मोंजा: कविता के नाम एक नगर-भ्रमण
पाक्षिक ब्लॉग रति सक्सेना की कलम से....

मोंजा: कविता के नाम एक नगर-भ्रमण

       मोंजा की यात्रा से पहले नॉर्वे की यात्रा हो चुकी थी, लेकिन यूरोप यात्रा का मक़सद मोंजा के पोएट्री फ़ेस्टिवल में जाना था, जहाँ मुझे कविता पाठ के लिए आमंत्रित किया गया था। एक तरफ़ का किराया भी दिया गया था। ओस्लो से मोंजा की यात्रा में सबसे ख़ूबसूरत नज़ारा आल्प्स की पर्वत शृंखलाएँ हैं, ख़ूबसूरत पहाड़ शृंखलाएँ… बिल्कुल लद्दाख की तरह आधी बर्फ़ से ढँकी और आधी नंगी… कहीं नीली, कहीं सफ़ेद झक्क…

मोंजा में POESIAPRESENTE 2009 की प्रेसिडेंट डोना मेरे नाम का फ़्लैग लिये क्रिस्टीना के साथ इंतज़ार कर रही थीं। POESIAPRESENTE 2009 मोन्जा के युवा कलाकारों द्वारा चलाया जाने वाला सांस्कृतिक कार्यक्रम है जो क़रीब-क़रीब पूरे वर्ष क्रियाशील रहता है। पिछले वर्ष फ़ेडेरिको ने मेरी कविताओं का अनुवाद इतालवी में किया था और पुस्तक के रूप में छपवाया था। उसी को पढ़कर मुझे इस फ़ेस्टिवल में भाग लेने के लिए विशेष रूप से बुलाया गया था। मेरा परिचय न तो फ़ेडेरिको से था, न ही इन युवा कर्मठ कलाकारों से। इसलिए मैं इस बुलावे को बड़े महत्व से देख रही थी।

मैंने इटली में कविता और अन्य कलाओं की स्थिति के बारे में बात की तो डोना बताने लगी कि यूरोपीय युवकों पर अमेरिकन संस्कृति का प्रभाव ज्यादा पड़ने लगा है। खाना-पीना, मस्ती मारना ही जीवन का उद्देश्य रह गया है।

मोंजा: कविता के नाम एक नगर-भ्रमण

इतालवी संसार एक वक़्त कला, संगीत और साहित्य के क्षेत्र में विशेष महत्व रखता था। रोमन संस्कृति में कला को भी प्रश्रय दिया गया था। विशेष रूप से शिल्प कला और वास्तुकला में यह संस्कृति बेजोड़ योगदान दे पायी। मोन्जा तो फ़ार्मूला वन कार रेस के लिए विश्व प्रसिद्ध है, इसे अमीरों की नगरी माना जाता है। मोन्जा में नॉर्वे के मुक़ाबले काफ़ी गर्मी थी, पता नहीं थकान के कारण या फिर पिज़्ज़ा के कारण मुझे रात में ही बुख़ार चढ़ गया।

मोन्जा की विशेषता पूछने पर दो-तीन चीज़ें महत्वपूर्ण बतायी गयी थीं, रोज़ गार्डन, राजभवन जिसे वे लोग बिग हाउस के नाम से पुकारते हैं और सबसे ज़्यादा महत्व है Monza Cathedral or Duomo di Monza। मिथक के अनुसार इसका निर्माण इटली की रानी थियोडेलिंडा ने करवाया था। जब वे आल्प पहाड़ियों को पार कर लैम्ब्रो नदी के पार आयीं तो कपोत ने उन्हें चर्च बनवाने की जगह दिखायी। आरंभ में इस स्थान का नाम मोडोएटिया था। इस निर्माण का समय ईसा बाद 595 बताया जाता है। आज यह इटली के ख़ूबसूरत चर्चों में से एक माना जाता है।

मुझे लगता है कि यदि हम धर्म में से युद्ध को निकाल बाहर करें, थोड़ी उदारता और भर दें, तो संभवतया ये मानव की सबसे ख़ूबसूरत कलात्मक मानसिकता का परिचायक बन सकती है। अब मैं राजमहल की ओर चलने लगती हूं, जो रोज़ गार्डन से सटा हुआ है। बाज़ार के भीतर से गुज़रते हुए मुझे मोन्जा की फ़ैशन संस्कृति का पूरा परिचय मिल रहा था। मैं हर दुकान को ध्यान से देख रही थी, जो बेहद ख़ूबसूरत लेकिन बेहद महंगी वस्तुओं से अटी पड़ी थी। मैं सोच रही थी इस तरह के बाज़ार केवल पैसे वाले लोगों के लिए होते हैं, तो फिर क्या ग़रीब या कम पैसे वाले लोगों के लिए कुछ नहीं है!

नॉर्वे की अपेक्षा भोजन की वस्तुएँ ज्यादा लुभावनी लग रही थीं। गलियाँ पतली-पतली थीं, लेकिन ख़ास यूरोपीय शैली में ईंटों से बनी थीं। यूरोप की ख़ास बात यह है कि यहाँ लोग पैदल चलना बेहद पसन्द करते हैं। बाज़ार में कारें न के बराबर थीं। ज़्यादातर लोग पैदल ही चल रहे हैं। यही अन्तर है अमेरिकन और यूरोपीय संस्कृति में।

कुछ देर में मैं रोज़ गार्डन पहुँची। पीछे एक लम्बी सी इमारत थी, जिसके बारे में बताया गया कि वह राजभवन है, लेकिन आजकल पर्यटकों के लिए खुला नहीं है। देखने में वह इमारत राजस्थानी रजवाड़ों के सम्मुख बेहद सामान्य सी लगी।

एक प्रौढ़ दम्पत्ति आकर मेरे पास बैंच में बैठ गये, मेरा रंग मेरी नस्ल की चुग़ली कर ही देता है। उन्होंने पूछा- क्या आप इंडिया से आयी हैं? मेरे हाँ कहने पर बात करने लगे- “कब आयीं, कैसे आयीं?”

मैंने उनसे राजभवन के बारे में पूछा तो कहने लगे, कुछ वर्ष पहले तो यह किराये पर दिया जाता था, लेकिन आजकल बन्द है, शायद मरम्मत चल रही है। किराये पर किसलिए, मैंने पूछा तो कहने लगे कि शादी आदि की पार्टी के लिए दिया जाता था। फिर अपने आप वृद्ध पुरुष बताने लगे- “मेरी बेटी ने अपनी शादी के लिए राजभवन को ही चुना था। बहुत महंगा था, फिर भी मैंने उसकी बात मान ली। जब मैं उसे शादी के लिए कार में लेकर आ रहा था, तब भी उससे पूछा कि क्या वह अपनी शादी के लिए पूरी तरह से तैयार है। मेरी बेटी बोली कि हाँ मैं इसी लड़के से शादी करूंगी। लेकिन चार साल बाद ही वे अलग हो गये।”

वृद्ध ने उसांस भरते हुए कहा। पिता कहीं भी हो, उसका दर्द एक सा होता है, उसकी इच्छा भी। सन्तान खुश रहे, और उसके जीवन में स्थिरता रहे, इससे बढ़कर क्या खुशी हो सकती है।

बारह बजने को आये, मैं बिनेरिया सात थिएटर हॉल की ओर चलने लगी, वहीं मुझे लंच लेना था। रास्ते में बड़ी-बड़ी दुकानें, तरह-तरह की ब्रेड और पिज़्ज़ा वाली दुकानें, चित्रों की प्रदर्शनी आदि को पार करते हुए ऐसी जगह पहुँची, जहाँ एक मैदान में बहुत से पेड़ लगे थे, मैंने देखा कि सारे पेड़ एक सीध में थे, सभी ऊँचे, लम्बे और कम घने। शहर के बीचो-बीच वन जैसा दृश्य बेहद लुभावना लगा।

बिनेरिया थिएटर पहुँचते ही डोना, क्रिस्टीना ने स्वागत किया। कुछ देर में एलोनेरा भी आ गई, साथ में फैदरिको था। मैंने फैदरिको को कभी नहीं देखा था, ज्यादा बातचीत भी नहीं हुई थी, बस जब कभी उसे मेरी कविता के बारे में कुछ पूछना होता, वह दो-चार पंक्तियाँ लिख देता था।

थोड़ी देर में मैंने और फैदरिको ने कविता के बारे में चर्चा की कि कौन-कौन सी कविताएँ पढ़ी जाएँगी, और कैसे पढ़ी जाएंगी। POESIAPRESENTE 2009 का कार्यक्रम सुबह से शुरू हो गया था, अनेक कार्यक्रम थे, सिम्पोज़ियम, इटली के फ़ेस्टिवल डायरेक्टों के विचार, कविता, फ़िल्म, कला आदि।

पूरा कार्यक्रम इतालवी भाषा में हो रहा था। मुझे लगा यदि मैं थोड़ा आराम कर लूंगी तो ही रात तक ठीक रह पाऊँगी। मैंने आयोजकों को अपना विचार बताया, उन्होंने मुझे कार से होटल छुड़वा दिया। होटल में आकर मैं फिर से दवा खाकर सो गयी। शाम को 6 बजे डोना मुझे लेने आ गयी। इटली के फ़ैशन संसार को देखकर मैंने अपने साथ रखी काले रंग की साड़ी का उपयोग करने का सोचा। शाम को तैयार होकर जब थिएटर पहुंची तो हर कोई साड़ी देखकर खुश था।

जिस बात ने मुझे आकर्षित किया, वह यह थी कि अधिकतर डायरेक्टर युवा थे। थिएटर काफ़ी बड़ा था, लेकिन उसमें मुश्किल से 40-50 लोग बैठे थे। जब मेरी बारी आयी तो मैंने थोड़े शब्दों में कृत्या के कार्यक्रमों के बारे में बताया और यह बताया कि हालांकि भारत के इतिहास में कविता को गौरवमय स्थान प्राप्त है, लेकिन कला के क्षेत्र में अब भी काम करने की गुंजाइश है। अब भी हम सिनेमा और क्रिकेट के सामने हार जाते हैं।

मुझसे एक संवाददाता ने सवाल पूछा कि क्या मेरे फ़ेस्टिवलों में श्रोताओं की संख्या अच्छी होती है। यह एक ऐसी समस्या है जिससे पूरा विश्व जूझ रहा है, मैंने मुस्कुराकर कहा कि हाँ पिछले दो फ़ेस्टिवलों में संख्या काफ़ी थी लेकिन फिर भी पूरी तरह से सन्तुष्ट नहीं हुआ जा सकता है। यदि सौ श्रोता भी कविता को मिल जाएं तो बहुत बड़ी बात होती है।

रात 11बजे रात का सेशन शुरू हुआ, थिएटर पूरी तरह से ख़ाली तो नहीं था, लेकिन इधर-उधर से भरा हुआ था। कुल मिलाकर 50 लोग होंगे।

यह इस दिन का सबसे महत्वपूर्ण कार्यक्रम था, इसकी शुरूआत A]live Poetry, to Elio Pagliarani के वीडियो इन्टरव्यू से हुई। Elio Pagliarani का जन्म 1927 में हुआ था, उन्होंने अपनी कविताओं से इतालवी संसार को झकझोर दिया था। बेहद महत्वपूर्ण फ़िल्म थी, एक कवि अपने समय से गुज़रकर बीत जाने के कगार पर खड़ा है, वह कभी बोलते हैं, तो कभी अपने मौन से काफ़ी कुछ कह जाते हैं। कैमरा उनके माथे की लकीरों, डूबी-सी आँखों और कंपकंपाते हाथों से गुज़रता हुआ दर्शकों को एक बेहद आत्मीय संसार में ले जा रहा था। किताबों के अम्बार में बैठा यह कवि अपने वर्तमान से निकलकर अतीत में पैठता जा रहा है, अपने प्रेम, स्नेह सम्बन्धों को बेझिझक पढ़ता जा रहा है… बेहद अद्भुत अनुभव है मेरे लिए।

इसके बाद Eleonora Matarrese ने Ryck Valli के संगीत के साथ अपनी लम्बी कविता Die Welt बड़े ही ओजस्वी रूप में पढ़ी। इसके बाद मेरी बारी आयी। मैं इस नवीन प्रयोग को देखकर बेहद नर्वस थी। मुझे समझ आ गया कि यहाँ कविता में इतालवी संवेदना का प्रयोग करना ज़रूरी होगा। फेदरिको ने मुझे मंच पर बुलाया, और तीन प्रश्न कविता के बारे में किये, जैसे मेरी कविता में देह और काल दोनों विरोधी तत्व महत्वपूर्ण क्यों हैं, आदि… इसके बाद मैंने अपनी कविता हिन्दी में पढ़नी शुरू की। मैंने उन कविताओं को विशेष रूप से लिया था, जिसमें प्रेम और सम्बन्धों की नयी व्याख्या थी। हालाँकि हमने रिहर्सल नहीं की थी, लेकिन आश्चर्य हुआ कि फेदरिको और मेरा ध्वनि संयोजन परिपूरक था… थिएटर बेहद शांत था। कविता-पाठ के बाद फैदरिको ने आयोजकों को धन्यवाद दिया। मैंने भी आयोजकों के साथ फैदरिको को भी धन्यवाद दिया, जिसके कारण मेरी कविता को नयी देह मिली।

हम दोनों ख़ुश थे… फैदरिको कह रहा था बहुत दिनों के बाद एक अच्छा पाठ हुआ, एक महिला मेरे गले लग गयी, कहने लगी मेरे रोंगटे अभी तक खड़े हैं, तुम कविता नहीं, मंत्र पढ़ रही थीं, जिसमें स्त्री का प्रेम, दर्द सभी कुछ था। मेरे लिए इससे ख़ूबसूरत लमहा कौन-सा हो सकता था!

रति सक्सेना, rati saxena

रति सक्सेना

लेखक, कवि, अनुवादक, संपादक और वैदिक स्कॉलर के रूप में रति सक्सेना ख्याति अर्जित कर चुकी हैं। व्याख्याता और प्राध्यापक रह चुकीं रति सक्सेना कृत कविताओं, आलोचना/शोध, यात्रा वृत्तांत, अनुवाद, संस्मरण आदि पर आधारित दर्जनों पुस्तकें और शोध पत्र प्र​काशित हैं। अनेक देशों की अनेक यात्राएं, अंतरराष्ट्रीय कविता आंदोलनों में शिरकत और कई महत्वपूर्ण पुरस्कार/सम्मान आपके नाम हैं।

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