ज़्यादातर हिंदी अख़बार इतिहास को समाज-सुधार, धार्मिक पुनर्जागरण और सामुदायिक पहचान के स्रोत की तरह देखते थे। इस मामले में हिंदी अकेली नहीं थी, मगर हिंदी का रास्ता जल्दी ही दूसरी भारतीय भाषाओं से अलग हो गया था।
- 1818 में बांग्ला में समाचार दर्पण और बाद में तत्वबोधिनी पत्रिका (1843) जैसी पत्रिकाओं के साथ इतिहास केवल गौरवगाथा नहीं बल्कि ज्ञान की शाखा की तरह आया। बंकिम चंद्र ने इतिहास का राष्ट्रवादी इस्तेमाल तो लिया पर बाद में बांग्ला पत्रकारिता में अभिलेख, पुरातत्व, भाषाविज्ञान और सामाजिक इतिहास को लेकर भी रुचि बढ़ी।
- दिल्ली के पतन, मुग़ल साम्राज्य के अंत और मुस्लिम अभिजात वर्ग के विघटन ने उर्दू पत्रकारिता का अलग इतिहास-बोध रचा। अवध अख़बार (1858) और बाद की उर्दू पत्रकारिता में इतिहास ख़ासतौर पर इस्लामी सभ्यता, दिल्ली की तहज़ीब, मुस्लिम राजनीतिक पतन और सांस्कृतिक स्मृति की तरह उभरता है। यह भी अकादमिक इतिहास नहीं है पर केवल अतीत की खोज या बस उसकी फिर से स्थापना की चाह भी नहीं है।
- 20वीं सदी की शुरूआत में तक़रीबन सभी भारतीय भाषाओं की पत्रकारिताओं में इतिहास राष्ट्रवादी परियोजना का हिस्सा बना। बंगाली प्रेस में प्लासी, बंगाल पुनर्जागरण, औपनिवेशिक शोषण के विषय दिखते हैं तो मराठी में शिवाजी, पेशवा इतिहास और मराठा साम्राज्य। आज़ादी के बाद बंगाली और मराठी पत्रकारिता में इतिहास के नायक और घटनाएँ बीच बहस में आए जैसे नक्सलबाड़ी आंदोलन, भूमि सुधार, श्रमिक राजनीति, ज्योतिबा फुले, आंबेडकर।
- हिंदी पत्रकारिता में इतिहासकारों के शोध की जगह जयंतियाँ, पुण्यतिथियाँ और स्मृति विशेषांक दिखने लगते हैं। गुजराती समाज अपेक्षाकृत अधिक शहरी, व्यापारी और समुद्री संपर्कों वाला समाज था। इसलिए गुजराती पत्रकारिता का इतिहास-बोध व्यापारिक इतिहास, समुदायों का इतिहास, सामाजिक सुधार, स्वामीनारायण आंदोलन, पारसी समुदाय पश्चिमी शिक्षा जैसे विषयों को लेकर रहा।
- पंजाबी पत्रकारिता में सिख इतिहास, गुरु परंपरा, खालसा, पंजाब की क्षेत्रीय स्मृति और औपनिवेशिक शासन के साथ संबंधों को विषय बनाया। बीसवीं सदी में गांधी, सरदार पटेल के अलावा स्वदेशी, सहकारिता आंदोलन सभी उत्तर भारतीय भाषाओं में इतिहास चेतना का प्रमुख हिस्सा बने।
सभी उत्तर भारतीय भाषाई पत्रकारिताओं में क्षेत्रीय और सामाजिक इतिहास की धारा दिखती है। मगर हिंदी पत्रकारिता अपने गठन के बाद तुरंत ही यह पूछने लगी थी कि भारत का गौरवशाली अतीत और उसके नायक क्या और कौन हैं? यह उसकी शक्ति भी थी और कमज़ोरी भी। शक्ति इसलिए कि वह राष्ट्रीय कल्पना गढ़ रही थी, कमज़ोरी इसलिए कि वह सामाजिक-क्षेत्रीय इतिहास और अभिलेखीय जटिलताओं को छोड़कर बस प्रतीकों, नायकों और सांस्कृतिक स्मृति की ओर झुक रही थी। इसीलिए शायद हिंदी पत्रकारिता में इतिहास-बोध अक्सर अतीत की व्याख्या से ज़्यादा अतीत की वैधता का सवाल बनता है।
इंस्टेंट और सिंप्लीफ़ाइड नैरेटिव
अंग्रेज़ी मीडिया जो इसी भूगोल में हिंदी के साथ-साथ काम करता दिखता है, वहाँ इतिहास की आर्काइवल रिपोर्टिंग और इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्टिंग की परंपरा विकसित हुई, जिसमें अतीत को दस्तावेज़ों और स्रोतों के आधार पर पुनर्निर्मित करने की कोशिश होती है। हिंदी ने अंग्रेज़ी से अनुवाद करके इसकी भरपाई की, पर हिंदी पत्रकार ने तकनीकी तौर पर इसे एक औज़ार की तरह नहीं अपनाया। वहाँ दस्तावेज़ी गहराई काफ़ी कमज़ोर या नदारद है और इसके बजाय नैरेटिव की तात्कालिकता (narrative immediacy) बहुत ज़्यादा प्रभावी रही है।
आख़िर में सवाल फिर उसी केंद्रीय बिंदु पर लौटता है, क्या हिंदी पत्रकारिता ने अपने समाज के लिए इतिहास को समझने की एक संस्कृति विकसित की है, या इतिहास को भावनात्मक, राजनीतिक और वैचारिक हथियार की तरह इस्तेमाल किया है? उपलब्ध परंपरा यह संकेत देती है कि हिंदी पत्रकारिता ने एक विशाल लोकप्रिय स्मृति-तंत्र तो खड़ा किया है, पर एक सुसंगत, आलोचनात्मक और ज्ञान-आधारित इतिहास-बोध का सार्वजनिक क्षेत्र विकसित करने में वह सफल नहीं रही है।

इतिहास यहाँ अक्सर अतीत को समझने के बजाय उसे वर्तमान की बहसों में इस्तेमाल करने का ज़रिया बनता है। हिंदी की डिजिटल पत्रकारिता में आज इतिहास को मिथक से अलग कर पाना लगभग नामुमकिन है। शायद इसकी एक बड़ी वजह है तथ्य के प्रति उदासीनता और यहाँ तक कि ‘अप्रिय तथ्यों’ का विरोध। जो तथ्य सत्ता को सूट करता है, वही हिंदी पत्रकार अपनी लेखनी में इस्तेमाल करता है। हिंदी के पाठक के पास उसकी जाँच पड़ताल का न तो वक़्त है और न पारंपरिक अनुशासन या आग्रह।

अजय शर्मा
पत्रकारिता में दो दशक से अधिक का अनुभव। इतिहास विषयक एवं अछूते विषयों को लेकर शोध की ओर गहरा रुजहान रखने वाले अजय इन दिनों स्वतंत्र रूप से लेखन एवं शोध कर रहे हैं। शोध आधारित आपकी कुछ पुस्तकें प्रकाशनाधीन हैं।
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