
- September 29, 2026
- आब-ओ-हवा
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भोपाल निवासी साहित्यकार विवेक रंजन श्रीवास्तव इन दिनों लंदन प्रवास पर हैं। नियमित लेखन के अभ्यास व स्वभाव के चलते वह उन विचारों/अनुभवों/दृश्यों आदि को दर्ज कर रहे हैं, जो लंदन यात्रा की देन हैं। इस कोने को इंदराज की तरह पढ़ें, यात्रा संस्मरण की या टिप्पणियों की तरह, अपने संदेशों के साथ ज़रूर जुड़ें।
दूर देस में लेखक-19....
नज़र रोकिए, पुराने घरों की दीवारों को सुनिए
लंदन शहर का इतिहास संग्रहालयों या यहां की भव्य इमारतों में ही नहीं है। वह कभी किसी साधारण-से मकान की दीवार पर लगी छोटी-सी नीली गोल पट्टिका में भी मिल जाता है। सड़क से गुज़रते हुए अचानक कोई नीला गोल चिह्न दिखायी देता है और लगता है, जैसे मकान कह रहा हो, ज़रा ठहरिए, मेरे भीतर एक इतिहास समाहित है।
लंदन की ब्लू प्लाक (Blue Plaque) परंपरा 1866 में शुरू हुई थी और इसे अपनी तरह की दुनिया की सबसे पुरानी योजनाओं में से एक माना जाता है।
आज पूरे लंदन में एक हज़ार से अधिक आधिकारिक पट्टिकाएँ हैं। इनका उद्देश्य किसी महत्वपूर्ण व्यक्ति और उस भवन के बीच संबंध को स्मरण में रखना है, जहाँ वह रहा था, या वह वहां काम करता था। इसीलिए ये पट्टिकाएँ केवल व्यक्ति की स्मृति नहीं, स्थान की स्मृति भी हैं।
मुझे इसकी सबसे सुंदर बात यह लगी कि इतिहास यहाँ किसी ऊँचे चबूतरे पर खड़ी मूर्ति ही नहीं है। वह उसी सड़क पर रहने वाले लोगों के बीच मौजूद है। जिस घर के सामने आज कोई कार खड़ी है, उसी घर में कभी किसी लेखक ने चर्चित ग्रंथ लिखा होगा, किसी वैज्ञानिक ने नया सोचा होगा या किसी समाज-सुधारक ने अपने समय में थोड़ा हटकर सवाल किया होगा।

लंदन के साहित्यिक इतिहास का एक ऐसा ही पता है… 48 डॉटी स्ट्रीट (Doughty Street)। यहाँ चार्ल्स डिकन्स (Charles Dickens) 1837 से 1839 तक रहे। यहीं रहते हुए उन्होंने ओलिवर ट्विस्ट (Oliver Twist) और निकोलस निकलबाय (Nicholas Nickleby) जैसे महत्वपूर्ण उपन्यास लिखे और बर्नाबी रज (Barnaby Rudge) कृति पर काम शुरू किया। आज उस मकान पर लगी पट्टिका और भीतर का डिकन्स संग्रहालय (Dickens Museum) उस समय की स्मृति सँजोये हुए है।
डिकन्स की कहानी में इस नीली पट्टिका का अर्थ और गहरा हो जाता है। जिस लेखक ने लंदन की ग़रीबी, अनाथ बच्चों और उपेक्षित लोगों की दुनिया को साहित्य में आवाज़ दी, उसके अपने बचपन में भी अभाव का अनुभव था। इसलिए डॉटी स्ट्रीट का वह घर केवल एक महान लेखक का निवास नहीं लगता, वह उस लंदन की ओर खुलती खिड़की भी है, जिसे डिकन्स ने अपनी कलम से दुनिया के सामने रखा।
फिर मन अपने देश की ओर चला जाता है। लंदन की एक दूसरी नीली पट्टिका 20 बैरन्स कोर्ट रोड (Baron’s Court Road) पर लगी है जो विश्वपुरुष बन चुके महात्मा गांधी की स्मृति को जीवन्त करती है।
1888 में क़ानून की पढ़ाई के लिए आये युवा मोहनदास गांधी कुछ महीनों तक यहाँ रहे थे। तब वे वह गांधी नहीं थे, जिन्हें दुनिया बाद में ‘महात्मा’ कहने वाली थी। वे एक उन्नीस वर्षीय विद्यार्थी थे, जो नये देश, नये समाज और नयी जीवन-शैली को समझने की कोशिश कर रहे थे।
गांधी से जुड़ी एक दूसरी पट्टिका किंग्स्ले हॉल (Kingsley Hall, Bow) में है, जहाँ वे 1931 में भारत के संवैधानिक भविष्य पर बातचीत के लिए लंदन आये, तब रहे थे। उन्होंने किसी आलीशान होटल के बजाय पूर्वी लंदन के ग़रीब समुदाय के बीच रहना पसंद किया था। यही विरोधाभास शायद गांधी की यात्रा को और अर्थवान बनाता है, एक ओर क़ानून पढ़ने आया युवा, दूसरी ओर वही व्यक्ति वर्षों बाद साम्राज्य से भारत की स्वतंत्रता की बात करने लंदन लौटता है।
एक ही शहर में डिकन्स और गांधी की ये पट्टिकाएँ लंदन की एक विशेष ख़ूबी का अहसास कराती हैं। शहर अपने अतीत को मिटाकर नया नहीं बनता, वह पुराने समय को साथ लेकर आगे बढ़ता है। आधुनिक जीवन उन्हीं गलियों में चलता रहता है, लेकिन दीवारें चुपचाप सड़क को बताती रहती हैं, यहाँ कभी कौन रहा था और उसने दुनिया पर क्या असर डाला।
भारत में पुराने साहित्यकारों की मूर्तियां खंडित करने वाले इन मिसालों से ज़रूर कुछ सीख सकते हैं।
यात्रा में हम अक्सर पूछते हैं, लंदन में क्या-क्या देखना चाहिए? शायद एक बेहतर प्रश्न यह है, लंदन में क्या-क्या पढ़ना चाहिए? क्योंकि यहाँ इतिहास कभी-कभी किताब ही नहीं, दीवार पर भी लिखा मिलता है। बस नज़र उठाने की नहीं, उड़ती हुई नज़र को ठहराने की ज़रूरत है।
(आब-ओ-हवा पर एक सप्ताह तक महात्मा गांधी के संदर्भ में विशेष सामग्री, रोज़ क्लिक करें aabohawa.org)

विवेक रंजन श्रीवास्तव
सेवानिवृत मुख्य अभियंता (विद्युत मंडल), प्रतिष्ठित व्यंग्यकार, नाटक लेखक, समीक्षक, ई अभिव्यक्ति पोर्टल के संपादक, तकनीकी विषयों पर हिंदी लेखन। इंस्टीट्यूशन आफ इंजीनियर्स के फैलो, पोस्ट ग्रेजुएट इंजीनियर। 20 से अधिक पुस्तकें प्रकाशित। हिंदी ब्लॉगर, साहित्यिक अभिरुचि संपन्न, वैश्विक एक्सपोज़र।
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