
- September 14, 2026
- आब-ओ-हवा
- 1
हिंदी की ज़मीनें... लंदन में बरसों से बसी हुई सुप्रसिद्ध साहित्यकार दिव्या माथुर जी के साथ हैरो-ऑन-हिल्स के एक कैफ़े में विवेक रंजन ने आब-ओ-हवा के लिए की साहित्यिक गुफ़्तगू...
दूर देस में हिन्दी के अपनों का मन-1
लंदन में रहते हुए जब किसी से पूछा जाता है आप कहाँ के हैं, तो इस छोटे-से सवाल के पीछे छिपी हुई पूरी ज़िंदगी जैसे सामने आ खड़ी होती है। हम अनजाने ही शायद सबसे पहले भूगोल में दिलचस्पी लेते हैं। मैंने बातचीत की शुरूआत इसी सवाल से की।
मैंने पूछा, “लंदन में इतने वर्षों से रहते हुए, अगर कोई आपसे यह पूछे तो क्या अब उस जवाब में लंदन भी शामिल होता है?”
दिव्या जी ने कुछ क्षण सोचा और फिर सहजता से कहा, “मेरा परिवार बहादुर शाह ज़फ़र के ज़माने से दिल्ली में है। मैं 1985 से लंदन में हूँ, लेकिन सच पूछें तो मैं न पूरी तरह दिल्ली की हूँ, न लंदन की। मेरा मन तो गाँवों और छोटे नगरों में अधिक रमता है।”

शायद यही वह जगह थी, जहाँ बातचीत ने अपना पहला मोड़ लिया। भौगोलिक पहचान के इस छोटे-से सवाल में जैसे स्मृतियों का एक पूरा भूगोल खुल गया था।
मैंने पूछा, “तो फिर लंदन का पहला दिन याद है? उस समय का लंदन और आज का लंदन, इन दोनों के बीच आपको सबसे बड़ा बदलाव क्या दिखता है?”
वे थोड़ी देर अतीत में लौटती हुई-सी लगीं। बोलीं, “ओडैंस, डेनमार्क जैसे सुंदर और आधुनिक शहर में रहने के बाद लंदन में रहना शुरू किया तो कुछ ऐसा लगा था, जैसे दिल्ली के यमुना पार के किसी इलाक़े में आ पहुँची हूँ।”
फिर मुस्कराकर उन्होंने लंदन की अपनी पसंदीदा जगहों का ज़िक्र किया। “सालों घूमने-फिरने के बाद जाना कि लंदन में बहुत-सी ख़ूबसूरत जगहें हैं। याद आया कि आर्ट्स काउंसिल ऑफ़ इंग्लैंड की एक कविता परियोजना के अंतर्गत ब्रिटेन के कवियों की रचनाओं को प्रकाशित किया गया था, उन चित्रों के साथ जो उनके पसंदीदा स्थान पर विशेष तौर पर पेशेवर ब्रिटिश फ़ोटोग्राफ़र्स द्वारा खींचे गये थे। क्योंकि मेरी पसंदीदा जगह वाटरलू-ब्रिज है इसलिए मेरी फ़ोटो ब्रिज पर उस स्थान से खींची गयी, जहाँ से पूरा वेस्टमिन्स्टर ऐबी (पार्लियामेंट हाउस) का मनोरम दृश्य दिखता है। यहाँ की इमारतों का कोई सानी नहीं।”
फिर जाने कैसे बातचीत अचानक वर्तमान की ओर लौट आयी।
“हाँ, बदलाव बहुत हुए हैं,” उन्होंने कहा। “1985 और आज, 2026 के बीच लंदन में दुर्भाग्यवश बहुत बड़े बदलाव आये हैं। विशेषतः यूरोपियन यूनियन से अलग होने और कोरोना महामारी के बाद देश जैसे पूरी तरह संभल ही नहीं पाया। जिस स्वास्थ्य सेवा, NHS, का कभी उदाहरण दिया जाता था, उसकी हालत आज जर्जर है। शिक्षा की स्थिति भी कुछ अलग नहीं। विद्यालयों की इमारतों की मरम्मत न जाने कब से नहीं हुई। बड़े-बड़े विश्वविद्यालय अमीर घरानों के विद्यार्थियों पर टिके हैं। बड़ी कंपनियाँ बंद हो गयीं या बंद होने की कगार पर हैं। महँगाई और आवास की समस्या चरम पर है।”
उनकी बात में शिकायत से अधिक एक लंबे समय से देखती आ रही दुनिया की चिंता थी।
मैंने पूछा, “परदेस में रहते हुए अपने देश की ऐसी कोई छोटी-सी चीज़ याद आती है, जिसे कोई पर्यटक शायद समझ भी न पाये?”
इस बार उत्तर बहुत छोटा था, लेकिन शायद सबसे अधिक निजी।
“चीज़ें तो नहीं,” उन्होंने कहा, “परिवार और संवेदनशील मित्रों की कमी खलती है, विशेषतः तीज-त्योहारों पर।”
मैंने बातचीत को थोड़ा और निजी करते हुए पूछा कि क्या लंदन की किसी सड़क, मौसम, पार्क, नदी या स्टेशन ने कभी अचानक उन्हें अपने शहर या गाँव की याद दिलायी।
वे लंदन की मेट्रो को लेकर ख़ास तौर पर प्रभावित दिखीं। फिर दिल्ली का ज़िक्र आया। “हाल ही चाँदनी चौक स्टेशन पर उतरी तो पिछली बार की तुलना में रख-रखाव का स्तर बहुत गिरा हुआ लगा। लंदन में कितनी भी बारिश हो जाये, सड़कों पर पानी नहीं भरता। लेकिन दिल्ली या नोएडा में जरा-सी बूँदाबाँदी हो और घुटने-घुटने पानी भर जाता है।”
बात स्वाभाविक रूप से यात्रा से भाषा की ओर मुड़ गयी। आख़िर जिस व्यक्ति ने इतने वर्षों तक दो संस्कृतियों के बीच रहते हुए लिखा-पढ़ा हो, उसके लिए भाषा केवल अभिव्यक्ति का माध्यम कैसे रह सकती है?
मैंने पूछा, “हिंदी आपके लिए आख़िर क्या है, भाषा, स्मृति, घर, पहचान या इन सबके बीच कुछ और?” इस सवाल पर उनकी आवाज़ में जैसे आत्मीयता उतर आयी।
“हिंदी का महत्व मुझे ब्रिटेन में रहने के बाद ही समझ में आया,” उन्होंने कहा। “भारत में थी तो अंग्रेज़ी साहित्य से बहुत प्रभावित रही, विशेषतः ब्रिटिश ‘ह्यूमर’ से। लेकिन भारतीय उच्चायोग और फिर नेहरू केंद्र-लंदन में काम करने के दौरान हिंदी के प्रचार-प्रसार से जुड़ने का अवसर मिला। वहीं भारतीय साहित्यकारों को नज़दीक से समझा।”
वे थोड़ी देर रुकीं, फिर वातायन-यूके की स्थापना का ज़िक्र करते हुए बोलीं, “उन्हें समझने के लिए मैंने वातायन-यूके की स्थापना की; बहुत-सी साहित्यिक शृंखलाएँ आयोजित कीं, जिनके माध्यम से स्वयं मैंने हिंदी के लब्धप्रसिद्ध साहित्यकारों को पढ़ा, सुना, गुना। अब तो हिंदी मेरे लिए साँस की आवक-जावक है।”
मैंने पूछा, “क्या विदेश में रहते हुए हिंदी से आपका रिश्ता भारत में रहने की अपेक्षा और गहरा हुआ?”
उन्होंने जवाब में एक मुहावरा का संदर्भ दिया, “Distance makes the heart grow fonder” यानी पास रहते समय जिस व्यक्ति या चीज़ की क़द्र नहीं होती, दूरी होने पर उसका मूल्य बख़ूबी समझ आता है। बातचीत में यह सवाल भी आया कि क्या प्रवासी साहित्य को अलग से प्रवासी साहित्य कहना ज़रूरी है, या साहित्य की कोई भौगोलिक नागरिकता होती ही नहीं।
उन्होंने कहा प्रवासी लेखकों की दुनिया को समझने के लिए केवल उनके पते को देखना पर्याप्त नहीं है। उनके सामने अनंत चुनौतियाँ हैं और उनके प्रति सहानुभूति भी बहुत कम है, “सब यह मानकर चलते हैं कि यहाँ पैसा पेड़ों पर उगता है,” वे हँसते हुए बोलीं, “सभी करोड़पति हैं और सबका जीवन बड़ा आरामदायक है। जबकि सच्चाई इससे नितांत विपरीत है।”
फिर उनकी बात में हल्की तल्ख़ी आयी, “प्रवासी होने के नाते कुछ लेखक वाहवाही ज़रूर पा लेते हैं, लेकिन अंततः काम बोलता है। ‘नॉस्टैलजिया’ को लेकर जिस तरह प्रवासी भारतीय लेखन की आलोचना की जाती है, वह भी मुझे कुछ अजीब लगता है। मैंने बहुत-से तुर्की, चेक और रूसी लेखकों को पढ़ा है। वे बार-बार अपने देश के इतिहास को खंगालते दिखायी देते हैं। फिर प्रवासी भारतीय लेखन को ही क्यों संदेह की नज़र से देखा जाये?”
मैंने पूछा, “लंदन में हिंदी पढ़ने, लिखने और सुनने वालों की दुनिया कैसी है?”
वे मुस्करा दीं। “जहाँ तक हिंदी का संबंध है, हम आज भी भारतीय प्रकाशकों और पाठकों पर ही निर्भर हैं। लिखने वाले, पढ़ने वाले और सुनने वाले, सब एक ही हैं। यूँ भारत में भी मैं यही देखती हूँ। श्रोता वही हैं, जो मंच पर जाने की आस में बैठे हैं। अपनी सुनाकर चलते बनते हैं। किसी को किसी से मुरव्वत नहीं है।”
बात साहित्य से पाठकों की नयी पीढ़ी तक पहुँची। मैंने उन बच्चों के बारे में पूछा जिनकी पहली भाषा अंग्रेज़ी है। क्या वे हिंदी साहित्य से जुड़ना चाहते हैं? और अगर चाहते हैं तो उन्हें हिंदी से जोड़ने का सबसे अच्छा रास्ता क्या हो सकता है?
इस सवाल पर उन्होंने कोई आसान नुस्ख़ा नहीं दिया। उनकी बातचीत से इतना ज़रूर स्पष्ट था कि भाषा को बचाने के बजाय उसे जीवन में स्वाभाविक रूप से जीवित रखने की ज़रूरत है। विश्वविद्यालयों, साहित्यिक संस्थाओं और प्रवासी समाज की भूमिका भी इसी संदर्भ में महत्वपूर्ण है।
अब बातचीत साहित्यकार के निजी संसार में प्रवेश कर चुकी थी। मैंने पूछा, “आपके जीवन में कोई किताब है, जिसने आपको भीतर से बदल दिया?”
इस बार उत्तर तुरंत आया।
“श्रीरामचरितमानस। हमारा परिवार राम-भक्त रहा है। रामायण को मैंने तेरह वर्ष की आयु से नियमित रूप से पढ़ा है, हारमोनियम, तबले और मंजीरों के साथ सैकड़ों बार इसका पाठ किया है। हालांकि पिता सूफ़ी थे किन्तु रामनाम की माला उनकी साँसों के साथ चलती थी। दशकों तक रामायण के विद्वानों से इसकी साप्ताहिक विवेचना सुनी है। आज भी जब इसे पढ़ती हूँ तो कुछ न कुछ नया हासिल होता है।”
मैंने पूछा, “कोई ऐसा लेखक या कवि जिससे आप कभी मिली नहीं, फिर भी लगता है कि उससे आपकी आत्मीय बातचीत है?”
उन्होंने बिना किसी झिझक के कहा, “जॉन मिल्टन।”
‘पैराडाइज़ लॉस्ट’ के रचनाकार मिल्टन की चर्चा करते हुए उनके चेहरे पर विशेष उत्साह दिखायी दिया। “मिल्टन के महाकाव्य की भाषाई समृद्धि, धार्मिक-दार्शनिक गहराई और दार्शनिक महत्वाकांक्षा की मैं सदा से प्रशंसक रही हूँ।”
मैंने मज़ाक़ में पूछा, “अगर आपको अपने साथ केवल पाँच किताबें लंदन लाने की मजबूरी हो तो?”
उन्होंने किताबों के नाम गिनाये, “रामायण, महाभारत, ऑस्कर वाइल्ड की ‘द इम्पॉर्टन्स ऑफ़ बीइंग अर्नेस्ट’, लियो टॉल्स्टॉय की ‘वार एंड पीस’, शारलेट ब्रॉन्टे की ‘जेन आयर’ और रूमी की ‘लव इज़ अ स्ट्रेंजर’।”
मैंने हँसते हुए टोका, “पाँच कहने पर छह हो गयीं?”
इस पर शायद वे भी मुस्करा दी होंगी क्योंकि कुछ किताबें गिनती से बाहर होती हैं।
आजकल क्या पढ़ रही हैं, इस सवाल पर उन्होंने आँखों की तकलीफ़ का ज़िक्र किया। “आजकल पढ़ना क़रीब-क़रीब बंद है, सिवा वातायनम् पत्रिका के लिए मिली सामग्री के। क्लासिक्स के अलावा मुझे जासूसी उपन्यास और सत्तर-अस्सी दशक की कॉमेडीज़ बहुत पसंद हैं। आजकल कुछ युवा लेखकों को पढ़ने की कोशिश में हूँ। लैपटॉप पर बहुत-सी पुस्तकें सुरक्षित कर रखी हैं।”
मैंने पूछा, “क्या देश बदलने से लेखक की भाषा बदल जाती है, या भाषा के भीतर छिपा देश उसके साथ चलता रहता है?”
“अब तो पूरा विश्व सिमटकर एक ग्लोबल विलेज में तब्दील हो गया है। यहाँ-वहाँ जैसा कुछ बचा नहीं। चाहें तो इसे तीसरी दुनिया कह लें। कुछ भविष्यवादी कहानियाँ और फ़ैंटेसी लिखी थीं, कुछ और लिखना चाहती हूँ।”
अब बातचीत भारत और ब्रिटेन के बीच आ गयी थी। मैंने पूछा, “दोनों समाजों को क़रीब से देखने के बाद आप क्या चाहेंगी कि भारत और ब्रिटेन एक-दूसरे से ये सीखें?”
उन्होंने ब्रिटिश नागरिकों की अनुशासनबद्धता, न्यायप्रियता और अक्षम लोगों के प्रति सम्मान की बात की। फिर भारतीय समाज की ख़ूबियों की ओर लौटीं, “हमारे यहाँ भोजन की विविधता है, संस्कृति है, संवेदनशीलता है, मेहमाननवाज़ी है।”
उनका मानना था भारत और ब्रिटेन के बीच संबंध केवल इतिहास से नहीं बने हैं। कला, संगीत, थिएटर, डिज़ाइन और अनेक सांस्कृतिक विधाओं ने भी दोनों समाजों को जोड़ा है।
“भारतीय चाहे जहाँ जाकर बस जाएँ,” उन्होंने कहा, “एक भरा-पूरा भारत उनके दिल में सदा ज़िंदा रहता है, भाषा, कला-संस्कृति, खान-पान, तीज-त्योहार और परंपराओं के रूप में।”
मैंने पूछा, “भारत के बारे में ब्रिटेन में सबसे बड़ा भ्रम क्या है और ब्रिटेन के बारे में भारत में?”
उन्होंने कहा कि आज भ्रम की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए, फिर भी अज्ञानता बनी हुई है। विशेषतः स्कैंडिनेवियाई देशों में भारत को लेकर अब भी यह धारणा मिल जाती है कि भारत ग़रीब और गंदा देश है, जहाँ जानवर सड़कों पर घूमते हैं और बंदरों-रीछों के तमाशे दिखाये जाते हैं।
फिर ब्रिटेन की ओर मुड़ते हुए बोलीं, “और भारत में ब्रिटेन को लेकर सबसे बड़ा भ्रम यह है कि यहाँ सब बहुत अमीर हैं, बहुत साफ़-सफ़ाई है और नस्लवाद ख़त्म हो चुका है।”
लंदन की बहु-सांस्कृतिक दुनिया ने उनकी सोच को किस तरह बदला, यह पूछने पर उन्होंने एक बहुत सरल लेकिन गहरी बात कही।
“दुनिया गोल है। रंग-बिरंगी पोशाकें हैं, तरह-तरह की भाषाएँ हैं, विविध संस्कृतियाँ हैं, लेकिन अच्छे-बुरे लोग हर जगह हैं। उनकी मानसिकताएँ, परेशानियाँ और बीमारियाँ भी समान हैं। जिजीविषा भी समान है। इसलिए मैं किसी भी राष्ट्रीयता के प्रति पूर्वाग्रही न होने का प्रयत्न करती हूँ।”
बातचीत का एक और दिलचस्प मोड़ तब आया जब साहित्यिक पत्रिकाओं में अप्रकाशित रचनाएँ माँगने की परंपरा पर चर्चा हुई।
उन्होंने लगभग झुंझलाहट के साथ कहा, “एक बेचारे लेखक के लिए इतनी सारी शर्तें क्यों हैं? संपादक बिना किसी पारिश्रमिक के अप्रकाशित रचनाओं का आग्रह करते हैं। आम तौर पर रचना मिलने की सूचना तक नहीं देते। लेखक कब तक आस लगाये बैठा रहे?”
फिर उन्होंने सवाल को ही पलट दिया, “अच्छी प्रकाशित रचना क्यों दो जगह प्रकाशित नहीं की जा सकती? सब पत्रिकाओं के पाठक अलग होते हैं।”
मैंने बातचीत को फिर थोड़ा हल्का किया। पूछा, “अगर लंदन में आपको एक दिन के लिए कोई भारतीय शहर मिल जाये तो कौन-सा शहर चुनेंगी?”
उत्तर आया, “केरल का कालेनचैरि – कोचीन का एक उपनगर।”
फिर वहाँ के लोगों, उद्यानों, खान-पान और अध्यापक-प्राध्यापकों तथा विद्यार्थियों का ज़िक्र करते हुए उन्होंने कहा, “सुंदर प्राकृतिक पर्यावरण के साथ ही साथ मुझे वहाँ के लोग भी मुझे बहुत पसंद हैं, विनम्र, मिलनसार और विविध कलाओं में निपुण। वे हमेशा मेरी इतनी ख़ातिर-तवाजो करते हैं।”
मैंने पूछा, “अगर आपकी ज़िंदगी पर लंदन की कोई सड़क, स्टेशन या नदी एक कविता लिखे तो उसका शीर्षक क्या होगा?”
उन्होंने बिना सोचे कहा, “वाटरलू, एक शब्द जो अपने में सदियों का इतिहास समेटे है।”
भाषा की बात फिर लौट आयी। मैंने पूछा, “ऐसी कौन-सी ब्रिटिश अभिव्यक्ति है जिसे आप चाहती हैं कि काश! हिंदी में भी उसी सहजता से इस्तेमाल किया जा सके?”
उन्होंने कहा, “‘Serendipity’। क्योंकि इसके तुल्य कोई दूसरा शब्द अंग्रेज़ी में भी नहीं है।”
फिर मैंने उल्टा सवाल किया, “और हिंदी का ऐसा कोई शब्द?”
इस बार उत्तर था, “‘पंगा’।”
वे हँसते हुए बताती हैं एक जर्मन प्राध्यापक और अनुवादक युटटा ऑस्टिन ने उनकी कहानी ‘पंगा’ का अनुवाद किया तो महीनों तक दोनों उसके अंग्रेज़ी पर्याय की तलाश करते रहे, लेकिन सफलता नहीं मिली।
मैंने पूछा, “अगर आज भारत लौटकर बिना किसी औपचारिक काम के पूरा एक दिन बिताने का अवसर मिले तो कहाँ जाएँगी?”
उत्तर बहुत घरेलू और आत्मीय था।
“दिल्ली में निज़ामुद्दीन में स्थित सुंदर नगर नर्सरी में पेड़ों के नीचे घूमूँगी।”
शायद विदेश में रहते हुए देश की सबसे बड़ी याद कभी-कभी किसी महान स्मारक की नहीं, पेड़ों की छाँव की होती है।
मैंने अंत की ओर बढ़ते हुए पूछा, “लंदन ने आपको अपने बारे में ऐसी कौन-सी बात बतायी जो भारत में रहते हुए आप नहीं जान पायी थीं?”
उन्होंने जैसे अपने अनुभवों का सार एक साथ रख दिया।
“मुस्कराना, अजनबियों का अभिवादन करना, धन्यवाद कहने और स्वीकारने में हिचकिचाना नहीं, पुलिस पर विश्वास करना और सबसे बड़ी बात, कुछ अपने लिए जीना।”
मैंने पूछा, “आज के युवा हिंदी लेखक से आपकी सबसे बड़ी अपेक्षा?”
उन्होंने कहा, “विश्व के प्रतिष्ठित लेखकों को पढ़ने के बाद ही लिखना शुरू करें। आत्म-आलोचना सीखें और किसी की राय माँगे तो उसका आदर करें।”
बातचीत अब समाप्ति की ओर थी। चाय शायद कब की ठंडी हो चुकी थी, लेकिन बातचीत में अभी भी गर्माहट थी।
मैंने आख़िरी सवाल रखा, “और अंत में, अगर ‘आब-ओ-हवा’ के पाठकों से बिना किसी औपचारिकता के बस दो मिनट गुफ़्तगू करनी हो, तो आप उनसे क्या कहना चाहेंगी?”
उन्होंने प्रवासी लेखकों की ओर संकेत करते हुए कहा, “बिना उन्हें पढ़े, सुनी-सुनायी बातों को न दोहराएँ और न ही उनके बारे में कोई राय क़ायम करें।”
यही शायद इस पूरी बातचीत का सबसे सधा हुआ निष्कर्ष था।
किसी लेखक की पहचान उसके पते से नहीं, उसकी रचना से होती है। दूरी चाहे दिल्ली और लंदन की हो, भाषा चाहे हिंदी और अंग्रेज़ी के बीच की हो, अंततः साहित्य मनुष्य तक पहुँचने की वह राह है जहाँ भूगोल धीरे-धीरे पीछे छूट जाता है।

विवेक रंजन श्रीवास्तव
सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।
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