इशिता राजन, ishita rajan
आज का यह भीषण लड़ाकू माहौल जो आपस में, परिवारों में, समाज में और देशों में व्याप्त है... एवं विवाह से पहले ही से संशय, अविश्वास, आरोप-प्रत्यारोप इस विश्वव्यापी वातावरण में हैं तो क्या है इसका हल? इस दूषित दुःखी मन:स्थिति को हटाने और सुकून के पल देने के विश्वसनीय मंत्र हैं ईशिता राजन की कहानी 'नया घर' में। -शशि खरे (संपादक-कथा प्रस्तुति)

ईशिता राजन लिखित कहानी: नया घर

         “नये घर में क्या-क्या चाहिए होगा, उसकी लिस्ट बनानी ज़रूरी है”
“पागल हो? नया घर किस तरह का होना चाहिए, किस-किस तरह के कितने कमरे, और कहाँ-कहाँ, वही पहले डिज़ाइन करना होगा।”
“पागल मैं नहीं, तुम हो! क्या-क्या सामान, रहने वाले की ज़रूरत में आता है, उसके आधार पर ही तो घर का डिज़ाइन बनेगा!”
“हम्म्म! बात तो कुछ ठीक ही कह रही हो!”
“कुछ ठीक नहीं, पूरी ठीक!”

सुबोध केवल एक उन्मुक्त हँसी हँसा, और कुछ शब्द नहीं! मही फिर बोली, “हर व्यक्ति का एक अपना ही जीने का तरीक़ा होता है! उसके शौक़, उसका काम, उसका सामाजिक जीवन, इन सभी चीज़ों के आधार पर पहले ‘क्या और कैसा सामान होगा’ और ‘किस तरह के कमरों की ज़रूरत रहेगी, की सूची बनेगी, और फिर जहाँ वह सब ज़रूरत का सामान रखा जाएगा, वह जगह डिज़ाइन होगी।”

“तब तो तुम्हें यह भी बताना होगा कि, क्या हम दोनों साथ रहने वाले हैं या अलग-अलग?”

इस बार वह हँसी! बोली, “हाँ! इस संभावना के बारे में भी सोचा जाना ज़रूरी है। यदि हम साथ रहेंगे तब, दो अलग लोगों के एक घर में क्या सामान होगा, इसकी दो अलग सूचियाँ बनेंगी, और घर के तीन हिस्से होंगे!”
“तीन क्यों?”
“एक तुम्हारी जीवन शैली के लिए, एक मेरी के लिए और तीसरा, हम दोनों के लिए!”

सुबोध और मही अपने रिश्ते को लेकर अभी बहुत निश्चित नहीं थे। सुबोध, मही के इन तीन हिस्सों वाले घर के ख्याल से पूरी तरह सहमत नहीं था। वह साथ रहना ही क्या जिसमें, अपने अलग-अलग हिस्से हों! परन्तु मही की राय इस बारे में एकदम स्पष्ट थी। दो अलग व्यक्तित्व हैं, अपनी निजता और साझेदारी, दोनों की संभावना में ही साथ रहने का प्रयत्न किया जा सकता है।

सुबोध का मन होता कि पूछे, “साथ रहना, एक दूसरे के अनुरूप ढलते जाना नहीं होता क्या?”

मही उसके मन के भीतर के प्रश्न को समझती और कहना चाहती, “उसके लिए घर का हमारा वाला हिस्सा होगा ना! अपने आप से मिलते रहने के बग़ैर, दूसरे के अनुरूप ढलना, बन्धन होता है। और फिर यदि हम सही व्यक्ति के साथ हैं, तो धीरे-धीरे दोनों वाला, साझा हिस्सा बढ़ने लगेगा और अपने अलग-अलग हिस्से सिकुड़ने लगेंगे। और यदि साथ अनुरूप न हुआ, तो इसके ठीक विपरीत होने लगेगा।”

वह पूछना चाहता, “और, अगर किसी के लिए तीन हिस्सों वाला घर बनाना संभव न हो तो?”

वह बताना चाहती, “एक-दूसरे को स्थान देने के लिए, किसी बड़े मकान की ज़रूरत नहीं होती, सुबोध। ‘स्थान देना है’ इस बात की समझ होना ज़रूरी है, बस। दोनों मिलकर छोटा घर बना पाएँ या फिर एक ही कमरे में अपने-अपने कोने सजा पाएँ तो भी चलेगा।”

पर वे दोनों इस बात को प्रकट में कहना नहीं चाहते। दोनों जानते थे कि बहस होगी। दोनों बहस करना नहीं चाहते थे।

सुबोध इस विषय से दूर ही रहना चाहता और मही बिना बहस इस पर बात करना चाहती! न सुबोध विषय से दूर रह पाता, न मही बहस से बच पाती। कुछ समय से, दोनों के मध्य फैल रहा ‘नये घर’ का यह विषय, रिश्ते में कुछ अनमनापन, बेस्वादी भरने लगा था।

सर्दियों की दोपहर, रेस्तरां के आँगन में, प्यार बरसा रही धूप सेकते, सुबोध और रितेश, बतियाते, समय को खींच से रहे थे।

“अपना घर बनाने की सोच रहे हो?” रितेश ने पूछा।
“हाँ! सोच तो रहे हैं! पर कुछ निर्णय हो नहीं पा रहे!”
“तुम्हारे पास ज़मीन है, बजट है! दिक़्क़त क्या है?”
“समझ नहीं पा रहे कि घर का डिज़ाइन किस हिसाब से करें!”

रितेश मज़ा लेकर सुनने लगा। सुबोध फिर बोला, “मतलब, हमारे हिसाब से या फिर उसके-मेरे-हमारे हिसाब से!”
“यह क्या बात हुई? और दोनों बातों में फर्क ही क्या है?”
“उसे दोनों बातों में फ़र्क़ दिखता है, और मैं समझने की कोशिश कर रहा हूँ।”
“मेरे ख़्याल से तो इसमें समझने जैसा कुछ है भी नहीं। थ्री बीएचके डिज़ाइन बहुत होगा तुम्हारे लिए! तुम्हारा और मही का कमरा हो, एक कभी जब तुम्हारे मम्मी-पापा को आकर रहना हो, या भविष्य में परिवार बढ़ाना हो, एक और गेस्ट रूम, हॉल, किचन और बाथरूम्ज़! और क्या? ज़्यादा हो तो एक स्टोर बनवा लेना!”
“तुम्हें सचमुच लगता है कि बात इतनी सिंपल होती है?”
“अब और क्या चाहिए होगा? अभी तो ब्याह हुआ भी नहीं है तुम्हारा! इतनी जल्दी और क्या ज़रूरतें होंगी!”
“इतना सरल नहीं है रे भाई! उसे, उसका सेक्शन और मेरा अलग चाहिए, एक और सैक्शन हम दोनों का! अब तुमने तो मम्मी-पापा और गेस्ट भी डाल दिये! मेरे मम्मी-पापा का सेक्शन होगा, तो उसके मम्मी-पापा के सैक्शन की बात भी होगी। होनी ही चाहिए!”
“अब यह तो सही बात नहीं है, भाई! मोहिनी भी ख़ूब पढ़ी लिखी है, अच्छी जॉब कर रही है, पर उसने तो मुझसे कभी अपने लिए अलग सैक्शन घर पर नहीं मांगा!”
“मुझसे नहीं मांग रही, वह कहती है कि अपना ख़र्चा करेगी! और मुझे इतना ग़लत भी नहीं लगता! क्रिएटिव फ़ील्ड है, उसे अपना आर्ट स्टूडियो और अपनी बालकनी का एकांत, अपनी किताबों के साथ समय चाहिए, तो कुछ ग़लत नहीं कह रही वह! मुझे भी तो मेरी फ़ोटोग्राफ़ी के लिए अपना फ़ोटो स्टूडियो चाहिए!”
“बात तो सही है! तब इतना क्यों सोच रहे हो?”
“भारतीय हूँ दोस्त! समाज, पितृसत्तात्मक होता है! मैं घर बनाने की सोच रहा हूँ! मेरा परिवार बहुत सहजता से इस नये घर को अपना और केवल मेरा घर मानकर चल रहा है! वे मुझसे ज़्यादा उत्साह से, मेरे घर के डिज़ाइन के बारे में सोच रहे हैं। मही का परिवार तो किसी तरह का दख़ल नहीं दे रहा! मही इसे उसका और मेरा, बस दो लोगों का प्रोजेक्ट समझ रही है। उसे पता नहीं कि मातृ-पितृ ऋण चुकाने के लिए हमारे यहाँ, बेटा बाध्य होता है।”
“उतना ग़लत भी नहीं है। हमारे यहाँ माता-पिता, लम्बे समय तक बेटों को पोसते हैं, हम किशोर होने पर, पैसा कमाने और ठोकरें खाने के लिए नहीं निकल जाते, हर तरह से संरक्षण में रहकर आगे बढ़ते हैं। फिर ऐसे माता-पिता का ख़्याल रखना, हमारा कर्तव्य बनता तो है।”
“और बेटियां? वे कहाँ से आती हैं? उन्हें नहीं पोसते उनके माता-पिता?”
“बोलकर देखो अपनी मम्मी से यह बात!” रितेश हंसते हुए बोला, “तुम्हारी बहन को, मही की तरह सपने देखने आते हैं क्या? स्टूडियो चाहिए क्या उसे घर पर? या किताब पढ़ने के लिए कोई एकांत? या उसके अपने घर में तुम्हारे मम्मी-पापा के लिए कोई जगह?”

सुबोध के मन में एक कंकड़-सा चुभा, जब रितेश ने अगली बात कही, “बड़े सपनों वाली लड़कियाँ, दोस्ती के लिए ही ठीक होती हैं, सुबोध, हिन्दुस्तानी परिवेश में ये लड़कियां वाइफ़ मटिरियल नहीं होतीं! मही, एक सशक्त औरत है, मज़बूत इरादों वाली! बुरा न मानो तो, अभी सोच लो, अभी ब्याह नहीं हुआ है तुम्हारा!”
“उसका मज़बूत होना, ग़लत है क्या?”
“ग़लत नहीं! पर तुम्हें पता होना चाहिए कि वह अपना जीवन अपनी तरह से जिएगी, तुम्हारे अनुसार नहीं ढलने वाली!”
“मैं चाहता भी नहीं कि वह मेरे अनुसार ढले!”

रितेश, सुबोध की ओर देखकर कुछ इस तरह हँसा कि जैसे सुबोध कोई नादान बच्चा हो।

मही, किराये के अपने दो कमरों की दुनिया और बालकनी से बाहर दिखती विशाल प्रकृति के साथ बहुत सन्तुष्ट है। यहाँ समय के बन्धन से स्वतंत्र हो, चाय का बड़ा मग हाथों में लिये, बैठ जाने पर, बहुत सारे क्रियात्मक विचार उसके आस-पास की हवा में बहने लगते हैं। दिमाग़ शांत होता है, और वह दिमाग़ को रचने की स्वतंत्रता दे पाती है। क्या उसे नया घर चाहिए? किसी समझौते के साथ तो बिलकुल नहीं। उसके अस्तित्व की सबसे बड़ी ज़रूरत है, रच पाना, और रच पाने की प्रक्रिया में अपनी कल्पनाओं को खाद पानी दे पाना! वह सब यहाँ, इस किराये के मकान में बख़ूबी हो पा रहा है।

क्या मही को, अपने जीवन में इससे अधिक और कोई ज़रूरत नहीं है? ऐसा नहीं है! किसी भी अन्य इन्सान की तरह, उसे भी ऐसे किसी दोस्त की ज़रूरत है, जिससे वह अपने ख़्याल, अपनी उपलब्धियाँ, स्वयं को अभिव्यक्त न कर पाने की व्यथा और अपनी सभी ख़ुशियाँ साझा कर सके। अपनी और उसकी परेशानियों पर बात कर पाये, जिसके साथ बैठकर एक-दूसरे की समस्याओं के हल खोजने की कोशिश की जा सके। यही क्यों, ऐसा साथ, जिसके साथ, ख़ामोशियाँ भी बाँटी जा सकें। वह सोचती, क्या सुबोध वह दोस्त, वह साथ है? पता नहीं! उसे सुबोध का साथ अच्छा लगता है, सही है! पर क्या सुबोध के साथ पूरा जीवन साझा करने के बारे में सोच सकती है वह? पता नहीं!

सुबोध मही के साथ, पूरा जीवन साझा करने के बारे में सोच सकता है क्या? सोच ही तो रहा है। वह जानता है कि मही एक बहुत स्वतंत्र व्यक्तित्व है। और वह वैसी ही रहे, उसमें कोई आपत्ति भी सुबोध को भला क्यों ही होगी, वह जैसी है, वैसी ही तो पसंद है उसे! उसे और अधिक सोचने की ज़रूरत महसूस नहीं होती, पर मही को होती है। क्या सचमुच उसे सुबोध के व्यक्तित्व का हर पहलू स्वीकार है, या फिर सुबोध को उसके व्यक्तित्व का!

“इतना नहीं सोचते मही! इतना सोचोगी, तो कभी किसी नतीजे पर नहीं पहुँच पाओगी!” सुबोध उससे कहता।

तब वह कहती, “यह ज़रूरी तो नहीं कि तुम्हें अभी मेरे बारे में हर वह बात पता हो, जो हमारे आपसी तालमेल के लिए ज़रूरी है, या मुझे तुम्हारी हर ऐसी बात।”
“कितनी ही बातें साथ रहने पर ही तो पता चलती हैं। अपने ही बारे में कितनी सारी बातें, हमें पता नहीं होतीं। वे किसी विशेष ट्रिगर पर सामने आती हैं। ऐसा नहीं होता कि हम कई बार अपनी ही कही किसी बात या अपने किसी व्यवहार पर चकित हो जाते हैं! फिर सोचने लगते हैं कि, ऐसा क्यों हुआ! मैं आम तौर पर ऐसा व्यक्ति नहीं हूँ।”
“तुम ठीक कह रहे हो।” वह कहती, “फिर भी, अभी थोड़ा और सोच लेना चाहती हूँ।
“अपना समय लो मही! पर, साथ तो आओ! फिर हमेशा साथ रहना है या नहीं, यह निर्णय लेने में तुम्हें आसानी होगी।”

“तुम्हारा समय ख़राब कर रही है, यह लड़की!” माँ खीजती। माँ की तलाश की हुई लड़कियों को वह लम्बे समय से मना करता चला आ रहा था। उसे यह बात बुरी भी लगती थी। पर वह एक साथी की तलाश में है! नाप-तौल कर हिसाब-किताब कर के, सामाजिक ज़रूरतों के, भौतिकता के आधार पर, किसी व्यापार की तरह किसी से दोस्ती करने के फ़ैसले किये जाते हैं क्या!

मही और सुबोध को मिले बहुत समय नहीं हुआ। किताबों की चटोरी और रंगों से खेलती यह लड़की, अपने बड़े शहर से, रूसी चित्रकार रोरिक की कला दीर्घा से मशहूर, इस छोटे-से क़स्बे, ‘नग्गर’ में और कितने सारे बाहर से आये ‘वर्क फ़्रॉम होम’ वाले युवाओं की तरह, किराये पर रह रही थी। चित्रकला का अध्ययन और अभ्यास कर रही वह इस शांत और सुन्दर स्थान पर बहुत ख़ुश रहती थी। उन दिनों, ऊपर से दिख रहे गाँव के छप्परों की तस्वीर बनाती, वह दिन के विशेष दो घंटे, उस विशेष स्थान पर बिताती थी। फिर सूरज अपना स्थान बदल लेता और गाँव के छप्पर अपना रंग! तब वह अपने रंग और ब्रश समेटती और अधूरी तस्वीर लिये लौट जाती। कभी-कभी वहीं बैठी रहकर, चुपचाप, पहाड़ों, बादलों, जंगलों और नदी को ताकती रहती…

कुछ दिनों से उसके वाले उस विशेष स्थान के आस-पास, उसे बड़े से लैंस वाले कैमरा के साथ सुबोध दिखने लगा था। वह भी कुछ विशेष घंटों अपने कैमरा को सैट करता, फिर विशेष पल में तस्वीरें खींचता, और फिर सब कुछ समेटकर लौट जाता। दो-तीन दिन बाद ही उनमें बात होने लगी। कला के उनके माध्यम अलग थे, पर फिर भी, बात करने के लिए बहुत कुछ साझा। दोनों बाक़ायदा प्रशिक्षित थे और रंगों, विषय वस्तु, रोशनी इत्यादि कई सारे साझे विषयों पर चर्चा चल निकलती। दोस्ती हुई, बढ़ती गयी, गहराती गयी।

सुबोध पास की ही पर्यटन नगरी से आता था, जहाँ उसके परिवार के पास दो होटलों के साथ, अन्य कुछ स्थानों पर फलों के बाग़, आय के साधन थे। परिवार समृद्ध था। नग्गर में भी उनके पास कुछ ज़मीन थी। इसी ज़मीन पर अपने रहने का घर और साथ ही होम स्टे चलाने की सुबोध की योजना थी। यहाँ के कई सारे परिवारों में यही चलन था। समाज के इस वर्ग के पास पैसा था। बच्चे कहीं न कहीं विदेशों में पढ़ने चले जाते, कुछ सीखकर, लौटते और पारिवारिक पर्यटन के व्यवसाय में कुछ न कुछ जोड़कर उसे आगे बढ़ाते। सुबोध का फ़ोटोग्राफ़ी का शौक़, पारिवारिक व्यवसाय में कुछ जोड़ पाने के लिए नहीं, बल्कि उसका प्रेम, उसका जनून भी था।

मही से दोस्ती बढ़ी, तो उसे लगने लगा था कि मानो, वह बरसों से उसी का इन्तज़ार कर रहा हो। उसकी जीवन शैली में मही बिलकुल फ़िट बैठती थी।

नये घर का उल्लास, सचमुच ही, सुबोध से अधिक उसके पापा को था। इसका ख़र्चा भी वही उठाने वाले थे। यूँ भी, उनके पास जो भी था, सुबोध का ही तो होने वाला था। बस बात यह थी कि पापा को अपने अनुभव पर भरोसा था और सुबोध को अपनी विदेशी और आधुनिक जीवन जीने के ढंग की समझ पर। पापा समाज से जुड़ाव वाली जीवन शैली को महत्व देते, वैसे घर की प्रस्तावना रखते, और सुबोध अपने ही तरीक़े से जीते हुए, समाज की अपनी पीढ़ी के साथ चलने की बात करता।

जीवन में मही के आ जाने से, उलझन कुछ बढ़ती नज़र आती थी। पर सुबोध के मन में, अपने साथी और उसके साथ वह जैसा जीवन जीना चाहता था, उसकी तस्वीर बिलकुल साफ़ थी। वह अपने फ़ोटोग्राफ़ी स्टूडियो वाला घर बनाये, यह बात तो उसके मम्मी-पापा को समझ आती थी, पर उस लड़की के लिए आर्ट स्टूडियो डिज़ाइन करना, जिसने अभी शादी के लिए हाँ भी न कहा हो, उनके गले नहीं उतर रहा था।

“तो रुक जाते हैं न कुछ समय!” उस शाम बात चली तो सुबोध ने कहा।
मम्मी बोलीं, “तो अब अपने जीवन की सारी योजनाएं उसके हिसाब से बनाओगे?”
“क्या परेशानी है, इसमें? जिसके साथ परिवार बनाना चाहता हूँ, उसके हिसाब से योजना नहीं बनाउंगा?”
पापा बात समझते, सँभालते बोले, “ठीक कह रहे हो बेटा, पर हमें तुम्हारे लिए अलग घर और होमस्टे अभी बनाना है। बना लेते हैं! फिर चाहे यह लड़की आये, या कोई और, तुम्हें तो जैसे रहना है, वैसे ही रहना है! क्या फ़र्क पड़ता है।”

सुबोध को यह सुनकर कुछ भय-सा लगा, जैसे कि मही उसके जीवन में नहीं भी हो सकती है। और वह यह कल्पना भी नहीं करना चाहता था। और भला कौन थी, मही के जैसी?

मम्मी समझाने लगी, “बहुत आज़ादी मांगने वाली लड़कियां ठीक नहीं रहतीं, बेटा! तुम्हें नहीं सँभालेगी वह!”
“मैं छोटा बच्चा हूँ क्या कि मुझे सँभालना पड़े?” वह हँस पड़ा। मम्मी फिर बोलीं, “पुरुष हमेशा बच्चा ही रहता है। तुम्हारे पापा तो अभी भी छोटे बच्चे हैं, उन्हें मैं न सँभालती तो जीवन कैसे चलता!?” और मम्मी-पापा इस बात को उपलब्धि की तरह लेकर हँसने लगे!

सुबोध को इस मानसिकता पर ग़ुस्सा भी आया और वह उदास भी हो गया! बोला, “पुरुष हमेशा बच्चा रहता है, क्योंकि तुम, यानी पूरी की पूरी सामाजिक व्यवस्था, ऐसा चाहती है।”

अगले ही पल मही के रूप में स्वतन्त्र स्त्री के प्रति सम्मान उसके भीतर और दृढ़ होकर बैठ गया!

उसने अगले ही दिन के लिए मही से ख़ूब सारे समय की मांग करते हुए, कहीं बाहर समय बिताने का अनुरोध किया, और वह मान भी गयी।

“क्या ख़ास बात करना चाहते हो? फिर से प्रोपोज़ करना है?” अपनी प्लेट में लज़्ज़ानिया सर्व करते हुए, मही ने हंसते हुए पूछा।
“प्रोपोज़ तो मैं कर चुका, तुम्हारे जवाब का इन्तज़ार कर रहा हूँ, जब भी आएगा!” सुबोध मुस्कुराया।
“फिर? कुछ और ख़ास बात?”
“बस! यूँ ही! कुछ और बातें करने के लिए, कुछ और जानने के लिए, मिलते रहना ज़रूरी है ना!”
सुबोध की तरफ़ गार्लिक ब्रेड बढ़ाते हुए मही मुस्कुरायी! सुबोध ने पूछा, “कैसे जीना चाहती हो, मही? क्या योजनाएं हैं तुम्हारी?”
“किस बारे में?”
“तुम्हीं बताओ! क्या महत्वपूर्ण है तुम्हारे लिए? तुम्हारा कोई नया प्रोजेक्ट? अगले पाँच साल या दस साल, या पूरा जीवन, किस तरह बिताना चाहोगी?”
“सुबोध! मुझे बिलकुल सही तरीक़े से पता है कि मैं हमेशा तस्वीरें बनाती रहना चाहती हूँ! एग्ज़ीबीशन्ज़ करना! और इस विषय पर लिखना मेरा सपना है! और तुम?”
“तुम्हें पता है, फ़ोटोग्राफ़ी मेरा शौक़ नहीं, मेरा प्रेम है। मैं भी इसे, कभी नहीं छोड़ूँगा। हालाँकि मैं लम्बे अंतरालों के लिए इस जगह से बाहर नहीं रह सकता! फ़ोटोग्राफ़ी के लिए भी, दूसरी जगहों पर जाकर रहना, हमेशा नहीं कर सकता। पर्यटन का पारिवारिक कारोबार मुझे चलाना भी है, और मुझे पसंद भी है। रोज़ नये लोगों से मिलना होता है। तुम्हें पता है, कि मेरे बचपन में ही, मुझे फ़ोटोग्राफ़ी का शौक़ आया कहाँ से?
“कहाँ से?”
“मेरे बचपन में, हमारे होटल में हर साल आकर ठहरने वाले एक मेहमान से!” वह मुस्कुराया, “हमारे घरेलू व्यवसाय ने मुझे, मेरे व्यक्तिगत जीवन में बहुत कुछ दिया है!”
“अच्छा लगता है, जब हमें अपनी रुचियाँ साफ़ दिखायी पड़ती हैं।”
“किस तरह के स्टूडियो की कल्पना करती हो तुम?”
“वादी में खुलती बालकनी और बड़ी-बड़ी खिड़कियों वाला एक स्टूडियो अपार्टमेंट हो, छोटा-सा! बहुत ज़रूरतें नहीं हैं मेरी!”
“तुम्हारी पसन्द का एक स्टूडियो अपार्टमेंट, हम अपने नये घर में बनाएँ, तो वहाँ रहकर देख सकती हो कि तुम्हें कैसा लगता है!”
“प्रपोज़ ही तो कर रहे हो!” वह हँसने लगी।
“नहीं! यह अलग है! मैं अपने अपार्टमेंट के लिए किरायेदार पक्का कर रहा हूँ! एकदम प्रोफ़ेशनल तरीक़े से!” उसने हँसते हुए कहा।
“किरायेदार हमेशा नहीं रहते!”
“वह हमेशा रह जाने वाली प्रोपोज़ल को दोहराना, अलग से, बाद के प्लान में है!”

वे दोनों हंसते रहे! मही को स्वतंत्रता का एक भरोसा बनता दिखायी दे रहा था।

सुबोध, नग्गर वाली अपनी ज़मीन पर बनने वाले हट्स और मुख्य भवन के डिज़ाइन पर अपने पापा से चर्चा कर रहा था! जिस तरह से वर्क फ़्रॉम होम का चलन बढ़ने लगा था। कई सारे लोग, पहाड़ी क़स्बों की तरफ रुख़ करने लगे थे। ऐसे समय में, पारिवारिक रिहायशी हिस्से के साथ, अलग-अलग तलों पर स्टूडियो अपार्टमेंट्स का होना, एक अच्छा निर्णय था।

“पापा, मही एक अपार्टमेंट में रहेगी, तो हम अपने रिश्ते को बेहतर समझ पाएंगे! चली भी गयी तो मम्मी को घर के डिज़ाइन के ख़राब होने का डर तो नहीं रहेगा!”
पापा उससे सहमत थे। बोले, “सुबोध, मन से चाहता हूँ कि तुम लोग साथ रहो! पर न रह पाओ तो स्वतंत्र होने का विकल्प होना ज़रूरी है! तुम्हारी मम्मी और मैं, हम दोनों अपने बेटे को तकलीफ़ में नहीं देखना चाहते, बस!”
“और मैं आपसे झूठ बोलकर कुछ नहीं करना चाहता!”
“घर के डिज़ाइन से बढ़कर मेरे लिए तुम्हारी ख़ुशी और तुम्हारी सुरक्षा है, सुबोध!” मम्मी ने कहीं से आकर कहा तो सुबोध के मन से बड़ा बोझ हट गया।

नग्गर के पहाड़ और घाटियाँ, जंगल और घरों की पत्थर वाली छतें, अपने रंग जल्दी-जल्दी बदलने लगे थे। मही की तूलिका और सुबोध के कैमरा लैन्स, रोज़ नये रंगों वाली तस्वीरें बनाने में व्यस्त थे। और, रेस्तरां में बैठे, मही और सुबोध अपनी ज़रूरतों के हिसाब से, भविष्य की बहुत सारी योजनाओं के साथ, दो छोटे स्टूडियो अपार्टमेंट्स के साथ एक आरामदायक नये घर के डिज़ाइन बनाने लगे थे।

इशिता राजन, ishita rajan

ईशिता आर. गिरीश

घर में साहित्यिक वातावरण के चलते बचपन में पास-पड़ोस के बच्चों को इकट्ठा कर कहानी रचने और कहने में विशेष रुचि व कहानियां पढ़ने का चस्का रहा। 8 वर्ष की उम्र में पहली कविता, 'आग की चिंगारियों पर'। कॉलेज के दिनों में कविता को नया मोड़, 1987 के बाद फिर से कहानी रचने की ओर रुजहान। कुछ पत्रिकाओं के लिए अंग्रेज़ी से हिन्दी अनुवाद किये, पुस्तक समीक्षाएँ भी। स्केच बनाने में रुचि! तैलचित्र और फ़ैब्रिक आर्ट भी बनाती हैं। एक कविता संग्रह व एक कथा संग्रह प्रकाशित है। कुछ किताबें प्रकाशनाधीन। इन दिनों कुल्लू में अवर लेडी ऑफ़ द स्नोज़ स्कूल में अध्यापन से सेवानिवृत होकर लेखन, सामाजिक कार्य और चित्रकला में संलग्न! संपर्क- 9816970519

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