
- September 14, 2026
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नियमित ब्लॉग नमिता सिंह की कलम से....
संस्कृतियों का संगम: ऐतिहासिकता और आधुनिक संदर्भ
डाॅ. भोलाशंकर व्यास की कृति ‘समुद्र संगम’ को, जो भारतीय ज्ञानपीठ से प्रकाशित हुई थी, उसे समसामयिक उपन्यासों के बीच पढ़ना एक अलग अनुभव है। यह ऐतिहासिक उपन्यास सरसरी तौर पर नहीं पढ़ा जा सकता क्योंकि यह मुग़ल शहज़ादे दाराशुकोह के गुरु, प्रसिद्ध कवि पंडितराज जगन्नाथ की आत्मकथा ही नहीं, बल्कि पूरे युग की कहानी है।भारतीय इतिहास का मध्यकाल आज के सामाजिक जीवन और राजनीति के संदर्भों में आज भी महत्वपूर्ण है। यहाँ आज भी अभागा दाराशुकोह एक जनप्रिय नायक है। इतिहास में हारे हुए नायक के लिए केवल मौत होती है और विजयी के लिए सिंहासन। औरंगज़ेब ऐतिहासिक तथ्यों और साक्ष्यों के बावजूद सर्वमान्य खलनायक है। इन पात्रों ने भारतीय रचनाकारों को हमेशा प्रभावित किया। उर्दू के उपन्यासकार काज़ी अब्दुल सत्तार का उपन्यास ‘दाराशुकोह’ भी चर्चित रहा।
यह उपन्यास कविराज पंडित जगन्नाथ की आत्मकथा के रूप में है। वह किशोरवय में ही मुग़ल सल्तनत के संपर्क में आते हैं और फिर दाराशुकोह के गुरु के रूप में सम्राट शाहजहाँ के भी अत्यंत निकट और प्रिय पात्र बनते हैं। यह उपन्यास उस काल का तथा दाराशुकोह के अलावा औरंगज़ेब, शाहजहां, जहानआरा तथा रोशनआरा के चरित्रों का भी गहन विश्लेषण करता है। उपन्यास में पंडितराज जगन्नाथ की मुग़ल ख़ानदान की एक कन्या से प्रणय गाथा भी है।
पंडित जगन्नाथ के माध्यम से लेखक ने दारा के व्यक्तित्व का विश्लेषण करते हुए उसे एक दार्शनिक और अध्येता के रूप में प्रस्तुत किया है। वह फ़ारसी के साथ-साथ पंडित जगन्नाथ के शिष्य के रूप में संस्कृत का विद्वान है। भारतीय दर्शन का अध्ययन कर उसे किसी बिन्दु पर इस्लाम की प्रमुख मान्यताओं के साथ एक नयी समन्वयवादी संस्कृति की स्थापना करना चाहता है, बहुत कुछ अपने पूर्ववर्ती अकबर महान के सुलहकुल की तरह। अंतर यह है कि दारा स्वयं हिन्दू दर्शन और संस्कृतियों का अध्येता है, फ़ारसी और संस्कृत दोनों में साधिकार काव्य रचना करता है लेकिन वह कूटनीतिज्ञ नहीं, भावुक है। बेहद अव्यावहारिक वह कठोर, राजनीतिक फ़ैसले नहीं कर पाता। अपने इर्द-गिर्द फैले षड्यंत्र जाल को भी नहीं समझता। बेहद अंधविश्वासी दारा ज्योतिषियों और नजूमियों की भविष्यवाणियों पर अत्यधिक भरोसा करता है, जो अक्सर उसकी हार का कारण भी बनते हैं।
दूसरी ओर औरंगज़ेब व्यवहार-कुशल है, बहुत अच्छा योद्धा और कुशल रणनीतिकार है। उसके लिए धार्मिक मुद्दे सत्ता की प्राप्ति और स्थायित्व के लिए उपयोगी तत्व हैं।

लेखक ने विभिन्न स्तरों पर स्त्रियों की स्थितियों का भी विशद वर्णन किया है। मुग़ल सल्तनत की स्त्रियों और परिचारिकाओं का विस्तार से वर्णन है। राजवंश की स्त्रियाँ संभवतः सबसे अधिक दयनीय और अभागी होती हैं। अकबर के समय से ही मुग़ल शहज़ादियों के विवाह का निषेध कर दिया गया था क्योंकि परिवार में शामिल होने वाला दामाद भी राज्य सत्ता के लोभ में अक्सर षड्यंत्रों का हिस्सा बन जाता था।
हाड़ा राजा राव छत्रसाल के ऊपर आसक्त जहानआरा का उत्कट प्रेम प्रसंग बेहद मार्मिक है।ऐतिहासिक रूप से यह कितना सत्य है, कहा नहीं जा सकता। जहानआरा अंत में सूफ़ी-संत की शिष्या बन जाती है और अध्यात्म की राह पकड़ती है। रोशनआरा औरंगज़ेब की निकटतम सहयोगी है और उच्छृंखल स्वभाव की है। बादशाह स्वयं उसके द्वारा अपने महल में छिपाये गये दो नौजवान पुरुषों को मौत की सज़ा देते हैं।
उस समय के सामाजिक-राजनीतिक परिदृश्य को रेखांकित करते हुए लेखक कहता है, “हिन्दू समाज की वर्ण व्यवस्था और सामाजिक न्याय से वंचित निम्न वर्ण के लोग स्वेच्छा से मुसलमान बने और हिन्दू समाज सिकुड़ता रहा।” लेखक आज भी भारतीय समाज में धार्मिक भेदभाव की समस्या से चिंतित है। इसी संदर्भ में लेखक कहता है कि सुलहकुल पर बादशाह अकबर की नीति अधूरी थी। उसने सामाजिक समन्वय के लिए राजपूत कन्यायों से विवाह किया लेकिन उसने मुग़ल राजकुमारियों को हिन्दू राजाओं की पत्नी नहीं बनाना चाहा। शासक और शासित की नीति-व्यवहार में भेद बना रहेगा, तो योजनाएँ सफल नहीं हो सकतीं।
निर्णायक सामूगढ़ के युद्ध में भी धोखों से घिरे दारा की हार हुई। वहाँ चंपतराय बुन्देला ने धोखा किया। शहज़ादे के ज्योतिष पर अंधविश्वास का फ़ायदा भी छिपे हुए गद्दारों ने उठाया।
धर्म का इस्तेमाल राजनीति में सत्ता प्राप्ति के लिए हमेशा होता रहा है। दारा-औरंगज़ेब की गाथा भी इस प्रवृत्ति पर स्पष्ट संकेत करती है। धर्म ने हमेशा अपने समय की सत्ता का समर्थन किया और राज्य सत्ता के अत्याचार और अन्याय को धर्मसम्मत बना उसे स्वीकृति प्रदान की। हारे हुए दारा और उसके छोटे बेटे सिपहर शुकोह को मैले-कुचैले कपड़ों में जब चाँदनी चौक की सड़कों पर घुमाया गया तो रोती-कलपती जनता में बेहद रोष था। जनता के विद्रोह का डर था। औरंगज़ेब ने उलेमाओं से सलाह ली। उन्होंने सहमति दी कि शरीअत के मुताबिक दाराशुकोह ने इस्लाम में यक़ीन करना बंद कर दिया है और वह काफ़िर हो चुका है इसलिए उसके लिए एक ही सज़ा है, सज़ा-ए-मौत। उलेमाओं के फ़तवे की मुहर के बाद उनका रातो-रात क़त्ल कर दिया गया।
सूफ़ी-संत सरमद, दारा जिनका भक्त था, वह घूम-घूमकर लोगों को दारा और उसके बेटे के क़त्ल का समाचार देने लगा। एक बार फिर उलेमाओं ने उसे शरीयत के मुताबिक़ जीवन बसर करने को कहा। फिर उसको भी काफ़िर होने का फ़तवा देकर क़त्ल कर दिया गया।
पंडित जगन्नाथ भी बनारस के पंडितों द्वारा धर्मच्युत और जातिच्युत कर दिये जाते हैं। एक तो उन्होंने यवनी से विवाह किया था और शूद्रों को संस्कृत के धार्मिक ग्रंथों के अध्ययन में सहायता दी थी। बनारस से निष्कासित पंडित जगन्नाथ मथुरा में शरण लेते हैं। मथुरा की जागीर दाराशुकोह की निजी जागीर थी। केशवराय मंदिर को वह नियमित आर्थिक सहायता देता था। उसकी मृत्यु के बाद यहाँ भी किसानों से लगान और व्यापारियों से चुंगी बहुत बढ़ा दी गयी और धार्मिक आधार पर भेदभाव किया जाने लगा।
मथुरा के किसान सरपंच का बेटा गोकुला पंडित जगन्नाथ के संपर्क में आया। उसने किसानों को संगठित किया और लगान वसूली के ख़िलाफ़ सशस्त्र विद्रोह कर दिया। सरकारी गुमाश्तों सहित मथुरा का फ़ौजदार मारा गया। बाद में यह विद्रोह दबा दिया गया। स्वयं पंडित जगन्नाथ को मथुरा छोड़कर वृन्दावन आना पड़ा।
उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता इसका भाषा सौंदर्य और अद्भुत प्रकृति वर्णन है। विपुल सौंदर्य से आच्छादित कश्मीर में प्रकृति का मानवीकरण लेखक की सूक्ष्म दृष्टि का परिचय देता है। पंडित जगन्नाथ मूलतः कवि थे इसलिए पूरा उपन्यास काव्यात्मकता के रस में डूबा है, चाहे फ़ारसी हो या संस्कृत काव्य हो।
लेखक इस देश की कृषक जनता की कर्मठता और संघर्षशीलता पर बहुत भरोसा करता है कि कृषक समुदाय की मेहनत ही धर्म और मज़हब के ठेकेदारों के निहित स्वार्थों का विरोध कर समन्वित समाज की रचना में योगदान करेगी। वह कामना करता है कि ईश्वर आगे उसे कृषक समाज में पुनर्जन्म दे।

नमिता सिंह
लखनऊ में पली बढ़ी।साहित्य, समाज और राजनीति की सोच यहीं से शुरू हुई तो विस्तार मिला अलीगढ़ जो जीवन की कर्मभूमि बनी।पी एच डी की थीसिस रसायन शास्त्र को समर्पित हुई तो आठ कहानी संग्रह ,दो उपन्यास के अलावा एक समीक्षा-आलोचना,एक साक्षात्कार संग्रह और एक स्त्री विमर्श की पुस्तक 'स्त्री-प्रश्न '।तीन संपादित पुस्तकें।पिछले वर्ष संस्मरणों की पुस्तक 'समय शिला पर'।कुछ हिन्दी साहित्य के शोध कर्ताओं को मेरे कथा साहित्य में कुछ ठीक लगा तो तीन पुस्तकें रचनाकर्म पर भीहैं।'फ़सादात की लायानियत -नमिता सिंह की कहानियाँ'-उर्दू में अनुवादित संग्रह। अंग्रेज़ी सहित अनेक भारतीय भाषाओं में कहानियों के अनुवाद। 'कर्फ्यू 'कहानी पर दूरदर्शन द्वारा टेलीफिल्म।
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