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डॉ. दिनेश पाठक की कलम से....

किताबें कुछ कहना चाहती हैं

            किताबें झांकती हैं बंद अलमारी के शीशों से,
            बड़ी हसरत से तकती हैं,
            महीनों अब मुलाक़ातें नहीं होतीं,
            जो शामें उनकी सोहबत में कटा करती थीं,
            अक्सर गुज़र जाती हैं अब कंप्यूटर के पर्दों पर

            गुलज़ार साहब की यह नज़्म, मौजूदा वक़्त में किताबों की बेबसी को सही-सही बयां करती है और उस पर जब नये ज़माने की एक लेखिका द्वारा दिये गये नारे, ‘डिजिटलाइज़ और डाई’ का ज़िक्र होता है तो सवाल उठता है क्या वाक़ई जिन किताबों के ज़रिये ज़िंदगी को जोश और जुनून मिलता रहा है, वो अतीत होती जा रही हैं?

पारंपरिक रूप में काग़ज़ों पर छापने के स्थान पर जब कोई किताब इलेक्ट्रॉनिक या डिजिटल प्रारूप में प्रस्तुत की जाती है तब हम उसे किताब का ‘ई’ संस्करण कहते हैं। इस तकनीक में किताब के कथ्य अथवा विषयवस्तु में तो कोई अंतर नहीं आता है लेकिन संवेदनाओं की नदी में डूबने उतरने या भावनाओं में भीगने का वह एहसास नहीं होता है, जो काग़ज़ की किताब को पढ़ने पर होता है। यदि हम अंग्रेज़ी शब्द ‘डिजिटलाइज़ेशन’ के मायने देखें तो वह होता है किसी विचार, संवाद, जानकारी, चित्र, मानचित्र यानी ज्ञान के किसी भी स्वरूप को अंकीय प्रारूप में परिवर्तित करना और यह वर्तमान कंप्यूटर युग की अनिवार्यता है।

मीडिया इस बदलती तकनीक के साथ क़दम से क़दम मिलाकर चल रहा है और काफ़ी हद तक इसने इसे इससे जुड़े लोगों के लिए अत्यधिक सुविधाजनक भी बना दिया है। वेब, कंप्यूटर एवं मोबाइल क्रांति के बावजूद अभी हमारे देश में पत्र-पत्रिकाओं के डिजिटल संस्करण अधिकांश भारतीयों को सहज सुलभ नहीं है इसलिए पत्र-पत्रिकाएं अभी भी काग़ज़ पर ज़िंदा है, किंतु जिस गति से सस्ते मोबाइल सेट, फ्री वाई-फ़ाई ज़ोन और दुनिया की तुलना में काफ़ी कम शुल्क पर इंटरनेट सेवाएं उपलब्ध करायी जा रही हैं, उसे देखकर लगता है जल्द ही यह संग्रहालय की विषय वस्तु बन जाएंगे।

दिनो-दिन गिरते सरकुलेशन के आंकड़े इसी ओर इशारा कर रहे हैं। जहां तक सूचना, समाचार और ज्ञान की बात है तो यह तकनीक निसंदेह अत्यंत प्रभावी है क्योंकि जिस गति से यह अद्यतन हो सकती है वह गति प्रिंट में नहीं है, लेकिन जब साहित्य, संस्कृति, इतिहास और कला से जुड़ी पुस्तकों के डिजिटल संस्करण पढ़ने की बात आती है, तो अधिकांश पाठकों के मन में कुछ अजीब-सा भाव पनपता है। हालांकि किताबों के ई-संस्करण तुलनात्मक रूप से सस्ते पड़ते हैं। विभिन्न वेबसाइट्स के ज़रिये हज़ारों किताबें मुफ़्त या नाम मात्र के शुल्क पर पढ़ी जा सकती हैं। यह बात और है कि इनमें से कई पूर्ण नहीं होती है।

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वेबदुनिया के विस्तार की तीव्र गति देखकर कई बार लगता है जल्द ही किताब अतीत हो जाएगी लेकिन वैज्ञानिकों का यह कथन हमें हौसला देता है कि इंसानी दिमाग़ कंप्यूटर स्क्रीन और काग़ज़ पर शब्दों को पढ़कर समझने की जो प्रोसेसिंग करता है वह बिल्कुल अलग होती है। इसीलिए काग़ज़ी किताब हमारे दिलो-दिमाग़ पर जो प्रभाव डालती है वह आईपैड, कंप्यूटर स्क्रीन या किंडल पर पढ़ी जाने वाली किताब नहीं डाल सकती है। भले ही विषय वस्तु एक समान हो, क्योंकि स्क्रीन पर पढ़ी जाने वाली किताब से पाठक का रिश्ता मन का नहीं, मशीनी होता है।

किसी किताब को पढ़ने के बाद, गुनने की जो बात काग़ज़ी किताब से बनती है वह मशीनी किताब से कतई नहीं। पसंदीदा किताबों को ज़िंदगी के क़रीबी रिश्तों की तरह ही सहेजकर रखा जाता रहा है। उसके किसी पेज पर लिखी किसी ख़ास बात को रेखांकित कर वैसे ही दोहराया जाता है जैसे किसी अपने की किसी ख़ासियत को बार-बार याद किया जाता है। मन को छू लेने वाले किताब के किसी ख़ास हिस्से के पृष्ठ पर कोई फूल या पत्ती रखकर उसे मन में वैसे ही समेटने की कोशिश होती है, जैसे अपने किसी अज़ीज़ को कोई उपहार देकर उसकी यादों में ख़ुद को हमेशा के लिए बसाने की कोशिश हो। शायर, अहमद फ़राज़ ने इंसानी ज़िंदगी के फ़लसफ़े को किताब से क्या खूब जोड़ा है:

अबके हम बिछड़े तो शायद कभी ख्वाबों में मिलें
जिस तरह सूखे हुए फूल किताबों में मिलें

संचार क्रांति के इस युग में पढ़ने का मतलब इंटरनेट तक ही सीमित रह गया है। हम पुस्तकों को भूलते जा रहे हैं। युवा वर्ग के हाथ में हमेशा मोबाइल नज़र आता है। जहां पहले ज्ञान के लिए व्यक्ति पुस्तकों को पलटता था अब सिर्फ़ गूगल बाबा और कृत्रिम बुद्धिमत्ता का सहारा लेता है। शोध बताते हैं इसके चलते लोगों की जिज्ञासु प्रवृत्ति और याद करने की क्षमता भी ख़त्म होती जा रही है। दो-तीन दशक पहले की भांति स्कूल और महाविद्यालयों में अब पुस्तकालय का कोई पीरियड नहीं होता, न ही शिक्षक पढ़ाई के दौरान किसी पुस्तक विशेष को पढ़ने की सलाह विद्यार्थियों को देते हैं। गली, मोहल्लों में अब तो वाचनालय भी मुश्किल से नज़र आते हैं।

देखा जाये तो तथाकथित संचार क्रांति ने पुस्तकों से उनके पाठक छीन लिये हैं, चुनौती वाकई बड़ी है| सूचना क्रांति के इस दौर में कभी-कभी लगता है कि पुस्तक अप्रासंगिक हो गयी है परंतु यह पूर्ण सत्य नहीं है। पुस्तकें अतीत में संसार को राह दिखाती रही हैं और तमाम परिवर्तनों के उपरांत भी छपी हुई किताबों का महत्व समाप्त नहीं हुआ है, ज़रूरत जागरूक होने की है।

तमाम वरिष्ठ रचनाकार बड़ी साफ़गोई से स्वीकारते हैं कि रचना प्रक्रिया में हाथ से काग़ज़ पर लिखने के दौरान जो विचार शृंखला जन्मती है वह कंप्यूटर पर नहीं बनती। सही बात है एक संवेदनशील पाठक किताब पढ़ते-पढ़ते रो सकता है, किताब में मुंह छुपाकर विचार तंद्रा में खो सकता है, किताब के किरदार से हमनवा होकर किताब सीने पर रखकर सो भी सकता है। यह सब मशीनी पुस्तक के साथ संभव नहीं है इसलिए हम पूरे विश्वास के साथ यह कह सकते हैं कि तमाम तकनीकी बदलाव के बावजूद किताब का वजूद हमेशा क़ायम रहेगा।

वैसे भी वरिष्ठ विद्वानों का मानना है कि, टेक्नोलॉजी हमारे जीवन में एक सुधारात्मक प्रक्रिया लेकर आयी है, जिसके कारण बहुत सारी चीज़ें सरल हो गयी हैं। वैज्ञानिक तकनीक तक सबकी पहुँच बढ़ी है, परिवेश बदल रहा है और यह जीवन की प्रगति का एक महत्वपूर्ण आयाम है। लेकिन छपी हुई किताब की जगह ई-बुक्स या किंडल वग़ैरह आने का यह अर्थ बिलकुल नहीं है कि इससे छपी हुई किताब का महत्व समाप्त हो जाएगा। भारत के सन्दर्भ में यदि देखें तो छपी हुई किताब भारतीय मानस के बहुत क़रीब है, क्योंकि छपी हुई किताब का संस्पर्श एक अलग उद्वेग जगाता है, मानवीय संवेदनाओं को जगाता है।

हाल ही आयी अमेरिका की एक रिपोर्ट में एक विस्तृत सर्वे के आधार पर आंकड़े दिये गये थे जिसके अनुसार वहां भी हर तीसरा आदमी वर्ष में एक छपी हुई किताब ज़रूर पढ़ता है और ई-बुक्स के कारोबार में हाल के वर्षों में गिरावट भी आयी है। निसंदेह ई-बुक्स ‘इनफ़ार्मेशन पॉइंट ऑफ़ व्यू’ से तो बहुत उपयोगी है, यानी उसे स्क्रॉल करना तो आसान है, लेकिन पढ़ने के दौरान उसमें भावनाओं को उद्वेलित करने की वह क्षमता नहीं है, क्योंकि ‘आईना वही रहता है चेहरे बदल जाते हैं’ की तर्ज़ पर स्क्रीन वही रहता है, मज़मून बदल जाते हैं। हर एक छपी हुई किताब अपने पाठक के साथ एक क़रीबी रिश्ता क़ायम करती है, इसीलिए सफ़दर हाशमी साहब ने कहा है:

किताबें कुछ कहना चाहती हैं
तुम्हारे पास रहना चाहती हैं
किताबें करती हैं बातें, बीतें ज़मानों की, दुनिया की,
इंसानों की, आज की, कल की एक-एक पल की
ख़ुशियों की, ग़मों की, फूलों की, बमों की
जीत की, हार की, प्यार की, मार की।

क्या तुम नहीं सुनोगे, इन किताबों की बातें?
किताबें, कुछ कहना चाहती हैं, तुम्हारे पास रहना चाहती हैं।

किताबों में चिड़ियां चहचहाती हैं,
किताबों में खेतियां लहलहाती हैं
किताबों में झरने गुनगुनाते हैं, परियों के क़िस्से सुनाते हैं
किताबों में रॉकेट का राज़ है,
किताबों में साइन्स की आवाज़ है
किताबों का कितना बड़ा संसार है
किताबों में ज्ञान की भरमार है

क्या तुम इस संसार में नहीं जाना चाहोगे?
किताबें, कुछ कहना चाहती हैं
तुम्हारे पास रहना चाहती हैं।

विश्व पुस्तक दिवस…

दुनिया के तमाम बाशिंदों के बीच प्रचलित विविधतापूर्ण संस्कृति को एक साथ लाने और उनके बीच किताबों की शक्ति को प्रचारित करने के उद्देश्य से यूनेस्को द्वारा प्रतिवर्ष 23 अप्रैल को विश्व पुस्तक दिवस मनाया जाता है, इस विश्व स्तरीय उत्सव की शुरूआत सन् 1995 में पेरिस से हुई थी। संयुक्त राष्ट्र शैक्षिक, वैज्ञानिक एवं सांस्कृतिक संगठन यूनेस्को द्वारा बच्चों के बीच किताबें पढ़ने की आदत को विकसित करने, कॉपीराइट का प्रयोग कर बौद्धिक संपत्ति को सुरक्षित रखने और किताबों तथा लेखकों को श्रद्धांजलि देने के सम्मिलित उद्देश्य से इसकी शुरूआत की गयी थी। ग्रेगेरियन कैलेंडर के अनुसार विलियम शेक्सपियर, व्लादिमीर नबो कोव, मैनुएल सेजिया जैसे लेखकों की जयंती और मी गुअल डी सर्वेंटस, गारसी लासो, जैसे लेखकों की पुण्यतिथि भी 23 अप्रैल को होने के कारण इस तिथि का चयन किया गया था।

दिनेश पाठक, dinesh pathak

डॉ. दिनेश पाठक

राष्ट्रीय पत्र-पत्रिकाओं हेतु दीर्घ काल से कला, संस्कृति, संगीत एवं सामायिक लेखन एवं संपादन। आकाशवाणी, दूरदर्शन एवं विभिन्न टी.वी. चैनलों हेतु कार्यक्रम/वृतचित्र लेखन, निर्माण, प्रस्तुतकर्ता के रूप में संबद्ध। विविध क्षेत्रों की विशिष्ट विभूतियों के शताधिक विस्तृत साक्षात्कार जिनमें लता मंगेशकर का अंतिम इंटरव्यू सम्मिलित है। तानसेन समारोह शताब्दी वर्ष हेतु निर्मित विशेष वृतचित्र, 'सुरों और संस्कृतियों का वैश्विक समागम तानसेन समारोह' सहित ऐसे अन्य प्रोजेक्टों में लेखन। 'स्वरित' का संपादन । साहित्य अकादमी म.प्र. सहित अन्य संस्थानों से सम्मानित। राजा मानसिंह तोमर संगीत एवं कला विश्वविद्यालय, ग्वालियर में पूर्व कुलसचिव एवं वित्त नियंत्रक। संपर्क: dpathak2005@gmail.com

3 comments on “किताबें कुछ कहना चाहती हैं…

  1. ब्रजेन्द्र श्रीवास्तव , ग्वालियर/बंगलौर says:

    डाक्टर दिनेश पाठक सदैव की तरह समसामयिक मुद्दों पर अपना अनुभव लेकर इस आलेख में पाठकों से रूबरू हुए हैं। पढ़ कर मन प्रसन्न हुआ।
    पाठक जी ने जीवन का यथार्थ और पुस्तक में निबद्ध कथ्य के बीच संबंध की जो निरंतरता है ,उसे अच्छे से रेखांकित किया है।
    किताबें जीवन के अनुभव, आनंद हर्ष क्लेश सभी कुछ अपने में समेटे रहती हैं इसलिए उनके साथ लगाव तो होता है नई पीढ़ी इनसे कुछ न कुछ सीखती भी है।
    पर फिर भी कुछ लोग यदि किताबों को रद्दी में कैसे फेंक देते हैं तो लगता है उन्होंने जीवन से कुछ सीखा ही नहीं।

  2. ब्रजेन्द्र श्रीवास्तव , ग्वालियर/बंगलौर says:

    डाक्टर दिनेश पाठक सदैव की तरह समसामयिक मुद्दों पर अपना अनुभव लेकर इस आलेख में पाठकों से रूबरू हुए हैं। पढ़ कर मन प्रसन्न हुआ।
    पाठक जी ने जीवन का यथार्थ और पुस्तक में निबद्ध कथ्य के बीच संबंध की जो निरंतरता है ,उसे अच्छे से रेखांकित किया है।
    किताबें जीवन के अनुभव, आनंद हर्ष क्लेश सभी कुछ अपने में समेटे रहती हैं इसलिए उनके साथ लगाव तो होता है नई पीढ़ी इनसे कुछ न कुछ सीखती भी है।

    पर फिर भी कुछ लोग यदि किताबों को रद्दी में कैसे फेंक देते हैं तो लगता है उन्होंने जीवन से कुछ सीखा ही नहीं।

    यह कमेंट पहली बार किया है पहले कभी नहीं किया पर यंत्र इसे स्वीकार नहीं कर रहा!!

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