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प्रदीप पाराशर की कलम से....

सीलिंग के पीछे छिपे सवाल

          रिहायशी इलाक़ों में व्यावसायिक गतिविधियों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद देश के अन्य हिस्सों के साथ ही भोपाल में नगर निगम की कार्रवाई लगातार चर्चा में बनी हुई है। क़ानून का पालन होना चाहिए, इसमें कोई दो-राय नहीं। लेकिन इस पूरी कार्रवाई के बीच कुछ ऐसे सवाल हैं, जिनका जवाब मिलना भी ज़रूरी है।

भोपाल का आख़िरी मास्टर प्लान 2005 में आया था। उसके बाद शहर बहुत बदल गया। आबादी बढ़ी, नयी कॉलोनियां बनीं, ज़रूरतें बदलीं और उन्हीं के साथ घरों के आस-पास छोटी-बड़ी व्यावसायिक गतिविधियां भी बढ़ती चली गयीं। आज स्थिति यह है कि शहर के अनेक इलाक़ों में दुकानें, क्लीनिक, कार्यालय, कोचिंग और दूसरी सेवाएं उसी व्यवस्था का हिस्सा बन चुकी हैं।

व्यवस्था का हिस्सा का यह अर्थ भी समझा जाना चाहिए कि इनमें से ज़्यादातर प्रतिष्ठानों ने व्यवस्थागत नियमों का पालन भी किया है। तमाम काग़ज़ी कार्रवाई की है और व्यवस्था द्वारा लगाये गये शुल्कों का भुगतान भी किया है।

अब अचानक यदि इन्हें अवैध मानकर सील किया जा रहा है तो सवाल उठते हैं-

  • इन सबकी शुरूआत हुई कैसे?
  • भवन का नक़्शा किसने पास किया?
  • निर्माण की अनुमति किसने दी?
  • व्यावसायिक गतिविधि वर्षों तक चलती रही तो नगर निगम और दूसरे विभागों ने कार्रवाई क्यों नहीं की?
  • और जिस संपत्ति से वर्षों तक टैक्स लिया गया, उसके उपयोग पर अब सवाल क्यों उठ रहा है?

ग़लती हुई है तो कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन ज़िम्मेदारी केवल नागरिक की ही क्यों? जिस व्यवस्था ने किसी गतिविधि को बनने, चलने और वर्षों तक क़ायम रहने दिया, उसकी जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।

दूसरा बड़ा सवाल रोज़गार का है। एक दुकान बंद होने का अर्थ केवल एक शटर गिरना नहीं है। उससे दुकानदार, कर्मचारी, परिवार, मकान मालिक और कई छोटे कारोबारी जुड़े होते हैं। व्यापक स्तर पर कार्रवाई हुई तो इसका असर शहर की स्थानीय अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा।

इसलिए रास्ता केवल सीलिंग नहीं हो सकता। जहां गंभीर नियम उल्लंघन है, वहां कार्रवाई हो; लेकिन जहां वर्षों से गतिविधियां चल रही हैं, वहां वास्तविक स्थिति देखकर नियमितीकरण, मिश्रित भूमि उपयोग और व्यावहारिक समाधान पर भी विचार होना चाहिए।

और सबसे ज़रूरी बात, भोपाल को एक ऐसा नया मास्टर प्लान चाहिए, जो आज के शहर को देखकर बनाया जाये, न कि वर्षों पुराने शहर को ध्यान में रखकर।

क़ानून का पालन ज़रूरी है, लेकिन क़ानून के साथ न्याय भी ज़रूरी है।

जनता से सवाल करने से पहले व्यवस्था से भी सवाल होना चाहिए।

आख़िर लोकतंत्र में जनता केवल नियमों का पालन करने के लिए नहीं है… उसे यह पूछने का अधिकार भी है कि नियम बनाने और लागू करने वालों ने अपनी ज़िम्मेदारी कितनी निभायी।

प्रदीप पाराशर, pradeep parashar

प्रदीप पाराशर

पेशे से वकील, समाजशास्त्र में स्नातकोत्तर के बाद से वकालत के क्षेत्र में अनेक उपलब्धियां। साहित्य में रुचि और काव्य लेखन का रियाज़ करते रहने के शौक़ीन। फ़ोटोग्राफ़ी और यात्राओं के लिए विशेष उत्साह।

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