
- September 14, 2026
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हिंदी की ज़मीनें.... एक रंगकर्मी की नज़र से समाज (विशेष रूप से हिंदी पट्टी का जनमानस), सत्ता और रंग-संस्कृति की बेबाक पड़ताल।
पंकज निनाद की कलम से....
हिंदी रंगमंच: संकट का ग्रहण बनाम रोशनी की उम्मीद
हिंदी भाषी क्षेत्रों में रंगमंच की परंपरा कोई नई या उधार ली हुई चीज़ नहीं है। हमारे पास लोकनाट्य की इतनी समृद्ध और विविध परंपराएँ रही हैं कि उनकी पूरी सूची बनाना भी मुश्किल है। रामलीला, नौटंकी, स्वांग, माच, नाचा, तमाशा, लोकगीत, क़िस्सागोई और कथावाचन… मनुष्य के मनोरंजन से लेकर धार्मिक आस्था और सामुदायिक जीवन तक, प्रदर्शन कलाएँ हमेशा हमारी साँसों का हिस्सा रही हैं। आधुनिक दौर में भी हिंदी भाषी क्षेत्र ने हबीब तनवीर, ब.व. कारंत, अलखनंदन और वंशी कौल जैसे बड़े रंगकर्मी दिये, जिन्होंने देश की सीमाओं के बाहर तक भारतीय रंगमंच की पहचान बनायी। फिर भी एक सच्चाई से आँख नहीं चुरायी जा सकती।
स्वतंत्रता की शताब्दी की ओर बढ़ते भारत में हिंदी रंगमंच की स्थिति चिंताजनक है। वह आज भी उस शिशु की तरह दिखायी देता है, जिसे लंबे समय से इनक्यूबेटर पर रखा गया हो। प्रतिभाएँ आती हैं, अच्छे नाटक होते हैं, उत्सव मनाये जाते हैं, लेकिन एक ऐसी आत्मनिर्भर रंगमंचीय व्यवस्था अब तक नहीं बन पायी, जहाँ कलाकार, दर्शक और अर्थव्यवस्था एक-दूसरे को सहारा देते हुए अपने पैरों पर खड़े हो सकें।
जब भी कोई रंगसंस्था बंद होती है या कोई अभिनेता थिएटर छोड़कर सिनेमा की ओर चला जाता है, तो हम मान लेते हैं कि समस्या अनुदान की है। अनुदान मिलता है, कुछ समय के लिए गाड़ी चलती है और फिर वही संकट सामने आ खड़ा होता है। असल सवाल शायद इससे कहीं अधिक बुनियादी है— जिस समाज के पास इतनी समृद्ध प्रदर्शन परंपराएँ रही हों, वहाँ आधुनिक रंगमंच इतना कमज़ोर क्यों रह गया?

इस सवाल को समझने के लिए हमें पहले यह पूछना होगा कि किसी समाज को कला की ज़रूरत ही क्यों है।
भोजन, कपड़ा और मकान मनुष्य को शारीरिक रूप से जीवित रखते हैं, लेकिन क्या सिर्फ़ साँस लेना ही जीवन है? रोटी हमें जीवित रखती है; कला हमें यह समझने में मदद करती है कि हम जीवित क्यों हैं। मनुष्य को कहानी चाहिए, स्मृति चाहिए, कल्पना, सौंदर्य और अपने अस्तित्व को समझने की बेचैनी चाहिए। किसी सभ्यता का मूल्यांकन उसकी इमारतों की ऊँचाई या जीडीपी से नहीं होता, बल्कि इस बात से होता है कि उसने अपने दौर को किस तरह देखा और महसूस किया।
रंगमंच इन सबमें थोड़ा अलग है। साहित्य को हम अकेले पढ़ सकते हैं, संगीत अकेले सुन सकते हैं; लेकिन रंगमंच मनुष्यों को एक जगह इकट्ठा करता है। एक जीवित मनुष्य दूसरे मनुष्य के सामने खड़ा होकर उसका दुख, प्रेम, अपराध और संघर्ष जीता है। यहीं से सहानुभूति पैदा होती है।
रंगमंच समाज का आईना ही नहीं, उसका एक्स-रे भी है। वह उन अंतर्विरोधों को सामने ला देता है, जिन्हें समाज अपनी आधुनिकता के दावे के पीछे छिपा लेना चाहता है।
जब समाज सहिष्णु होने का दावा करता है, तब रंगमंच सवाल पूछता है— फिर असहमति से इतना डर क्यों है? जब समाज स्त्रियों के सम्मान का ढोल पीटता है, तो रंगमंच पूछ लेता है कि फिर उसे अपनी मर्ज़ी से जीने की ज़मीन क्यों नहीं मिलती?
सिर्फ़ समाज ही नहीं, लोकतंत्र को भी रंगमंच की इसी कड़वी सच्चाई की ज़रूरत है। लोकतंत्र केवल चुनाव और मतदान नहीं है, वह सवाल पूछने का साहस है। हर दौर की सत्ता अपने पक्ष में एक चमकीला आख्यान बनाती है— हमने विकास किया, हमने देश बचाया। कला उस आख्यान में दरार डालती है।
सत्ता कहती है विकास हुआ, नाटक पूछ लेता है कि उसकी क़ीमत किसकी ज़मीन ने चुकायी? इतिहास लिखता है युद्ध जीत लिया गया, मंच पर खड़ा एक सिपाही पूछ लेता है कि उस युद्ध में मरा कौन? जब चारों तरफ़ ढिंढोरा पीटा जा रहा हो कि सब ख़ुश हैं, तब नाटक का एक अकेला पात्र कह देता है— “मैं ख़ुश नहीं हूँ।”
लेकिन यहाँ एक कठिन सवाल खड़ा होता है— अगर कला समाज को गढ़ती है, तो समाज कला को कैसे प्रभावित करता है?
हमारे यहाँ लोककलाएँ थीं, लेकिन कलाकार को समाज के बराबर के नागरिक का दर्जा देने वाली सामाजिक संरचना कमज़ोर रही। हमने कला का उपयोग किया, कलाकार का सम्मान नहीं किया।
रुदाली की परंपरा में शोक की सामूहिक अभिव्यक्ति के लिए स्त्रियों के भावनात्मक श्रम की ज़रूरत तो थी, लेकिन उन्हें सामाजिक प्रतिष्ठा नहीं मिली। रामलीला में भी, अनेक स्थानों पर पात्रों के चयन में अभिनय क्षमता के साथ-साथ जाति, सामाजिक प्रतिष्ठा और पवित्रता की धारणाएँ काम करती रही हैं।
जिस समाज में बेटे के अभिनेता बनने पर पहला सवाल हो— “इससे कमाओगे क्या?”, और बेटी के मंच पर जाने पर सवाल हो— “लोग क्या कहेंगे?”, वहाँ प्रतिभा की नहीं, सामाजिक स्वीकृति की कमी है।
बंगाल, महाराष्ट्र या दक्षिण भारत में कला केवल उत्सवी गतिविधि नहीं रही; वह मध्यवर्गीय जीवन और नागरिक संस्कृति का हिस्सा बनी। वहाँ कला ने दर्शक और रसिक पैदा किये। जहाँ कला को जातिगत पेशा या महज़ मनोरंजन मान लिया गया, वहाँ कला की व्यापक सामाजिक शक्ति सीमित हो गयी।
हिंदी पट्टी के रंगमंच में प्रतिभा की कमी नहीं है। हमारे यहाँ भी मोहन राकेश, धर्मवीर भारती, भीष्म साहनी और हबीब तनवीर जैसे बड़े नाटककार हुए, लेकिन ग़ैर-हिंदी भाषी क्षेत्रों की तरह हिंदी में लोकप्रिय नाटककारों की एक निरंतर परंपरा नहीं बन सकी। हमारा समाज इन प्रतिभाओं को टिकाये रखने का वातावरण नहीं बना सका।
लेकिन इसमें सिर्फ़ समाज को ही दोष देना न्यायसंगत नहीं होगा।
हमारे रंगमंच ने भी अपने दर्शकों से वह निकटता नहीं पायी, जो कई ग़ैर-हिंदी भाषी रंगमंचों ने पायी। हमारे गंभीर रंगमंच ने दर्शकों को साथी मानने के बजाय परीक्षक मान लिया।
नाटक का प्रयोगवादी होना ग़लत नहीं है। प्रयोग रंगमंच की प्रकृति का हिस्सा है। लेकिन प्रयोग के नाम पर नाटक को दुरूह बना देना कोई औचित्य नहीं। ऐसे तथाकथित बुद्धिजीवियों को यह समझना चाहिए कि दुरूह होना और गहरा होना दो अलग बातें हैं।
दर्शक को हँसाइए, रुलाइए, असहज कीजिए— लेकिन उसे अपने से बाहर मत कीजिए।
नैशनल स्कूल ऑफ़ ड्रामा जैसे संस्थानों ने असाधारण कलाकार दिये। उन्होंने भारतीय रंगमंच को प्रशिक्षित प्रतिभाओं की कई पीढ़ियाँ दीं। लेकिन प्रशिक्षण के बाद अपने शहर में रंगमंच को टिकाऊ ढंग से कैसे चलाया जाये, इसकी तैयारी और उसके लिए आवश्यक संरचना सीमित रही।
रंगमंच को सिर्फ़ अभिनेता नहीं, निर्माता चाहिए। नियमित मंच चाहिए, प्रचार चाहिए, टिकट-संस्कृति चाहिए और सबसे बढ़कर— पैसा चाहिए।
आख़िर अभिनेता भी मनुष्य है। उसे भी रोटी, कपड़ा, मकान और सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा की ज़रूरत है। इसलिए कुछ प्रतिभाशाली अभिनेताओं का मुंबई की ओर जाना स्वाभाविक था। सिनेमा, टीवी और बाद में OTT के पास पैसा था, लोकप्रियता थी और काम के बड़े अवसर थे।
जिस रंगकर्मी ने वर्षों साधना की, वह अपना जीवन चलाने के लिए आगे बढ़ा तो दोष अभिनेता का नहीं, उस व्यवस्था का है जिसने प्रतिभा तो तैयार की, लेकिन उसे रोकने की अर्थव्यवस्था नहीं बनायी।
लेकिन समस्या केवल इतनी नहीं थी कि अभिनेता मुंबई चले गये। मुंबई के साथ एक और चीज़ थी, जिससे हिंदी रंगमंच को लगातार प्रतिस्पर्धा करनी थी— दर्शक की बदलती हुई दृश्य-संवेदना।
फ़िल्म और टीवी से प्रतिस्पर्धा करने के लिए रंगमंच को फ़िल्म नहीं बनना था। लेकिन उसे यह ज़रूर समझना था कि दर्शक की आँख बदल रही है। प्रकाश, ध्वनि, मंच-सज्जा, दृश्य-रचना, प्रचार और तकनीक के नये प्रयोगों ने देखने के उसके अनुभव को बदल दिया था। बाद में OTT ने इस बदलाव को और तेज़ कर दिया।
दुर्भाग्य से हिंदी रंगमंच के एक हिस्से ने तकनीक से दूरी को ही अपनी रंगमंचीय शुद्धता समझ लिया। जैसे रोशनी, ध्वनि या दृश्य-तकनीक का बेहतर इस्तेमाल रंगमंच को कम गंभीर बना देगा।
तकनीक रंगमंच की आत्मा नहीं बदलती; वह उसकी अभिव्यक्ति की संभावनाएँ बढ़ाती है।
रंगमंच को फ़िल्म की नक़ल नहीं करनी थी, लेकिन फ़िल्म, टीवी और बाद में डिजिटल माध्यमों से इतना तो सीखना ही था कि दर्शक तक कैसे पहुँचा जाये और उसकी बदलती हुई संवेदना के साथ संवाद कैसे क़ायम रखा जाये।
इसी बीच एक और रास्ता खुला— सरकारी अनुदान का।
सरकारी सहायता अपने आप में कोई बुरी चीज़ नहीं है। कला और संस्कृति को सार्वजनिक समर्थन मिलना ज़रूरी भी हो सकता है। समस्या तब शुरू होती है, जब रंगमंच की आर्थिक निर्भरता इतनी बढ़ जाये कि अनुदान देने वाला स्वयं एक शक्ति-केंद्र बन जाये।

जब रंगमंच की जीविका किसी बाहरी संरचना पर निर्भर हो जाती है, तो कलाकार धीरे-धीरे यह समझने लगता है किन विषयों पर काम करना सुरक्षित है और किन सवालों से बचना बेहतर है। सबसे घातक सेंसरशिप वही होती है, जो बाहर के आदेश से नहीं, बल्कि कलाकार के अपने भीतर बैठ जाती है।
यहीं रंगमंच के सामने सबसे बड़ा ख़तरा पैदा होता है। क्योंकि रंगमंच हमेशा से सत्ता का प्रतिपक्ष रहा है। वह उसकी गोद में बैठा भाट नहीं, बल्कि उसकी पीठ पर लदा वेताल है—और वेताल सवाल पूछे बिना कभी नहीं रहता।
तो क्या सामने केवल अंधेरा है?
बिल्कुल नहीं।
अगर ऐसा होता तो छोटे शहरों में बिना पैसे के नाटक करने वाले जुनूनी युवा न होते। अगर सब कुछ ख़त्म हो चुका होता, तो आज भी कोई अभिनेता मंच पर खड़ा होकर अपनी पूरी ऊर्जा से किसी पात्र को जीने की कोशिश नहीं कर रहा होता। कोई लेखक रात-रात भर नाटक नहीं लिख रहा होता। कोई दर्शक टिकट ख़रीदकर अँधेरे सभागार में बैठने नहीं आता।
फिर वही बात कि समस्या ऊर्जा की नहीं, उसे टिकाऊ संरचना देने की है।
और यह एक बात अनेक कला क्षेत्रों की भी दिखायी देती है। मिसाल के तौर पर पत्रकारिता। यदि कोई बग़ैर कॉर्पोरेट या सरकारी समर्थन के पत्रकारिता करने का जोखम उठाता है तो उसके लिए अवसर और टिकाऊ संरचना क्या है? कोई केवल कवि रहते हुए अपना जीवन चलाना चाहता है, काव्य कला से समझौता किये बग़ैर तो उसके लिए हमारे हिंदी समाज और व्यवस्था ने क्या ढांचा तैयार किया है? ऐसे ही प्रश्न संगीत, लोककलाओं आदि अनेक क्षेत्रों में पूछे जा सकते हैं, पूछे जाने चाहिए। बात फिर रंगमंच की ओर लौटती है।
रंगमंच केवल रंगकर्मियों की ज़िम्मेदारी नहीं है। यदि हमें रंगमंच चाहिए तो…
- हमें दर्शक बनना होगा, टिकट ख़रीदना होगा।
- कलाकार को ‘बेचारा’ समझने के बजाय अपने समाज का सांस्कृतिक नागरिक मानना होगा।
- हमें छोटे शहरों में मंच बनाने होंगे, स्थानीय संस्थाओं और समुदायों को रंगमंच से जोड़ना होगा।
- बच्चों और युवाओं को दर्शक ही नहीं, सहभागी बनाना होगा।
- लोक परंपराओं को आधुनिक रंगभाषा से जोड़ना होगा।
- तकनीक से डरने के बजाय उसे अपनी अभिव्यक्ति का साधन बनाना होगा।
- निजी, सामुदायिक और सार्वजनिक— हर तरह के सहयोग के रास्ते खोलने होंगे।
- सरकार की सहायता हो, लेकिन रंगमंच की स्वतंत्रता की क़ीमत पर नहीं।
हिंदी रंगमंच का संकट उस समाज का संकट है जिसने कला की ज़रूरत तो समझी, पर कलाकार की नहीं। और शायद यही इस पूरे संकट और पूरे हिंदी समाज की सबसे बड़ी विडंबना है— हमने रंगमंच (विस्तृत अर्थ में कला क्षेत्रों) से बहुत कुछ माँगा, लेकिन रंगमंच को वह समाज नहीं दिया, जिसकी उसे ज़रूरत थी।
लेकिन ग्रहण कितना भी गहरा हो, वह सूर्य को समाप्त नहीं करता, केवल कुछ समय के लिए ढंकता है।
हमारे पास परंपरा है, प्रतिभा है, लोकस्मृति है और कहने के लिए बहुत कुछ है। सवाल सिर्फ़ इतना है, क्या हम उसे जीवित रखने के लिए अपने हिस्से की ज़िम्मेदारी लेने को तैयार हैं?
रोशनी अपने आप नहीं लौटेगी— उसे बचाने और फैलाने के लिए समाज को भी रंगमंच के साथ मंच पर उतरना होगा।
(चित्र परिचय: हबीब तनवीर के चर्चित नाटक ‘आगरा बाज़ार’ के मंचन की यादगार तस्वीर। दूसरे चित्र में पंकज निनाद मंचित नाटकों के कुछ दृश्य।)

पंकज निनाद
पेशे से लेखक और अभिनेता पंकज निनाद मूलतः नाटककार हैं। आपके लिखे अनेक नाटक सफलतापूर्वक देश भर में मंचित हो चुके हैं। दो नाटक 'ज़हर' और 'तितली' एम.ए. हिंदी साहित्य के पाठ्यक्रम में भी शुमार हैं। स्टूडेंट बुलेटिन पाक्षिक अख़बार का संपादन कर पंकज निनाद ने लेखन/पत्रकारिता की शुरूआत छात्र जीवन से ही की थी।
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