गुजराती कहानी, हिंदी, मौलश्री ही क्यों, gujrati kahani, hindi anuvad
कुछ बातें कभी पुरानी नहीं होतीं और उन्हें कहने के लिए कोई अलंकृत भाषा की ज़रूरत भी नहीं होती। तेज़ बहती धारा में एक कंकड़ समर्पित होने की हल्की-सी सुगबुगाहट जैसी है यह कहानी। इसकी लेखक और अनुवादक बकुला घासवाला ही हैं, जो गुजराती में प्रतिष्ठित लेखक हैं और अब अनुवाद का रुख़ भी कर रही हैं। (शशि खरे-संपादक, कथा प्रस्तुति)

गुजराती कहानी हिंदी में: मौलश्री ही क्यों?

             अगर मैं अपनी डायरी के कुछ पन्नों पर बिखरी उसकी यादों को इकठ्ठा करूँ और अपने दिल की बातें अपने शब्दों में लिखूँ तो वह शब्दांकन इस तरह होगा: जब मैंने उसे पहली बार देखा तब वह मौलसिरी के पेड़ के नीचे ध्यानमग्न होकर किताब पढ़ रही थी, पता नहीं क्यों, लेकिन जैसे ही मेरी नज़र उस पर पड़ी, मेरी धड़कन थम गयी।

इत्तेफ़ाक से, परीक्षा में उसका नंबर मेरी बेंच पर ही आया और मुझे अब भी लगता है कि तब मेरे दिल की धड़कनें और बढ़ गयी थीं। वैसे, वह कृष्णकली भी अपने लंबे घुंघराले बालों के साथ, मोहक और आकर्षक लगती थी। वह स्वभाव से ही अंतर्मुखी होगी, मैं यह कैसे भूल सकता हूँ कि जब मैं उसके पास बैठकर बोर्ड की परीक्षा दे रहा था, तो उसने मेरी तरफ़ देखा तक नहीं था! मुझे अब भी उन दिनों में हमारे बीच हुई बस एक छोटी-सी बातचीत याद है।

मैंने पूछा – क्या आपको पेड़ बहुत पसंद हैं?
– हां। मौलसिरी यानी बकुल सबसे ज़्यादा। इसके फूल आकर्षक और ख़ुशबूदार होते हैं इसीलिए मुझे पसंद हैं।

वह बातचीत और छह-सात दिन का समय मेरे मन के एक कोने में पूरी तरह से जम गया है।

हालांकि बाद में मुझे पता चला कि वो जिस परिवार से है, वो हमारी पहुंच से बाहर है! वो मेरी यादों में तो बसी रही लेकिन मैंने उसे अपने दिल की बात कहने का साहस छोड़ दिया। घर के हालात और पापा की कठोरता से दबा मैं अपनी हद से आगे नहीं जा सकता था। अगर वो कहीं भी दिख जाती तो मैं ख़ुश हो जाता। एक बार मैं दोस्तों के साथ पढ़ रहा था और मैंने कहा कि आज मैंने उसे देखा, उसे देखा तो ऐसा लगा जैसे.. जेठ की तपती-जलती धूप में बकुल की ख़ुशबू वाली शीतल बयार छूकर निकल गयी हो।

बाद में मेरे दोस्त जानने के लिए बेताब हो गये कि वो कौन है, लेकिन मैंने कभी उसका नाम नहीं लिया।

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बाद में इत्तेफ़ाक़ से ही हमारे रास्ते अलग हो गये लेकिन वो मेरे मन में बसी ही रही। उसकी शादी किसी अमीर घराने में हो गयी और वो मेरी आँखों से ओझल, फिर अपनी ही दुनिया में खो गयी। मैं भी अपनी दुनिया और करियर में खो गया।

मेरा भी एक संसार था और अपना व्यवसाय था। उसे ख़ुशनुमा और सुविधाओं से भरपूर रखना मेरा फ़र्ज़ था और है। अपनी ही दुनिया में राज़ी रहने वाले घरवाले मेरे कठोर परिश्रम की और मन की बात नहीं जानते। इतना पाने के लिए मैंने जो तपस्या की है वह अप्रतिम और बहुत कठिन है।

सामने, उसकी ज़िंदगी भी बड़ी सयानी और अच्छी गृहिणी जैसी है। वह हमेशा अपने बच्चे, पति-घर, बाग-बगीचे, खेत, बड़ा कारोबार, बड़े परिवार और पब्लिक लाइफ़ की छोटी-मोटी भाग-दौड़ वाली आदतों में हमेशा व्यस्त दिखती है। कभी-कभी किशोरियों की प्रगति के लिए, पर्यावरण और जनहितकारी कार्यों की वजह से हम कभी-कभी मिलते थे लेकिन हमारा रिश्ता कभी स्मित से आगे नहीं बढ़ा और सच तो यह भी है कि मैं उसे कुछ कहने की हिम्मत कभी भी नहीं कर पाया।

सिर्फ़ इतना ही नहीं, किसी अपने स्वजनों या दोस्तों से भी नहीं। सिर्फ़ दिन या महीने ही नहीं, सालों बीतने लगे लेकिन मैं वहीं रह गया था जहां था। बस, मेरे मन में उसके साथ की हुई छोटी-सी बातें, अपने पसंदीदा गाने और उसके सहवास के सपने थे। वो सिर्फ़ मेरे लिए था, मैं उसके मन में था या नहीं, यह भी एक कल्पना का विषय था।

समय के साथ, इत्तेफ़ाक़ से, उनके समधी हमारे पड़ोसी बन गये। इस वजह से, उसकी कई बातें मुझ तक अनायास पहुँचती रहीं। जब भी उसका बेटा ससुराल आता था तो वह मेरे घर में ही ज़्यादातर वक़्त बिताता था और बातों का सिलसिला चलता रहता। हालाँकि उसका आना तो बहुत कम होता था और जब आती भी थी तो उससे बातें नहीं होती थीं। लेकिन फिर एक मौक़ा मिला जाता था कि मैं उसे देख सकूँ।

अब उसकी शादी की पचासवीं सालगिरह और उसकी 70वीं सालगिरह पर उसके बच्चों ने एक सरप्राइज़ पार्टी रखी थी। वहाँ कोई उपहार या फूलों का गुलदस्ता लेकर नहीं जाना था लेकिन उन्होंने कुछ अलग तरह के गिफ़्ट देने की पहल की थीं। सादगी और प्यार के मेल से बनी एक सुंदर देहाती सजावट और ख़ूबसूरत माहौल बनाये रखे, ऐसी एक सुखद शाम में सबको बस दो लाइनों में उस दंपत्ति के लिए अपनी भावनाएँ जतानी थीं।

किसी ने गाना गाया तो किसी ने किसी फ़िल्म या नाटक के डायलॉग सुनाये। मैं यहाँ भी चुप था। सहरा के चातक पक्षी की तरह आकंठ प्यासा! मेरी पत्नी ने हमारी तरफ़ से औपचारिक रूप से दो बातें कहीं और अपनी शुभकामनाएँ दीं लेकिन जो मुझे कहना था, वह मेरे मन में ही रह गया।

मैं ‘भीगी रात’ फ़िल्म का वह गाना सुनाना चाहता था, “दिल जो न कह सका…” परंतु गले से आवाज़ निकली ही नहीं। भले ही यह अहसास फ़िल्मी लगे, लेकिन इसे देखकर मेरे मन में मुग्ध अवस्था के आनंद का वह दौर वापस आ गया जैसे अब भी उसी समय में जीता हूँ। जो भी हो, बहुत समय के बाद आज मुझे उसे शांति से देखने का मौक़ा मिला। उसके घने बाल ग़ायब हो चुके थे!

उसके सेठानीपन की परत उसके शरीर पर जम चुकी थी। घुंघराले बालों की जगह विग ने ले ली थी, लेकिन मुझ पर इसका कोई असर नहीं था क्योंकि हमने उसकी बहू से उसके बालों की दुखद कहानी पहले ही सुन ली थी।

जब हम उससे मिले तो उसने अपने पुराने दिनों को याद करते हुए अपने जीवनसाथी को बताया कि मैंने इनके साथ एक ही बेंच पर बैठकर मैट्रिक की परीक्षा दी थी। इतनी-सी बात सुनते ही मेरा दिल बाग़-बाग़ हो गया। ओह, उसे आज भी वह याद है। तो मैं ज़रूर उसके मन में हूँ। फिर मेरी कल्पना का दौर आगे बढ़ा और जो हुआ वह मेरी सोच से भी परे था!

वह खाने के दौरान मेरे पास से अकेली गुज़र रही थीं तब मैंने उसे बुलाकर जल्दी से बताया कि मैं पचास साल से अपने मन में कुछ भावनाओं को लेकर जी रहा हूँ। मुझे नहीं पता कि आपके लिए मेरे मन में क्या फ़ीलिंग्स थीं और अब भी हैं। शायद यह मेरी मूर्खता थी या पहला क्रश था, आपके प्रति सम्मान या प्रशंसा थी या मुझे वह भी पता नहीं है कि मैं आपसे कैसा प्यार करता हूँ लेकिन मेरे मन में आज भी आपके लिए कुछ विशिष्ट लगाव है।

मैंने आप को पहली बार बकुल के पेड़ के नीचे देखा था और पल भर में ही आप ह्रदयस्थ हो गयी थीं। आप अभी भी उन पेड़ों को पसंद करती हैं, वह मुझे पता हो गया है क्योंकि बकुल के पेड़ों को अभी भी आप के बग़ीचे में देखता हूँ… उसने दो मिनट तक मुझे देखा और बिना कोई अन्य प्रतिक्रिया दिये बिना धन्यवाद कहा और अपने जीवनसाथी के पास मुस्कुराते चेहरे के साथ जाकर खड़ी हो गयीं।

मैं थोड़ा-सा हलबला तो गया था लेकिन कौन जानता है उस पल में ख़ुद को तनावमुक्त भी महसूस कर रहा था! अब उसे सोचना था, मैंने तो उसे बता दिया! हालांकि यह ऐसा था जैसे वहीं किसी नाटक के किसी दृश्य का अभिनय चल रहा हो लेकिन उसकी गहरी शांति ने उसके गंभीर, गहन अनुभवी व्यक्तित्व का अंदाज़ा दे दिया।

मुझे समझ नहीं आ रहा था कि अब क्या होगा? मैं किस समय में जी रहा था और यहाँ जो हो रहा है वह कौन-सी सच्चाई है?

जब सरप्राइज़ पार्टी में उस की सालगिरह को लेकर गिफ़्ट देने का दूसरा दौर शुरू हुआ तो उसके रिश्तेदारों ने उसकी पसंद की चीज़ों में हिस्सा लेने के लिए अलग-अलग प्लान बताये, उनमें से किसी ने किताब पब्लिश करने की बात की तो किसी ने वीडियो फ़िल्म बनाने की।

उसके बेटे ने अपनी माँ के पर्यावरण और पेड़ों से प्यार, पानी बचाने और साफ़-सफ़ाई के बारे में बात करना शुरू किया और गाँव के दो तालाबों की सुरक्षा की ज़िम्मेदारी लेने का वादा किया तब पता नहीं क्यों लेकिन मैंने बिना सोचे-समझे कहा कि मैं शहर की चारों ओर सत्तर बोरसल्ली के पेड़ लगाऊँगा और उनकी देखभाल करूँगा कि वे बढ़ें और सदाबहार बनें।

उस समय, मैंने उसकी सत्तर साल की आँखों में एक ख़ास चमक देखी, जिसे सिर्फ़ मैं ही समझ पाया। वहाँ मौजूद लोगों को यक़ीन था कि मैं जो कहूँगा, वही करूँगा।

तालियों की गड़गड़ाहट में मैंने अपनी पत्नी की तरफ़ देखा तक नहीं शायद जान-बूझकर! अगली सुबह, मैंने पार्टी की सफलता को लेकर अपनी ख़ुशी ज़ताने के लिए उसे फ़ोन करने की हिम्मत जुटायी और जब मैंने “आप, आप, आप कैसी हैं?” कहकर बात शुरू की तो वह अचानक बोल पड़ी, “क्या आप-आप करते हो, मैं तुम्हारे लिए कोई अजनबी हूँ?”

फिर उसने हमारे बीच तब हुई छोटी-सी बातचीत को हूबहू सुनाया और मैं उस पल में पहुँच गया, जहाँ एक परीक्षा खंड था और एक किशोर एवं एक किशोरी एक ही बेंच पर बैठकर परीक्षा के पेपर लिख रहे थे!

बाद में वही अपनी पसंदीदा कवयित्री की रचना याद करता रहा:

समय के पंख लगाकर समय के आरपार।
चल, बकुल के साये में हो जाएं एकाकार।

जानता नहीं मैं तुम्हारे मन की बात,
फिर भी कह दी अपने दिल की बात।

अंतर्मन के आरपार उमड़ पड़ा है समंदर प्यार का,
बीते वर्षों की प्यास को बुझा सकूँ तुम्हारे साथ।

काश, अभी ही जा पाता यादों के वनांचल में,
जहाँ भूल जाऊँ बीते समय की अग्निपरीक्षाएँ

नवसर्जन की दहलीज़ पर खडे होकर,
अगर छू सकें उसी आसमां को, दोनों साथ।

चलो, बनकर पंछी हम उड़ते रहे आसमां में,
समय के पंख लगाकर कर, समय से आरपार!

हालाँकि, समझ की हद में ही खड़े रहे, हमने कोई बेवकूफ़ी नहीं की। पंद्रह साल बाद, जब हम 85 साल के हुए, तो हमारा छोटा-सा शहर मौलश्री की ख़ुशबू से सराबोर हो गया था। साथ में मैं भी। हमारी अलग-अलग दुनिया पूरी तरह से बरकरार है, सिर्फ़ हम दोनों, जिन्होंने चार पीढ़ियाँ देखी हैं, वही जानते हैं कि मौलश्री ही क्यों…

बकुला घासवाला, bakula ghaswala

बकुला घासवाला

कर्मशील-लेखिका-अनुवादक-कवि। क़रीब आधा दर्जन किताबें लेखन-सहलेखन में प्रकाशित हैं। गुजराती साहित्य परिषद द्वारा 2005 का भगिनी निवेदिता अवार्ड (प्रथम)। मृणालिनी साराभाई की अंग्रेज़ी आत्मकथा ‘द वॉइस आफ़ द हार्ट' का गुजराती अनुवाद 'अंतर्नाद-एक नृत्यांगना जीवन’ को साहित्य अकादमी, दिल्ली द्वारा 2019 में पुरस्कृत किया गया। हाल ही ऑडियो नॉवेल ‘सात पेटी ना संबंधे’ जिज्ञेश पटेल की आवाज़ में प्रसारित हुई। आकाशवाणी से प्रसारित। वलसाड की 'अस्तित्व' संस्था की स्थापना व सक्रियता में विशिष्ट योगदान। समाज-संस्कृतिसेवी।

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