
- April 15, 2026
- आब-ओ-हवा
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पाक्षिक ब्लॉग डॉ. संजीव जैन की कलम से....
लेखन बोलना नहीं, अभिव्यक्त होना है
ध्वनि से अर्थ तक: लेखन की आंतरिक यात्रा का पांचवा अध्याय…
मनुष्य बोलना सीखता है, पर अभिव्यक्त होना नहीं सीखता— वह उसके भीतर पहले से होता है। लेखन उसी अभिव्यक्ति की परिपक्व यात्रा है।
मनुष्य जब जन्म लेता है, वह भाषा नहीं जानता। वह शब्दों का अर्थ नहीं समझता, व्याकरण नहीं पहचानता, वाक्य नहीं बना सकता। फिर भी वह अभिव्यक्त होता है। उसका रोना, उसकी आँखों का फैलना, उसकी पकड़, उसकी देह की बेचैनी— ये सब अभिव्यक्ति हैं। कोई उसे सिखाता नहीं कि दुख कैसे जताना है, सुकून कैसे पाना है, निकटता कैसे माँगनी है। यह सब उसके भीतर पहले से है। जैसे जीवन के साथ एक मौन भाषा भी जन्म लेती है।
बोलना एक कौशल है, अभिव्यक्त होना एक स्वभाव। कौशल सीखा जाता है; स्वभाव पहचाना जाता है। यही भेद समझ लेना लेखन को समझने की पहली सीढ़ी है। हम बोलना सीखते हैं— माता-पिता से, समाज से, विद्यालय से। पर जो भीतर अनुभव होता है, उसे बाहर आने की चाह सीखनी नहीं पड़ती। वह अपने रास्ते खोज लेती है— कभी आँसू से, कभी हँसी से, कभी मौन से।
समस्या तब शुरू होती है जब समाज हमें बोलना तो सिखाता है, पर अभिव्यक्ति को नियंत्रित करना भी सिखाता है। “ऐसे मत रोओ”, “ऐसे मत हँसो”, “यह मत कहो”, “यह ठीक नहीं लगता।” धीरे-धीरे मनुष्य अपनी स्वाभाविक अभिव्यक्ति पर पहरा लगाना सीख जाता है। वह शिष्ट हो जाता है, सामाजिक हो जाता है, पर भीतर कहीं कुछ सिकुड़ने लगता है। उसकी अभिव्यक्ति बची रहती है, पर ढँकी हुई।
यहीं से लेखन का महत्व शुरू होता है। लेखन कई बार उस ढँकी हुई अभिव्यक्ति को फिर से रास्ता देता है। जो बात सीधे कहना कठिन है, वह लिखी जा सकती है। जो भावना बोलते समय टूट जाती है, वह लिखते समय टिक सकती है। लेखन अभिव्यक्ति का विकल्प नहीं, उसका विस्तृत रूप है— जहाँ अनुभव को समय मिलता है, आकार मिलता है, ठहराव मिलता है।
अभिव्यक्ति मूलतः भीतर की ऊर्जा का बाहर की ओर प्रवाह है। जब यह प्रवाह सहज होता है, मनुष्य हल्का महसूस करता है। जब यह रुकता है, भीतर दबाव बनता है। आधुनिक मनोविज्ञान भी मानता है कि दबी हुई भावनाएँ मनोवैज्ञानिक तनाव का कारण बन सकती हैं। लेखन इस दबाव को रचनात्मक दिशा दे सकता है। पर यह तभी संभव है जब लेखन सचमुच अभिव्यक्ति बने, प्रदर्शन नहीं।
आज बहुत-सा लेखन प्रदर्शन है— प्रभाव डालने का, बुद्धिमान दिखने का, संवेदनशील दिखने का। वहाँ शब्द चुने जाते हैं, पर अनुभव नहीं खुलते। यह लेखन सामाजिक हो सकता है, साहित्यिक भी, पर वह आत्मिक स्तर पर मुक्त नहीं करता। क्योंकि वहाँ अभिव्यक्ति नहीं, छवि काम कर रही होती है।
सच्ची अभिव्यक्ति में जोखिम है। क्योंकि वह हमें हमारे बनाये हुए व्यक्तित्व से बाहर लाती है। वह दिखा सकती है कि हम जितना समझते हैं, उतने सरल नहीं; जितना मानते हैं, उतने दृढ़ नहीं; जितना दिखते हैं, उतने संतुलित नहीं। इसलिए मनुष्य अक्सर अभिव्यक्ति से बचता है। वह सुरक्षित भाषा चुनता है। लेखन तब आदत बन जाता है, अन्वेषण नहीं।
यदि हम बचपन को देखें तो पाएँगे कि बच्चे अभिव्यक्ति में निपुण होते हैं। वे अपनी खुशी छिपाते नहीं, अपने दुख को तर्क से नहीं ढँकते। वे पूर्णता से व्यक्त होते हैं। जैसे-जैसे वे बड़े होते हैं, वे बोलना बेहतर सीखते हैं, पर अभिव्यक्त होना कम। यह विरोधाभास आधुनिक मनुष्य की त्रासदी है— वह भाषा में समृद्ध है, अभिव्यक्ति में गरीब।
लेखन इस दूरी को कम कर सकता है। पर इसके लिए लेखक को अपने भीतर लौटना पड़ता है— उस जगह जहाँ अनुभव शब्दों से पहले जन्म लेते हैं। जब कोई लेखक लिखते समय यह पूछे कि “मैं क्या कहना चाहता हूँ” से पहले “मैं क्या महसूस कर रहा हूँ,” तभी लेखन अभिव्यक्ति की यात्रा बनता है।
लेखन की परिपक्वता का अर्थ कठिन शब्द नहीं, गहरी सच्चाई है। एक सरल वाक्य भी गहरा हो सकता है यदि वह अनुभव से आया हो। और एक जटिल वाक्य भी खोखला हो सकता है यदि वह सिर्फ़ प्रभाव के लिए गढ़ा गया हो। परिपक्व लेखन का संबंध भाषा की सजावट से कम, संवेदना की प्रामाणिकता से अधिक है।

अभिव्यक्ति का एक और आयाम है— मौन। हम अक्सर अभिव्यक्ति को बोलने या लिखने से जोड़ते हैं, पर कई बार अभिव्यक्ति मौन में होती है। किसी की उपस्थिति, किसी का स्पर्श, किसी की चुप्पी— ये भी अभिव्यक्ति हैं। लेखन जब परिपक्व होता है, तो वह मौन को भी जगह देता है। वह सब कुछ कह नहीं देता। वह पाठक को महसूस करने की जगह देता है।
लेखन की यात्रा कच्ची अभिव्यक्ति से परिपक्व अभिव्यक्ति तक की यात्रा है। कच्ची अभिव्यक्ति तत्काल होती है— जैसी भावना, वैसा शब्द। परिपक्व अभिव्यक्ति देखती है, समझती है, फिर व्यक्त होती है। इसमें समय है, धैर्य है, आत्म-साक्षात्कार है। यह दमन नहीं, परिष्कार है।
इस परिष्कार का अर्थ भावनाओं को दबाना नहीं, उन्हें समझना है। जब लेखक अपने क्रोध को लिखता है और लिखते-लिखते देखता है कि उसके पीछे चोट है, उसके पीछे अपेक्षा है—तब अभिव्यक्ति गहरी होती है। वह प्रतिक्रिया से आगे बढ़कर समझ बनती है। यही परिपक्वता है।
लेखन मनुष्य को स्वयं से मिलाता है। हम अक्सर सोचते हैं कि हम अपने को जानते हैं, पर जब लिखते हैं तो कई अनजानी बातें सामने आती हैं। कोई स्मृति अचानक खुल जाती है, कोई दबा प्रश्न उठता है, कोई भूला हुआ डर दिख जाता है। लेखन भीतर के कमरे खोल सकता है— यदि लेखक सचमुच देखने को तैयार हो।
इस अर्थ में लेखन आत्म-संवाद है। जैसे मनुष्य अपने ही भीतर बैठकर स्वयं से बात कर रहा हो। यह संवाद कई बार उपचार भी बन सकता है। जब अनुभव शब्द पाते हैं, वे अस्पष्ट नहीं रहते। उन्हें देखा जा सकता है, समझा जा सकता है। यह स्पष्टता ही कई बार शांति लाती है।
पर लेखन का लक्ष्य उपचार नहीं होना चाहिए; लक्ष्य ईमानदारी होना चाहिए। उपचार तो उसका परिणाम हो सकता है। यदि लेखक सिर्फ़ हल्का होने के लिए लिखता है, तो वह गहराई से बच सकता है। पर यदि वह देखने के लिए लिखता है, तो हल्कापन स्वयं आ सकता है।
अभिव्यक्ति की परिपक्व यात्रा में एक चरण ऐसा भी आता है जहाँ लेखक कम बोलता है, पर अधिक कहता है। उसके शब्दों में अनावश्यकता कम होती जाती है। जैसे नदी अपने रास्ते साफ करती हुई बहती है। यह सरलता प्रयास से नहीं आती; यह देखने से आती है। जितना मन स्पष्ट, उतनी अभिव्यक्ति पारदर्शी।
लेखन अंततः भीतर और बाहर के बीच एक पुल है। भीतर अनुभव है, बाहर भाषा। यह पुल जितना ईमानदार होगा, अभिव्यक्ति उतनी सच्ची होगी। यदि बीच में डर, दिखावा, या जल्दबाज़ी आ जाए, तो पुल कमजोर हो जाता है।
मनुष्य बोलना सीखता है— यह सामाजिक विकास है। मनुष्य अभिव्यक्त होना पहचानता है—यह आंतरिक जागरण है। लेखन इन दोनों के बीच की परिपक्व कड़ी है।
यह हमें सिखाता है कि भीतर जो है, उसे बाहर आने की जगह दी जाये— सजाकर नहीं, समझकर। लेखन तब कला से आगे बढ़कर साधना बन सकता है। साधना— जहाँ हर शब्द स्वयं को थोड़ा और स्पष्ट देखने का अवसर हो।
और शायद अंततः लेखन का सबसे बड़ा उपहार यही है— वह हमें दूसरों से पहले स्वयं के प्रति ईमानदार बनाता है। जब मनुष्य स्वयं से ईमानदार होता है, तब उसकी अभिव्यक्ति दूसरों तक भी सच्चाई के साथ पहुँचती है।
तब लेखन सिर्फ़ लिखा हुआ नहीं रहता, जिया हुआ होता है। और जिया हुआ शब्द ही पाठक के भीतर जगह बनाता है। क्योंकि अभिव्यक्ति सीखी नहीं जाती—पहचानी जाती है। और लेखन उसी पहचान की परिपक्व यात्रा है।
“लेखन बोलना नहीं, अभिव्यक्त होना है”— यह वाक्य साधारण लगता है, पर इसके भीतर चेतना की एक बहुत गहरी परत छिपी है।
बोलना समय में होता है, लेखन समय के बाहर – जब हम बोलते हैं, शब्द जन्म लेते ही मर जाते हैं। पर लेखन… वह समय के प्रवाह से बाहर खड़ा होता है। लेखन में लिखा गया एक वाक्य लेखक के “उस क्षण” को अनंत क्षणों में बाँट देता है। इसलिए लेखन केवल संप्रेषण नहीं—समय को स्थिर करने का प्रयास है।
बोलना ध्वनि है, लेखन मौन का आकार
बोलना ध्वनि का विस्तार है, पर लेखन… मौन का मूर्त रूप। जब आप लिखते हैं, आप शब्द नहीं लिखते— आप अपने भीतर के मौन को आकार देते हैं और मौन ही वह जगह है, जहाँ सबसे सच्ची अभिव्यक्ति जन्म लेती है।
लेखन में “मैं” घुल जाता है- बोलते समय “मैं” बहुत सक्रिय रहता है— मैं क्या कहूँ? लोग क्या सोचेंगे? पर जब लेखन गहरा होता है, तो “मैं” धीरे-धीरे विलीन हो जाता है। एक बिंदु आता है जहाँ— लेखक नहीं लिखता, लेखन स्वयं घटित होता है। वहीं से असली अभिव्यक्ति शुरू होती है।
लेखन शब्दों के बीच की खाली जगह है- हम सोचते हैं लेखन शब्दों से बनता है— पर सच यह है कि लेखन शब्दों के बीच की ख़ामोशियों में छिपा होता है। वही विराम, वही ठहराव—जहाँ पाठक अपने अनुभव भरता है। लेखन तब पूर्ण होता है जब लेखक और पाठक दोनों मिलकर उसे रचते हैं।
लेखन एक “अनकही स्मृति” का पुनर्जन्म है- कभी-कभी हम जो लिखते हैं, वह हमने कभी सोचा भी नहीं होता। वह जैसे कहीं गहरे दबा हुआ था— अचेतन में, या उससे भी नीचे। लेखन उसे ऊपर लाता है— जैसे कोई पुरातत्वविद् धरती के भीतर से कोई प्राचीन सभ्यता खोज ले। इसलिए लेखन केवल अभिव्यक्ति नहीं, खोज (Discovery) भी है— स्वयं की।
लेखन भाषा से परे जाता है- जब लेखन बहुत गहरा हो जाता है, तो भाषा केवल माध्यम रह जाती है, संदेश नहीं। तभी अलग-अलग भाषाओं के लोग भी एक ही लेखन को “महसूस” कर पाते हैं, क्योंकि असली लेखन शब्दों में नहीं, अनुभूति में लिखा जाता है।
लेखन “अस्तित्व का हस्ताक्षर” है- हर व्यक्ति बोल सकता है, पर हर व्यक्ति लिख नहीं सकता, क्योंकि लिखना मतलब— अपने अस्तित्व पर हस्ताक्षर करना। यह कहना कि— “मैं यहाँ था, मैंने अनुभव किया और यह मेरा साक्ष्य है।”
लेखन एक सूक्ष्म प्रतिरोध है- लेखन हमेशा व्यवस्था के ख़िलाफ़ नहीं होता, पर वह हमेशा “विस्मृति” के ख़िलाफ़ होता है। जब आप लिखते हैं, आप भूलने के विरुद्ध खड़े होते हैं। लेखन स्मृति का विद्रोह है।
लेखन एक आंतरिक प्रयोगशाला है- आपके भीतर जो विचार हैं— वे स्थिर नहीं, तरल हैं। लेखन उन्हें ठोस बनाता है, ताकि आप उन्हें देख सकें, परख सकें, बदल सकें। इस अर्थ में लेखन विज्ञान की तरह एक प्रयोग है— बस प्रयोगशाला भीतर है।
लेखन “होना” है- जब लेखन अपनी चरम अवस्था में पहुँचता है, तो वह अभिव्यक्ति भी नहीं रह जाता। वह केवल “होना” बन जाता है। कोई प्रयास नहीं, कोई उद्देश्य नहीं—बस एक प्रवाह…जैसे नदी बहती है, वैसे ही शब्द बहते हैं।
निष्कर्ष- “लेखन बोलना नहीं, अभिव्यक्त होना है”— क्योंकि बोलना बाहर की ओर जाता है, और लेखन भीतर से बाहर आता है। बोलना दुनिया को बदलने की कोशिश है, लेखन स्वयं को देखने की प्रक्रिया।
स्याही नहीं थी—
फिर भी उँगलियाँ काली थीं,
जैसे किसी अदृश्य रात को छू आया हूँ मैं।
काग़ज़ सफ़ेद नहीं था—
वह एक मौन था,
जिसमें मेरे भीतर की अनगिनत असफल ध्वनियाँ
धीरे-धीरे डूब रही थीं।
मैं लिख नहीं रहा था—
कुछ मेरे भीतर से रिस रहा था,
जैसे समय की किसी दरार से
अनकही स्मृतियाँ टपकती हैं।
शब्द आए—
पर वे शब्द नहीं थे,
वे छायाएँ थीं
उन अनुभूतियों की
जिन्हें मैंने कभी पूरी तरह जिया ही नहीं।
हर वाक्य के बाद
एक खाई खुलती थी—
जहाँ अर्थ गिरकर टूट जाता,
और केवल अनुभव बचता।
मैंने देखा—
लेखन पंक्तियों में नहीं होता,
वह उन खाली जगहों में होता है
जहाँ मैं स्वयं अनुपस्थित हो जाता हूँ।
एक क्षण आया—
जब “मैं” ने लिखना बंद कर दिया,
और लेखन ने “मुझे” लिखना शुरू किया।
अब काग़ज़ पर जो था
वह मेरा नहीं था—
वह उस मौन का हस्ताक्षर था
जो जन्म से पहले भी था
और मृत्यु के बाद भी रहेगा।
मैंने कलम रख दी—
पर लेखन रुका नहीं।
वह अब भी चल रहा है—
मेरी नाड़ी में,
मेरी श्वास में,
और उस शून्य में
जहाँ कोई शब्द नहीं पहुँचता।
शायद—
लेखन कभी लिखा ही नहीं जाता,
वह केवल प्रकट होता है
जब हम धीरे-धीरे
गायब होने लगते हैं।

संजीव कुमार जैन
लंबे समय से साहित्य के स्वाध्याय एवं अध्यापन से जुड़े संजीव सरोजिनी नायडू शासकीय कन्या स्नातकोत्तर स्वशासी महाविद्यालय, भोपाल में हिंदी के सह प्राध्यापक हैं। आपकी अभिरुचि पढ़ना लिखना है लेकिन अधिक प्रकाशन से आप गुरेज़ करते हैं।
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