अशोक वाजपेयी, ashok vajpayee
अशोक वाजपेयी को श्रीकांत वर्मा सम्मान के बाद साहित्य जगत में आरोप-प्रत्यारोप का दौर जारी है। ख़ुद वाजपेयी अपने जुमलों को लेकर सुर्ख़ियों में आ रहे हैं। इस संदर्भ में एक क्षेपक कथा के रूप में वरिष्ठ लेखक-समालोचक ने य​ह प्रतिक्रिया आब-ओ-हवा के लिए उपलब्ध करवायी है।
अजित कुमार राय की कलम से....

अच्छा लेखक बनाम नैतिक व्यक्ति

           अशोक वाजपेयी को प्रथम श्रीकांत वर्मा शिखर सम्मान दिया गया, तो चर्चा की धूल उड़ने लगी। वाजपेयी जी एक श्रेष्ठ कवि, उदात्त आलोचक और उत्कृष्ट कलाविद् हैं। इधर, एक सक्रिय संस्कृतिकर्मी के रूप में रज़ा फ़ाउंडेशन की उपस्थिति को जीवंत बना देने वाले वाजपेयी जी का विवादों से पुराना नाता रहा है।

साहित्यिक कार्यक्रमों की उन्होंने झड़ी लगा दी है। साहित्य-विमुख सरकार की उदासीनता के दौर में इस निरन्तरता का अपना विशेष महत्व है। साहित्य अकादमी भी कुछ आयोजन करता रहता है। यों अशोक जी को हटाकर देखें तो दिल्ली में सन्नाटा छा जाएगा।

ऐतिहासिक अंधेरे का साक्षात्कार करने वाले श्रीकांत वर्मा की स्मृति में दिये जाने वाले पुरस्कार के लिए अतीत और वर्तमान के बीच एक स्वस्थ संवाद और उसके जटिल रिश्ते की समझ अशोक जी को उपयुक्त सिद्ध करती है। उन्हें हार्दिक बधाई। उनकी विवक्षा की मीमांसा की एक विनम्र कोशिश मैंने की थी, जो ‘स्मृतियों का कोलाज’ शीर्षक से ‘समीक्षा’ में प्रकाशित हुई थी।

यद्यपि अशोक जी इस समय शायद मुझसे नाराज़ हैं। उनके सामने साहित्यिक सामंतवाद जैसे बिन्दुओं पर बोलने और कथादेश में उनके आध्यात्मिक एप्रोच का खंडन करने के कारण वे मुझसे असहज हो गये। आज एक आलोचक भी अपनी आलोचना बर्दाश्त नहीं कर सकता। फिर हम राजनेताओं से सहिष्णुता की अपेक्षा कैसे कर सकते हैं? फिर भी, वे अब किसी भी भारतीय पुरस्कार से बड़े लेखक हैं।

नोबेल पुरस्कार देने वाले व्यक्ति के हथियार बनाने की फ़ैक्ट्री का मालिक होने से यदि पुरस्कार अस्पृश्य है तो फिर वह वैज्ञानिक भी पापी है, जिसने इन शस्त्रों का आविष्कार किया। सुना है, पुरस्कार की धनराशि श्रीकांत वर्मा के जमा खाते से आवंटित की गयी है, उनके सुपुत्र का पैसा वह नहीं है। होता भी तो क्या ये विरोध की तख़्ती थामे लोग 21 लाख रुपये मिलने पर छोड़ देते? या फिर कोई प्रगतिशील तर्क गढ़ते।

अशोक वाजपेयी, ashok vajpayee

आज जलेस-प्रलेस लेखकीय मान्यता के प्रवेश-द्वार हैं। पुरस्कार प्रसिद्धि दिला सकते हैं, साहित्यिक सिद्धि नहीं। आज सर्जनात्मक आचरण की दीक्षा दुर्लभ है। आज एक अच्छा लेखक ज़रूरी नहीं कि अच्छा और नैतिक व्यक्ति भी हो। आज चरित्र केवल कहानियों में रह गये हैं। वह तो ज़्या पॉल सार्त्र थे, जिन्होंने नोबेल पुरस्कार को ठुकरा दिया था। अपने यहाँ नीलाभ ने साहित्य अकादमी पुरस्कार को अस्वीकार कर दिया था। सुमित्रानंदन पंत और महादेवी वर्मा को ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला, पर निराला को नहीं। तो क्या निराला छोटे कवि हो गए? और क्या गारंटी है कि गोस्वामी तुलसीदास जी भी आज होते तो उन्हें नोबेल पुरस्कार मिल ही जाता। नोबेल छोड़िए, नामवर सिंह वर्णाश्रम व्यवस्था के पोषक होने के कारण उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार भी नहीं मिलने देते।

यद्यपि टी.एस. इलियट की साहित्यिक कृतियों के मूल्यांकन में नैतिकता आदि साहित्येतर मानदण्डों के अनुप्रयोग से वे सहमत नहीं हैं। किन्तु तुलसी और शेक्सपियर जैसे द्रष्टा और स्रष्टा किसी भी नोबेल पुरस्कार से बहुत बड़े हैं और उन्हें पुरस्कृत करने से नोबेल का मान बढ़ जाता। क्योंकि…

कविता करके तुलसी न लसे
कविता लसी पा तुलसी की कला

आचार्य हज़ारीप्रसाद द्विवेदी ने उसी समय पुरस्कारों की प्रामाणिकता और ईमानदारी को प्रश्नांकित किया था। आज तो जाने कितने पापड़ बेलने पड़ते हैं और जाने कितने जुगाड़ सोपान बनते हैं। अपना अभिनन्दन ग्रन्थ ख़ुद छपवाना पड़ता है। ऐसे साहित्य से भला किसका भला हो सकता है! शोरीले वातावरण को सुरीला बनाना ही कवि कर्म है। किन्तु साहित्य में ही इतना शोर!

अजित कुमार राय, ajit kumar rai

अजित कुमार राय

आस्था अभी शेष है, रथ के धूल भरे पांव आपकी चर्चित कृतियां हैं। 'सर्जना की गंध लिपि' संपादित कृति है और 'नई सदी की हिन्दी कविता का दृष्टि बोध' आलोचना पुस्तक प्रकाशित है। आप हिंदी साहित्य की तमाम महत्वपूर्ण पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं। अनेक संकलनों में निबन्ध, कविताएँ और आलोचनाएँ प्रकाशित। पूर्व प्रधानाचार्य, सुभाष इण्टर कालेज।

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