
- April 15, 2026
- आब-ओ-हवा
- 25
नियमित ब्लॉग इस बार ब्रजेन्द्र शरण श्रीवास्तव की कलम से....
ललित कला को कैसे समझें?
एक सामान्य दर्शक के रूप में कला को समझने के लिए सबसे आवश्यक यह है कि पहले तो हममें जीवन को समग्र रूप से समझने की समझ होना चाहिए। जितना हम अपने और आसपास के जीवन को, इसके हर्ष-विषाद को, अनुराग-विराग को, भय और विमुक्ति को, मान-अपमान को, जीवन मरण चक्र को समझेंगे, उतना ही हम इस सत्य के निकट होंगे कि जीवन में जो निरन्तरता है, सातत्य है वह दो परस्पर विरोधी अनुभवों के बीच अनवरत बने रहने वाले द्वन्द्व के कारण ही तो है। इसे ऐसे समझिए कि सुख और दुख शरीर के दो चरणों की तरह हैं, जिनके सहारे हम चलते हैं।
जब हमारा मन अपने या दूसरों के सुख और दुख में से किसी एक के रंग से रंजित होता है, तो हमारे ऐसे सामने दुख या सुख की एक अस्पष्ट झलक-सी, मूर्ति-सी होती है। पर जब हम इन दोनों भावों में से निकलकर शान्त भाव को प्राप्त होते हैं तो कहा जाता है कि हम प्रकृतिस्थ हुए। थोड़े में कहें तो मन की प्रकृति सत्व, रज, तम इन तीन मानसिक गुणों से मिलकर बनी है। मन जब इन तीनों में से किसी भी गुण में लिप्त नहीं होता, उस समय मन त्रिगुण साम्य की स्थिति में या मूल प्रकृति में स्थित होता है– मूल शान्त प्रकृति में अवस्थित। यह बात अलग है कि हम तो निरंतर दौड़-धूप में ही लगे रहते हैं, प्रकृतिस्थ तो बहुत कम ही होते हैं।
मूर्त कला और अमूर्त कला
मूर्त कला में कोई न कोई भाव अवश्य होता है इसलिए इसे देखते समय हम तटस्थ नहीं रह पाते- कला में उकेरा गया भाव मन को उद्वेलित करता है, मन उसमें रंग जाता है इसलिए कला में रंजकता होना कला का गुणधर्म ही है- चाहे वह चित्रकला हो अथवा शिल्प या स्थापत्य कला हो। नाट्य कला को तो सीधे-सीधे रंगकर्म ही कह दिया जाता है।
इसके विपरीत अमूर्त कला में भाव अस्पष्ट-अदृष्ट-सा होता है, यह कुछ आकाश में तैरते बादल के एक छोटे-से टुकड़े जैसा होता है, जिसे हम जब भी कुछ आकृति देने का प्रयास करते हैं, तब तक बादल अपना रूप बदल चुका होता है। अमूर्त कला के साथ भी कुछ ऐसा ही है। यह मन को रंगने के स्थान पर मन के छिपे रंगों को ही शमित करने का प्रयास करती है। ऐसे में हम यदि केवल दृष्टा ही बने रह सकें तो बहुत सम्भव है, हमें रंजकता से परे कुछ अनुभूति हो सकती है और तब हमें ऐसी अमूर्त कला का कुछ रसास्वादन हो सकता है।
अमूर्त चित्रण में कलाकार का मन भी, जहाँ तक मैं समझ सका हूँ– सुख-दुख और अनुराग-विराग से परे गहन चिंतन में एकाग्र होता है। तब उसका मन साकार से निराकार की ओर, व्यक्त से अव्यक्त की ओर अनजाने में ही मुड़ जाता है और तभी अमूर्त का चित्रण हो पाता है। यह अव्यक्त का आभास कुछ ऐसा ही होता है जैसा कि साकार के माध्यम से निराकार का आभास होना।
कला मूर्त हो या अमूर्त वैसे तो समझने-समझाने से कहीं अधिक अनुभव करने की वस्तु है, जो प्रेक्षक मन में अधिकतर सहज आनन्द की सृष्टि करती है; कभी-कभी कौतूहल जागृत करती है और कभी यह कला गूढ़ आध्यात्मिक संकेत से आत्मिक तृप्ति भी देती है। यह बात सहज ही मूर्त चित्रकला पर और शिल्प सहित अन्य कला विधाओं पर लागू होती है।
इसी क्रम में देखें तो काव्य में जब मूर्त का अमूर्त रूप विधान या एब्स्ट्रैक्ट इमेजरी की जाती है– जैसे कि वृद्धा के मुख पर फैले विषाद को धुआं छोड़ती चिमनी से तुलना की जाती है तो पढ़कर कुछ कल्पना तो की जा सकती है। पर जब श्रीकान्त वर्मा कहते हैं- ‘घाट हूँ मैं भी, मगर नदी मुझ को छूती नहीं’- तो वाक्य की अर्थवत्ता का कितना भी दोहन करें, पाठक के मन में से कोई छवि, कोई इमेज, ‘नदी मुझको छूती नहीं’ जैसे शब्द विन्यास से नहीं बनती। बस शब्दों के बीच की छुपी गूढ़ अर्थवत्ता का अव्यक्त आनन्द ही लिया जा सकता है, जो हरेक के बस का नहीं।

इसी प्रकार जब ललित कला में भी कुछ ऐसा ही नया प्रयोग रंग और शिल्प के साथ किया जाता है और कलाकार का मन किसी भाव को कुछ ऐसी ही प्रतीकात्मकता में उकेरता या गढ़ता है, तो ऐसी अमूर्त या प्रतीकात्मक कला को समझने-समझाने के अक्सर दो ही विकल्प होते हैं : पहला- ऐसी कृति को केवल निहारा जाये और मन में जो कुछ व्यक्त-सा और कुछ अव्यक्त-सा घटित होता हुआ विचार आता हो, उसे आने दिया जाये; दूसरा- कृति को निहारते समय बुद्धि और तर्क को प्रवेश दिया जाये, जो प्रेक्षक की समझ के अनुसार परत-दर-परत इसके रहस्य को अनावृत्त करने में जुट जाएं।
अमूर्त कला को समझना/अनुभव करना
व्यक्त या मूर्त या बोधगम्य कला को प्रेक्षक अपने-अपने स्तर पर ग्रहण करते हुए उसका आनन्द लेता है, जिसमें उसके संस्कार और परिवेश की भी भूमिका होती है। पर बात यहाँ अव्यक्त अमूर्त कला बिम्ब की है।
इस प्रश्न पर ग्वालियर के कलाकार व शिल्पज्ञ धृतिवर्धन गुप्त (जो अपनी कलाकृतियों से मुंबई की जहांगीर आर्ट गैलरी को शोभित करते रहे हैं) का यह कहना है कि ‘कला सृष्टि का कोई अर्थ खोजने की कोशिश करने का अर्थ होगा, कलाकृति के अवलोकन से मिलने वाले आनन्द से वंचित रह जाना’।
आर्टिस्ट धृतिवर्धन गुप्त का कथन है, ‘मुझे लगता है कला का अभीष्ट ही आनन्द है। कलाकार अपने मन की मौज में रंगों आकारों और ब्रश स्ट्रोक्स् आदि के आनन्द में डूबकर एक अनोखी सृष्टि की रचना करता है। इस कला सृष्टि का कोई अर्थ ढूँढने की कोशिश करने का अर्थ होगा कलाकृति के अवलोकन में आनन्द से वंचित रह जाना; अर्थात किसी भी कलाकृति को देखते हुए, मत सोचिए कि यह क्या है? बस देखिए और महसूस कीजिए। तब आप भी कलाकार की आनन्द अनुभूति को अपने ढंग से स्वयं भी अनुभूत कर सकेंगे’।
उनके इस कथन में एक तरह से मनुष्य का समग्र जीवन दर्शन भी छुपा हुआ है। इस दर्शन को समझ लेने पर उनके इस कथन का आशय तो स्पष्ट होगा ही, अमूर्त कला का प्राण तत्व भी किंचित बोधगम्य हो सकता है।
मुझे याद है ऐब्स्ट्रैक्ट या अमूर्त कला क्या है, इसे फ़ाइन आर्ट्स कॉलेज, ग्वालियर में मुझ जैसे नये कलाकारों को समझाते हुए सत्तर के दशक में कला गुरु विश्वामित्र वासवाणी जी ने एक बार कुछ कहा था… उसका केन्द्रीय विचार यह था कि वसंत का अमूर्त चित्रण करना है तो वसंत आगमन के पूर्व व्याप्त शीत की जड़ता के प्रतीक रूप कोई रंग लेंगे, वसंत के उन्मेष के प्रतीक रूप में पृथ्वी की गोद में प्रसुप्त अंकुर की कोई अव्यक्त-सी रूप आकृति लेंगे और वसंत में पुष्पित सरसों का पीला या टेसू के फूलों का केसरिया रंग लेंगे; इन सब को लेकर कलाकार दृष्ट आकृतियों से हटकर जब कैनवास पर इन्हें बिखेरेगा, फूल पत्तियों के स्थान पर इनके कुछ अभिनव प्रतीक कल्पित करते हुए चित्रण करेगा, वही चित्रण चित्रकार का बनाया वसंत ऋतु का अमूर्त चित्रण होगा। यह वसंत के आंतरिक आध्यात्मिक स्वरूप का चित्रण होगा जो ज्ञात साकार वसन्त की अज्ञात निराकारवत अभिव्यक्ति होगी।
नाम रूप से परे कुछ नहीं
जगत में जिस किसी वस्तु का नाम है तो उसका रूप होगा और रूप है तो उसका कुछ नाम होगा या रख दिया जाएगा। इस प्रकार सृष्टि में नाम और रूप से परे कुछ भी नहीं है। सृष्टि नाम रूप मय है। इस लिहाज़ से देखें तो अमूर्त कला में, ऐब्स्ट्रैक्ट आर्ट में कैनवास पर की गयी वसंत की उक्त सृष्टि कहने को तो कलाकार की नज़र में अमूर्त हुई, रूप-आकार रहित कही गयी। पर जैसे ही कलारसिक की दृष्टि उस पर पड़ती है, उसके मन में नाम और रूप वाली एक अलग ही सृष्टि बनने लगती है, जो कलाकार की सोच से मिलती हो यह बिल्कुल भी ज़रूरी नहीं है। अधिकतर यह दर्शक के सोचने, देखने के स्तर के अनुसार अलग-अलग हो सकती है या नहीं भी हो सकती है। और तब यही अमूर्त चित्र अंततः नाम रूप वाला चित्र बन जाता है।
उदाहरण के लिए भूत अमूर्त है, पर शब्द तो है, भूत देखा नहीं तो नाम कैसे पड़ा! किसी न किसी स्वरूप के कारण। भूत का स्वरूप पृथ्वी तत्व की न्यूनता होने से दिखता नहीं है पर इसका स्वरूप वायवीय है इसलिए इस अमूर्त का नाम भी है। इसी तरह स्वप्न में देखे गये विम्ब भी जागृत होने पर कुछ ऐसे ही अमूर्त हो जाते हैं।
नाम रूप रहित कलाकृति में शब्दातीत आनंद कुछ निराकार निर्गुण ब्रह्म की अनुभूति जैसा अव्यक्त होता है। सूरदास जी इस अनुभूति को गूंगे का गुड़ जैसा अवर्णनीय कहा है, इसका आनंद लेने के बाद दर्शक अमूर्त चित्रकला में नाम खोजेगा या रूप देखेगा। क्योंकि मन की प्रवृत्ति निराकार पर टिकती ही नहीं है। अन्वेषण के इस प्रयास में उसका मन दुबारा आनंद से भर सकता है, कोई दर्शक उसमें वसंत खोजेगा, कोई उसमें किसान के श्रम की आभा देखेगा, कोई नये सामाजिक मूल्यों का अभ्युदय, तो कोई बच्चों की कारस्तानी मात्र कहकर कंधे उचकाकर आगे बढ़ सकता है। सामान्यतः दर्शक के स्तर पर अमूर्त कला की यही एक प्रारम्भिक उपलब्धि है। मेरी समझ के अनुसार पर यह अंतिम उपलब्धि नहीं है। अंतिम उपलब्धि के लिए कुमार स्वामी के विचार पर कुछ विमर्श करते हैं।
अमूर्त या प्रतीक ही कला की वास्तविक भाषा
कुमार स्वामी के अनुसार “The work of art is a symbol, and as such it is a language.” ( The Transformation of Art in Nature 1934) अर्थात् कला, जगत के दृश्य या रूप (forms) मात्र नहीं होती है; कला की भाषा वस्तुतः प्रतीक की भाषा है, सिंबल की भाषा है। इसलिए इसे भी अन्य भाषा की तरह सीखने की ज़रूरत तो सदैव ही रहेगी।
कुमार स्वामी के अनुसार कला प्रकृति की केवल नक़ल मात्र नहीं, बल्कि अपने कला का लक्ष्य अपने प्रतीक के माध्यम से सृष्टि का और जीवन का दोनों का रहस्य समझना-समझाना है। अन्यथा नटराज की मूर्ति केवल नृत्य ही दिखेगी, इसमें सृष्टि-स्थिति-संहार के प्रतीक नहीं दिखेंगे। गणेश के चित्र में टेढ़ी सूंड ही दिखेगी, हमारे शरीर के मूलाधार चक्र स्थित कुंडलिनी शक्ति नहीं दिखेगी। भारतीय मंदिर, चाहे वह दक्षिण की मंडपम शैली के भव्य प्रवेशद्वार युक्त गोपुरम वाले हों या उत्तर भारत की नागर शैली में बने गगनचुम्बी शिखर की संरचना वाले मन्दिर हों, इन सभी में केवल स्थापत्य ही दिखेगा, जबकि इसमें प्रतीक रूप में व्यक्त ब्रह्मांडीय व्यवस्था कॉस्मिक ऑर्डर हमसे नहीं खोजा जा सकेगा।
कुमार स्वामी का अनुभव है कि परंपरागत कलाकार अपने रूपांकन में स्वयं को अभिव्यक्त करने के बजाय स्वयं को एक ऐसा माध्यम बनाने का प्रयास करता है जिसमें विश्व की परम चेतना अपने सत्य शिव और सुन्दर रूप में अवतरित हो सके। “The traditional artist does not seek self-expression but the embodiment of universal truth.” इसी पुस्तक में कुमार स्वामी का यह भी कथन है कि प्रत्येक साधारण व्यक्ति भी अपने आप में एक कलाकार है- The artist is not a special kind of man, but every man is a special kind of artist. उनका यह कथन प्रत्येक व्यक्ति के मौलिक कलाबोध को अहमियत देता है, जो कलाकार के दृष्टिबोध से बाधित नहीं है।
कला का आरंभिक और अंतिम लक्ष्य
कला भी जीवन यात्री की तरह ही है। जैसे जीवन के लक्ष्य क्रम में धर्म-अर्थ-काम के बाद ही मोक्ष का भाव आता है। कुछ इसी तरह ही कला को भी शुरू में जीवन को समझने के लिए जीवन के द्वन्द्व से जुड़ना होता है इसलिए कला जितने अधिक जीवन से जुड़ी होती है उतना ही अधिक कला, जीवन के संघर्ष को यह कहें कि जीवन की गतिशीलता और विविधता को सहज रूप से रूपांकित करती चलती है और यही जाने-अनजाने में कला का आरंभिक लक्ष्य भी होता है।
सुख-दुख के ‘दो के जोड़े’ से जीवन बनता और चलता दिखता है पर वास्तव में जीवन आंतरिक शक्ति से परिचालित होता है। आत्मा केन्द्र है और मन से जुड़े सुख-दुख इस केन्द्र का बाहरी घेरा या परिधि है, जो द्वैत उत्पन्न करते हैं… हर्ष-क्लेश का द्वन्द्व होता रहता है मन में। जीवन के संघर्ष को समझकर ही इस संघर्ष से परे जाने की बात कला में भी आती है।
जीवन का लक्ष्य परम सत्य अर्थात आत्मानंद को प्राप्त होना ही है। यह आत्मानंद ही मुक्ति है: सा विद्या या विमुक्तये। इसी प्रकार कला का अंतिम लक्ष्य आत्मानंद में सहायक होना है। इस लक्ष्य की पूर्ति जब कला में प्रदर्शित होती है तो यह प्रतीक रूप में ही अधिकतर सम्भव हो पाती है, इसे व्यक्त करना ही कलाकार का लक्ष्य होता है।
विष्णु पुराण (1-19-41) में एक महत्व की बात कही गयी है, कलाकार को अपने दृष्टिबोध बढ़ाने के लिए इसे समझना ज़रूरी है: ‘तत्कर्म यन्न बंधाय सा विद्या या विमुक्तये, आयासाय अपरम् कर्म विद्या अन्या शिल्पनैपुणम्’, जो कर्म, बंधन का कारण न हो, वही कर्म है; जो विद्या मुक्त करे सांसारिकता से, वही विद्या है। इससे भिन्न सभी कर्म व्यर्थ के परिश्रम हैं और अन्य सभी विद्याएँ केवल ‘शिल्प नैपुणम्’ कला-कौशल मात्र ही हैं। इसलिए सच्चे कलाकार का प्रयास ललित कला को केवल एक निपुण विद्या से आगे ले जाकर, आत्म ज्ञान का माध्यम बनाने का होना चाहिए। दर्शक को इस दिशा में प्रेरित करने का लक्ष्य भी ऐसी कला में शामिल होना चाहिए।
ललित कला को समझना-समझाना इस तरह जीवन को समझने-समझाने जैसा ही है- जैसी दृष्टि वैसी ही सृष्टि।
(चित्र परिचय: वरिष्ठ कलाकार धृतिवर्धन गुप्त द्वारा रचित श्वेत-श्याम पेंटिंग, शीर्षकरहित)

ब्रजेन्द्र श्रीवास्तव
साहित्य, संस्कृति व कला, विज्ञान, धर्म, अध्यात्म व दर्शन, ज्योतिष और वास्तु, वैदिक विद्या एवं ब्रह्मांड विज्ञान जैसे विभिन्न विषयों पर 50 से अधिक वर्षों से निरंतर लेखन। आपके लिखे दो कथक नृत्य-नाटक दिल्ली कथक केन्द्र के कलागुरुओं के निर्देशन में मंचित। ज्योतिर्विज्ञान में नये विचार शिक्षा मंत्रालय से डिजिटलीकृत। संपर्क: shrivastava.brijendra@gmail.com
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इस लेख को पढ़ने के पूर्व कला प्रदर्शनी में जाने से ही डरता था । मुझे लगता था कि मुझे तो इन चित्रों को देखने की समझ ही नहीं है । किंतु मुझे लग रहा है कि अब मैं भी इन अमूर्त चित्रों को देख कर उनका आनंद ले सकूंगा । भले ही प्रारंभ में अधिक प्रयास से भी कम समझ होगी ।
आपने मूर्त और अमूर्त चित्रों में जो अंतर बताया वह हम जैसे नासमझ दर्शकों की आँखें खोल देने वाला है । इसके पूर्व अमूर्त चित्रों की हम खिल्ली उड़ाया करते थे । संभवतः आपके लेख से दर्शक संख्या भी बढ़ने की संभावना हो सकती है । वस्तुतः आपके द्वारा किया गया प्रयास चित्रकारों को करना चाहिए था । किंतु वे अपने संकुचित दायरे में रहना ही पसंद करते है । यही कारण है कि कला प्रदर्शनी में दर्शक संख्या उंगलियों पर गिनने वाली होती हैं ।
आपने ग़ज़ब की टिप्पणी की है प्रेब बंधु शुक्ल जी। मुझे ज्ञात हुआ आप कुशल रंगकमी भी रहे हैं ग्वालियर रंगमंच पर।
अमूर्त को समझाने में आर्टिस्ट को भी आगे आना चाहिए ये आग्रह आपका ठीक लगता है।अब आर्टिस्ट ही इस पर कुछ कहें। आर्टिस्ट का विचार आलेख में दिया भी है कि दर्शक केवल देखे अर्थ निकालना उसका निजी कार्य तो आर्टिस्ट क्यों दखल दे?
हार्दिक धन्यवाद इस विचारयुक्त मार्ग दर्शी टिप्पणी के लिए
समझें जीवन की तरह, कभी मूर्त, कभी अमूर्त, कभी पूर्ण कभी अपूर्ण, कभी रंगों से भरी, कभी वीरान. बस अपने मन से पूछें, कुछ समझ आया?
जी बिल्कुल। ऊधो मन माने की बात
अत्यंत ही गूढ़ विषय पर विस्तृत लेख है। मुझ जैसे साधारण व्यक्ति के लिए समझ पाना थोडा मुश्किल है पर ज्ञानवर्धक है।
प्रिय महेन्द्र जी, आपने लेख पढ़ा आपका ज्ञान वर्धन हुआ यह इस लेख की उपलब्धि है। वस्तुतः ज्ञान विज्ञान के क्षेत्र में अनंत विषय हैं रुचि तो कुछ में ही हो सकती है।ज्ञानरंजन और रुचि विस्तार ही इस लेख का उद्देश्य है,जिसका सम्पादक जी ने उदारता से अवसर दिया है। आपको हार्दिक धन्यवाद महेन्द्र जी
टिप्पणी
मान्यवर
ललित कला को कैसे समझें? मेरे इस आलेख को कलात्मक रूप में प्रकाशन के लिए सम्पादक को को हार्दिक धन्यवाद। मेरे इस आलेख पर कुछ पाठकों ने टिप्पणी की है उनका कहना है कि उनकी टिप्पणियाँ इस ब्लॉग में कमेन्ट कालम में दिख नहीं रहीं हैं।इसमें लिखा आता है कि यह कमेंट पहले कर किया है। इस फॉर्मेट सुधारने की जरूरत है
कला के दर्शन पर एक महत्वपूर्ण एवं अत्यंत विस्तृत लेख। जैसा एक पाठक ने लिखा भी कि लेख ज्ञानवर्धक किन्तु गूढ़ है,मैं इसमें जोड़ना चाहूंगा, लेख अत्यंत ज्ञानवर्धक किन्तु कहीं कहीं गूढ़ हो गया है। यह संभवतः लेखक के साहित्य,कला एवं सांस्कृतिक विषयों के साथ साथ धर्म,आध्यात्म,ज्योतिष,दर्शन एवं ब्रह्मांड विज्ञान जैसे विषयों में महत्वपूर्ण दखल रखने के कारण हो सकता है। कुल मिला कर एक संदर्भ लेख के तौर पर संकलनीय।
दिनेश पाठक जी
आप स्वयं सिद्धहस्त लेखक हैं राष्ट्रीय स्तर पर निरन्तर लेखनी आपकी चलती रहती है। ज्ञान रंजन ही इस लेख का उद्देश्य है । अब ज्ञान सागर में हर विषय हरेक के लिए सुबोध कैसे बने यही चुनौती लेखक के समक्ष रहती है। मेरी कोशिश को आपसे प्रोत्साहन मिला यह उपलब्धि है मेरे लिए।हार्दिक धन्यवाद आपको
Bahut umda aur behtreen margdarshan
अनुपम सोनी जी हार्दिक धन्यवाद उत्साह वर्धन के लिए, आपका।
विषय बहुत ही गूढ़ है और आपके द्वारा किया गया विश्लेषण बहुत ही रोचक और ज्ञान पूर्ण रहा, भूतकाल में जब कभी ऐसी कृतियों को देखने का अवसर मिला तो नासमझ की तरह आगे बढ़ जाना ही श्रेयस्कर लगता था किंतु आज ये लेख पढ़कर अहसास हुआ कि कलाकार के द्वारा उकेरी गई कृतियों में उसकी समाज के प्रति सोच और प्रकृति के प्रति उसकी संवेदनाओं को प्रसारित करना ही रहा होगा।
आपके इस ज्ञानवर्धक लेख को पढ़कर कला और कलाकार के मर्म को समझने में बहुत लाभ मिलेगा।
मधु सूदन जी
आपने लिखा है:
“भूतकाल में जब कभी ऐसी कृतियों को देखने का अवसर मिला तो नासमझ की तरह आगे बढ़ जाना ही श्रेयस्कर लगता था किंतु आज ये लेख पढ़कर अहसास हुआ… ”
मुझे प्रसन्नता है कि एब्सट्रेक्ट आर्ट के प्रति आपका दृष्टि बोध बढ़ा है।यह एब्सट्रेक्ट आर्ट के चित्रकारों के लिए भी अच्छी खबर है और मुझे भी खुशी है मेरे इस आलेख से आपको मदद मिली। वैसे यह आपकी जिज्ञासा वृत्ति है मेरा लेख तो निमित्त मात्र है।
हार्दिक धन्यवाद मधुसूदनजी।
विषय बहुत ही गूढ़ है और आपके द्वारा किया गया विश्लेषण बहुत ही रोचक और ज्ञान पूर्ण रहा, भूतकाल में जब कभी ऐसी कृतियों को देखने का अवसर मिला तो नासमझ की तरह आगे बढ़ जाना ही श्रेयस्कर लगता था किंतु आज ये लेख पढ़कर अहसास हुआ कि कलाकार के द्वारा उकेरी गई कृतियों में उसकी समाज के प्रति सोच और प्रकृति के प्रति उसकी संवेदनाओं को प्रसारित करना ही रहा होगा।
आपके इस ज्ञानवर्धक लेख को पढ़कर कला और कलाकार के मर्म को समझने में बहुत लाभ मिलेगा।
आपका साधुवाद
आपके आलेख पर कुछ कमेंट करने की कम से कम मैं योग्यता नहीं रखता। किन्तु पढ़ने के बाद मैं जितना कुछ समझ सका हूँ उसे शब्दों में ढ़ालने का प्रयास कर रहा हूँ –
यूँ कला का अर्थ अभिव्यक्ति से है। कलाकार विभिन्न माध्यमों या विधा से भावों को व्यक्त करता है। यह भाव उसके स्वयं के या फिर जिसे वह दर्शा रहा है उसके होते हैं।
ललित (लालित्य) का अर्थ भाव से है। मूलभाव सुख और दुख ही हैं। अन्य सभी भाव इनके उत्पाद हैं और तद्नुसार ही वे सुखानुभूति या फिर दुखानुभूति के निमित्त कारण हैं। यह ललित कला के प्रभाव को ग्रहण करने के लिए भावना के विकास और परिष्कार की अपरिहार्यता को स्वीकारना है।
तब ललित कला किसी खास विधा द्वारा भावाभिव्यक्ति है। हमें उसे उसी भाव से ग्रहण करना चाहिए। यह भाव का कला के माध्यम से प्रतीक पक्ष (Symbolic representation) है। तब फिर आवश्यक है दृष्टा अथवा श्रोता का निरपेक्ष भाव से उसे ग्रहण करना।
साथ ही कला का एक अर्थ स्थिति भी है, जैसे – चन्द्र कलायें। स्थिति के साथ ही कला में अनुशासन और सापेक्ष भाव आ जाता है।
किसी कलाकार के लिए यह सापेक्षता ही कला का अनुशासन है। तब फिर उसका मूल्यांकन प्रतीक न रहकर छाया (Image) का रूप धारण कर लेता है। छाया के साथ ही उसमें बहिर्जगत का प्रक्षेपण शुरू हो जाता है।
धृतिवर्धन जी का यह कहना कि कला सृष्टि का अर्थ खोजने का मतलब उसके आनन्द से बंचित होना है। कुछ सीमा तक मैं उनसे सहमत हूँ। यह ठीक उसी प्रकार से होगा जैसे किसी छोटे बच्चे द्वारा रंगों को यूँ ही फैला देने से बनी अर्थहीन आकृति को देखकर माता-पिता का पुलकित एवं प्रफुल्लित होना। यह सिर्फ भाव की प्रधानता से ही सम्भव है। अन्यथा दूसरा कोई उसमें आनन्द ले ही नहीं सकता। उसे तो यह उद्वेलित करेगा।
अमूर्त कला के भाव को ग्रहण करना बिना पूर्वानुमान के सम्भव नहीं है, “जाकी रही भावना जैसी प्रभु मूरत देखी तिन तैसी”। उदाहरण के लिए – भैरों जी की बेढौल आकृति को बिना पहले से जाने कोई उसके सामने नतमस्तक नहीं होगा। यहाँ नाम, रूप पर आरोपित हो रहा है। वहीं किसी भी धनुष वाण ली हुई प्रतिमा (रूप) को देखते ही श्रीराम के नाम का स्वत:स्फूर्ति स्मरण होने लगता है। यह आपके कथन नाम-रूप के सामरस्य को दर्शाता है।
किसी भी आकार का तब तक कोई महत्व नहीं है जब तक उसके पीछे कोई सुदृढ़ विचार न हो। कोई भी आकृति अपने उद्देश्य के बिना आकृष्ट नहीं करती। यह उद्देश्य ही है जो उसे मूल्यवान बनाकर गरिमा प्रदान करता है। इसके लिए जरूरी है आकृति के साथ-साथ चेतना का विकास। प्रकृति के आकस्मिक बदलाव निरर्थक नहीं होते। बिना घटनाक्रम का विश्लेषण किये हम घटना की सार्थकता को नहीं समझ सकते। इसके लिए घटना की आवश्यकता को भिन्न दृष्टिकोण से समझना होगा। दूसरे शब्दों में चेतना के विकास के बिना परिस्थितिगत या दृष्टिगत परिवर्तन अर्थहीन हैं। यह चेतना ही है जो दिखने वाले परिवर्तन को अर्थवान बनाती है।
ललित कला से सम्बद्ध लोगों को इसका संज्ञान लेना मेरी दृष्टि से आवश्यक है।
अवधेश त्रिपाठी
16-04-2026
अवधेश त्रिपाठी जी
आपने इतनी विस्तृत शास्त्रीय समीक्षा मेरे लेख पर लिखी इसके लिए हार्दिक आभार।
वस्तुत: अमूर्त कला सार्वलौकिक रुचि का विषय नहीं ठीक वैसे ही जैसे शास्त्रीय संगीत।अब इसका सरलीकरण उप शास्त्रीय संगीत तक तो हो सकता है पर लोक संगीत स्तर तक नहीं।
इसलिएआपने जो यह लिखा है कि–
“छोटे बच्चे द्वारा रंगों को यूँ ही फैला देने से बनी अर्थहीन आकृति को देखकर माता-पिता का पुलकित एवं प्रफुल्लित होना। यह सिर्फ भाव की प्रधानता से ही सम्भव है। अन्यथा दूसरा कोई उसमें आनन्द ले ही नहीं सकता। उसे तो यह उद्वेलित करेगा।”
यह कथन समीचीन नहीं लगता।
कला की दृष्टि से देखें तो ईश्वर से बढ़ कर कोई कलाकार ही नहीं है तो ऐसे में मनुष्य की कोई भी मूर्त रचना रूप रंग उद्देश्य प्रभाव सभी लिहाज से व्यर्थ है । तब कलाकार क्या करे?तब वह स्वयं ही ब्रह्मा बन जाता है और अमूर्त की मानसिक सृष्टि करने लगता है।
बस इस एबस्ट्रेक्ट आर्ट को कुछ ऐसे भी समझा जा सकता है।
आपने जो अन्य मुद्दे उठाए हैं वे महत्वपूर्ण हैं उन पर पृथक आलेख लिखकर समाधान का प्रयास करूंगा।
हार्दिक धन्यवाद आपको अवधेश जी
इस आलेख पर प्रोफेसर सुरेश्वर शर्मा जी जबलपुर ने मुझे व्हाट्सएप पर यह टिप्पणी भेजी है क्योंकि यह टिप्पणी भाग ठीक से काम नहीं कर रहा है( दो अन्य का भी यही कथन है)
“कला सरिता से दो कूल कहें, आलिंगन दे,
कल कल करती सरिता अनुभूति सागर की ओर बहती रही, और मूर्त कूल सरिता से मिलकर
सागर मे अमूर्त अव्यक्त निराकार निर्विकार हो गए,
अत: कला जो सर्वदा ललित ही होती है, उसके यही मूर्त और अमूर्त दो पक्ष हैं।
इस के आगे मै अवाक हूँ।”
प्रोफेसर शर्मा जी ने यहाँ ललित कला के दो अमूर्त पक्ष माने हैं जो अनुभूति में निर्विकार हो जाते हैं। उनकी यह स्थापना कला में निहित एक नए सौंदर्य बोध की ओर इंगित करती है जो दर्शक की रस ग्रहण क्षमता पर निर्भर है। इस काव्यात्मक और चित्र कला में दिशा निर्देशक टिप्पणी के लिए प्रोफेसर डाक्टर सुरेश्वर शर्मा जी का हृदय से नमन। निरंतर प्राप्त ऐसी टिप्पणियों से मेरा लेखन सार्थक हो रहा है।
संपादक जी को हार्दिक धन्यवाद।
किसी लेखक का कथन है शिक्षा न हो तो मस्तिष्क कार्य करता है सामान्य आदमी कला को इसी तरह आत्मसात करता है आपने लिखा है हर आदमी मै कलाकार होता है
कला को समझने का सौंदर्य बोध को यह भी आवश्यक है एक आदमी पहाड़ों पर जा कर प्रकृति का आनंद लेता दूसरा एकांत से बेचैन होता है, अब सौंदर्य बोध कोई बाहरी तत्व तो है नहीं यह मन मस्तिष्क मै होता है दर्शक का आंतरिक गुण होता है जब किसी कला से तादात्म्य बैठता है तो आनंद की अनुभूति करता है। अमूर्त कला प्रायः परंपरागत नियमों से मुक्त होती है स्वतंत्र होती है यद्यपि सरल नहीं होती बल्कि सामान्यीकरण के विपरीत अमूर्तिकरण की ओर जाती है यानि बिल्कुल गणित की तरह पूर्ण abstract दुनियादारी की सामान्य बातों का अमूर्तिकरण करने की चेष्टा कलाकार करता है।जैसे एक कवि की कविता या क्षणिका लंबे चौड़े लेख के विपरीत गहरा प्रभाव प्रस्तुत करते है अमूर्त कला के भावों को समझना यानि उसका सामान्यीकरण करना जितना वह जीवन संघर्ष से जुड़ी होती उतना दर्शक भी आत्मसात करता है
मूर्त कलाएं मनुष्य के ऐतिहासिक सांस्कृतिक जीवन संघर्षों के दुख सुख हर जीत घृणा तृष्णा क्रोध अवसाद रूपांकित जितना करीब से से करती है दर्शक को गहराई से प्रभावित करती है यानि चेतना को जागृत करती वह रूपांकन परम आनंदकारी होता है।
कला अनुभव की सुंदर अभिव्यक्ति है और अनुभव देखे हुए की यथाशक्य समग्र समझ है। द्वंद्व जीवन को सदैव दोलायमान रखते हैं; यह रजोगुण का परिणाम है। यदि इसकी गति रज से सत्त्व और फिर गुण-साम्य की ओर हो, तो परिणाम ‘समत्व’ होता है। कला का क्षेत्र इस समत्व से कुछ ही नीचे है। कला-अभिव्यक्ति अपरा प्रकृति का आनंदप्रदायक गुण है। लेखक महोदय संभवतः यही समझा रहे हैं।
लेखक ने मूर्त कला और अमूर्त कला को पृथकता से स्पष्ट किया है। मूर्त कला एक छोटे बच्चे से लेकर वयोवृद्ध तक सभी के लिए आनंददायी है और एक रसिक या अनुभव की दृष्टि से विशेष बुद्धिमत्ता की अधिक अपेक्षा भी नहीं रखती। कलाकार में शास्त्र की समझ अपेक्षित रहती है, लेकिन जन्मजात कलाकार में यह अंतर्जात (Innate) होती है; इसके शास्त्र बाद में बनते हैं।
अमूर्त कला के संबंध में जानकारी के अभाव में अधिक कुछ कहना युक्तिसंगत नहीं होगा, लेकिन लेख पढ़ने से ऐसा प्रतीत होता है कि ऐसी कला-अभिव्यक्ति किसी निश्चित उद्देश्य के लिए कलाकार के मन में अंशों में उपजी अवचेतन और अचेतन मन की विचार-तरंगें हैं, जिन्हें वह प्रतीकात्मक अर्थ देकर प्रस्तुत करता है। इन्हें समझने के लिए तर्क-बुद्धि का प्रयोग आवश्यक है। यह आम का स्वाद लेना छोड़कर उसके रासायनिक संगठन की मीमांसा करने जैसा है; तथापि महत्त्व उसका भी है। जैसे बेंजीन की रासायनिक संरचना की पहेली का समाधान केक्यूले (Kekulé) को स्वप्न में अपनी पूंछ को मुंह में पकड़े हुए गोलाकार सर्प के रूप में दिखा ।
मूर्त कला पहले आनंद का रसास्वादन और फिर कला की ज्ञान मीमांसा है जो एक रसिक भोक्ता के दृष्टि से आवश्यक नहीं है ।
अमूर्त कला पहले समझ और बाद में उसका आनंद है। मूर्त कला में आनंद प्रधान है, जबकि अमूर्त कला में आनंद और तर्कशीलता दोनों का होना आवश्यक है। इसमें भी एक कलाकार और रसास्वादन करने वाले रसिक की दृष्टि में अंतर हो सकता है।
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आपका ललित कला के ऊपर लिखा गया विश्लेषण बहुत ही सटीक और सार्थक है भूतकाल के समय को याद करूं तो कई बार ऐसे कार्यक्रम या प्रदर्शनियों में जाने का सौभाग्य मिला किंतु विषय की अधिक जानकारी न होने के कारण नासमझी में देखते हुए आगे बढ़ जाना ही श्रेयस्कर लगता था किंतु आज इस विश्लेषण पर ज्ञान वर्धन हुआ और कलाकार की नजर से देखें तो वह समाज में व्याप्त कुरीतियों पर की गई उसकी भावनाओं की आवाज होती है फिर वह प्रकृति के लिए किया गया कार्य हो या समाज के प्रति सोच का प्रतिबिंब होती है।
आपके इस लेख से हम जैसे अनभिज्ञ जन को भी कुछ जानने समझने का अवसर मिलेगा।
मधु सूदन जी
आपने लिखा है:
“भूतकाल में जब कभी ऐसी कृतियों को देखने का अवसर मिला तो नासमझ की तरह आगे बढ़ जाना ही श्रेयस्कर लगता था किंतु आज ये लेख पढ़कर अहसास हुआ… ”
मुझे प्रसन्नता है कि एब्सट्रेक्ट आर्ट के प्रति आपका दृष्टि बोध बढ़ा है।यह एब्सट्रेक्ट आर्ट के चित्रकारों के लिए भी अच्छी खबर है और मुझे भी खुशी है मेरे इस आलेख से आपको मदद मिली। वैसे यह आपकी जिज्ञासा वृत्ति है मेरा लेख तो निमित्त मात्र है।
हार्दिक धन्यवाद मधुसूदनजी।
पुनः
आपने लिखा है मधु सूदन जी कि आज इस विश्लेषण पर ज्ञान वर्धन हुआ और कलाकार की नजर से देखें तो वह समाज में व्याप्त कुरीतियों पर की गई उसकी भावनाओं की आवाज होती है फिर वह प्रकृति के लिए किया गया कार्य हो या समाज के प्रति सोच का प्रतिबिंब होती…
मुझे प्रसन्नता है कि आपके मन के भीतर छुपा कला मर्मज्ञ जागृत हो रहा है। बहुत आभार पुनः।
यह लेख सिर्फ कला ही नहीं जीवन को समझने में भी सहायक है।लेखक की भाषा शैली ने साहित्य व दर्शन जैसे विषय को सहज बना दिया है।
यह लेख सिर्फ कला ही नहीं जीवन को समझने में भी सहायक है।लेखक ने अपनी भाषा शैली से साहित्य व दर्शन जैसे गंभीर विषयों को सहज बना दिया है।
गुरुदेव, ऐसा प्रतीत हो रहा है की जीवन भर पराग को एकत्रित करके जो मधु बना है उसे हम छत्ते में एक नलीका डाल कर पी रहे हैं। ब्रह्मा द्वारा रचित कालकृति द्वारा भावपूर्ण कलात्मक रचनाएँ निश्चय ही ब्रह्म साधना हैं।