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डॉ. आकिब जावेद की कलम से....

मध्य-पूर्व में शांति की अधूरी कहानी

           “शक्ति वहाँ केंद्रित होती है, जहाँ ज्ञान और संसाधनों पर नियंत्रण होता है।”

           आज का वैश्विक परिदृश्य इस कथन की गूंज को बार-बार दोहराता है, विशेषकर तब, जब हम पश्चिमी देशों और मध्य पूर्व के बीच के जटिल संबंधों को समझने का प्रयास करते हैं। यह संबंध केवल कूटनीति या अंतरराष्ट्रीय सहयोग तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके भीतर सत्ता, संसाधन, इतिहास, संस्कृति और मानवीय पीड़ा की कई परतें एक साथ जुड़ी हुई हैं। मध्य पूर्व, जो कभी सभ्यताओं का पालना माना जाता था, आज विश्व राजनीति का सबसे संवेदनशील और संघर्षग्रस्त क्षेत्र बन चुका है। मानव सभ्यता के लिए ऐसा दर्दनाक अज़ाब, जिसकी अपनी पीड़ाएं कम नहीं।

यदि हम इतिहास की ओर लौटें, तो पाते हैं वर्तमान संघर्षों की जड़ें औपनिवेशिक दौर में ही निहित हैं। 1916 का केवल एक कूटनीतिक समझौता नहीं था, बल्कि यह उस मानसिकता का प्रतीक था जिसमें शक्तिशाली राष्ट्रों ने अपने हितों के अनुसार एक पूरे क्षेत्र का नक्शा खींच दिया। इस प्रक्रिया में न तो स्थानीय समाजों की विविधता को महत्व दिया गया और न ही उनकी ऐतिहासिक पहचान को। परिणामस्वरूप, ऐसे राष्ट्र अस्तित्व में आये, जिनकी सीमाएँ तो तय थीं, परंतु उनके भीतर सामाजिक और राजनीतिक एकता का अभाव था।

1948 में इज़राइल की स्थापना आधुनिक इतिहास की एक निर्णायक घटना थी, जिसने मध्य पूर्व की राजनीति को स्थायी रूप से बदल दिया। इस क्षेत्र पर पहले ऑटोमन साम्राज्य का नियंत्रण था, जो प्रथम विश्व युद्ध के बाद समाप्त हो गया और इसके बाद ब्रिटेन ने यहाँ शासन किया। इस दौरान यहूदियों का अपने ऐतिहासिक होमलैंड में लौटने का आंदोलन (ज़ायनिज़्म) तेज़ हुआ, वहीं अरब फ़िलिस्तीनी लोग भी इस भूमि को अपनी मातृभूमि मानते थे।

ऐसे बन गया संघर्ष क्षेत्र

जब दो क़ौमों के बीच ​बात उलझी तो संयुक्त राष्ट्र बीच में आया। 1947 में संयुक्त राष्ट्र ने इस क्षेत्र को दो राज्यों- एक यहूदी और एक अरब में बाँटने का प्रस्ताव दिया, जिसे यहूदी नेतृत्व ने स्वीकार किया लेकिन अरबों ने इसे अन्यायपूर्ण मानकर अस्वीकार कर दिया।

14 मई 1948 को डेविड बेन-गुरियन ने इज़राइल के स्वतंत्र राष्ट्र की घोषणा की, जिसके तुरंत बाद पड़ोसी अरब देशों ने हमला कर दिया और 1948 का अरब-इज़राइल युद्ध शुरू हुआ। इस युद्ध में इज़राइल की जीत हुई, लेकिन इसका सबसे गहरा प्रभाव फ़िलिस्तीनी जनता पर पड़ा। लगभग सात लाख से अधिक फ़िलिस्तीनी अपने घरों से बेदख़ल हो गये, गाँव उजाड़ दिये गये और वे शरणार्थी बनकर पड़ोसी देशों या शरणार्थी शिविरों में रहने को मजबूर हुए। इस त्रासदी को फ़िलिस्तीनी नकबा के नाम से याद करते हैं, जिसका अर्थ है “विनाश”।

समय के साथ यह विवाद केवल भूमि का नहीं बल्कि पहचान, अस्तित्व और अधिकारों का संघर्ष बन गया। फ़िलिस्तीनी लोग आज भी अपने खोये हुए घरों में लौटने के अधिकार, स्वतंत्र राज्य की स्थापना और सम्मानजनक जीवन की मांग करते हैं। दूसरी ओर इज़राइल अपनी सुरक्षा और अस्तित्व को प्राथमिकता देता है। इस टकराव ने कई युद्धों, हिंसाओं और राजनीतिक असफलताओं को जन्म दिया है।

आज के संघर्ष का प्रश्न क्या?

वर्तमान समय में यह संघर्ष और भी संवेदनशील और दुखद रूप ले चुका है। विशेषकर गाज़ा पट्टी में रहने वाले फ़िलिस्तीनी लोग निरंतर संघर्ष, नाकेबंदी और सैन्य कार्रवाइयों का सामना कर रहे हैं। हाल की घटनाओं में बड़े पैमाने पर नागरिकों की मौत, बच्चों और महिलाओं की पीड़ा, घरों और अस्पतालों का विनाश, तथा बुनियादी ज़रूरतों की कमी ने मानवीय संकट को अत्यंत गहरा कर दिया है। कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों और मानवाधिकार समूहों ने इन घटनाओं को गंभीर मानवीय उल्लंघन बताया है, जबकि कुछ इसे नरसंहार जैसी स्थिति के रूप में भी देखते हैं, हालांकि इस शब्द के उपयोग को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मतभेद बने हुए हैं।

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फ़िलिस्तीनी दर्द केवल आँकड़ों में नहीं बल्कि पीढ़ियों से चले आ रहे विस्थापन, असुरक्षा और पहचान के संकट में छिपा है। एक बच्चा जो शरणार्थी शिविर में जन्म लेता है, वह अपने दादा-दादी की खोयी हुई ज़मीन की कहानियाँ सुनते हुए बड़ा होता है, लेकिन ख़ुद उस भूमि को कभी देख नहीं पाता। इस पूरे संघर्ष ने मानवता को यह सोचने पर मजबूर किया है कि शांति, न्याय और सह-अस्तित्व के बिना कोई भी समाधान स्थायी नहीं हो सकता।

यह संघर्ष केवल भूमि के अधिकार का प्रश्न नहीं है, बल्कि यह पहचान, इतिहास और अस्तित्व की लड़ाई भी है। दशकों से चल रहे इस विवाद ने न केवल लाखों लोगों को विस्थापित किया है, बल्कि इसने अंतरराष्ट्रीय राजनीति को भी गहराई से प्रभावित किया है। आज भी यह संघर्ष विश्व के सबसे जटिल और संवेदनशील मुद्दों में से एक बना हुआ है।

मध्य पूर्व की महत्ता केवल उसके इतिहास या भूगोल तक सीमित नहीं है। 20वीं शताब्दी में तेल की खोज ने इस क्षेत्र को वैश्विक अर्थव्यवस्था का केंद्र बना दिया। सऊदी अरब, इराक और ईरान जैसे देशों में विशाल तेल भंडार हैं, जिन पर दुनिया की ऊर्जा आवश्यकताओं का एक बड़ा हिस्सा निर्भर करता है। ऊर्जा के इस महत्व ने पश्चिमी देशों की रुचि को और अधिक गहरा कर दिया।

विश्व की भूमिका

यहाँ समाजशास्त्री का “विश्व-प्रणाली सिद्धांत” प्रासंगिक हो जाता है, जिसमें वे बताते हैं कि किस प्रकार विकसित राष्ट्र (कोर) विकासशील या संसाधन-समृद्ध क्षेत्रों (परिधि) का उपयोग अपने आर्थिक हितों के लिए करते हैं। मध्य-पूर्व इस सिद्धांत का एक जीवंत उदाहरण प्रतीत होता है, जहाँ संसाधनों की प्रचुरता के बावजूद स्थायी विकास और स्थिरता का अभाव है।

21वीं सदी में यह क्षेत्र कई बड़े युद्धों और संघर्षों का केंद्र बना रहा है। 2003 एक ऐसा मोड़ था, जिसने पूरे क्षेत्र को अस्थिरता की ओर धकेल दिया। “विनाशकारी हथियारों” के आरोप के आधार पर शुरू किये गये इस युद्ध ने न केवल इराक की राजनीतिक संरचना को कमज़ोर किया, बल्कि पूरे क्षेत्र में असुरक्षा और हिंसा को बढ़ावा दिया।

इसी प्रकार 2011 से जारी युद्ध ने यह दिखा दिया कि आधुनिक युद्ध कितने विनाशकारी हो सकते हैं। लाखों लोग अपने घरों से बेघर हो गये, हज़ारों बच्चों की शिक्षा छिन गयी और एक पूरी पीढ़ी अनिश्चित भविष्य के साये में जीने को मजबूर हो गयी। संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, यह हमारे समय के सबसे बड़े मानवीय संकटों में से एक है।

इन संघर्षों के बीच एक आम व्यक्ति का जीवन अक्सर अनदेखा रह जाता है। जब हम समाचारों में “युद्ध”, “रणनीति” या “कूटनीति” जैसे शब्द सुनते हैं, तो उसके पीछे छिपी मानवीय पीड़ा अक्सर हमारी दृष्टि से ओझल हो जाती है। एक माँ जो अपने बच्चों के लिए भोजन जुटाने में असमर्थ है, एक बच्चा जो स्कूल की जगह शरणार्थी शिविर में जीवन बिता रहा है या एक युवा जो अपने देश को छोड़ने के लिए मजबूर है। ये सभी इस संघर्ष की वास्तविक तस्वीर प्रस्तुत करते हैं।

किसी प्रसिद्ध समाजशास्त्री के अनुसार, आधुनिकता के साथ जोखिम भी बढ़ते हैं। मध्य-पूर्व इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है, जहाँ वैश्विक स्तर पर लिये गये निर्णय स्थानीय स्तर पर गहरे प्रभाव डालते हैं। आज युद्ध केवल सीमाओं तक सीमित नहीं हैं; वे आर्थिक प्रतिबंधों, वैचारिक टकराव और तकनीकी हस्तक्षेप के रूप में भी सामने आते हैं।

उम्मीद की किरण

फिर भी, इस युद्ध के अंधकारमय वातावरण के बीच आशा की किरणें दिखायी देती हैं। संयुक्त राष्ट्र और अन्य अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ लगातार शांति स्थापित करने के प्रयास कर रही हैं। 2020 के दोहा समझौता ने यह संकेत दिया कि संवाद और सहयोग के माध्यम से तनावपूर्ण संबंधों को सुधारा जा सकता है। हालांकि, यह भी उतना ही सत्य है कि ऐसे प्रयास तब तक प्रभावी और स्थायी नहीं हो सकते, जब तक वे न्याय, समानता और पारस्परिक विश्वास के सिद्धांतों पर आधारित न हों।

आज आवश्यकता इस बात की है कि हम इस पूरे मुद्दे को केवल राजनीतिक या सामरिक दृष्टिकोण से न देखें, बल्कि इसे मानवीय दृष्टिकोण से भी समझें। शांति केवल युद्ध का अभाव नहीं है, बल्कि यह एक ऐसी स्थिति है जिसमें न्याय, समानता और मानव गरिमा का सम्मान हो।

किसी प्रसिद्ध दार्शनिक ने कहा था “न्याय ही सामाजिक संस्थाओं का पहला गुण है।” यह विचार हमें यह समझाता है कि जब तक समाज में न्याय स्थापित नहीं होगा, तब तक कोई भी शांति स्थायी नहीं हो सकती।

पश्चिम और मध्य-पूर्व के बीच संबंधों को यदि नयी दिशा देनी है, तो इसके लिए आवश्यक है कि वैश्विक शक्तियाँ अपने तात्कालिक हितों से ऊपर उठें और एक दीर्घकालिक, न्यायपूर्ण और समावेशी दृष्टिकोण अपनाएँ। स्थानीय समुदायों की भागीदारी सुनिश्चित की जाये, संसाधनों का न्यायपूर्ण वितरण हो और सांस्कृतिक विविधता का सम्मान किया जाये।

अंततः, यह संघर्ष केवल दो क्षेत्रों के बीच का नहीं है, बल्कि यह उस विश्व व्यवस्था का प्रतिबिंब है जिसमें हम सभी जी रहे हैं। यदि हम एक अधिक न्यायपूर्ण और शांतिपूर्ण विश्व की कल्पना करते हैं, तो हमें इस दिशा में सामूहिक प्रयास करने होंगे।

मध्य-पूर्व की धरती, जिसने कभी सभ्यता को जन्म दिया था, आज भी शांति और सह-अस्तित्व का संदेश देने की क्षमता रखती है। आवश्यकता केवल इस बात की है कि हम उस संदेश को सुनने और समझने का प्रयास करें।

आकिब जावेद, aaqib javed

डॉ. आकिब जावेद

बांदा, उत्तर प्रदेश में शिक्षक तथा शिक्षा के क्षेत्र में नवाचार हेतु सतत प्रयासरत आकिब शिक्षकों के प्रशिक्षण कार्यक्रमों में जुड़े रहे हैं। शिक्षा के साथ ही साहित्य में आपकी उपस्थिति निरंतर है। ग़ज़ल, कविता, कथा तथा बाल साहित्य की विभिन्न विधाओं में लेखन एवं संग्रह। देश-विदेश की प्रतिष्ठित साहित्यिक वेबसाइटों एवं मंचों के साथ ही पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाओं का प्रकाशन। साहित्यिक संस्था 'आवाज़-ए-सुख़न-ए-अदब' के संस्थापक और ब्लॉगर। शिक्षा एवं साहित्य दोनों क्षेत्रों में अनेक सम्मान भी प्राप्त। अपने साहित्य को समाज के प्रति सजग दृष्टिकोण, मानवीय संवेदनाओं और जनसरोकारों की प्रतिबद्धता प्रमुख मानते हैं। संपर्क: 9506824464।

2 comments on “मध्य-पूर्व में शांति की अधूरी कहानी

  1. यही एकमात्र उपाय है दुनिया को रहने लायक बनाए रखने का आपके शब्दों में -पूरे मुद्दे को केवल राजनीतिक या सामरिक दृष्टि कोण से न देखें बल्कि इसे मानवीय दृष्टिकोण से भी समझें।
    शांति केवल युद्ध का अभाव नहीं है….!

    बहुत प्रशंसनीय लेख।

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