
- August 14, 2026
- आब-ओ-हवा
- 0
व्यंग्य-कथा संजीव परसाई की कलम से....
व्यंग्य का दरोगा
दरोगा-राज में सब सुखी थे। लोग ले-देकर अपने काम आसानी से करवा लेते। देने वाले ख़ुश कि उनके ग़ैर-क़ानूनी काम पर क़ानूनी ठप्पा लग गया। लेने वाले भी ख़ुश कि उनके एक माले का इंतज़ाम और हो गया। जनता भी ख़ुश ही थी, सबके हिस्से के कष्टों को गिनती। ख़ुद के कम लगते। अब के दौर में दरोगाई झाड़ने की हसरत पाले लाखों लोग हैं। हर तरफ दरोगा हैं, खाने के, सोने के, पढ़ने और लिखने के भी। इन सबने एक ही वॉट्सएप विष विद्यालय से डिग्री ली है।
नर्मदा नदी किनारे आत्मचिंतन हेतु बैठा था। अचानक पीछे से आवाज़ आयी, क्या अब हमारी मां नर्मदा पर व्यंग्य लिखोगे?
पीछे मुड़कर देखा तो लेखन का दरोगा, मुझे घूर रहा था। मैं निश्चिंत भाव से बैठा रहा, उसे लगा कि मैं सहम गया हूं। वो ख़ुश हुआ और मेरे बगल में आकर बैठ गया। ऐसे लोगों की भली पहचान हो गयी है अब, ये सरस्वती का नाम लेकर लक्ष्मी पूजन में बैठ जाते हैं। घर में किताबों की अलमारी के पीछे तिजौरी बना रखी है। किताबें तभी छूते हैं, जब तिजोरी से माल निकालना हो या रखना हो। आजकल ये बरास्ता राजनीति चल रहे हैं। भाईसाहब से लेखकों को मिलवाना इनके जीवन का ध्येय है। ख़ैर वो बोले चला जा रहा था…
-देखो गुरु, ये सरकार, सिस्टम तक तो ठीक है। भगवान, देवी, गंगा मैया, नर्मदा मैया को छोड़ देना चाहिए।
मैं अपलक नर्मदा को निहार रहा था। चारों ओर नर्मदा माई की जय, हर नर्मदे कहने वाले विचर रहे थे। नर्मदा मैया के सीने को चीरकर कितने झोपड़े हवेलियाँ बन गये। कितने आये और गये नर्मदा यूं ही सब पर प्यार लुटाती रहीं। जब नदी किनारे बैठो तो ऐसे ख़्याल आ ही जाते हैं।

मेरा हुंकारा न आना, उसे नागवार गुजरा। वो थोड़ा तल्ख़ हो गया।
-वैसे तुम जैसे सतही और हल्के लेखकों से कुछ होना नहीं है। तुम दो-चार किताबें लिखकर ख़ुद को बड़ा लेखक मानने लगे हो। तुम्हारे जैसे छत्तीस आते हैं, पता भी न चलता है।
मैं अब उसके होने का अहसास कर रहा था। मैने कहा, आओ मैं तुमको नर्मदा मैया पर लिखा व्यंग्य पढ़ाता हूं।
वो बचने की कोशिश करने लगा, मैं उसका हाथ खींचने लगा। उसको लगभग घसीटते हुए, उन नालों पर ले गया, जो गंदगी सीधे नदी में डाल रहे थे।
अब वो फिर नाराज़ हो गया, मैं नगरपालिका का दरोगा नहीं हूं। मुझे इससे क्या? मैं तो बस ये देखूंगा कि कोई भी हमारे धर्म, संस्कृति का अपमान न करे। दरोगा भागने लगा, मैंने हाथ पकड़ लिया।
चाय पिला…मैंने बोला।
मैं नहीं पीता… वो बोला
मैं पीता हूं….. मैं बोला
वो मुझे चाय की दुकान पर बैठकर, भाषा, शिल्प, शैली, विचारों के साथ लेखन में संस्कृति के महत्व पर ज्ञान देने लगा। आपका शब्द चयन सही नहीं होता। बुंदेली, तो कभी मालवी घुसेड़ देते हो। अंग्रेज़ी के शब्द ठेलकर क्या अंतर्राष्ट्रीय होना चाहते हो। लिखते क्या हो, ज्ञान ठेल देते हो। संदेश इतना ज़रूरी नहीं है, वो पाठक का अपना अनुभव है वग़ैरह वग़ैरह।
तुम्हारे व्यंग्य लिखने से क्या लोगों का व्यवहार बदलेगा? मैने तुम्हारी रिपोर्ट बना ली है। कुछ ओंगा-पोंगा लिखा तो, सबसे पहले तुम्हारा इलाज किया जाएगा। पुरस्कार तो क्या, प्रकाशक भी न मिलेगा।
वो बोले जा रहा था। अंदर का अक्खड़ परसाई, जोशी की तरह शांत बैठ चाय सुड़कता रहा। मैंने इन सालों में इस जैसों के लिए घोर प्रतिरोधक क्षमता यानि इम्यूनिटी विकसित कर ली है। इस प्रकार के लोगों से संवाद करने का यही तरीक़ा है, कि विरोध न करो, बहस न करो बस उनकी बात को इग्नोर करो। ऐसा होने से उनके पिलपिले अहम को धक्का लगता है, जो साहित्यिक पर्यावरण के लिए सुखद होता है।
मैंने उसे नहाने के लिए, मनाने का विचार किया। असल में मैं उसके अन्तःवस्त्र देखना चाहता था। विचार था कि जो बाहर से सहज दिखने का नाटक करता है, वो अंदर से कैसा है। सो वापस तट पर ले गया। उसे नहलाने की गरज से चिरौरी करने लगा। आपके संदेश से जीवन की ख़ुशबू आती है, जो लक्ष्य आपने अपने लिए तय किये हैं, वो असल में मानवता के होना चाहिए। लेखन और लेखक पर आपकी पकड़ बहुत मज़बूत है। आपके बाजुओं में परमपिता ने जो ताक़त बख़्शी है, चाहें तो सबको निचोड़ दें। शब्द, ज्ञान और परंपरा आपसे ही ज़िंदा हैं, आप मुंह फेर लें तो हिंदी साहित्य अनाथ न हो जाये। लेकिन आप ज्ञानी ठहरे, आप ऐसा कभी करते नहीं हैं। आपकी मर्मज्ञता से हम सब गधे, घोड़े उपकृत हो रहे हैं, आपका हस्तक्षेप न हो तो साहित्य और व्यंग्य का तो किसी दिन समापन ही हो जाये।
दरोगा पिघल रहा था। उसके चेहरे पर गर्वीले भाव देख मैंने जारी रखा…
उसने भी मेरी झूठी तारीफ़ की- वैसे आप भले आदमी हो, आजकल ग़लत लोगों के साथ उठ-बैठ रहे हो। आपने बहुत अच्छी बात कही है, लेकिन क्या कहा है इसे ज़रा विस्तार से समझा दीजिएगा।
मैंने फिर क़सीदा दोहरा दिया… वो फिर ख़ुश हुआ, उसने गर्वित होकर नर्मदा की ओर कृपादृष्टि की फिर घूमते हुए मुझ पर ठहर गयी।
हुम्म्म्म्…. कहकर नर्मदा में उतरने का संकल्प लिया। अंजुरी में जल भरकर चेक किया, फिर ख़ुद पर छिड़क लिया। दो-चार बूंदें मुझ पर भी आ गिरीं। मैं धन्य हुआ…
मैं उस दृश्य की कल्पना करने लगा, जब दरोगा नर्मदा नदी में उतरेगा और नदी का स्तर बढ़ जाएगा। क्योंकि आयोजनों में उसकी उपस्थिति आयोजन का स्तर ऊपर उठा देती है। गोष्ठियां, सभाओं में बदल जाती है। इसकी समीक्षा से किराने वाले लेखक बन जाते हैं। गोष्ठियों में इनकी अगड़म-बगड़म टीकाएं समीक्षा कहलाती हैं। अब तक सुना था, मैं आज इस दृश्य का साक्षी होने वाला था। मुझे नर्मदा मैया भी चिंतित लगीं।
वो अपनी बात से फिर गया, चड्डी न होने का बहाना करके बगल में आकर बैठ गया। मैं दुःखी हो गया…
मुझे उदास देख वो कहने लगा – सुनो, वो भाईसाब की नाव आ रही है, उस पर बैठ पार उतर जाते हैं। भाईसाब से मिलवा देता हूँ।
मैं हिला नहीं…
सामने से एक बड़ी नाव आ रही थी, शाम के धुंधलके में भी उसके ऊपर लिखा संस्कृति चमक रहा था। दस-बीस लोग उसमें बैठे हुए थे, किनारे खड़े लोगों की ओर हाथ हिला रहे थे। संस्कृति नर्मदा की लहरों में हिचकोले खा रही थी। किनारे खड़े आदमी को लगता, अब डूबी की तब डूबी। अंदर बैठे लोग मौज से थे, कुल मिलकर बड़ा मनोरम दृश्य था।
दरोगा मेरी ओर देखकर मुस्कुराया।
हौले से बोला- चलो नैया सवार होकर पार उतरते हैं। उस पार सब कुछ सुरम्य, सहज, सुलभ है। तुम जैसों को चाहिए क्या? लिखने के विषय, महान लेखकों, संपादकों का आशीर्वाद, प्रकाशकों की भीड़, पुरस्कारों की रेहड़ियाँ सब कुछ मिलेगा। मैंने सुना है, उसपार बड़ा मनोरम दृश्य होता है, रोज़ लिखो, रोज़ छपो, आक्षेप मुक्त वातावरण, किसी को कोई शिकायत नहीं, सम्मान सरोकार सब कुछ मिलेगा।
मैं कुछ सोचता, इसके पहले लेखन का दरोगा नाव में उचककर घुस गया। मैंने देखा नाव हिली और नर्मदा में दो-चार लहरें बढ़ गयीं।
अंदर जाकर उसने गर्वित अंदाज़ में हाथ हिलाया, मैंने तट से ही प्रणाम किया। अब मैं संस्कृति को बीच नदी में हिचकोले खाते देख रहा हूं। सूरज अब ढलने वाला है।

संजीव परसाई
घोषित रूप में क़रीब 25 सालों से लेखन, पठन-पाठन की गतिविधियों में संलग्न। व्यंग्यात्मक शैली में बात कहने में महारत। विभिन्न विषयों पर आलेख, शोध प्रकाशित। चर्चित पुस्तक “हम बड़ी ई वाले” के बाद हाल ही प्रकाशित किताब "भोपाल टॉकीज़" चर्चा में। पत्रकारिता और जनसंचार में स्नातकोत्तर और पत्रकारिता में शुरूआती ज़ोर-आज़माइश के बाद व्यवहार परिवर्तन संचार की ओर मुड़े। देश के अख़बारों, पोर्टल, डिजिटल प्लेटफ़ॉर्म और सोशल मीडिया पर सामाजिक लेखन से संबद्ध।
Share this:
- Share on Facebook (Opens in new window) Facebook
- Share on X (Opens in new window) X
- Share on Reddit (Opens in new window) Reddit
- Share on Pinterest (Opens in new window) Pinterest
- Share on Telegram (Opens in new window) Telegram
- Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp
- Share on Bluesky (Opens in new window) Bluesky
