harrow, war monument, london
भोपाल निवासी साहित्यकार विवेक रंजन श्रीवास्तव इन दिनों लंदन प्रवास पर हैं। नियमित लेखन के अभ्यास व स्वभाव के चलते वह उन विचारों/अनुभवों/दृश्यों आदि को दर्ज कर रहे हैं, जो लंदन यात्रा की देन हैं। इस कोने को इंदराज की तरह पढ़ें, यात्रा संस्मरण की या टिप्पणियों की तरह, अपने संदेशों के साथ ज़रूर जुड़ें।
दूर देस में लेखक-17....

भारत से लाये पत्थर पर हमारे नाम चिट्ठी

              हैरो ऑन द हिल की ढलानों और पुरानी गलियों से गुज़रते हुए इतिहास बार-बार सामने आ खड़ा होता है। कहीं सदियों पुराना चर्च, कहीं पुरानी इमारतें और कहीं किसी भूले हुए व्यक्ति की स्मृति को बचाये हुए कोई पत्थर। लेकिन इस बार मेरी नज़र एक अपेक्षाकृत आधुनिक स्मारक पर ठहर गयी।

गहरे काले-भूरे ग्रेनाइट का एक ऊंचा, सादा-सा त्रिकोणीय स्तंभ। न कोई भव्य प्रतिमा, न हाथ में तलवार लिये कोई सैनिक, न विजय का कोई आक्रामक प्रतीक। बस पत्थर और उस पर उकेरे हुए कुछ शब्द। पास जाकर पढ़ा तो लगा, यह स्मारक युद्ध की कहानी से अधिक मनुष्य की कहानी कह रहा है, मनुष्यों के नाम किसी चिट्ठी की तरह।

स्मारक पर लिखा है, इसे 2005 में हैरो के लोगों की स्मृति में बनाया गया, उन नागरिकों और दुनिया के विभिन्न हिस्सों से आये उन लोगों की स्मृति में, जिन्होंने अपने प्राण दिये ताकि दूसरे स्वतंत्रता में जी सकें। अंत में एक आग्रह है, जो लोग बाद में अगली पीढ़ी में आएं, वे यह सुनिश्चित करें कि उन्हें भुलाया न जाये।

इन कुछ पंक्तियों में युद्ध का पूरा दर्शन जैसे सिमट आया है। युद्ध में मरने वाला व्यक्ति केवल सैनिक नहीं होता। उसके पीछे एक घर होता है, परिवार होता है, कोई प्रतीक्षा करता हुआ व्यक्ति होता है और एक ऐसा भविष्य होता है जो उसके हिस्से में नहीं आया। लेकिन इस स्मारक की दृष्टि केवल अपने लोगों तक सीमित नहीं है। वह ‘हैरो’ से निकलकर ‘दुनिया’ तक जाती है।

harrow, war monument, london

यही बात इसे अन्य स्मारकों से अलग बनाती है।

शायद इसीलिए स्मारक पर किसी विशेष युद्ध का नाम प्रमुखता से नहीं लिखा गया। यह किसी एक तारीख़ या किसी एक रणभूमि को याद करने के बजाय उस सार्वभौमिक क़ीमत को याद करता है जो स्वतंत्रता के लिए मनुष्य ने चुकायी है।

इस स्मारक का इतिहास भी कम दिलचस्प नहीं। इसे स्थानीय पूर्व-सैनिकों के एक अभियान के बाद 2005 में स्थापित किया गया था। उन्हें लगा कि हैरो का पुराना नागरिक युद्ध-स्मारक पर्याप्त नहीं है। नया स्मारक बनाया गया और बाद में जब सिविक सेंटर के पुनर्विकास की योजना बनी तो उसे हटाकर फेंका नहीं गया, बल्कि 2024 में हैरो टाउन सेंटर में नये स्थान पर सम्मानपूर्वक स्थापित किया गया।

पत्थर भी अपने आप में एक छोटी-सी वैश्विक संबंधों की कहानी कहता है। स्मारक जिस काले-भूरे चित्तीदार ग्रेनाइट से बना है, वह भारत से आयात किया गया था। ब्रिटेन की धरती पर खड़ा यह स्मृति-स्तंभ, भारत के पत्थर से बना है और उन लोगों को याद करता है जिन्होंने दूसरों की स्वतंत्रता के लिए जीवन दिया। इतिहास कभी-कभी कितने अनपेक्षित रास्तों से देशों और मनुष्यों को जोड़ देता है।

मुझे लगा, स्मारक केवल मृतकों की याद में नहीं होते। वे जीवितों के लिए भी होते हैं। वे हमें बताते हैं कि जिस स्वतंत्रता को हम सहज मानकर जी रहे हैं, उसके पीछे किसी की असहज मृत्यु हो सकती है।

हैरो की सड़क पर आते-जाते लोग इस पत्थर के पास से गुज़रते हैं। कोई रुकता होगा, कोई फूल रखता होगा, कोई बस एक नज़र डालकर आगे बढ़ जाता होगा। शहर की ज़िंदगी अपनी गति से चलती रहती है। लेकिन स्मारक वहीं खड़ा रहता है, चुप, निर्विकार।

और उस पर लिखे शब्द जैसे राह चलते मनुष्य से एक छोटा-सा प्रश्न पूछते हैं…

जिन्होंने अपनी जान देकर हमें स्वतंत्रता दी, क्या हम उन्हें याद रखेंगे?

इतिहास को बचाने की ब्रिटिश आदत का एक अर्थ यह भी है कि वे केवल पुरानी इमारतें नहीं बचाते, वे स्मृतियों के लिए भी जगह बचाते हैं। कभी किसी मध्ययुगीन चर्च में, कभी किसी पुराने भवन की दीवार पर और कभी शहर के बीच खड़े एक साधारण-से ग्रेनाइट से बने स्मारक में।

हैरो का यह स्मारक मुझे इसी अर्थ में सुंदर लगा, यह युद्ध का महिमामंडन नहीं करता, मृत्यु का प्रदर्शन नहीं करता। यह केवल स्वतंत्रता की क़ीमत याद दिलाता है।

और शायद किसी स्मारक के लिए इससे बड़ी सार्थकता और क्या हो सकती है कि उसके सामने खड़ा व्यक्ति कुछ क्षण के लिए अपने वर्तमान से बाहर निकलकर उन अनजान लोगों के बारे में सोचने लगे, जिनकी वजह से उसका आज संभव हुआ। हैरो में भारतीय, पाकिस्तानी, बंग्लादेशी आबादी ख़ूब है। बातचीत में एक पाकिस्तानी दूकानदार ने स्वयं को इंडियन कहा, शायद मुझे इंडियन समझकर, हिंदी में बात करते हुए, मुझे लगा अखंड भारत बसा ही हुआ है हैरो में।

(1 सितंबर, विश्व पत्र दिवस के अवसर पर विचारणीय है कि क्या ऐसे स्मारक आने वाली पीढ़ियों के नाम पूर्वजों के पत्र नहीं हैं!)

विवेक रंजन श्रीवास्तव, vivek ranjan shrivastava

विवेक रंजन श्रीवास्तव

सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।

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