रामकुमार कृषक, ramkumar krishak
पाक्षिक ब्लॉग ज्ञानप्रकाश पांडेय की कलम से....

रामकुमार कृषक: विश्वसनीयता का संकट

           सत्तर के आस-पास का समय रहा होगा, जब रामकुमार कृषक साहित्य की दुनिया में आये। ऐसा माना जाता है उनकी जीवन-शैली उनके साहित्य से काफ़ी मेल खाती है। उनकी साहित्यिक यात्रा भी काफ़ी लंबी रही है और वे आज भी निरंतर रचनारत दिखायी पड़ते हैं। कुबेर दत्त जी का कहना है कि उनकी रचनाएँ विश्वसनीय हैं। क्यों न ग़ज़ल के अन्य पहलुओं के साथ-साथ उनकी रचनाओं की विश्वसनीयता की भी जाँच कर ली जाये?

उचित होगा इस पड़ताल की शुरूआत कृषक जी द्वारा संपादित ‘अलाव’ पत्रिका के ग़ज़ल-विशेषांक से की जाये। जिस विशेषांक की चर्चा मैं कर रहा हूँ, वह अगस्त 2015 का अंक है। 496 पृष्ठों के इस विशेषांक में आदरणीय कृषक जी ने मात्र 23 ग़ज़लकारों को स्थान दिया है। यह बात समझ से परे है कि हिंदी ग़ज़ल के लगभग 50–55 वर्षों के इतिहास में उन्हें केवल 23 ग़ज़लकार ही क्यों दिखायी दिये।

आश्चर्य की बात यह भी है कि इस आमंत्रण में अतिथि स्वयं आतिथेय भी हैं; अर्थात् इस अंक के एक अतिथि रचनाकार स्वयं कृषक जी ही हैं। यहीं से विश्वसनीयता संदिग्ध प्रतीत होने लगती है। स्थिति और भी विचित्र तब हो जाती है, जब यह ज्ञात होता है कि अधिकांश अतिथि रचनाकार या तो अधिकारी वर्ग से हैं या प्रोफेसर हैं अथवा संपन्न वर्ग से हैं। प्रश्न यह उठता है कि एक जन-कवि की ऐसी कौन-सी बाध्यता रही होगी कि उसे अभिजात्य वर्ग का पद प्रक्षालन करना पड़ा!

इस अंक के लेखों का अवलोकन करने पर एक और प्रवृत्ति स्पष्ट होती है— प्रायः हर लेख में कुछ चुनिंदा कवियों की रचनाएँ ही उद्धृत की गयी हैं। आश्चर्य यह है जिन रचनाकारों की यहाँ विशेष प्रशंसा की गयी है, उनके शेर या तो स्तरहीन प्रतीत होते हैं या फिर बह्र के मानकों पर ही खरे नहीं उतरते।

ख़ैर… षड्यंत्र हिंदी ग़ज़ल की एक प्रवृत्ति बनता जा रहा है। हिंदी ग़ज़ल से जुड़े अनेक लोग, हिंदी ग़ज़ल से अधिक अपने व्यक्तित्व और प्रतिष्ठा के बारे में सोचते प्रतीत होते हैं। आत्मोन्नति के माध्यम से हिंदी ग़ज़ल का विकास करने का दावा करने वालों की संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ रही है।

रामकुमार कृषक, ramkumar krishak

विनय मिश्र साहब ने तो हिंदी ग़ज़ल के वर्तमान दौर को ‘विनय युग’ तक कह दिया है। इसके अतिरिक्त भी कई गुट सक्रिय हैं, जिनकी चर्चा फिर कभी की जाएगी। हिंदी ग़ज़ल में कुछ आयातित अथवा भाड़े के समीक्षक भी देखने को मिलते हैं, जो थोड़ी-सी धनराशि के बदले केवल चुनिंदा रचनाकारों पर ही लिखते हैं। ख़ैर, हर किसी की अपनी-अपनी मजबूरियाँ होती हैं। अब ज़रा कृषक जी की ओर चलते हैं। उनके लेखन को संदिग्ध बनाते कुछ शेर देखिए:

लोग करते जो बया को बेघर
घर बनाने की बात करते हैं

वही हिंदी ग़ज़ल की रोज़मर्रा वाली बात है। कहना केवल इतना है कि ‘बया’ ही क्यों! कोई अन्य पक्षी क्यों नहीं? यहाँ यदि ‘बया’ के स्थान पर कोई ऐसा शब्द प्रयुक्त होता, जिसका अर्थ केवल ‘बया’ तक सीमित न रहकर अपनी व्यापकता में उपस्थित होता, तो अधिक उपयुक्त होता।

एक और बात कहना चाहूँगा कि पहले मिसरे के अंत में ‘घर’ और दूसरे मिसरे की शुरूआत में ‘घर’ आने के कारण जो ‘घर-घराहट’ उत्पन्न हुई है, वह भी कानों को अखरती है। अब कुछ और शेर देखें, जिनका विवेचन स्वयं कृषक जी द्वारा ही संभव प्रतीत होता है…

लौटकर जा रहे गुफाओं में
दूर जाने की बात करते हैं

जो नहीं आज के ज़माने के
आज़माने की बात करते हैं

एक और शेर देखते हैं इस शेर में कृषक जी भले ही संदिग्ध नज़र न आयें किंतु उनकी ग़ज़लगोई तो कठघरे में आ ही जाती है, शेर देखें:

क्रिकेट हॉकी और पतंग
गिल्ली और गुलेल रहे

इस तथाकथित शेर में कृषक जी ने एक ही मिसरे को दो पंक्तियों में लिख दिया है। कहने का अर्थ यह है कि इस पूरे शेर में एक ही वाक्य है। इसे आप चाहे तो शेर कह लें चाहे कुल्लियाते-कृषक कह लें। चाहे तो सर पटक लें। एक और शेर:

हाथ जूता तो आरती के नया
उसको सहने का चलन आम करें

अब शेर का अर्थ, भाव या रब्त अल्ला मियां ही बता सकते हैं। इस शेर पर कुछ कहना, समय व्यर्थ करना ही होगा। कभी-कभी तो ऐसा लगता है जैसे हिंदी के ग़ज़लकार, ग़ज़ल को आंधी का आम समझते हैं। आंधी आयी है, जितना लूट सकते हो लूट लो। ख़ैर… एक और शेर:

किस तरह खाएं सीख लें पहले
पीछे खाने का इंतज़ाम करें

इस अद्भुत शेर पर जितना कहा जाये कम है। इस शेर में मानव विकास की थियरी को ही नकार दिया गया है। कृषक जी अगर आदिम काल में पैदा हुए होते तो पहले तेल मसाला का ज्ञान प्राप्त करते फिर थाली चम्मच फाॅर्क का आविष्कार करते, फिर आग का आविष्कार करते तब कहीं जाकर शिकार करना सीखते। बुफ़े सिस्टम का भी आविष्कार इन्होंने पहले ही कर लिया होता। अच्छा हुआ डार्विन मर गये। वो तो अत्महत्या कर लेते। और यदि यहां कृषक जी का तात्पर्य रिश्वतख़ोरी या हरामख़ोरी से है, तब भी यह शेर आत्महत्या ही कर लेता है। एक और शेर देखें:

जिन लोगों के हाथ रंगे
उनका रंग गुलाल न पूछ

इस शेर में भी कृषक जी, आकाश के न जाने किस तारे को तोड़ लाने की फ़िराक में हैं। शेर पर कुछ कह पाना मुश्किल हो रहा है। न कोई मुहावरा बन पा रहा है, न कोई प्रतीक। यह भी देखें:

ठीक होकर भी न हों हम अस्पतालों की तरह
दूसरे के हो न हो लेकिन दलालों की तरह

इस शेर पर भी मैं कुछ कह नहीं पा रहा। ऐसा लग रहा है जैसे कुछ शब्दों को अनायास जोड़ दिया गया है, जिनका न कोई सिर है न पैर। एक और शेर:

हों सभी आज़ाद लेकिन यूं कहीं कोई न हो
पेट भरने को भटकते नैनिहालों की तरह

इस शेर में कृषक जी का विवेक, ज्ञान प्रकाश ‘विवेक’ के विवेक की तुलना में कहीं आगे निकल गया है। यहां कृषक जी ने ‘बेरोज़गारी’ को ‘आज़ादी’ से कैसे जोड़ दिया है, समझ ही नहीं आ रहा है। ‘आज़ादी’ अगर ‘आर्थिक आज़ादी’ तक सीमित होती तो भी ठीक था, मगर कृषक जी की आज़ादी तो शारीरिक आज़ादी की तरफ़ इशारा कर रही है। बात बनती दिखायी नहीं दे रही। एक और शेर देखें:

खुरदरापन ऐंठ इनमें फ़ितरतन ही है
ख़ूबियों को देखिए तो फेक बसूला

पाठक क्या पाठक के बाप की भी हिम्मत नहीं है कि इसका कोई अर्थ निकाल सके। चलिए इसी तसलसुल में थोड़ा और आगे बढ़ते हैं। अब यह देखें:

धूल उड़ती है धुआं-सा भी कहीं कुछ है
तप रही साहब ज़मीं उट्ठेगा बगूला

इस तथाकथित शेर में स्टेटमेंट के अलावा आख़िर क्या है? मगर कृषक जी हैं कि इसे शेर मानने पर अड़िआये हैं। शेरियत दूर से ही अंगूठा दिखाकर रफ़ूचक्कर हो गयी है।

कई बार वैसे तो हम छपे-उपे अख़बारों में
फिर भी कब शामिल हो पाये बड़े-बड़े फ़नकारों में

अब कृषक जी का यह भ्रम दूर कैसे किया जाये कि अख़बार में छपने से कोई बड़ा फ़नकार नहीं बन जाता है। अख़बार में तो चोर-उचक्के भी छपते हैं। कुछ लोग जुगाड़ से भी छपते हैं। अगर हर आदमी बड़ा फ़नकार बन जाता, तब तो हो गया। सारी दुनिया में फ़नकार ही फ़नकार नज़र आते। ख़ैर, अगला शेर देखिए:

पढ़ने को पढ़ लेते हम भी लेकिन क़द ही कम निकला
कुछ ऊंचे आदर्श टंगे हैं पत्थर की मीनारों में

यह शेर कई पहलुओं पर विचार करने की मांग कर रहा है। अगर कृषक जी यह कहना चाहते हैं कि छोटी जाति का होने के कारण या संसाधनों के अभाव के कारण वे नहीं पढ़ पाये तो यह बात आज के दौर में बिल्कुल बचकानी है। आज बड़ी से बड़ी नौकरी में आरक्षण है, संसाधन सरकार उपलब्ध करा देती है। दूसरी बात यह कि शिक्षा प्राप्त करने की शर्त अगर ऊंचे आदर्शों को अंगीकार करना है तो इसमें दोष क्या है? इस बात का रोना, रोने की भला क्या ज़रूरत थी? तीसरी बात मैं भाषाई त्रुटि के स्तर पर करना चाहूंगा। ये ऊंचे आदर्श अगर पत्थर की मीनार की जगह ईंट की मीनार पर टँगे होते तो क्या वे शिक्षा प्राप्त कर लेते? यहां ईंट या पत्थर लिखने की क्या ज़रूरत थी? यहां तो ‘मीनार’ शब्द ही पर्याप्त था। इस ग़ज़ल का हर शेर क़ाबिले-ग़ौर है। आगे बढ़ते हैं:

बिक जाते बावक़्त अगर हम मालामाल हुए होते
नाम लिखा ही लेते अपना ऊंचे इज़्ज़तदारों में

इस शेर को पढ़कर मैं भी कृषक जी के दुःख से दुःखी हूं। थोड़ी मेहनत करते तो समय पर बिक सकते थे। देर से बिकने की वजह से मालामाल नहीं हो पाये। इन्हें अलाव का ग़ज़ल विशेषांक पहले ही निकाल लेना चाहिए था। थोड़ी चूक हो गयी। बहुत देर से निकला। सोने पर सुहागा यह कि इस अलाव के सारे कंडे भी गीले निकले। धुएं के अलावा कुछ निकला ही नहीं। एक बात और कहना चाहूंगा कि यह ‘ऊंचे इज़्ज़तदार’ क्या होता है? क्या सिर्फ़ ‘इज़्ज़तदार’ कहने से काम न चला? कहीं ऐसा तो नहीं कि ‘नीचे इज़्ज़तदार’ भी होते हों? ख़ैर, यह देखें:

चाह न होती मैदानों की बियाबान में क्या होते
पहुंचे हुए अगर हम होते तो होते बाज़ारों में

पहले मिसरे का अर्थ तो अल्लाह जाने, मैं तो दूसरे मिसरे के बारे में बात करना चाहूंगा। कृषक साहब फिर भ्रमित हो रहे हैं। उन्हें ऐसा लग रहा है कि हर पहुंचा हुआ आदमी बिका हुआ होता है। बाज़ारू होता है। क्या हमारे देश के सारे बड़े लोग, सारे महापुरुष बाज़ारू और बिके हुए थे। सबसे आसान काम है बड़े लोगों पर आक्षेप लगाना। एक और शेर देखें:

जुड़े नहीं होते धरती से तो हम भी उड़ते फिरते
लोग उड़े फिरते हैं जैसे हवा बाज़ ग़ुब्बारों में

यह शेर भी आकाशदीप तोड़ने जैसा ही दुःसाध्य है। कृषक जी कैसा मंज़रनामा पेश करना चाह रहे हैं, समझ में नहीं आ रहा। यह ‘हवाबाज़ ग़ुब्बारे’ क्या है, यह भी समझ में नहीं आ रहा। एक और शेर देखें जिसमें कृषक जी के साथ-साथ मैं भी चौंक गया हूं:

मैंने उसे चौंककर देखा
उसका उठा हुआ सिर देखा

चौंकना तो समझ में आ रहा है मगर यह उठा हुआ सिर किसका है? कहीं कोई सांप तो फन उठाये नहीं खड़ा है? शायद कोई मेंढक कूदने के लिए तैयार खड़ा हो, या कुछ और है? भगवान जाने। कुछ बनता-बिगड़ता दिख नहीं रहा। एक और वाहियात शेर:

यूं तो रूह बहादुर शय है
फिर भी इधर बहुत तनहा है

पिक्चर ब्लर हो गया है। सब कुछ समझ से परे है। कृषक साहब बताना क्या चाह रहे हैं? कोई तंत्र-मंत्र तो नहीं करना चाह रहे। यह तो नहीं कहना चाह रहे कि बहादुर होने के बाद तनहा नहीं होना चाहिए था मगर फिर भी तनहा है। एक वाहियात और:

कहिए राज़ी ख़ुशी सभी की
कल परसों की और अभी की

इन दोनों तथाकथित मिसरों में एक ही वाक्य बन पाया है। यहां शेर बन पाने की कोई गुंजाइश नज़र नहीं आ रही। खीसें निपोरता-सा एक और शेर:

दुनिया जो नानी जैसी थी
रामपियारी हुई कभी की

इस शेर का पहला मिसरा तो समझ में आता है कि दुनिया कभी नानी जैसी थी, यानी बहुत प्यार करने वाली; लेकिन दूसरे मिसरे की ‘रामप्यारी’ के नखरों से अल्लाह पाक ही बचाये। इस ‘रामप्यारी’ के माध्यम से कृषक जी कौन-सा प्रतीक खड़ा करना चाह रहे हैं, वही बेहतर बता सकते हैं।

दूसरी बात यह है कि दुनिया कभी नानी जैसी नहीं रही; वह हमेशा संघर्षों से भरी रही है। कृषक साहब की उलझनें कुछ विचित्र-सी प्रतीत होती हैं। कहीं न कहीं उनके भीतर एक हीनभावना भी घर किये हुए दिखती है। यह देखें:

लोग ग़ज़लें कह रहे हैं हम ग़ज़ल कैसे कहें
है रवायत पर तग़ज़्ज़ुल का दख़ल कैसे कहें

यह भी कोई बात हुई कि लोग ग़ज़लें कह रहे हैं, इसलिए हम ग़ज़ल नहीं कह सकते? दूसरे मिसरे की बात भी बहुत असरदार नहीं लगती। यदि रवायत पर तग़ज़्ज़ुल का दख़ल है, तो आप भी तग़ज़्ज़ुल के साथ ग़ज़ल कहें। एक और फूहड़-सा शेर:

दर्दे-दिल कहिए तो कह दें पर सुनाएंगे किसे
कान वालों की कमी है आजकल कैसे कहें

इस शेर का पहला ही मिसरा इतना उलझा हुआ है कि कुछ कहते नहीं बनता। इसमें प्रयुक्त पदबंध ‘कहिए तो कह दें’ और उसके बाद ‘पर सुनाएँगे किसे’ आपस में इस तरह उलझे हैं कि किसी निष्कर्ष पर पहुँचना कठिन हो जाता है। दूसरा मिसरा भी आपत्तिजनक-सा प्रतीत होता है। दिल का दर्द क्या केवल ‘कान वालों’ को सुनाया जाना चाहिए? या उन लोगों को जो भावनाओं का सम्मान करते हैं? ‘कान वाला’ तो चंगेज़ ख़ान भी था। दो और शेर देखें:

लूटिए लेकिन शराफ़त से स्वयं लुट जाएंगे
कुछ कहे दुनिया हमें हम बेअकल कैसे कहें?

आदमी की मौत का क्या है दिखायी दे न दे
रूह का हो ही नहीं सकता क़त्ल कैसे करें?

इन दोनों शेरों का भी सिर-पैर समझ भगवान भरोसे ही है। इन्हें मैंने सिर्फ़ इसलिए दर्ज कर दिया है कि हो सकता है आप कोई अर्थ निकाल लें… कुछ और शेर देखते हैं जो भाषाई स्तर पर खटक रहे हैं:

पैराहन पोशाक की मत पूछिए
तितलियों को आए दिन सीना हुआ

इस शेर पर भी अनगिनत बातें कही जा सकती हैं। पहली यह कि ‘पैराहन’ और ‘पोशाक’ समानार्थी शब्द हैं, जिन्हें एक साथ लिखने का कोई औचित्य नहीं बनता। दूसरी बात यह कि दूसरे मिसरे में ‘सीना हुआ’ पदबंध कोई विशेष अर्थ नहीं दे पा रहा; यदि ‘सीना पड़ा’ होता, तो वाक्य कुछ बन सकता था। कृषक साहब की खिल्ली उड़ाता एक और शेर:

एक बर्तन की तरह घर में रहा
उसकी महफ़िल में गया मीना हुआ

कृषक जी जैसे बड़े संपादक को इतना तो जानना ही चाहिए था कि ‘मीना’ भी एक बर्तन होता है, जिसका उपयोग शराब रखने के लिए किया जाता है। कहने का आशय यह है कि कृषक साहब पहले भी बर्तन थे और महफ़िल में जाकर भी बर्तन की तरह ही ढनकते या बजते रहे हैं; यहाँ कोई नया कमाल नहीं हुआ। कुछ और शेर देखते हैं, जो कृषक जी की लुटिया डुबाने पर तुले हैं:

धीमे-धीमे काट रहा जो बदतर क़ातिल है
वरना कुछ बेहतर होता है बेहतर क़ातिल में

‘बदतर क़ातिल’ और ‘बेहतर क़ातिल’ का यह फ़लसफ़ा तो कृषक जी ही बता पाएंगे, मैं तो बस इतना ही कह सकता हूं कि क़ातिल हर हाल में बुरा ही होता है। यहां भी कृषक जी का शेर म्याऊँ की आवाज़ के साथ मौन हो गया है। एक और देखें:

साथ मशीनों का देना फिर उन्हें जाम करना
कमख़याली है पुर्जों की सत्त की मिल में

यह शेर भी बाकमाल है। मतलब आप कृषक जी से पूछिएगा। कुछ और शेरों को आलोचना की कसौटी पर रखकर देखते हैं, शायद कोई बात बन जाये:

पूछिए मत इस ज़माने की तरक़्क़ी का चलन
कारखाने के लिए जंगल उगाये जा रहे हैं

पैदा हुए बिना ही यहां जो बुज़ुर्ग हैं
मुड़-मुड़ के देखते हैं जवानी कहां गयी

लोग बेकार नापते सड़कें
कार ढलती है कारख़ाने में

हर तरफ़ सब्ज़ा ही सब्ज़ा है कहीं बंजर नहीं
अब समंदर में उतरकर बागबानी कीजिए

चमत्कार पैदा करने के लालच में कृषक जी यहाँ

विचित्र-से भ्रम देखे आपने! कारखाने के लिए जंगल उगाये जा रहे हैं; भला बिना पैदा हुए कोई बुज़ुर्ग कैसे हो सकता है; कार, कारख़ाने में बनती है तो सड़क पर आपका पैदल चलना बेकार है; और चौथे शेर ने तो कृषक साहब के वक़ार की चड्ढी तक उतार दी है। मज़े की बात यह है कि कृषक साहब या तो बंजर में बागवानी करेंगे या समुंदर में। अपने आप को जनकवि कहलवाने की इच्छा रखने वाला कवि बार-बार बुरी तरह हिट-विकेट हो रहा है।

रोज़ हंसता तो किस तरह हंसता
जन्म लेते ही जब नहीं रोया

सपनों के फूल-वूल तजुर्बों की गंध है
अनमोल मोहब्बत है मोहब्बत ख़राब है

घर-घर थे चौबारे भी थे गली मोहल्ले भी थे
लिपे-पुते चौक थे मिलकर खाना खाते थे

सेहतमंद खेल होंगे ही सुन लेना
मच्छर सेना से टकराएगी सेना

सर्जक क्या निर्माता तक तो हुए नहीं
मुर्गीमार हुए भूले अंडे सेना

उपर्युक्त सभी बेमिसाल शेर कृषक जी के संपादकीय मस्तिष्क की देन हैं। सभी शेर बावन हाथ के हैं। पाठक चाहें तो इन्हें हिंदी ग़ज़ल की धरोहर मानकर सुरक्षित रख सकते हैं; किंतु मेरी नज़र में इनकी हैसियत कचरे से अधिक नहीं है।

हिंदी के ग़ज़लकारों का एक पीड़ादायक पक्ष यह रहा है कि उनके भीतर ग़ज़ल लिखने की प्रबल इच्छा तो होती है, मगर वे शिल्प में इतने कच्चे होते हैं कि लाख सतर्कता के बावजूद भी उनकी पोल खुल ही जाती है। क़दम-क़दम पर वे अपनी कमज़ोरियाँ छिपाते नज़र आते हैं।

कुछ लोग जहाँ अपनी कमियों को छिपाने के लिए यह कहते दिखायी देते हैं कि “मुफ़ाईलुन के पैमाने पर मैं ग़ज़लें नहीं कहता”, वहीं कुछ लोग अपनी ग़लतियों से बचने के लिए अपनी तुकबंदियों को ‘गीतिका’ और ‘तेवरी’ का नाम दे देते हैं। कुछ लोग तो स्वयं अपनी ख़ामियों की बात कहकर भोलेपन का आभास देने लगते हैं, लेकिन यह सरलता “कवित विवेक एक नहिं मोरे” वाली सरलता नहीं है।

तुलसी बाबा संस्कृत के विद्वान थे। उन्होंने अपने समय में प्रचलित लगभग सभी छंदों का प्रयोग किया था। उनके द्वारा ऐसा कहा जाना उनकी सरलता का परिचायक है, लेकिन कृषक जी द्वारा ऐसा कहा जाना उनकी चालाकी प्रतीत होता है। और थोड़ी स्पष्टता से कहें तो यह उनकी धूर्तता ही है। कृषक जी की इस चालाकी में कुछ हद तक उनके पैरोकार भी योगदान देते हैं।

कुबेर दत्त जी ने फ्लैप पर लिखा है कि उनके यहाँ अनुपयोगी सजावट, पच्चीकारी या कला-कोविदी नहीं है। इसलिए वे अदबी नसीहतों पर नहीं, बल्कि न्याय और इंसानियत के लिए लड़ रही जनता पर क़ुर्बान होते हैं। स्वयं कृषक जी ने भी अपने कई शेरों में यह स्वीकार किया है कि उन्हें शिल्प का समुचित ज्ञान नहीं है, या वे यह कहते दिखायी देते हैं कि शिल्प से अधिक वे कथ्य को महत्व देते हैं।

यदि वास्तव में ऐसा है, तो प्रश्न उठता है कि कृषक जी लगातार ग़ज़लें लिखने पर क्यों आमादा रहे? क्या ग़ज़ल लिखने के लिए किसी ने उन्हें बाध्य किया था या डाॅक्टर ने कहा था? कथ्य को वे किसी अन्य माध्यम से भी व्यक्त कर सकते थे। कुछ शेर देख लेते हैं:

तुम ही से पूछते हैं यों बहुत हैरान हैं हम भी
हमारी हर ग़ज़ल क्यों आजकल बे-बह्र है भाई

यहाँ ‘आज-कल बेबह्र’ से क्या मतलब है? आप तो हमेशा से बे-बह्र हैं। सीज़नली तो ऐसा होता नहीं। ख़ैर, ऐसी और बातें भी:

तग़ज़्ज़ुल ग़ज़ल का नहीं पास मेरे
कई लोग मिलते हैं आंखें तरेरे

नहीं भावनाएं विरल और गहरी
अरथ भी अगर है तो केवल इकहरी

मिसरा-ए-सानी हो या फिर मिसरा-ए-ऊला
शेर अपना शेर है लंगड़ा हो या लूला

आप तख़्ती कीजिए मत कीजिए तख़्ती
तख़्तियों से दूर जो उन सबने कबूला

आख़िर इस तरह के शेर लिखने की ज़रूरत कृषक जी को क्यों पड़ी? उन्हें पढ़कर हम स्वयं समझने में समर्थ थे कि वे कैसे हैं, लंगड़े हैं या लूले? मुझे इसमें उनकी सरलता या ईमानदारी कम, अपने आप को बचाने की युक्ति अधिक नज़र आती है। तुलसी जैसी सरलता कृषक जी में दूर-दूर तक दिखायी नहीं देती। उनके भीतर की यह छद्म शिष्टता स्वयं को बचाने का एक उपक्रम मात्र है। तो यहां भी उनकी विश्वसनीयता ख़तरे में आ जाती है।

ठीक ऐसा ही छद्म आवरण इनके प्रगतिवादी और जनवादी होने के दावों में भी दिखायी देता है। प्रायः हिंदी का हर ग़ज़लकार अपने आप को प्रगतिवादी दिखाने का कोई अवसर नहीं छोड़ता। कृषक जी ने भी इस अवसर को भुनाने की पूरी कोशिश की है। प्रगतिवादी दिखने के कई फ़ॉर्मूले हैं, जैसे हिंदू देवी-देवताओं को कोसना, मंदिरों को भला-बुरा कहना, किसी तबक़े का बेवजह पक्ष लेना या कुछ पर्दे वाली चीज़ों को बेपर्दा कर देना आदि। कृषक जी में भी स्वयं को प्रगतिवादी दिखाने की कोशिश इसी तरह की है, किंतु सतही प्रगतिवादिता किसी न किसी शेर में उजागर हो ही जाती है। कुछ नमूने देखें:

आओ मंदिर मस्जिद खेलें ख़ूब बदाएँ मस्जिद को
कल्पित जन्मभूमि को जीतें और हराएँ मस्जिद को

एक बरन होकर नालों से कल सुरसरि कहलाती थी
अब उनसे ऐसे मिलती है ख़ुद नाला हो जाती है

घोंट-घाट कर ग्रंथ पोथियाँ नफ़रत का फलसफ़ा रचा
अब पंडित्य कहां कबिरा का केवल ढाई आखर में

एड्स की असली दवा कंडोम
लीजिए यह आनछु कंडोम

ऐसे अनेक शेर हैं, जिनके सहारे कृषक जी ने अपनी झूठी प्रगतिवादिता को साधने की कोशिश की है; लेकिन तवाज़ुन और निष्पक्षता के अभाव में वे सतही बनकर रह गये हैं। मैं किसी का विरोधी नहीं हूँ, किंतु संतुलन की अपेक्षा तो कर ही सकता हूँ। और यह देखिए, यहां तो कृषक जी की प्रगतिवादिता की हवा निकलती दिखायी देती है:

पर्दा ही बेपर्दा करता अब तो रोज़-रोज़ घर में
फैल रहा है कूल्हा कल्चर अब तेज़ी से मंज़र में

लड़कियों और स्त्रियों के पहनावे पर इस तरह की आपत्तिजनक टिप्पणी करने वाला व्यक्ति भला प्रगतिवादी हो सकता है? प्रगतिवाद का आडंबर रचने वाले शेर तो कृषक जी के पास बहुत हैं, किंतु उसकी पोल खोलने वाले शेर उनके पास कम नहीं हैं। स्त्री-स्वतंत्रता का विरोध करते उनके कुछ शेर देखें:

धरा धाम में क्या रखा है भूख गुलामी और घुटन
मस्त-मस्त मस्ती मेट्रो की मुक्त कर रही अंबर में

वो दिन कब के हवा हो गए नंगापन मजबूरी था
नाच रही है अब दमयंती स्वयं उधारी नरवर में

कृषक जी की मानसिकता को विकृत कहा जाये या आपत्तिजनक! आधुनिकता पर तंज़ करने के उनके तरीक़े भी बेहूदा ही हैं। ख़ैर… जैसा मैं कई लेखों में कह चुका हूँ, बड़बोलापन हिंदी ग़ज़ल की एक बड़ी प्रवृत्ति बनकर सामने आयी है। कृषक जी भी इससे अछूते नहीं हैं; बल्कि कुछ आगे ही दिखते हैं। अब यह देखें:

चांद का मुंह भी रहा जिसके लिए टेढ़ा
क्या कहेंगे मुश्किलाते आम की ग़ज़लें

इस शेर को पढ़कर साफ़ पता चलता है कि कृषक जी ने या तो मुक्तिबोध को पढ़ा नहीं है, या फिर समझा नहीं है। हिंदी ग़ज़ल के कुछ रचनाकार प्रायः बाप को ही संतानोत्पत्ति का गुर सिखाते नज़र आते हैं। मेरे विचार से इन्हें सुल्तान अहमद साहब की एक-दो कक्षाएँ अवश्य ले लेनी चाहिए। मुक्तिबोध जीवन भर आम लोगों के दुःख-दर्द से जुड़े रहे और हमारे कृषक जी उन्हें ऐसे ताना मार रहे हैं!

अब ज़रा कृषक जी के शिल्प की जाँच-पड़ताल करते हैं। शिल्प हिंदी ग़ज़ल की एक प्रमुख कमज़ोरी रहा है। कृषक जी के यहां भी इस तरह की कमियों की झड़ी है। कुछ उदाहरण देखते हैं:

लोग जो भी हैं अदब के ऊपर
उनको दंडौत और सलाम करें

इस शेर की मूल बह्र है— फ़ाइलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन। इस पर देखें तो ऊला मिसरा गोबर करता दिख रहा है। एक नमूना यह है:

देश बाज़ार हो गया सारा
हो तो ईमान ही नीलम करें

ज़िंदगी बूंद भर नहीं होती
दिल को हर हाल समंदर रखना

इन शेरों की भी मूल बह्र— फ़ाइलातुन मुफ़ाइलुन फ़ेलुन ही है। किंतु यहां दूसरा मिसरा कृषक जी की इज़्ज़त के साथ खेल रहा है।

खुरदुरापन ऐंठ इसमें फ़ितरतन ही है
ख़ूबियों को देखिए तो फेक बसूला

पता नहीं इसका मतलब क्या है, फिर भी इसका वज़्न कसें तो— फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ा। पहला मिसरा तो इसना अनुपालन कर रहा है किंतु दूसरा मिसरा नंगई पर उतर आया है। अब लगे हाथ क़ाफ़िये की भी कुछ ग़लतियां देखें:

मैंने उसे चौक कर देखा
उसका उठा हुआ सिर देखा।

मतले के इस शेर में ‘कर’ और ‘सिर’ की वजह से दोनों काफ़िये विजातीय हैं। एक और मतले में उन्होंने क़ाफ़िये बांधे हैं:

गमले हैं फुटपाथों पर
पांवों में खुदे अनाथों पर

यहाँ ‘फुटपाथों’ और ‘अनाथों’ के बाद ‘कनातों’, ‘विराटों’ और ‘दवातों’ जैसे क़ाफ़िये छाती चौड़ी करके अपनी अलग पार्टी बनाने का बिगुल फूँक रहे हैं।

कुल मिलाकर हम कह सकते हैं कृषक जी की पैंट पीछे से फटी जा रही है मगर पालथी मारकर बैठने पर अड़े हैं। अर्थात उपरोक्त विवेचन के आधार पर स्पष्ट है कि कृषक जी की ग़ज़लगोई कई स्तरों पर प्रश्नों के घेरे में आती है। जहाँ एक ओर उनके कथ्य में जनपक्षधरता और प्रगतिशीलता का दावा दिखायी देता है, वहीं दूसरी ओर शिल्पगत असावधानियाँ, भाषाई त्रुटियाँ, कमज़ोर रचनात्मकता और विचारों का असंतुलन बार-बार उजागर होता है। उनके अनेक शेर न तो ग़ज़ल की पारंपरिक कसौटियों पर खरे उतरते हैं और न ही अर्थ, प्रतीक एवं बिंब-विधान की दृष्टि से संतोषजनक प्रतीत होते हैं।

इसके अतिरिक्त, संपादकीय दृष्टि और चयन प्रक्रिया में भी पक्षपात तथा सीमित दृष्टिकोण के संकेत मिलते हैं, जिससे उनकी रचनात्मक विश्वसनीयता संदिग्ध हो जाती है। प्रगतिवाद के नाम पर प्रस्तुत विचार भी कई स्थानों पर सतही और असंतुलित जान पड़ते हैं, जो उनके वैचारिक आग्रहों को कमज़ोर करते हैं।

अतः कृषक जी का लेखन, अपेक्षित गंभीरता और शिल्पगत परिपक्वता के अभाव में, हिंदी ग़ज़ल की समृद्ध परंपरा को आगे बढ़ाने के बजाय कई बार उसे पीछे धक्का देता दिखता है। आवश्यकता इस बात की है कि ग़ज़लकार कथ्य के साथ-साथ शिल्प, भाषा और संतुलन पर भी समान ध्यान दें, तभी हिंदी ग़ज़ल का स्वस्थ और सार्थक विकास संभव है।

ज्ञानप्रकाश पांडेय, gyan prakash pandey

ज्ञानप्रकाश पांडेय

1979 में जन्मे, पेशे से शिक्षक ज्ञानप्रकाश को हिन्दी और उर्दू की शायरी में समकालीन तेवरों के लिए जाना जाता है। अमिय-कलश (काव्यसंग्रह), सर्द मौसम की ख़लिश (ग़ज़ल संग्रह), आसमानों को खल रहा हूँ (ग़ज़ल संग्रह) प्रकाशित हैं। कुछ एक प्रतिष्ठित संस्थाओं से नवाज़े जा चुके हैं।

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