
- September 12, 2026
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ख़बरनामा:200... हर शनिवार, इस शृंखला के लेख हिंदी पत्रकारिता के 200 वर्षों के इतिहास की प्रवृत्तियों, सीमाओं, उपलब्धियों और अंतर्विरोधों को समझने का प्रयास हैं। इन लेखों को इन्हें लिखने वाले पत्रकार की ओर से स्वीपिंग स्टेटमेंट या सार्वभौम सत्य नहीं बल्कि दीर्घकालिक और प्रमुख प्रवृत्तियों की पहचान के रूप में देखा जाये। असहमति और सहभागी आलोचना का स्वागत।
अजय शर्मा की कलम से....
भाषा अपनी, ख़बर किसकी? उधार की?
हिंदी पत्रकारिता अपने पाठकों तक दुनिया को कैसे पहुँचाती है। अपनी रिपोर्टिंग से, दूसरी भाषाओं की पत्रकारिता के सहारे या अनुवाद के ज़रिये? क्या हिंदी पत्रकारिता में सब कुछ अनुवाद के उधार का है? या हिंदी पत्रकारिता ने दूसरी भाषाओं से लिए विचारों-समाचारों की अपनी व्याख्या, जाँच और उनका पुनर्सृजन भी किया है? हिंदी पत्रकारिता में अनुवाद इतना केंद्रीय क्यों है कि कई क्षेत्रों में वह मौलिक रिपोर्टिंग का विकल्प है? क्या हिंदी पत्रकारिता ने समाचारों का अपना स्रोत-तंत्र भी खड़ा किया है या वह लंबे समय तक दूसरी भाषाओं में तैयार सूचना संसार पर निर्भर रही है? हिंदी पत्रकारिता अपने पाठकों के लिए आधुनिकता की निर्माता बनी है या आधुनिकता की अनुवादक?
पिछला लेख पढ़ें: हिंदी का पाठक—एक तफ़्तीश
मुझे लगता है ये कुछ सवाल हैं, जिनके ज़रिये हिंदी पत्रकारिता में अनुवाद को लेकर बात करनी चाहिए, ख़ासकर उसके दो सौवें साल में।
19वीं सदी की शुरूआत में हिंदी का पाठक जन्म ले रहा था। हिंदुस्तानी (हिंदी-उर्दू) का सार्वजनिक संसार ही देवनागरी-आधारित हिंदी का सार्वजनिक संसार था। ऐसे में हिंदी के अख़बार ख़बरें कहाँ से जुटा रहे थे? उनमें कितनी ख़बरें स्थानीय होती थीं, कितनी सरकारी सूचनाएँ थीं, कितनी दूसरे अख़बारों से ली जाती थीं, कितनी विदेशी ख़बरें थीं? क्या ख़बरों का अनुवाद किया जाता था या उन्हें फिर से लिखा जाता था?
अगर 19वीं सदी के अख़बारों पर नज़र डालें तो पता चलता है उनमें ज़्यादातर सूचनाएँ सरकारी स्रोतों से मिलती थीं या अंग्रेज़ी अख़बारों से अनुवाद करके उठायी जाती थीं। अधिकतर के पास अपने रिपोर्टर या सूचना स्रोत और संसाधन नहीं थे। पहले यह चुनौती थी, आज़ादी के बाद यही ढर्रा भी बन गया क्योंकि इसमें आसानी थी। इसलिए हिंदी पत्रकार ने शुरू से ही दुनिया को देखने के लिए अपने रिपोर्टर्स से अधिक उपलब्ध सूचनाओं पर निर्भरता दिखायी।
तो क्या पिछले दो सौ सालों में हिंदी पत्रकारिता ने दूसरी भाषाओं से आये संसार को अपनी सामाजिक परिस्थितियों के भीतर अर्थवान किया है? या उसने मूलत: अंग्रेज़ी में मौजूद ज्ञान का हिंदीकरण करके ज्यों का त्यों ले लिया है? और क्या दो सौ साल बाद हिंदी पत्रकारिता ख़ुद ज्ञान का स्रोत है, या अनूदित सूचना के प्रसार का ज़रिया भर है?

हिंदी पत्रकारिता को खड़ा करने वाले शुरूआती साहित्यकार संपादकों ने नयी जन्मायी गयी भाषा को अनुशासन, शैली और सार्वजनिक अभिव्यक्ति दी। मगर रिपोर्टिंग, डेटा, विशेषज्ञता और अनुभवजन्य जाँच की जगह नहीं बनायी। इसीलिए हिंदी पत्रकारिता में एक दीर्घकालीन प्रवृत्ति दिखती है, भाषा में आत्म-निर्भरता, ज्ञान में पर-निर्भरता।
दूसरी भाषा से आयातित वर्तमान
आधुनिक हिंदी पत्रकारिता की एक दिलचस्प ख़ासियत है कि उसका वर्तमान अक्सर कहीं और किसी भाषा में (अक्सर अंग्रेज़ी में) तैयार किया गया होता है।
- आर्थिक ख़बरें अंग्रेज़ी में रॉयटर्स/ब्लूम्सबर्ग/एजेंसी → अंग्रेज़ी न्यूज़रूम → हिंदी न्यूज़रूम → हिंदी पाठक तक पहुँचती है।
- अंतरराष्ट्रीय राजनीति अंग्रेज़ी में एजेंसी → अंग्रेज़ी मीडिया → हिंदी मीडिया तक आती है।
- वैज्ञानिक शोध जर्नल → अंग्रेज़ी प्रेस विज्ञप्ति → अंग्रेज़ी ख़बर → हिंदी रिपोर्ट की शक्ल में बदलता है।
सरकारी नीतियाँ अंग्रेज़ी दस्तावेज़ → एजेंसी या अंग्रेज़ी अख़बार → हिंदी अनुवाद तक आती हैं।
यानी अनुवाद सूचनाओं का और ज्ञान की पूरी सप्लाई चेन बन चुका है।
ख़बर एजेंसियों का पुल
हिंदी पत्रकारिता की अनुवाद निर्भरता को केवल अंग्रेज़ी अख़बारों और हिंदी अख़बारों के बीच का संबंध मानना अधूरी बात होगी। देश की आज़ादी के बाद समाचार एजेंसियों ने इस निर्भरता को संस्थागत रूप दिया है। अब हर हिंदी अख़बार को दिल्ली, मुंबई, लंदन या न्यूयॉर्क में अपना संवाददाता रखने की ज़रूरत नहीं थी। एजेंसी की कॉपी उसकी डेस्क तक पहुँच सकती थी। भाषा बदलना और ख़बर पहुँचाना एक ही प्रक्रिया का हिस्सा बन गया। इसने हिंदी पत्रकारिता की पहुँच तो बढ़ायी, पर साथ ही सूचना के स्रोत और उसके चयन को कुछ बड़े मध्यस्थों पर निर्भर कर दिया।
“अनुवाद” क्यों चाहिए?
दुनिया की सबसे उम्दा और ताक़तवर पत्रकारिताएँ भी एजेंसियों, विदेशी संवाददाताओं और दूसरे स्रोतों पर निर्भर होती हैं। और यह कोई ग़लत बात नहीं है, बल्कि ज़रूरत है। समस्या तब होती है जब पहले ख़बर के लिए और फिर उसके अर्थ के लिए भी दूसरी भाषा पर निर्भरता बन जाती है। हिंदी पत्रकारिता में यह हुआ है, पर कैसे हुआ?
अगर बारीकी से देखें तो पहला कारण है संसाधन, यानी हिंदी पत्रकारिता संस्थानों के लिए हर जगह संवाददाता रखना महँगा सौदा रहा है। दूसरा औपनिवेशिक वजहों से अंग्रेज़ी का प्रशासनिक प्रभुत्व यानी सरकारी दस्तावेज़, न्यायपालिका, विश्वविद्यालय, विज्ञान आदि का बड़ा हिस्सा अंग्रेज़ी में था। तीसरा, समाचार एजेंसियों की मौजूदगी। चौथा, हिंदी पत्रकारों में विशेषज्ञता की कमी। पाँचवाँ, समय का दबाव। छठा, समाचार का केंद्रीकरण। सातवाँ, हिंदी पत्रकारिता का बड़ा पर आर्थिक रूप से सीमित बाज़ार। आठवाँ, संपादकीय संस्कृति जिसमें राजनीतिक ख़बरें छोड़कर दूसरे लगभग सभी विषयों के प्रति एलर्जिक रुख़ रहा है।
तो अगर हिंदी पत्रकारिता का अपना संवाददाता नेटवर्क हिंदी पट्टी के बाहर बहुत कमज़ोर है, तो क्या दक्षिण, पूर्वोत्तर और पश्चिम भारत की ख़बरें भी दूसरी भाषाओं के ज़रिये हिंदी पाठक तक पहुँचीं? नहीं, ऐसा शायद ही हुआ। मसलन, तमिलनाडु की घटना हिंदी पत्रकार के पास तमिल स्रोत से नहीं बल्कि अंग्रेज़ी मीडिया के माध्यम से पहुँचती है। तो ऐसे में हिंदी पाठक को तमिलनाडु का समाज नहीं, अंग्रेज़ी मीडिया द्वारा निर्मित तमिल समाज, संस्कृति का संस्करण मिलता है।
अनुवाद के विषय और अनुवाद का भूगोल
एक और अहम चीज़ देखने को मिलती है। हिंदी पत्रकार सभी कहानियों का अनुवाद नहीं करते। तो वह क्या है, जिसे वो अनुवाद के लिए चुनते हैं और वह क्या है जिसे छोड़ देते हैं।
एक नज़र डालते हैं कुछ उदाहरणों पर। अमेरिकी चुनाव– हाँ, ब्रिटिश राजनीति- हाँ, नासा की ख़बरें- हाँ, वैश्विक अर्थव्यवस्था- हाँ। मगर भारतीय विश्वविद्यालय का समाजशास्त्रीय शोध- बहुत कम, स्थानीय भाषा का शोध- और भी कम, भारतीय भाषाओं में प्रकाशित ज्ञान- नहीं। इन्हें एक प्रवृत्ति की तरह देखा जाना चाहिए, न कि किसी सत्य के रूप में।
अगर इस ट्रेंड पर नज़र डालें तो हिंदी पत्रकार को दुनिया अक्सर उन्हीं जगहों की दिखायी देती है, जिन्हें अंग्रेज़ी और वैश्विक समाचार एजेंसियाँ अहम घोषित कर देती हैं। तो समस्या सिर्फ़ इतनी नहीं रहती कि हिंदी पत्रकार अंग्रेज़ी से अनुवाद करके छाप देता है। समस्या यह भी होती है कि हिंदी पत्रकार ज्ञान का चयन भी दूसरी भाषा के माध्यम से करता है।
दूसरी भाषा, यह भी सीमित अर्थ है। ये प्रश्न भी पूछे जाने चाहिए कि हिंदी के न्यूज़रूम में अंग्रेज़ी को छोड़कर क्या किसी और भारतीय या ग़ैर-भारतीय भाषा से अनुवाद की व्यवस्था है? क्या अंग्रेज़ी के अलावा किसी और भाषा से अनुवाद को ज़रूरत और योग्यता माना जाता है?
इसी से जुड़ा है हिंदी पत्रकारिता में अनुवाद का भूगोल। यानी कौन-सी दुनिया अनूदित होकर हिंदी पत्रकारिता में उतरेगी और कौन-सी दुनिया अनुवाद होकर भी नहीं आएगी? जैसे हिंदी मीडिया में अमेरिका, ब्रिटेन, चीन, रूस बहुत दिखायी देंगे। मगर नेपाल, श्रीलंका, बांग्लादेश, म्यांमार, अफ्रीका, लैटिन अमेरिका, दक्षिण-पूर्व एशिया, भारत का उत्तर पूर्व, दक्षिण भारत शायद ही प्रकट होंगे।
1991 के बाद रूपांतरण
भारत में उदारीकरण के बाद हिंदी अख़बार आधुनिकता की नयी भाषा अपनाने को मजबूर हुए, जैसे liberalisation (उदारीकरण), globalisation (वैश्वीकरण), outsourcing (आउटसोर्सिंग), startup (स्टार्टअप), GDP (सकल घरेलू उत्पाद), mutual fund (म्यूचुअल फ़ंड)। ये और ऐसे ही बहुत-से शब्दों का हिंदी पत्रकारिता में प्रवेश हुआ।
मगर क्या हिंदी पत्रकारिता ने नयी आर्थिक वास्तविकताओं को समझने के लिए अपने विशेषज्ञ तैयार किये? या पहले से उपलब्ध ज्ञान का अंग्रेज़ी से हिंदीकरण किया? हिंदी पत्रकारों के पास अंग्रेज़ी की तरह इन धारणाओं को समझने-समझाने वाले विशेषज्ञ नहीं थे। ऐसे में वो या तो पूरी तरह से दुभाषी पत्रकारों और विशेषज्ञों पर निर्भर थे या आर्थिक धारणाओं के हिंग्लिश वर्शन के अनुवाद के साथ छापकर-बोलकर अपना काम चला रहे थे।
तबरेज़ अहमद नेयाज़ी के 2010 के अध्ययन ‘कल्चरल इंपीरियलिज़्म ऑर वर्नाक्युलर मॉडर्निटी? हिंदी न्यूज़पेपर्स इन अ ग्लोबलाइज़िंग इंडिया’ का निष्कर्ष है कि हिंदी अख़बारों ने आधुनिकता की भाषा अपनाकर उसे स्थानीय सांस्कृतिक संसाधनों के साथ मिलाया और एक तरह की हाइब्रिड वर्नाक्युलर मॉडर्निटी यानी संकर भाषाई आधुनिकता खड़ी की। नेयाज़ी के मुताबिक़ हिंदी सिर्फ़ अंग्रेज़ी की फ़ोटोकॉपी नहीं थी। उसने अंग्रेज़ी से आयी आधुनिकता को स्थानीय सामाजिक और सांस्कृतिक अर्थों में पुनर्गठित किया।
यानी हिंदी पत्रकारिता अनुवादक भर नहीं रही। कई बार वह अनुवादक से अधिक सांस्कृतिक मध्यस्थ रही है।
तो क्या हिंदी पत्रकारिता का कुछ “मौलिक” है?
नई आधुनिकता के पुनर्पाठ के अलावा हिंदी पत्रकारिता में सब कुछ आयातित नहीं रहा है। उसके पास कुछ मौलिक वहाँ है, जहाँ उसका अपना सामाजिक अनुभव और संवाददाता नेटवर्क मौजूद है।
मिसाल के लिए गांधीवादी पत्रकारिता, स्वतंत्रता आंदोलन की स्थानीय रिपोर्टिंग, किसान आंदोलनों की रिपोर्टिंग, हिंदी क्षेत्र के सामाजिक आंदोलन, जाति विरोधी विमर्श, ग्रामीण समाज की पत्रकारिता, ग्रामीण भारत और कृषि संकट, आपातकाल के अनुभव, मंडल आंदोलन, हिंदी क्षेत्र की चुनावी राजनीति, राम मंदिर आंदोलन, छोटे शहरों की पत्रकारिता। इन क्षेत्रों में हिंदी पत्रकारिता ने ख़ुद सामग्री पैदा की है। इन क्षेत्रों में हिंदी पत्रकारिता मौलिक रही है, पर मूल रूप से अपने राजनीतिक और सामाजिक भूगोल के भीतर।
दूसरा पहलू यह है कि हिंदी पत्रकारिता ने शुरू से ही राजनीति को अपना प्राथमिक रिपोर्टिंग डोमेन चुना है। ग्राउंड रिपोर्टिंग, मौलिक निष्कर्ष, आंकड़े, समीकरण सबसे ज़्यादा हिंदी पत्रकारिता में राजनीति में ही मिलते हैं। चुनाव, जाति, नेता, आंदोलन, धर्म, स्थानीय सत्ता, राज्य की राजनीति, अपराध, सामाजिक संघर्ष वो इलाक़े हैं, जहाँ हिंदी पत्रकारिता का अपना रिपोर्टिंग नेटवर्क मज़बूत हुआ। हालाँकि इनमें से भी कुछ अंग्रेज़ी पत्रकारिता के अर्थ-निर्माण और उसके अनुवाद के ज़रिये आया, जैसे सामाजिक आंदोलन, कृषि संकट, जाति-विरोधी विमर्श, स्वतंत्रता आंदोलन, राम मंदिर आंदोलन, मगर मोटे तौर पर हिंदी पत्रकारिता का मौलिक ज्ञान संसार इन डोमेन में विस्तृत और गहरा रहा है।
इसी के सापेक्ष विज्ञान, तकनीक, दुनिया का बाज़ार और अर्थशास्त्र, अंतरराष्ट्रीय शोध, उच्च शिक्षा, वैज्ञानिक संस्थान, सामाजिक विज्ञान, इन सभी में आयातित सूचनाओं और अवधारणाओं पर भयानक निर्भरता दिखायी देती है।
हिंदी पत्रकारिता में मौलिकता का प्रश्न सिर्फ़ भाषा का नहीं, उसमें रिपोर्टिंग का भी है। मिसाल के लिए क्या हिंदी पत्रकार मौलिक स्रोत तक गया, उसने क्या मौलिक तथ्य खोजा, क्या उसने मौलिक व्याख्या की और नया अर्थ निकाला? क्या हिंदी पत्रकार ने मौलिक अवधारणा पेश की यानी उसने क्या किसी सामाजिक घटना को समझने के लिए विचार का नया सांचा मुहैया कराया? यह परंपरा कमज़ोर रही है। ऐसा बहुत कम होता है कि हिंदी पत्रकार ख़ुद स्रोत ढूँढ़े, दस्तावेज़ पढ़े, डेटा जुटाये, विशेषज्ञों से बात करे, स्थानीय स्तर पर शोध करे, लंबे समय तक किसी विषय का पीछा करे, दूसरे स्रोतों से सत्यापन करे और अपने निष्कर्ष निकाले। हिंदी पत्रकारिता में इसका दायरा बहुत ही सीमित है।
शब्द गढ़ना बनाम ज्ञान गढ़ना
हिंदी भाषा, साहित्य और देवनागरी लिपि के प्रचार-प्रसार के लिए स्थापित नागरी प्रचारिणी सभा ने 1898 में वैज्ञानिक शब्दावली तैयार करने के लिए समिति बनायी थी। इसके बाद 1906 में हिंदी साइंटिफ़िक ग्लॉसरी छपी। नागरी प्रचारिणी सभा ने शब्दकोश, व्याकरण, साहित्य इतिहास, विश्वकोश और वैज्ञानिक शब्दावली जैसी परियोजनाएँ पूरी कीं और क़रीब ऐसे 400 ग्रंथ छापे।
चारु सिंह के 2021 के अध्ययन (साइंस इन द वर्नाक्युलर? ट्रांसलेशन, टर्मिनोलॉजी एंड लेक्सिकोग्राफ़ी इन हिंदी साइंटिफ़िक ग्लॉसरी (1906)) के मुताबिक़ यह केवल शब्दों का अनुवाद नहीं था। वैज्ञानिक अवधारणाओं को हिंदी में प्रामाणिक और स्वीकार्य बनाने की समस्या भी थी। यानी शब्दावली बनाना ख़ुद ज्ञान निर्माण की राजनीतिक और बौद्धिक प्रक्रिया थी।
हिंदी ने आधुनिकता को समझने के लिए अपने शब्द गढ़े थे, जैसे लोकतंत्र, समाजवाद, पूँजीवाद, राष्ट्रवाद, धर्मनिरपेक्षता, संविधान, संप्रभुता, अर्थव्यवस्था, औद्योगिकीकरण, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, मानवाधिकार आदि, आदि। तो सवाल यह है कि क्या शब्दावली के साथ उस अवधारणा का अपना हिंदी ज्ञान संसार भी गढ़ा गया था?
मिसाल के लिए “अर्थव्यवस्था” शब्द है, पर क्या हिंदी पत्रकारिता ने भारतीय मायनों में इसे समझने का अपना विश्लेषणात्मक ढाँचा खड़ा किया है? “धर्मनिरपेक्षता” एक शब्द है लेकिन क्या हिंदी पत्रकारिता ने भारतीय धर्मनिरपेक्षता का अपना ख़ुद का सिद्धांत विकसित किया है? “जाति” शब्द तो है पर क्या हिंदी पत्रकारिता ने जाति पर समाजशास्त्रीय ज्ञान का अपना सार्वजनिक संसार बनाया? वैज्ञानिक शब्दावली तो बनी, पर क्या हिंदी पत्रकारिता ने उस शब्दावली के सहारे वैज्ञानिक पत्रकारिता भी खड़ी की?
यहीं से हिंदी और हिंदी पत्रकारिता का शब्द संसार और ज्ञान संसार दो अलग-अलग चीज़ें हो जाते हैं। ऐसे में कुछ समीकरण जो दो सौ साल बाद भी देखे जा सकते हैं-
- वैज्ञानिक शब्दावली का निर्माण ≠ वैज्ञानिक पत्रकारिता का निर्माण
- अर्थशास्त्रीय शब्दावली ≠ आर्थिक पत्रकारिता
- राजनीतिक शब्दावली ≠ राजनीतिक विश्लेषण
यानी जो संसार हिंदी पत्रकारिता ने रचा, वह “आश्रित ज्ञान संसार” या “अनुवाद आधारित आधुनिकता” का संसार है। इसकी हिंदी पत्रकारिता में अपनी कोई ज़मीन नहीं है। अगर है, तो वह बहुत संकुचित और छोटी है।
कहाँ है स्वर्णिम माध्य?
आधुनिकता को हिंदी लगातार अनुवाद के ज़रिये हासिल करती है। इसके कई हिस्से हैं।
- पहला है शाब्दिक अनुवाद यानी अंग्रेज़ी की ख़बरों को हिंदी में लिख देना।
- दूसरा है, संपादकीय अनुकूलन (adaptation) यानी मूल ख़बर में से कुछ चुनना, कुछ हटाना और उसे हिंदी पाठक के लिए ढाल देना।
- तीसरा है फिर से पैकेजिंग यानी दूसरी भाषा में प्रकाशित सामग्री को नई हेडलाइन, नया कोण और नया कथ्य दे देना।
- चौथा है पुनर्व्याख्या, यानी मूल घटना को हिंदी क्षेत्र के सामाजिक अनुभव से जोड़ना।
- और पाँचवाँ है स्वतंत्र रिपोर्टिंग यानी मूल स्रोत पर ख़ुद जाकर जानकारी जुटाना।
मगर अक्सर ये सारे चरण पूरे नहीं किये जाते या हो नहीं पाते। इनमें से अमूमन कोई एक-दो चरण ही पूरे किये जाते हैं और कई छोड़ दिये जाते हैं, या छूट जाते हैं।
मिसाल के लिए जब अंग्रेज़ी पत्रकार लिखता है, India’s GDP grew by 6%। तो क्या हिंदी पत्रकार उस आंकड़े को बिहार के छोटे व्यापारी, उत्तर प्रदेश के किसान या मध्य प्रदेश के मज़दूर के अनुभव से जोड़ पाता है। अगर हाँ, तो शायद वह अनुवादक नहीं, इंटरप्रेटर बन सकेगा, जो हिंदी पत्रकारिता के लिए शायद ज़्यादा रचनात्मक काम होगा।
पुनर्सृजन और पुनर्व्याख्या इसी तरह से हिंदी के अपने ज्ञान का संसार रच सकते हैं। और शायद यही वह कसौटी है, जिस पर आधुनिक हिंदी पत्रकारिता को परखा जाना चाहिए। यानी हिंदी पत्रकारिता ने दूसरी भाषा में रची-बनी दुनिया को अपने भाषा और सांस्कृतिक संसार में समझने योग्य कैसे बनाया है?
शेष भारत में अनुवाद की हालत
क्या भारत की सभी भाषाई पत्रकारिताएँ समान रूप से अंग्रेज़ी से ज्ञान और सूचनाओं को अनुवाद की शक्ल में लेती रही हैं, या अलग-अलग भाषाओं ने अपने-अपने सामाजिक संसारों से ज्ञान और समाचार पैदा करने की अलग क्षमताएँ विकसित कीं? क्या उन्होंने अपने सामाजिक अनुभव को अधिक मौलिक ढंग से बदला?
ख़ासकर बांग्ला, मराठी, गुजराती, तमिल और मलयालम की पत्रकारिताओं में भी क्या हिंदी पत्रकारिता जैसे हालात हैं? आधुनिक विज्ञान, इतिहास, समाजशास्त्र, अर्थशास्त्र और राजनीतिक सिद्धांतों को लेकर कितनी मौलिक संस्थाएँ, पत्रिकाएँ और शब्दावली और अवधारणा निर्माण की परंपराएँ इन भाषाओं में विकसित हुईं?

अन्य भारतीय भाषाओं का अनुभव यह बताता है कि मातृभाषा में पत्रकारिता केवल दूसरी भाषा से ज्ञान आयात करने का माध्यम नहीं बनती, वह अपने क्षेत्र, समाज और राजनीतिक समुदाय की अपनी अवधारणाएँ भी बना सकती है। इसका अर्थ यह नहीं कि ये अन्य भाषाएँ अनुवाद से मुक्त रही हैं। सवाल अनुवाद की मौजूदगी का नहीं, बल्कि उसके साथ मौलिक रिपोर्टिंग और ज्ञान-निर्माण के अनुपात का है।
इसीलिए मुझे लगता है कि अन्य भारतीय भाषाई पत्रकारिताओं का अध्ययन हिंदी पत्रकारिता में अनुवाद के बारे में एक संतुलित नज़रिया दे सकता है। यानी क्या हिंदी पत्रकारिता ने अपने समाज के अनुभवों को उसी तरह ज्ञान में बदला जिस तरह अन्य भारतीय भाषाई पत्रकारिताओं ने किया?
हिंदी डिजिटल मीडिया में अनुवाद
हिंदी का मौजूदा डिजिटल मीडिया कहाँ खड़ा है? क्या उसने हिंदी पत्रकार को दूसरी भाषाओं के कॉन्टेंट का और तेज़ पुनर्लेखक बना दिया है?
असल में हिंदी डिजिटल पत्रकारिता में तीन-चार चीज़ें दिखती हैं, अनुवाद, एग्रीगेशन, पुनर्लेखन, एआई समर्थित पुनर्लेखन। यानी अब अनुवाद केवल अंग्रेज़ी एजेंसी की या अख़बार या मीडिया चैनल से हिंदी चैनल या अख़बार में नहीं पहुँचता। इनके ऊपर एक पाँचवीं चीज़ बैठी है, एल्गोरिद्म के चलते ख़बर का चयन। यानी अब सवाल केवल यह नहीं है कि किस भाषा से हिंदी में अनुवाद हुआ, बल्कि यह कि किस भाषा की और कौन-सी सामग्री पहले एल्गोरिद्म ने हिंदी पत्रकार के सामने रखी? यह बहुत बड़ा बदलाव है।
अब हिंदी डिजिटल में ख़बर निर्माण की यह प्रक्रिया दिखती है—
मूल ख़बर→ अंग्रेज़ी या दूसरी भाषा का डिजिटल स्रोत → सोशल मीडिया/सर्च एल्गोरिद्म → हिंदी डिजिटल डेस्क → अनुवाद और पुनर्लेखन → क्लिक योग्य हेडलाइन → सोशल मीडिया → हिंदी पाठक → पाठक की प्रतिक्रिया → एनेलिटिक्स → अगली ख़बर का चुनाव
यानी अब हिंदी पत्रकारिता में अनुवाद केवल भाषाई मध्यस्थ नहीं है, वह एल्गोरिद्मिक मध्यस्थता भी दे रहा है। और यह काफ़ी महीन बात है।
जनवरी 2017 में LSE/CIS के एक अध्ययन ने हिंदी के अख़बार दैनिक जागरण, अंग्रेज़ी अख़बार हिंदुस्तान टाइम्स और मलयालम अख़बार मलयाली मनोरमा के डिजिटल संक्रमण पर 30 से अधिक संपादकों, प्रबंधकों और पत्रकारों के साक्षात्कार लिये। इस अध्ययन ने दिखाया कि भारतीय भाषाई अख़बार डिजिटल संचालन के लिए अलग डिजिटल इकाइयाँ बना रहे थे और ऑडिएंस की एनेलिटिक्स, फ़ेसबुक/ट्विटर जैसे सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स और हाइपरलोकल समाचारों को संपादकीय प्रक्रिया में शामिल कर रहे थे।
19वीं सदी में हिंदी पत्रकार के पास दुनिया तक पहुँचने के ज़रूरी स्रोत और संसाधन नहीं थे। मगर दो सौ साल बाद अब हिंदी पत्रकार के सामने दुनिया की ख़बरें पाने के बहुत अधिक स्रोत हैं। सूचना की कमी अब सूचना की बाढ़ में बदल चुकी है। मगर पत्रकार क्या चुने, इसका फ़ैसला प्लेटफ़ॉर्म लॉजिक से और ऑडिएंस की एनेलिटिक्स से होने लगा है। तो क्या इससे हिंदी पत्रकारिता में ज्ञान की वृद्धि हुई है? यह ज़रूरी नहीं है।
असल में डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म पर मूल स्रोत का संदर्भ घटता जाता है, और दावा तेज़ी से फैलता है। डिजिटल पत्रकारिता ने अनुवाद की रफ़्तार तेज़ की है, साथ ही अनूदित सूचना का संदर्भ छोटा कर किया है। अब ख़बर केवल एक भाषा से दूसरी भाषा में नहीं जाती। वह एक माध्यम से दूसरे माध्यम में जाते-जाते हर बार थोड़ी और संक्षिप्त, थोड़ी और उत्तेजक, थोड़ी और संदर्भहीन होती जाती है।
दूसरा पहलू यह है कि मशीन अनुवाद ने पहली बार किसी एक भाषा की दूसरी पर निर्भरता की रुकावट काफ़ी हद तक ख़त्म कर दी है। लेकिन इससे हिंदी पत्रकार के लिए एक नया सवाल खड़ा हुआ है। अगर मशीन किसी भी भाषा की ख़बर को तुरंत हिंदी में बदल सकती है, तो क्या हिंदी पत्रकारिता अब अधिक मौलिक होगी या केवल दुनिया भर की सामग्री की तेज़ उपभोक्ता और पुनर्लेखक बन जाएगी?
मशीन अनुवाद भाषा की निर्भरता कम कर सकता है, रिपोर्टिंग की निर्भरता नहीं। इसलिए डिजिटल युग में पहली बार हिंदी पत्रकारिता के सामने मौक़ा है कि वह अंग्रेज़ी को अनिवार्य मध्यस्थ बनाये बिना दूसरी भारतीय भाषाओं से सामग्री ले सकती है। मगर ऐसा होता नहीं दिखता। तो फिर एक कड़वा सवाल उठता है, क्या हिंदी डिजिटल मीडिया अभी भी दूसरी भारतीय भाषाओं को देखने के लिए अंग्रेज़ी का ही चश्मा पहने रहेगा?
क्या हिंदी पत्रकारिता ने अपने प्रश्न तैयार किये?
किसी भाषा की पत्रकारिता की मौलिकता की एक और कठिन कसौटी है। क्या उसने ऐसे सवाल पूछे जो उसके समाज के बारे में दूसरी भाषाओं में नहीं पूछे जा रहे थे? क्या हिंदी पत्रकारिता ने हिंदी पट्टी की ग़रीबी को अपनी अवधारणा से समझाया? जाति और लोकतंत्र को लेकर अपने भूगोल में अपनी समझ को विकसित किया? ग्रामीण अर्थव्यवस्था की अपनी व्याख्या विकसित की? भारतीय परिवार के बदलते स्वरूप पर विमर्श दिया? भारतीय भाषाओं और आधुनिकता के संबंध पर सोचा-विचारा? हिंदी क्षेत्र में औद्योगिक पिछड़ेपन को लेकर कोई समझ बढ़ायी? उत्तर भारत की पुरुष मानसिकता का विश्लेषण किया? अपने ही पाठक समाज की आलोचना की?
मुझे लगता है हिंदी पत्रकारिता की समस्या यह नहीं है कि वहाँ बहुत कुछ अनुवाद का है। अनुवाद के बिना आधुनिक पत्रकारिता की कल्पना मुश्किल है। समस्या वहाँ शुरू होती है, जहाँ अनुवाद रिपोर्टिंग की जगह ले लेता है, दूसरी भाषा ख़बर का ही नहीं बल्कि उसके अर्थ का भी स्रोत बन जाती है और जहाँ हिंदी पत्रकार अपने समाज के लिए नये सवाल पूछने के बजाय दूसरी भाषा में पूछे गये सवालों को हिंदी में दोहराने लगता है।
दो सौ साल में हिंदी पत्रकारिता ने एक बड़ा पाठक समाज खड़ा किया है। कई बार अपने अनुभवों के भीतर नया अर्थ भी पैदा किया है, इसलिए उसे महज़ अंग्रेज़ी की अनुवादक पत्रकारिता कहना अन्याय होगा। मगर यह सवाल पूछना ही चाहिए कि उसने अपने लिए कितने स्रोत बनाये, कितने विशेषज्ञ पैदा किये, कितने दस्तावेज़ पढ़े, कितनी भारतीय भाषाओं से सीधे संवाद किया और अपने समाज के बारे में कितने ऐसे अद्वितीय सवाल पूछे, जो कहीं और नहीं पूछे जा रहे थे।
डिजिटल युग ने इस सवाल को और तीखा किया है। अब तकनीक के आधार पर हिंदी पत्रकार केवल अंग्रेज़ी से नहीं, भारत की लगभग हर भाषा से सीधे संवाद कर सकता है। मशीन अनुवाद और आर्टिफ़िशियल इंटेलिजेंस भाषाई दीवारें गिरा रहे हैं। मगर वे ख़ुद-ब-ख़ुद रिपोर्टर की आँख, स्रोत की विश्वसनीयता, दस्तावेज़ पढ़ने की आदत या सवाल पूछने की क्षमता पैदा नहीं करेंगे।

अनुवाद से हिंदी पत्रकारिता को दुनिया मिली। अब उसे तय करना है कि उस दुनिया की व्याख्या अपनी होगी या नहीं।

अजय शर्मा
पत्रकारिता में दो दशक से अधिक का अनुभव। इतिहास विषयक एवं अछूते विषयों को लेकर शोध की ओर गहरा रुजहान रखने वाले अजय इन दिनों स्वतंत्र रूप से लेखन एवं शोध कर रहे हैं। शोध आधारित आपकी कुछ पुस्तकें प्रकाशनाधीन हैं।
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