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पाक्षिक ब्लॉग चारु शर्मा की कलम से....

पहली फिल्म, जिसके खिलाफ सड़क पर उतरी जनता

नमस्कार दोस्तो, विश्व सिनेमा का इतिहास बहुत दिलचस्प और रोमांचित करने वाला है। बिल्कुल एक मल्टीस्टारर फ़िल्म की तरह जिसमें कमाल के हीरो थे, जिन्होंने सिनेमा की भाषा और व्याकरण को इतनी गहनता से गढ़ा कि उसकी नींव आज भी पुख़्ता है और आज एक विशाल साम्राज्य के रूप में पूरी दुनिया में अपनी पताका लहरा रही है। विश्व सिनेमा के इतिहास की कहानी में ड्रामा था, इमोशन थे और थे बेहतरीन क्लाइमेक्स, जिनको आज भी हर सिनेमा को चाहने वाला दोहराता है और उसमें खो जाता है।

विश्व सिनेमा के शुरूआती चरणों में एक विशेष क्रम से उन्नति की और एक के बाद एक उसमें विशेष बदलाव जुड़ते चले गये। एडविन एस. पोर्टर के बाद विश्व सिनेमा एक ऐसे मोड़ पर खड़ा था, जहाँ वह अभी अपनी भाषा सीख ही रहा था। पोर्टर ने उसे कहानी कहना सिखाया था, लेकिन वह कहानी अभी भी बिखरी हुई थी— जैसे कोई बच्चा शब्दों को जोड़ तो लेता है, पर उनसे कविता या कहानी नहीं बना पाता। इसी अधूरेपन के बीच एक ऐसा व्यक्ति उभरा, जिसने सिनेमा को न केवल व्यवस्थित किया बल्कि उसे भावनाओं, संरचना और व्याकरण से भर दिया। यह व्यक्ति था डी.डब्ल्यू. ग्रिफ़िथ (D. W. Griffith)।

ग्रिफिथ की कहानी सिर्फ़ एक महान फ़िल्मकार की कहानी नहीं है; यह एक ऐसे व्यक्ति की कथा है जो अपने भीतर लगातार संघर्ष करता रहा, महत्वाकांक्षा और असुरक्षा के बीच, सफलता और अस्वीकृति के बीच, और कला तथा विचारधारा के बीच। ग्रिफ़िथ का निजी जीवन उनके सिनेमा जितना ही जटिल और विरोधाभासी था। उनका जन्म 1875 में अमेरिका के केंटकी में हुआ, एक ऐसे परिवार में, जहाँ अतीत की शान और वर्तमान की कठिनाई साथ-साथ मौजूद थी। उनके पिता एक सैनिक थे, लेकिन उनके जल्दी निधन ने परिवार को आर्थिक संकट में डाल दिया। बचपन से ही ग्रिफ़िथ ने यह महसूस किया कि उन्हें अपनी पहचान ख़ुद बनानी होगी। शायद यही कारण था कि उनके भीतर एक गहरी बेचैनी और महत्वाकांक्षा पनपती गयी— वे कुछ ऐसा करना चाहते थे जो उन्हें भीड़ से अलग कर दे।

युवा ग्रिफ़िथ का सपना सिनेमा नहीं था; वे ख़ुद को एक महान नाटककार और थिएटर अभिनेता के रूप में देखना चाहते थे। उन्होंने मंच पर काम किया, नाटक लिखे, लेकिन बार-बार असफलता हाथ लगी। उनकी स्क्रिप्ट्स ठुकरायी जातीं, उनके अभिनय को औसत कहा जाता। यही वह दौर था, जब उनका आत्मविश्वास डगमगाने लगा और शायद यहीं से उनके भीतर वह ज़िद पैदा हुई, जिसने आगे चलकर उन्हें सिनेमा में असाधारण बना दिया।

इसी असफलता ने उन्हें उस माध्यम की ओर धकेला, जिसे उस समय बहुत गंभीरता से नहीं लिया जाता था— चलचित्र।

सिनेमा के इतिहास में ग्रिफिथ का प्रवेश

ग्रिफ़िथ ने 1908 में उन्होंने Biograph Company में एक अभिनेता के रूप में काम शुरू किया। यह एक संयोग था, लेकिन यही संयोग सिनेमा के इतिहास का निर्णायक मोड़ बन गया। जल्द ही उन्हें निर्देशन का मौक़ा मिला और यहीं से उनका असली प्रयोग शुरू हुआ।

1908 से 1913 के बीच ग्रिफ़िथ ने सैकड़ों छोटी फ़िल्मों का निर्देशन किया— इतनी तेज़ी से कि यह संख्या 400 से भी अधिक पहुँच गयी। यह केवल उत्पादन नहीं था, बल्कि एक प्रयोगशाला थी। हर फ़िल्म में वे कुछ नया आज़माते— कैमरे की दूरी बदलना, दृश्य को काटकर जोड़ना, और सबसे महत्वपूर्ण, यह समझना कि दर्शक किस तरह भावनात्मक रूप से प्रतिक्रिया देते हैं। उन्होंने महसूस किया कि सिनेमा केवल घटनाओं को दिखाने का माध्यम नहीं है; यह दर्शकों के भीतर भावनाओं को जगाने का सबसे शक्तिशाली साधन बन सकता है।

यहीं से उन्होंने सिनेमा की भाषा को गढ़ना शुरू किया। पहले कैमरा दूर से स्थिर रहता था, जैसे दर्शक थिएटर देख रहा हो। ग्रिफ़िथ ने चेहरों को पास लाकर दिखाया— क्लोज़-अप के माध्यम से। अचानक दर्शक केवल दृश्य नहीं देख रहा था, बल्कि चरित्र की आँखों में झाँक रहा था, उसकी भावनाओं को महसूस कर रहा था। यह एक साधारण तकनीकी बदलाव नहीं था; यह सिनेमा के अनुभव को पूरी तरह बदल देने वाला क़दम था।

इसके साथ ही उन्होंने समानांतर संपादन को विकसित किया— एक ऐसी तकनीक जिसमें अलग-अलग स्थानों पर घट रही घटनाओं को एक साथ दिखाया जाता है। इससे सस्पेंस पैदा होता, समय की गति तेज़ होती, और कहानी में तनाव आता। दर्शक अब केवल देख नहीं रहा था; वह कहानी के भीतर खिंचता चला जा रहा था। यह वही तकनीक है जो आज हर थ्रिलर, हर एक्शन फ़िल्म और हर भावनात्मक क्लाइमेक्स में दिखायी देती है।

लेकिन ग्रिफ़िथ का सबसे बड़ा क़दम 1915 में आया, जब उन्होंने अपनी सबसे प्रसिद्ध और सबसे विवादास्पद— फ़िल्म बनायी: The Birth of a Nation। यह फ़िल्म तकनीकी रूप से क्रांतिकारी थी। यह लगभग कुल 2 घंटे 45 मिनट की फ़िल्म थी (लगभग 165 मिनट)। यह दो भागों में प्रदर्शित की जाती थी। उस समय के हिसाब से यह एक “अविश्वसनीय रूप से लंबी” फ़िल्म थी। इसने साबित किया कि दर्शक लंबे समय तक बैठकर जटिल कहानी देख सकते हैं। साथ ही, इस फ़िल्म ने यह भी तय किया कि आने वाले समय में सिनेमा सिर्फ़ कुछ क्षणों या मिनटों के मनोरंजन का ही नहीं बल्कि एक महाकाव्यात्मक कथा कहने की क्षमता रखता है। इस फ़िल्म की रिलीज़ के साथ ही सिनेमा ने उस दिन अपनी ताक़त साबित की थी और साथ ही एक सवाल भी उठाया था कि सिनेमा आख़िर क्या-क्या कर सकता है?

सिनेमा से खड़ा हुआ पहला सामाजिक विवाद

दुनिया ने पहली बार एक ऐसी फ़िल्म देखी, जो समय से बड़ी थी… जो सिर्फ़ मनोरंजन नहीं, एक अनुभव थी। भव्य सेट, हज़ारों लोगों की भीड़ एक साथ परदे पर उमड़ रही थी, युद्ध के दृश्यों में घोड़े, हाथी, धुँआ, चीख-पुकार की आवाज़ें और फ़िल्म के लिए विशेष रूप से बनाया गया संगीत स्कोर, इतने गहरे क्लोज़अप शॉट्स कि किरदारों के चेहरे की लकीरों के साथ-साथ उनके इमोशन्स भी परदे पर सजीव हो उठे थे। एक ओर ‘द बर्थ आफ़ अ नैशन’ फ़िल्म उस दौर में एक मास्टरपीस की तरह लोगों के सामने आयी तो वहीं इसने उस दौर की सबसे प्रॉब्लमैटिक फ़िल्म का ख़िताब भी अपने नाम कर लिया। इसी फ़िल्म ने ग्रिफ़िथ की विरासत को जटिल बना दिया। इसमें नस्लवादी विचारधारा थी और इसमें Ku Klux Klan का महिमामंडन किया गया था।

कू क्लक्स क्लैन एक गुप्त संगठन था, जिसकी शुरूआत 1865 के आस-पास अमेरिका में गृह युद्ध के तुरंत बाद हुई थी। इतिहासकारों की मानें तो यह कोई साधारण संगठन नहीं था बल्कि यह एक हिंसक, नस्लवादी आतंक समूह था जिसका मूल उद्देश्य श्वेत (White) लोगों की “सर्वोच्चता” बनाये रखना, अश्वेत (Black) लोगों और उनके अधिकारों का विरोध करना और उन पर डर, हिंसा और आतंक के ज़रिये नियंत्रण क़ायम करना था। बात उस दौर की है जब अमेरिका गृह युद्ध के गहरे घाव से उबर रहा था। ग़ुलामी का अंत घोषित हो चुका था, लेकिन समाज के भीतर बराबरी अभी भी एक अधूरा सपना था।

इसी उथल-पुथल के बीच एक ऐसा संगठन जन्म लेता है, जो ख़ुद को “रक्षक” कहता है, लेकिन जिसका अस्तित्व डर और हिंसा पर टिका है। यह था Ku Klux Klan। इसके सदस्य रात के अंधेरे में, सफ़ेद चोग़े में और चेहरे ढँककर घोड़ों पर निकलते थे और बिल्कुल वे किसी भूत की तरह लगते थे। लेकिन उनका काम था- उन लोगों को डराना, दबाना और मिटाना जो अब बराबरी की मांग कर रहे थे। ख़ासकर अश्वेत (ब्लैक) समुदाय, जिन्हें क़ानून ने तो आज़ादी दी थी, लेकिन समाज ने अभी भी स्वीकार नहीं किया था।

यह कहानी इतिहास में हमेशा दफ़न रहती अगर ग्रिफ़िथ की ‘द बर्थ आफ़ अ नैशन’ ने इसको परदे पर ज़िन्दा न किया होता। एक भरे हुए थिएटर में, पर्दा उठता है और स्क्रीन पर एक भव्य कहानी चलने लगती है। दर्शक चकित हैं। इतनी लंबी फ़िल्म, इतने बड़े दृश्य, इतनी भावनाएँ— सिनेमा पहले कभी ऐसा नहीं लगा था। और इस सबके पीछे था एक नाम… ग्रिफ़िथ।

फ़िल्म आगे बढ़ती है। युद्ध के दृश्य, टूटते परिवार, बदलता समाज। लेकिन धीरे-धीरे कहानी एक दिशा लेने लगती है। अश्वेत पात्रों को ख़तरनाक, अस्थिर और हिंसक रूप में दिखाया जाता है और फिर एक मोड़ आता है।

स्क्रीन पर वही सफ़ेद चोग़े दिखायी देते हैं। लेकिन इस बार वे डरावने नहीं दिखते। इस बार वे “नायक” हैं।

दर्शकों के सामने एक ऐसी कहानी रखी जा रही थी, जिसमें Ku Klux Klan को देश का रक्षक बताया गया था, एक ऐसा समूह जो व्यवस्था और “सभ्यता” को बचा रहा है। थिएटर में बैठे कई लोग इसे तालियों के साथ स्वीकार करते हैं। उनके लिए यह सिर्फ़ फ़िल्म नहीं, एक भावनात्मक सत्य जैसा लगता है।

लेकिन बाहर की दुनिया में एक अलग प्रतिक्रिया जन्म ले रही थी। कुछ लोग स्तब्ध थे। कुछ ग़ुस्से में थे। अफ्रीकी-अमेरिकी समुदाय के लिए यह फ़िल्म सिर्फ़ एक कहानी नहीं थी— यह उनके अस्तित्व के ख़िलाफ़ एक बयान थी। वे सड़कों पर उतर आये। विरोध प्रदर्शन शुरू हुए। अख़बारों में बहस छिड़ गयी। सवाल उठने लगे— क्या सिनेमा को यह अधिकार है कि वह इतिहास को इस तरह बदल दे? फ़िल्म के दृश्य अब सिर्फ़ पर्दे तक सीमित नहीं रहे थे। उनका असर बाहर फैल रहा था। और फिर, एक और ख़तरनाक बात हुई।

वही समूह, जो कभी धीरे-धीरे ख़त्म हो रहा था, Ku Klux Klan— फिर से सक्रिय होने लगा। लोग फ़िल्म से प्रेरित होकर उसमें शामिल होने लगे। एक काल्पनिक “हीरो” वास्तविक दुनिया में फिर से जीवित हो रहा था। यह वह क्षण था, जब दुनिया ने पहली बार सिनेमा की असली शक्ति को महसूस किया। यह सिर्फ़ मनोरंजन नहीं था। यह विचार था। प्रभाव था और कभी-कभी ख़तरा भी।

ग्रिफ़िथ ने ख़ुद को बचाने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि उन्होंने केवल इतिहास को दिखाया है, कोई ग़लत संदेश देने की मंशा नहीं थी। लेकिन अब बात मंशा से आगे बढ़ चुकी थी। सवाल यह नहीं था कि उन्होंने क्या सोचा! सवाल यह था कि लोगों ने क्या देखा और उससे क्या सीखा। द बर्थ आफ़ अ नैशन ने सिनेमा को नयी ऊँचाई दी लेकिन उसी के साथ उसने यह भी दिखा दिया कि ऊँचाई के साथ ही गिरने का ख़तरा भी बढ़ जाता है। इस पूरे विवाद ने सिनेमा के सामने एक नया दर्पण रख दिया।

क्या फिल्म केवल कला है? या वह समाज की ज़िम्मेदारी भी उठाती है?

1915 में, फ़िल्म रिलीज़ के कुछ ही समय बाद जॉर्जिया में स्टोन माउंटेन पर Ku Klux Klan को औपचारिक रूप से फिर से स्थापित किया गया और कहा जाता है इस पुनर्जीवन के पीछे फ़िल्म का ही  सीधा प्रभाव था। यह पहली बार था, जब एक फ़िल्म ने सिर्फ़ कहानी नहीं सुनायी बल्कि एक विचारधारा को ताक़त दी और सबसे ख़तरनाक बात उस विचारधारा के लोग ख़ुद उस फ़िल्म को देखकर और मज़बूत हो गये।

जवाब में एक और फ़िल्म

शुरूआत में, ग्रिफ़िथ को लगा था कि उन्होंने कुछ असाधारण रच दिया है और तकनीकी रूप से, यह सच भी था। लेकिन उन्हें शायद यह अंदाज़ा नहीं था कि उनकी फ़िल्म पर्दे से बाहर निकलकर समाज में तूफ़ान खड़ा कर देगी। ग्रिफ़िथ के लिए यह एक झटका था। उन्होंने ख़ुद को एक कलाकार के रूप में देखा था— एक ऐसा व्यक्ति जो “कहानी” कह रहा है। लेकिन अब उन पर आरोप लग रहे थे कि उन्होंने नफ़रत को बढ़ावा दिया है, पहले उन्होंने चुपचाप यह सब देखा। फिर धीरे-धीरे उन्होंने प्रतिक्रिया देना शुरू किया। उनका पहला बचाव सीधा था, “मैंने कुछ नया नहीं बनाया… मैंने तो सिर्फ़ इतिहास दिखाया है।”

जैसे-जैसे आलोचना बढ़ती गयी, ग्रिफ़िथ का स्वर भी बदलने लगा। अब वे सिर्फ़ सफ़ाई नहीं दे रहे थे— वे ख़ुद को पीड़ित महसूस करने लगे थे। उन्होंने कहा कि उन्हें “ग़लत समझा जा रहा है।” एक कलाकार के रूप में उनकी स्वतंत्रता पर हमला हो रहा है। लोग उनकी फ़िल्म को देखने के बजाय, उस पर निर्णय सुना रहे हैं। यह प्रतिक्रिया केवल सार्वजनिक बयान तक सीमित नहीं रही। उन्होंने इसे अपने काम के ज़रिये जवाब देने का फ़ैसला किया। और आलोचना के जवाब में उन्होंने 1916 में बनायी एक और फ़िल्म इनटॉलरेंस Intolerance— एक महत्वाकांक्षी फ़िल्म जिसमें संपादन और संरचना का अद्भुत प्रयोग था।

इसमें उन्होंने चार अलग-अलग युगों की कहानियाँ दिखायीं, हर युग में असहिष्णुता, अन्याय और मानवता के ख़िलाफ़ हिंसा को दर्शाया गया। यह ऐसा मालूम होता था जैसे ग्रिफ़िथ का संदेश था, “देखो, समस्या मैं नहीं हूँ… समस्या असहिष्णुता है, जो हर युग में मौजूद रही है।” लेकिन यह फ़िल्म दर्शकों के लिए बहुत जटिल साबित हुई और व्यावसायिक रूप से असफल रही। यह ग्रिफ़िथ के जीवन का एक महत्वपूर्ण मोड़ था— उनकी रचनात्मक ऊँचाई और व्यावसायिक गिरावट का संगम।

लेकिन यह जवाब द बर्थ आफ़ अ नैशन के विवाद को पूरी तरह शांत नहीं कर सका। समाज के एक हिस्से के लिए, ग्रिफ़िथ अभी भी वही व्यक्ति थे, जिन्होंने एक ख़तरनाक विचार को सुंदर रूप में पेश किया था। समय बीतता गया। सिनेमा बदलता गया। नयी पीढ़ी के फ़िल्मकार आये और ग्रिफ़िथ— जो कभी सिनेमा की भाषा गढ़ रहे थे— धीरे-धीरे उस भाषा के भीतर ही पीछे छूटने लगे। लेकिन उनकी प्रतिक्रिया, उनका बचाव, और उनका यह विश्वास कि वे “सही” हैं, यह सब इतिहास में दर्ज रह गया।

उनकी कहानी हमें एक असहज सच के सामने खड़ा करती है – कभी-कभी कलाकार यह नहीं देख पाता कि उसकी रचना का असर क्या होगा और जब दुनिया उसे आईना दिखाती है, तो वह उसे स्वीकार करने के बजाय… उससे बचने की कोशिश करता है। ग्रिफ़िथ ने अपने तरीक़े से जवाब दिया— फ़िल्म बनाकर, विचार रखकर, और ख़ुद को सही साबित करने की कोशिश करके। लेकिन इतिहास ने उनका फ़ैसला दो हिस्सों में किया— एक, जिसने सिनेमा को भाषा दी। और दूसरा, जिसने उस भाषा के इस्तेमाल पर हमेशा के लिए एक सवाल छोड़ दिया।

ग्रिफ़िथ ने अपने पूरे करियर में करीब 520 फ़िल्मों का निर्देशन किया जिसमें 450+ लघु फिल्में थीं और करीब 30-40 फ़ीचर फ़िल्में। इनमें से क़रीब 250-300 शुरूआती लघु फ़िल्में खो चुकी हैं लेकिन बची हुई फ़िल्में आज भी अमेरिका के अलग-अलग आर्काइव और म्यूज़ियम में सुरक्षित हैं।

निजी जीवन से पहले सिनेमा

उनकी निजी ज़िंदगी में स्थिरता कभी पूरी तरह नहीं आयी। उन्होंने 1906 में लिंडा आर्विडसन से विवाह किया, जो स्वयं एक अभिनेत्री थीं और बाद में उनकी कई शुरूआती फ़िल्मों में दिखायी दे चुकी थीं। यह रिश्ता शुरूआत में सहयोग और साझेदारी का था; दोनों एक ही दुनिया में काम कर रहे थे, एक ही सपने देख रहे थे। लेकिन जैसे-जैसे ग्रिफ़िथ का करियर बढ़ा, उनके स्वभाव का दूसरा पहलू सामने आने लगा— उनका नियंत्रण प्रिय, काम में डूबा हुआ व्यक्तित्व। वे अपने काम में इतने खो जाते कि निजी रिश्तों के लिए जगह कम होती गयी। धीरे-धीरे यह विवाह टूटने लगा, और अंततः उनका अलगाव हो गया।

इसके बाद उन्होंने 1936 में एवलिन बाल्डविन से विवाह किया, लेकिन यह रिश्ता भी स्थायी नहीं रह सका। उनके जीवन में प्रेम था, लेकिन स्थिरता नहीं। ऐसा लगता है उनका सच्चा, सबसे गहरा रिश्ता सिनेमा के साथ ही था— एक ऐसा रिश्ता, जो उन्हें पूरी तरह घेर लेता था, और बाक़ी सब कुछ पीछे छूट जाता था।

ग्रिफ़िथ के कोई संतान नहीं थी। उनका जीवन, उनकी ऊर्जा, उनका समय— सब कुछ उनके काम में समा गया। शायद इसी कारण, जब उनका करियर ढलान पर आया, तो उनके पास वह निजी सहारा नहीं था, जो कई लोगों को अंत के वर्षों में संभालता है।

उनके व्यक्तित्व का एक महत्वपूर्ण पहलू था उनका काम करने का तरीक़ा। वे एक परफेक्शनिस्ट थे— लेकिन उस हद तक, जहाँ यह दूसरों के लिए कठिन हो जाता था। सेट पर वे पूरा नियंत्रण चाहते थे। कलाकारों से वे भावनात्मक रूप से गहरे प्रदर्शन की अपेक्षा करते और इसके लिए उन्हें मानसिक रूप से भी धकेलते थे। उनकी पसंदीदा अभिनेत्री, लिलियन गिश, ने बाद में लिखा कि ग्रिफ़िथ कलाकारों को उनकी सीमाओं तक ले जाते थे—कभी-कभी उससे भी आगे। उनके साथ काम करना एक अवसर भी था और एक चुनौती भी।

फिर भी, समय के साथ उनका मूल्यांकन जटिल होता गया। एक ओर, फ़िल्म इतिहासकार उन्हें सिनेमा का “व्याकरण रचने वाला” मानते हैं— वह व्यक्ति जिसने क्लोज़-अप, संपादन और भावनात्मक कथा को व्यवस्थित किया। दूसरी ओर, उनकी विचारधारा और उसके प्रभाव को लेकर आलोचना जारी रही। आज भी उनके नाम के साथ एक द्वंद्व जुड़ा है— सम्मान और असहजता का।

और फिर रियल ट्रैजडी

उनके जीवन के अंतिम वर्ष अपेक्षाकृत शांत और कुछ हद तक अकेलेपन में बीते। सिनेमा, जिसे उन्होंने नयी दिशा दी थी, अब एक विशाल उद्योग बन चुका था— लेकिन वे उसकी मुख्यधारा से बाहर थे। नयी पीढ़ी के फ़िल्मकार, नयी तकनीकें, और बदलता दर्शक— इन सबके बीच ग्रिफ़िथ धीरे-धीरे इतिहास का हिस्सा बनते गये। 1948 में उनका निधन लॉस एंजिल्स के एक होटल में हुआ। बिना उस भव्यता के, जो कभी उनके करियर के शिखर पर थी। लेकिन इतिहास का स्वभाव अलग होता है; वह धीरे-धीरे अपना निर्णय देता है। बाद के दशकों में फ़िल्म इतिहासकारों और फ़िल्म स्कूलों ने ग्रिफ़िथ को फिर से खोजा। उन्हें सिनेमा के “व्याकरण का वास्तुकार” कहा जाने लगा।

आज जब हम ग्रिफ़िथ को देखते हैं, तो उन्हें केवल एक महान निर्देशक या एक विवादास्पद व्यक्ति के रूप में नहीं देख सकते। वे दोनों हैं। उनका जीवन हमें यह सिखाता है कि कला और कलाकार अलग नहीं होते। उनकी उपलब्धियाँ जितनी बड़ी थीं, उनके प्रश्न भी उतने ही बड़े हैं। ग्रिफ़िथ की कहानी सिनेमा के विकास की कहानी भी है— एक ऐसी कला की, जो अपने साथ न केवल तकनीकी प्रगति लाती है, बल्कि नैतिक और सामाजिक सवाल भी खड़े करती है। और शायद यही कारण है कि उनका नाम आज भी इतिहास में जीवित है— एक ऐसे व्यक्ति के रूप में, जिसने सिनेमा को आवाज़ दी, लेकिन उस आवाज़ की दिशा को लेकर हमें सोचने पर मजबूर कर दिया।

अगर पोर्टर ने सिनेमा को कहानी कहना सिखाया, तो ग्रिफ़िथ ने उसे वह भाषा दी जिसमें वह कहानी दुनिया से बात कर सके। उनकी यात्रा हमें यह भी सिखाती है कि महानता केवल उपलब्धियों में नहीं, बल्कि उन विरोधाभासों में भी होती है जो एक कलाकार को जटिल और मानवीय बनाते हैं। सिनेमा के इतिहास में उनका स्थान इसलिए स्थायी है क्योंकि उन्होंने केवल फ़िल्में नहीं बनायीं, उन्होंने एक पूरी कला को उसकी आवाज़ दी।

ग्रिफ़िथ ने पूरी ज़िंदगी सिनेमा को एक पैशन की तरह जिया और जो उनकी फ़िल्मों में भी साफ़ तौर पर दिखायी देता है लेकिन इसके चलते वो अपनी व्यक्तिगत ज़िंदगी को कभी सहेज नहीं सके। आज उनकी विरासत, उनकी फ़िल्में अब सिनेमाघरों में नहीं, इतिहास की तिजोरियों में सांस ले रही हैं। और शायद यही सबसे बड़ी विरासत है कि उसकी कहानी अभी ख़त्म नहीं हुई – वह हर फ्रेम में आज भी चल रही है।

चारु शर्मा, charu sharma

चारु शर्मा

फ़िल्मकार, लेखक, प्रोड्यूसर और सांस्कृतिक क्यूरेटर। यथाकथा फ़िल्म एंड लिटरेचर फ़ेस्टिवल की संस्थापक। चारु मुख्यतः सामाजिक मुद्दों और ऐतिहासिक कथाओं संबंधी डॉक्यूमेंट्री फिल्मों, सांस्कृतिक कार्यक्रमों और कंटेंट पर केंद्रित हैं। व्यक्तित्वों, विचारों आदि के दस्तावेज़ीकरण से जुड़े प्रोजेक्ट्स से जुड़ी रही हैं। फ़ीचर-लेंथ डॉक्यूमेंट्री “एम्बेसडर ऑफ़ सोशलिज़्म – लाइफ एंड टाइम्स ऑफ डॉ. राममनोहर लोहिया” उनके प्रमुख कार्यों में शामिल है। संपर्क: 9082050680

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