
- April 15, 2026
- आब-ओ-हवा
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पाक्षिक ब्लॉग डॉ. आज़म की कलम से....
उर्दू में आलोचना की ज़ोरदार किताब
“काशिफ़ अल-हक़ाइक़” 1894 में प्रकाशित हुई। इमदाद इमाम “असर” की लिखी हुई उर्दू भाषा की बेहद महत्वपूर्ण तनक़ीदी (आलोचना) किताब मानी जाती है, जिसे “बहारिस्तान-ए- सुख़न” भी कहा जाता है। यह दो जिल्दों (भागों) में है और इसमें पश्चिमी और पूर्वी साहित्य का आलोचनात्मक अध्ययन, शायरी की क़िस्में और विधाएँ और शेरी फ़नून, पोएटिक क्रॉफ्ट पर विस्तार से बहस की गयी है।
यह उर्दू के आरंभिक और महत्वपूर्ण आलोचना की किताबों में एक है। मिस्र, यूनान, इटली और अरब की शायरी, उमर-उल-क़ैस (अरब का इस्लाम पूर्व काल का मशहूर शायर) का “मीर” और “ग़ालिब” से तनक़ीदी अध्ययन का दिलचस्प अंदाज़ देखने को मिलता है। फ़ारसी और उर्दू शायरी की विधाएं, संस्कृत की कविता की परंपरा और अन्य विषय भी इसमें मौजूद हैं। शायरी को अन्य कलाओं जैसे कि खेती, संगीत, चित्रकारी के साथ जोड़कर देखने की कोशिश करने वाली शोधात्मक और आलोचनात्मक दृष्टिकोण से अतिविश्वसनीय किताब मानी जाती है। यह किताब दो जिल्दों में है और क्राफ्ट और इतिहास के आधारों पर शायरी का जायज़ा लेती है।
“असर” ने सर सैयद अहमद ख़ान के प्रभाव में मअरूजी तनकीद (ऑब्जेक्टिव क्रिटिसिइज़्म) की बुनियाद रखी, शायरी के उसूल बनाये और ग़ज़ल समेत अन्य विधाओं पर तनकीदी नज़र डाली है। “असर” ने तनक़ीद/क्रिटिसिज़म के फ़न को उर्दू ज़बान को और अच्छे से परिचित कराया और कलाम की जांच के लिए उसूल बनाये। किताब में अरब, अजम (ग़ैर अरबी) और हिंदुस्तान की शायरी, और शेरी प्रगति का विस्तृत जायज़ा लिया गया है। जहां तक उनके अपने विचारों की बात है, तो “असर” ने शायरी में बनावट और कृत्रिमता को “क़ातिल ज़हर” क़रार दिया है, जो मौलाना “हाली” के दृष्टिकोणों से समानता रखता है। कुछ आलोचकों ने बहुत-सी बातों को लफ़्फ़ाज़ी कहा है लेकिन आम तौर पर विद्वानों ने इसे शोधपरक और विशिष्ट आलोचना का प्रयास माना है और उर्दू में आलोचना की बुनियाद को मज़बूत करने वाली किताबों में शामिल किया है।

लेखक ने आम परंपरागत आलोचना से हटकर साइन्सी बुनियादों पर शायरी को परखा है। इस तरह यह एक तरक़्क़ीपसंद और इल्मी किताब है, जिससे उर्दू तनक़ीद को एक नयी राह मिली, एक नयी सम्त मिली। किताब में अलग अलग शायरों के कलाम पर भी इनफ़िरादी तनक़ीद है और अपने विचारों ख्यालों से विवेचना की है। उनका ख़ास नज़रिया था कि उर्दू अदब को संस्कृत अदब से ज़्यादा सीखने की ज़रूरत थी क्योंकि शायरी नाम है अपने इर्द-गिर्द, अपने परिवेश और परिस्थितियों से प्रभावित होना और उनका वर्णन करना। इसलिए देश का तक़ाज़ा ही था कि उर्दू शायरी, संस्कृत की शायरी का अंदाज़ अपने अंदाज़ में पैदा करती। उनके विचार में शायरी रूह को ख़ुशी प्रदान करती है। वह हर शेर में कथ्य और उसके ज़ाहिरी हुस्न (शिल्प सज्जा) को भी अहमियत देते थे और दोनों में मुनासिब तनासुब (अनुपात) की बात करते थे कि महज़ ख़याल की ऐसी गहराई न हो जो लफ़्ज़ों से बयान न हो सके या महज़ अल्फाज़ ही न हों जिससे कि ख़याल दब जाये।
उनके मुताबिक़ शायरी की दो क़िस्में हैं एक दाख़िली (आंतरिक) जिसमें शायर सिर्फ़ अपने जज़्बात और एहसास की तस्वीर पेश करता है और दूसरी ख़ारजी (बाह्य) जिसमें शायर कायनात की मुख़्तलिफ़ चीज़ों के नक़्श बनाता है। वह सादगी और सहजता को अहमियत देते हैं, अतिशयोक्ति (मुबालग़ा आराई) पसंद नहीं करते। कुछ शायरों की शायरी पर उनका दृष्टिकोण भावनात्मक नज़र आता है जैसे “सौदा” की क़सीदानिगारी पर उन्होंने उनकी इतनी तारीफ़ की है जो सामान्य आलोचना से विमुख हो गयी है और महज़ एक भावनात्मक उद्गार नज़र आती है। अंग्रेज़ी और अन्य ज़बानों से आशनाई का यह फ़ाइदा हुआ कि उन्होंने अरबी के इब्न क़तिया, इब्न रशीक़, अब्दुलक़ादिर जुरजानी, अबू हिलाल असकरी, हाफ़िज़, कोलरेज आदि के विचारों से लाभ उठाया है यानी उनकी आलोचना पर उनके प्रभाव महसूस किये जा सकते हैं। कुछ बातों की पुख़्ता दलील वो पेश नहीं करते हैं। इसलिए कई दूसरे आलोचकों ने भी उनके विचारों और उनके वक्तव्यों पर सवाल उठाये हैं मगर फिर भी जिस ख़ूबसूरती से यह किताब मुख़्तलिफ़ असनाफ़-ए-सुख़न (विभिन्न विधाओं), मुख़्तलिफ़ ममालिक (विभिन्न देशों) के साहित्य आदि पर बात करती है इस कारण यह किताब एक शाहकार की हैसियत रखती है।
उनके कुछ नज़रियात (दृष्टिकोण):
इमाम असर ने वाज़ेह तौर पर शायरी को उच्च शिष्टाचार के प्रशिक्षण का माध्यम बताया है। उनके अनुसार दुनिया की दो हैसियतें हैं। एक आलम-ए-ख़ारिज (बाह्य दुनिया) जिसमें माद्दा (तत्व) शामिल है और दूसरा आलम-ए-बातिन (आंतरिक दुनिया) जिसमें माद्दा नहीं बल्कि जज़्ब-ए-क़लबिया (हार्दिक भावना) दाख़िल है। इस विभाजन के अनुसार उन्होंने शायरी को भी दो हिस्सों में बांटा है। एक ऑब्जेक्टिव और दूसरा सब्जेक्टिव। उन्होंने शायरों की भी क़िस्में इसी सोच के तहत बतायी हैं। उनके विचार में कुछ शायर आलम-ए-ख़ारिज को बयान करने और उनको शेरी पैकर में ढालने पर मुकम्मल महारत रखते हैं, जैसे नज़ीर अकबराबादी, आलम-ए-ख़ारिज को बेहतर अंदाज़ में पेश करने की महारत रखते हैं और मीर तक़ी मीर आलम-ए-बातिन के इज़हार पर मुकम्मल महारत रखते हैं।
इसके अलावा कुछ शायर ऐसे भी हैं, जो दोनों तक़ाज़ों को निहित रखते हैं और वही अस्ल में अज़ीम शायर कहलाते हैं। इमदाद इमाम असर इस प्रकार के शायरों में “अनीस” को शामिल करते हैं। वह फ़ारसी और उर्दू शायरी को सम-स्वभाव वाला मानते हैं, “चूंकि दोनों ज़बानों की शायरियों का एक ही अंदाज़ है इसलिए इन दोनों का ज़िक्र साझा तौर पर किया जाता है। हक़ीक़त यह है कि उर्दू की मौजूदा शायरी के साथ बड़ी समानता रखती है। दोनों ज़बानों के शेरी अस्नाफ़ (विधाओं) के एतिबार से बराबर हैं और ख़यालात के रंग लगभग एक जैसे हैं। इसका सबब यह है कि उर्दू के शायर फ़ारसी शायरों का हमेशा अनुसरण करते रहे हैं। यही वजह है कि उर्दू शायरी बावजूद इसके कि इसकी उन्नति हिंदुस्तान में हुई संस्कृत की शायरी से कोई उपयुक्तता या पारस्परिक संबंध नहीं रखती”। (काशिफ़ अल-हक़ाइक़, भाग दो, पेज 1)
उनके ख्याल में “रामायण” और “महाभारत” जैसी रज़मीह शायरी (war epic/युद्ध महाकाव्य) फ़ारसी में भी नहीं हैं। उनका विचार था अगर संस्कृत की शायरी में रुचि दिखायी जाती, ध्यान दिया जाता, विश्व स्तर पर उर्दू शायरी को बहुत अहमियत हासिल होती।
ख़ैर! इसके पहले हिस्से में मुख़्तलिफ़ फ़नून लतीफ़ा (विभिन्न ललित कलाओं), मुख़्तलिफ़ अक़वाम (विभिन्न राष्ट्र एवं समुदायों) में शायरी, अरब का शेरी हवाला और इस्लामी दौर की शायरी का तज़्करा है। हिस्सा दो में इस्लामी ख़िलाफ़त के बाद अरब के बाहर के शायरों, मुख़्तलिफ़ शेरी असनाफ़ और हिंदुस्तान में शायरी, ग़ज़ल और उर्दू के मुख़्तलिफ़ शायरों के तज़्करे मिलते हैं। फ़ारसी ग़ज़ल में ख़्वाजा हाफ़िज़, सादी, जामी, फ़ग़ानी, ख़ुसरो, ग़ालिब वग़ैरह की ग़ज़लों पर विमर्श तजज़िया किया गया है। उर्दू शायरी में रफ़ी सौदा, मीर तक़ी मीर, मोमिन देहलवी, ख़्वाजा आतिश, ज़ौक़ देहलवी, ग़ालिब देहलवी, नासिख़, रिंद वग़ैरह का ज़िक्र है। उर्दू ज़बान में तनक़ीद के हवाले से मौलाना अल्ताफ़ हुसैन “हाली” की किताब “मुक़द्दमा-ए-शेर-ओ-शायरी” के बाद सबसे मशहूर किताबों में “काशिफ़ अल-हक़ाइक़” का भी नाम है, जो कि “बहारिस्तान-ए-सुख़न” के नाम से भी प्रसिद्ध है।
एक नज़र: नवाब सैयद इमदाद इमाम “असर”
17 अगस्त 1849 को (बिहार) के सालारपुर ज़िला पटना में पैदा हुए। उनके वालिद का नाम वहीद उद्दीन ख़ान था। मुमताज़ इल्मी अत्यंत शिक्षित ख़ानदान था। इमदाद असर उर्दू, फ़ारसी, अरबी और अंग्रेज़ी के विद्वान थे। उनका काल भी कमोबेश मौलाना “हाली” और अल्लामा “शिबली” का काल है, हाँ अलबत्ता “हाली” के बाद उनक यह शाहकार सामने आया। आलोचना में उन्होंने उसूलों से बहस कम की है और अमली तनक़ीद (क्रियात्मक आलोचना) पर ध्यान अधिक केंद्रित रखा है। “काशिफ़ अल-हक़ाइक़ के अलावा उन्होंने मिरआत अल-हिकमा, फ़साना हिम्मत नाम से नावेल, किताब अल-असमार, किमिया-ए-ज़राअत, फ़वाइद दारिन, मिस्बाह अल-ज़ुलम, किताब अल-जवाब मअरूफ़ ब मनाज़िर अल-मसाइब, मियार अल-हक़, हिदया कैसरिया, रिसाला ताऊन और शायरी में दीवान “असर” लिखी हैं। “शम्स अल-उलमा” ख़िताब मिला था। बुनियादी तौर से शायर थे, नावेल-निगार थे, मगर प्रसिद्धि का कारण आलोचना है। 17 अक्टूबर 1934 में देहांत हुआ।

डॉक्टर मो. आज़म
बीयूएमएस में गोल्ड मेडलिस्ट, एम.ए. (उर्दू) के बाद से ही शासकीय सेवा में। चिकित्सकीय विभाग में सेवा के साथ ही अदबी सफ़र भी लगातार जारी रहा। ग़ज़ल संग्रह, उपन्यास व चिकित्सकी पद्धतियों पर किताबों के साथ ही ग़ज़ल के छन्द शास्त्र पर महत्पपूर्ण किताबें और रेख्ता से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ग़ज़ल विधा का शिक्षण। दो किताबों का संपादन भी। मध्यप्रदेश उर्दू अकादमी सहित अनेक प्रतिष्ठित संस्थाओं से सम्मानित, पुरस्कृत। आकाशवाणी, दूरदर्शन से अनेक बार प्रसारित और अनेक मुशायरों व साहित्य मंचों पर शिरकत।
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