
- October 8, 2026
- आब-ओ-हवा
- 0
विवेक सावरीकर मृदुल की कलम से....
नाना का यूं चले जाना...
नाना पाटेकर के यह दुनिया छोड़कर चले जाने की ख़बर मिली और आंखों के आगे उनके रंगमंच और रुपहले परदे पर निभाये कितने ही संजीदा और अतरंगी किरदार सजीव हो उठे। हिंदी फ़िल्मों में नाना पाटेकर को प्रसिद्धि मिली। 1989 की ब्लॉकबस्टर क्राइम ड्रामा फ़िल्म ‘परिंदा’ से, जिसमें उन्होंने क्रूर गैंगस्टर ‘अन्ना’ का किरदार निभाया था।
हालांकि बॉलीवुड में अभिनय की शुरूआत वो मुज़फ़्फ़र अली की ‘गमन’ से कर चुके थे। लेकिन परिंदा के किरदार ने उनको रातो-रात शोहरत के शिखर पर पहुंचा दिया। फिर तो क्रांतिवीर, तिरंगा जैसी फ़िल्मों में दर्शक नाना का काम और उनकी ख़ास शैली की संवाद अदायगी का अनुभव लेने के लिए थिएटर हॉल भरने लगे।
क्रांतिवीर के संवाद- “आ गये मेरी मौत का तमाशा देखने” और “ये मुसलमान का ख़ून, ये हिंदू का ख़ून… बता इसमें मुसलमान का कौन-सा, हिंदू का कौन-सा”… जैसे संवाद तो इतने मक़बूल हुए कि आज भी नाना की मिमिक्री करने वाले मंच के कलाकारों का काम इन संवादों के बग़ैर नहीं चलता।
वर्ष 1997 की फ़िल्म “यशवंत” का उनका संवाद तो उद्धरण की तरह लिया जाता है- “एक मच्छर साला आदमी को हिजड़ा बना देता है..”
दरअसल यहां केवल संवाद लेखन का कमाल नहीं था, उनको उस शिद्दत के साथ कहने का था, जिसे नाना ने अपने दशकों की रंगमंचीय साधना से ईजाद किया था। यद्यपि नाना के बोलने में मराठी उच्चारण कभी भी गया नहीं, पर उन्होंने अपने इस दोष को अपना गुण बना दिया, यह बात रेखांकित करने योग्य है।
अपनी इसी बेबाकी और इनबिल्ट ग़ुस्सैलपन के दम पर वे 1993 की फ़िल्म “तिरंगा” में अभिनय सम्राट दिलीप कुमार के किरदार को बराबरी की टक्कर दे सके। वो संवाद याद करें- “पंद्रह सौ की नौकरी करने वाला एक दिन तुझे डेढ़ सौ का कफ़न पहनाएगा…”
मगर नाना पाटेकर ने केवल सनक भरे और लाउड किरदार ही किये हों, ऐसा नहीं। सिनेप्रेमी “वैलकम” में उदय शेट्टी के अतरंगी किरदार को क्या कभी भूल पाएंगे? कॉमेडी की उत्कृष्ट टाइमिंग और पंच डालने का वो अंदाज जितनी बार भी फ़िल्म देखें, हमें हंसाये बिना नहीं रहता। इसी तरह अमोल पालेकर की फ़िल्म “थोड़ा-सा रूमानी हो जाये” में नटवरलाल उर्फ़ बारिशकर का संवाद- “हां मेरे दोस्त वही बारिश, जो आसमान से आती है, बूंदों में गाती है…” की प्रैक्टिस तो हर नये अभिनेता को अपनी संवाद शैली चमकाने के लिए करना चाहिए, ऐसा बन पड़ा है।

इसी क्रम में उनके कुछ और किरदार भी याद किये जाने चाहिए। शिमित अमीन निर्देशित ‘अब तक छप्पन’ में अंडरवर्ल्ड की कहानी में एक एनकाउंटर स्पेशलिस्ट के किरदार को नाना ने लाउडनेस के बजाय संजीदगी से अदा करके फ़िल्म को एक नया आयाम दिया। ‘वजूद’ और ‘यात्रा’ जैसी फ़िल्मों के किरदार भी हैं तो ‘ख़ामोशी’ और ‘हूतूतू’ जैसे भी, जिनमें उनकी लाउडनेस और संजीदगी का अनोखा मिश्रण सिनेप्रेमियों के साथ ही सिने समीक्षकों को भी चौंकाता ज़रूर है।
रंगमंच की मज़बूत पृष्ठिभूमि
मराठी रंगमंच पर नाना पाटेकर को स्पॉट लाइट में लेकर आयीं थीं स्व. विजया मेहता, जिन्हें मराठी रंगजगत ने “बाई” याने आदरणीय महिला का दर्जा दिया। यूं रंगमंच पर अपनी अभिनय साधना और निर्देशन क्षमता का परचम अनेकानेक महिलाओं ने फहराया है मगर “बाई” का विशेषण पाने वाली केवल विजया मेहता ही रहीं। उन्हीं विजया मेहता ने जब “हमीदाबाईची कोठी” (लेखक अनिल बर्वे) रंगमंच पर साकार किया, तो सत्तार के किरदार में नाना पाटेकर ने ऐसी धूम मचायी कि नाट्य रसिक दीवाने हो गये।
इसके बाद नाना पाटेकर अभिनीत जयवंत दळवी के नाटक “पुरुष” ने कामयाबी के झंडे गाड़े। रीमा लागू और नाना ने इस मराठी नाटक के सैकड़ों शो किये। नाटक में बलात्कारी नेता गुलाब राव के नकारात्मक चरित्र को नाना ने इतने सधे हुए ढंग से बिना अतिरिक्त लाउड हुए निभाया कि उसने यथार्थवादी अभिनय का नया पाठ तैयार कर डाला।
हाल के कुछ वर्षों से नाना फ़िल्मों में कम सक्रिय थे। वे खेती-किसानी में अधिक रमते थे।फिर भी महेश मांजरेकर की 2016 में प्रदर्शित मराठी फ़िल्म “नटसम्राट” में उन्होंने जो काम किया, वो अद्भुत है। इस भूमिका के लिए उन्हें मराठी फ़िल्मफ़ेयर अवार्ड्स में सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का पुरस्कार मिला और ज़ी चित्रगौरव पुरस्कार समारोह में भी आपको इसी फ़िल्म के लिए सर्वश्रेष्ठ अभिनेता के पुरस्कार से नवाज़ा गया था।
ऐसे दैदीप्यमान अभिनेता के अचानक अवसान ने हिंदी, मराठी फ़िल्म और रंगमंच पर गहरा प्रहार किया है। याद आती है 1991 की उनकी असाधारण फ़िल्म “प्रहार” जो फौज के कठोर अनुशासन पर बनी थी। इसे उन्होंने निर्देशित करने के साथ अपने मर्मस्पर्शी अभिनय से यादगार बना दिया था। सचमुच नाना के अकस्मात चले जाने से जो शून्य पैदा हुआ है, उसे भरने में लंबा वक़्त लगेगा।

विवेक सावरीकर मृदुल
सांस्कृतिक और कला पत्रकारिता से अपने कैरियर का आगाज़ करने वाले विवेक मृदुल यूं तो माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता विश्ववियालय में वरिष्ठ अधिकारी हैं,पर दिल से एक ऐसे सृजनधर्मी हैं, जिनका मन अभिनय, लेखन, कविता, गीत, संगीत और एंकरिंग में बसता है। दो कविता संग्रह सृजनपथ और समकालीन सप्तक में इनकी कविता के ताप को महसूसा जा सकता है।मराठी में लयवलये काव्य संग्रह में कुछ अन्य कवियों के साथ इन्हें भी स्थान मिला है। दर्जनों नाटकों में अभिनय और निर्देशन के लिए सराहना मिली तो कुछ के लिए पुरस्कृत भी हुए। प्रमुख नाटक पुरूष, तिकड़म तिकड़म धा, सूखे दरख्त, सविता दामोदर परांजपे, डॉ आप भी! आदि। अनेक फिल्मों, वेबसीरीज, दूरदर्शन के नाटकों में काम। लापता लेडीज़ में स्टेशन मास्टर के अपने किरदार के लिए काफी सराहे गये।
Share this:
- Share on Facebook (Opens in new window) Facebook
- Share on X (Opens in new window) X
- Share on Reddit (Opens in new window) Reddit
- Share on Pinterest (Opens in new window) Pinterest
- Share on Telegram (Opens in new window) Telegram
- Share on WhatsApp (Opens in new window) WhatsApp
- Share on Bluesky (Opens in new window) Bluesky
